एक ज्वलंत विश्लेष्णात्मक प्रश्न


1940 के दशक की शुरूआत में ही लंदन के शीर्ष अखबार ‘ट्रुथ’ ने लिखा था –
“गांधी पूंजीपतियों, राजा-महाराजाओं के संत हैं लेकिन पवित्र आत्मा होने का ढोंग करते हैं ।”
यह सच है क्योंकि बिड़ला, बजाज तथा सिंघानिया आदि सभी पूंजीपति उनके मित्र थे जिन्हें वे बड़ी चतुराई से ट्रस्टी कहते थे ।

सुभाषचंद्र बोस ने नेहरू के बारे में कहा – नेहरू अवसरवादी है, वह दूसरों का बाद में सोचते हैं, पहले अपना हित निश्चित करते हैं ।
गांधी ने नेहरू के बारे में कहा कहा था – नेहरू मेरी सबसे बड़ी कमजोरी है ।

कौन किसकी कमजोरी थी, अब तो ऐतिहासिक रूप से इतिहास ही पुनर्विचार करें ,,, कि क्यों नहीं सब कुछ वास्तविकता के साथ बदला जाये..
क्यों नहीं द्रोही व थोप नेतों की जगह असल सेनानियों को समक्ष लाकर उभारा जाये, स्वतंत्रता और राष्ट्रवाद को कांग्रेस-नेहरू-गांधी के दुश्चरित्र त्रिकोण के बाहर भी असली पहचान मिले, क्यों नहीं हम बदलें …??

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