कश्मीर – (भाग 2) काँग्रेस + अब्दुल्ला पार्टी + हुर्रियत का गिरोह और सुनियोजित इस्लामिक ‘आजादी’ = जेहाद का आयात (भाग 2)


image

दिल्ली की जामा मस्जिद के इलाके से गेस्ट हाऊस में हथियार और विस्फोटक पकडे जाते ही बडे बडे बुद्धिजीवी और विद्वान सारे ही मुसलमानों को ही आतंकी कहने साबित करने में जुट गये,,लेकिन इस कँटीले विषधारी पेड की जड़ नहीं पकड सकते…?
कश्मीर और कश्मीरियत का आतंकी और देशद्रोहिता का भरापूरा और वर्तमान तक में कायम इतिहास कैसे भूले जा रहे हो….?
हम कश्मीर में रह,कमा नहीं सकते धारा 370 है ना…?
लेकिन कश्मीरी जयपुर,जोधपुर, दिल्ली, हैदराबाद, लखनऊ आदि शहरों सहित पूरे भारत में रह,कमा सकता है, व्यापार, यात्राऐं कर सकता है,मकान,दुकान खरीद सकता है,नौकरियाँ, पासपोर्ट,निवास पत्र पा सकता है…?
इस घटना की जड़ यही है….
नामाकूल और नाफ़रमाबरद़ार ,जलील लोग कानूनन और राष्ट्रहित में घूमन्तू ना बना कर और एक ही राज्य में उनका एकाधिकार समाप्त करके ही बस में रखे जा सकतें हैं.

यदि सारे भारत के हर तरह के कैदी, अपराधी ही सरकारी प्रश्रय में सुविधा और हथियार समेत सीमाओं से दूर बसाना तो शुरू करो फिर देखियेगा कैसी अपूर्व शांति और भाईचारा,राष्ट्रीयता कायम रखने की गुहारों समेत भारत माता की जय पूरे कश्मीर से एक स्वर में समवेत गूंजने लगेगी…!
भारत में मुस्लिम आतंकवाद और भारत सहित भारतीयता के विरोध का जनक ही कश्मीर है,लगभग हर बडी छोटी आतंकी घटनाओं में जितना पाकिस्तान और पाकिस्तानी सम्मिलित रहे हैं उतना ही कश्मीरियों और कश्मीर का हाथ इन राष्ट्रद्रोही विचारों के पोषक और इन घटनाओं के सहयोगियों के रूप में रहा ही है।
पर सब इसकी फिक्र ना करो संजय दत्त का ही रोना रोते रहो…!!
दिल्ली की AK 47 और संजय दत्त की 3-3  AK56 के घटनाक्रम में मुझे कोई फर्क नहीं दिखता,,,!!
राष्ट्रद्रोही कर्म करने के बाद साबित होनें के लिये धार्मिकता या जनप्रिय नेता-अभिनेता होना किस प्रकार आडे आ सकता है?
सोचो……….

पी.ओ.के. में 50 हजार हिन्दू-सिखों के नरसंहार का जिम्मेदार कौन है ?

पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पी.ओ.के.) के लाखों शरणार्थी 66 वर्षों से विस्थापित कैंपों में ही रहते हैं। सरकार जबाव दे कि 66 वर्षों से पी.ओ.के. को वापिस लेने के लिये हमने क्या किया ?

1965 एवं 1971 में युध्द जीतने के बाद भी अपने क्षेत्र वापिस लेने के स्थान पर 1972 में शिमला समझौते में छम्ब का क्षेत्र भी हमने पाकिस्तान को क्यों दे दिया ?

संविधान सभा में जम्मू-कश्मीर का प्रतिनिधित्व स्वाधीनता अधिनियम 1947, का उल्लंघन कर महाराजा हरिसिंह के स्थान पर शेख अब्दुल्ला की इच्छा के अनुसार नेशनल कांफ्रेंस के प्रतिनिधियों को प्रतिनिधित्व देने के लिये संविधान सभा में प्रस्ताव क्यों लाया गया ?

स्वाधीनता अधिनियम के अनुसार आंतरिक प्रशासक शेख अब्दुल्ला को महाराजा एवं प्रधानमंत्री की देख-रेख में ही सरकार चलानी थी पर वे बार-बार महाराजा हरिसिंह और प्रधानमंत्री मेहरचंद महाजन का अपमान करते थे। उनको समझाने के स्थान पर अवैधानिक ढंग से पहले मेहरचंद महाजन और फिर महाराजा हरिसिंह को हटाने का कार्य केन्द्र सरकार ने क्यों किया ?
सीमापार और यहां तक कि कश्मीर घाटी में भी चल रहे आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों, कश्मीर में आने वाले समय में पाकिस्तान की आतंकवाद फैलाने की योजनाओं, बढ़ते मदरसे, जमायते-इस्लामी की कट्टरवाद फैलाने की गुप्तचर रिपोर्टों की राजीव गांधी सरकार ने 1984 से 1989 तक अनदेखी क्यों की ?

जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की भूमिका स्पष्ट होने के बाद भी राष्ट्रवादी शक्तियों को मजबूत करने के स्थान पर अलगाववादी मानसिकता की नेशनल कांफ्रेंस, पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी को बढावा क्यों दिया गया? कांग्रेस ने स्वयं अपने नेतृत्व को ही कश्मीर घाटी में कभी विकसित क्यों नहीं होने दिया ?

पी.वी. नरसिंहराव ने भी आजादी से कुछ कम (less than freedom, sky is the limit) जैसा आश्वासन क्यों दिया ?

1952 में नेहरू-शेख सहमति (दिल्ली प्रस्ताव), 1975 का शेख-इंदिरा समझौता, 1986 का राजीव-फारूक समझौता, नरसिंहराव की स्वायत्तता संबंधी घोषणा और अब वर्तमान सरकार की पाकिस्तान व अलगाववादियों से पिछले 5 वर्षों से चल रही गुपचुप वार्ता और भविष्य की स्वायत्तता की संभावित योजनायें क्या यह नहीं दर्शातीं कि कांग्रेस की अलगाववादियों के सामने घुटने टेकने की नीति व मुस्लिम बहुल क्षेत्र होने के कारण कश्मीर को अलग दर्जे की नीति ही कश्मीर की समस्या का वास्तविक कारण है ?

वास्तव में जम्मू-कश्मीर समस्या का मूल जम्मू-कश्मीर में नहीं है अपितु नई दिल्ली की केन्द्र सरकार में निहित है। इसलिये इसका समाधान भी जम्मू-कश्मीर को नहीं पूरे भारत को मिलकर खोजना है। समय आ गया है कि 66 वर्षों की कांग्रेस की नेहरूवादी सोच के स्थान पर भारतीय संविधान की मूल भावना एकजन-एकराष्ट्र को स्थापित किया जाय तथा अलग संविधान, अलग झंडा, अनुच्छेद-370 जैसी अलगाववादी मानसिकता को बढ़ावा देने वाली व्यवस्थाओं को समाप्त किया जाये।

यह आजाद भारत की सबसे बड़ी असफलता है कि 66 वर्षों में लाखों करोड़ रूपये खर्च कर, हजारों सैनिकों के बलिदान के पश्चात भी जम्मू-कश्मीर की देश के साथ मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक एकात्मता उत्पन्न नहीं की जा सकी। अनुच्छेद-370 के कारण वहां हमेशा एक एहसास रहता है कि हमारी एक अलग राष्ट्रीयता है, हम शेष भारत से अलग हैं। यहां का मीडिया एवं नेता हर समय इसे भारत के कब्जे वाला कश्मीर (India occupied Kashmir) ही संबोधित करते हैं।
भारत हर वर्ष अनुदान बढ़ाता रहता है। पिछले 20 वषों में 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक की केन्द्रीय सहायता-अनुदान कश्मीर को दिये गये। इससे अधिक विशेष बजटीय प्रावधान किये गये। यह परंपरा बन गयी कि प्रधानमंत्री के प्रत्येक दौरे में हजारों करोड़ के विशेष पैकेज की घोषणा की जाय। परन्तु फिर भी अलगाववाद बढ़ता ही जा रहा है। क्योंकि अलगाववादी भाषा से अलगाववाद को समाप्त नहीं किया जा सकता। आज कश्मीर घाटी का प्रत्येक दल और शेष देश से वहां जाने वाले अधिकांश नेता एक ही भाषा बोलते हैं जिसके कारण कश्मीर घाटी में अलगाव कम होने के स्थान पर जड़ जमा गया है।
आवश्यकता है घाटी तथा देश की सभी शक्तियों को बताने की कि अनुच्छेद-370 की समाप्ति, अलग संविधान और अलग निशान की समाप्ति ही अलगाववाद की समाप्ति का एकमात्र उपाय है और यह कार्य तुरन्त होना चाहिये ताकि उमर, महबूबा, गिलानी, मीरवायज एवं शेष देश के मुस्लिम वोट के भूखे, स्वार्थी, सत्तालोलुप नेता कोई नयी दुविधाजनक, राष्ट्रघाती परिस्थिति देश के सामने उत्पन्न न कर सकें !

1946 में जम्मू-कश्मीर के लोकप्रिय महाराजा को हटाने के लिये नेशनल कांफ्रेंस के तत्कालीन नेता शेख अब्दुल्ला ने ”कश्मीर छोड़ो” (Quit Kashmir) आंदोलन छेड़ा। आंदोलन घाटी के कुछ लोगों में ही सक्रिय था। वह देश की आजादी का समय था, ऐसे समय किसी भी रियासत में ऐसे आंदोलन का कोई औचित्य नहीं था। शेख अब्दुल्ला चाहते थे कि देश की आजादी की घोषणा से पूर्व महाराजा उन्हें सत्ता हस्तांतरित करें। उसके अनुसार मुस्लिमबहुल होने के कारण हिन्दू राजा को मुस्लिमबहुल कश्मीर पर राज्य करने का अधिकार नहीं है। महाराजा हरिसिंह ने शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार कर लिया।
यह प्रश्न आज तक अनुत्तरित है कि सांप्रदायिक विद्वेष एवं व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा पर आधारित इस आंदोलन का समर्थन करने के लिए नेहरू जी ने जम्मू-कश्मीर आने की जिद क्यों की जबकि महाराजा हरिसिंह ने भी उनसे न आने का व्यक्तिगत अनुरोध किया, व कांग्रेस पार्टी ने भी उन्हें ऐसा करने से मना किया। नेहरू जी को कोहाला पुल पर रोक लिया गया एवं रियासत से वापिस भेज दिया गया। परिणामस्वरूप नेहरू जी हमेशा के लिए देशभक्त महाराजा हरिसिंह के विरोधी हो गये। वास्तव में 1931 की गोलमेज कॉन्फ्रेंस में महाराजा हरि सिंह की देशभक्तिपूर्ण भूमिका के कारण अंग्रेज उनसे नाराज थे। माउण्टबेटन ने कश्मीर के विलय को उलझा कर उनसे व्यक्तिगत बदला लिया जिसकी कीमत देश को आज तक चुकानी पड़ रही है।

महाराजा हरिसिंह 26 अक्तूबर से पूर्व और संभवत: 15 अगस्त से पूर्व ही विलय के लिये तैयार थे, पर प्रश्न यह है कि नेहरू जी ने विलय के साथ आंतरिक शासन के लिये शेख अब्दुल्ला को सत्ता हस्तांतरण की जिद क्यों की, जबकि इसके लिये महाराजा कदापि तैयार नहीं थे.?

इसी विषय पर समझाने के लिये गांधी जी भी जम्मू-कश्मीर महाराजा के पास क्यों आये?

विलय होने के पश्चात नेहरू जी एवं उनकी सरकार ने जनमत संगह कराने की अवैधानिक, एकतरफा घोषणा क्यों की ?

इन सवालों के उत्तर “आजादी की ठेकेदार और भारत को आजादी के नाम पर डोमिनियन देश” ही बनाने का धोखा दे चुकी काँग्रेस और उसके ठेकेदार दे सकते हैं…??

27 अक्तूबर को भारत की सेना ने आने के पश्चात वीरतापूर्ण संघर्ष कर कश्मीर घाटी में 8 नवम्बर तक उड़ी तक का क्षेत्र मुक्त करा लिया। 1 जनवरी 1948 को भारत पाकिस्तान के खिलाफ यू.एन.ओ. में गया, जनवरी 1949 में युध्दविराम घोषित हुआ। पर यह रहस्य है कि भारत की सेनायें चाहतीं भी थीं, व सक्षम भी थीं कि पूरे जम्मू-कश्मीर को मुक्त करा लेते, पर 13 महीने हाथ पर हाथ रख कर बैठने के बाद भी सेना को आज्ञा क्यों न मिली ? परिणामस्वरूप 85 हजार वर्ग किमी. क्षेत्र पाकिस्तान के कब्जे में रह गया। 50 हजार हिन्दू-सिख मारे गये, लाखों हिन्दू शरणार्थी हो गये।

यह दोहरा और देशघाती खेल नेहरू और काँग्रेस ने क्यों रचा…??
इसमें कौनसी धर्मनिरपेक्षता और अखंडता की रक्षा की देशद्रोही काँग्रेस ने..??

वर्तमान उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी तथा एस के रसगोत्रा और सगीर अहमद के नेतृत्व वाली अलग अलग समितियों की सिफारिशों को हमें समेकित रूप में देखना और विश्लेषण करना होगा।
इसके अंतर्गत उपद्रवग्रस्त क्षेत्र विशेषाधिकार कानून एवं सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम को हटाने, बीस साल से पाक अधिकृत कश्मीर में रह रहे अतंकवादियों के वापस आने पर आम माफी और उनका पुनर्वास, नियंत्रण रेखा के आर-पार के विधायकों का साझा नियंत्रण समूह, परस्पर दूरसंचार की सुविधा और सीमा पार आवागमन की खुली छूट आदि सुझाव यदि मान लिये जाते हैं तो यह संभवतः उससे भी अधिक है जिसकी मांग अलगाववादी करते रहे हैं। इन्हें स्वीकार करने के बाद कश्मीर की आजादी केवल एक कदम दूर रह जाती है।

स्व. नरसिम्हाराव के वक्तव्य-

“आजादी से कम कुछ भी” का यह कूटनीतिक फलन है जिसमें अलगाववादियों के ही नहीं बल्कि विदेशी शक्तियों के भी मंसूबे पूरे हो रहे हैं। इसमें कश्मीर से विस्थापित हुए लाखों लोगों के लिये उम्मीद की किरण कहीं नजर नहीं आती है। वहीं इन फैसलों के कारण जम्मू और लद्दाख की सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक स्थितियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसका भी आकलन किया जाना बाकी है। जम्मू और लद्दाख के नागरिक इस स्थिति की कल्पना करके भी सिहर उठते हैं ।

जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के बयान-

– जम्मू-कश्मीर की समस्या आर्थिक व रोजगार के पैकेज से हल होने वाली नहीं है। यह एक राजनैतिक समस्या है और समाधान भी राजनैतिक होगा।
– जम्मू-कश्मीर का भारत में बाकी राज्यों की तरह पूर्ण विलय नहीं हुआ। विलय की कुछ शर्तें थीं जिन्हें भारत ने पूरा नहीं किया।
– जम्मू-कश्मीर दो देशों (भारत एवं पाकिस्तान) के बीच की समस्या है जिसमें पिछले 63 वर्षों से जम्मू-कश्मीर पिस रहा है।
– स्वायत्तता ही एकमात्र हल है। 1953 के पूर्व की स्थिति बहाल करनी चाहिए।

अब भूतपूर्व हो चुके काँग्रेस के पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम के बयान

– जम्मू-कश्मीर एक राजनीतिक समस्या है।
– जम्मू-कश्मीर का एक विशिष्ट इतिहास एवं भूगोल है, इसलिये शेष भारत से अलग इसका समाधान भी विशिष्ट ही होगा।
– समस्या का समाधान जम्मू व कश्मीर के अधिकतम लोगों की इच्छा के अनुसार ही होगा।
– गुपचुप वार्ता होगी, कूटनीति होगी और समाधान होने पर सबको पता लग जायेगा।
– हमने 1952, 1975 और 1986 में कुछ वादे किये थे, उन्हें पूरा तो करना ही होगा।
– विलय कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में हुआ था, यह बाकी राज्यों से अलग था, उमर ने विधानसभा के भाषण में विलय पर बोलते हुये कुछ भी गलत नहीं कहा।
– स्वायत्तता पर वार्ता होगी और उस पर विचार किया जा सकता है।

आखिरकार कांग्रेसनीत सरकारों के प्रतिनिधित्व के यह सब बयान देश को क्या समझाते हैं …??
काँग्रेस की सरकारें भारतीय सरकारें थी या सेना विरोधी, भारत की अखंडता और संप्रभुता की विरोधी सरकारें थी, जिनका प्राथमिक कार्य सिर्फ देशद्रोह ही था…??
image

1974 के इंदिरा-शेख अब्दुल्ला समझौते में पुन: यह कहा गया कि

जम्मू-कश्मीर राज्य भारतीय संघ का एक अविभाज्य अंग है, इसका संघ के ‘साथ’ अपने संबंधों का निर्धारण भारतीय संविधान के अस्थायी अनुच्छेद-370 के अंतर्गत ही रहेगा।

14 नवम्बर 1962 को संसद में पारित संकल्प एवं 22 फरवरी 1994 को संसद में सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव में स्पष्ट रूप से यह कहा गया कि जो क्षेत्र चीन द्वारा (1962 में) व पाकिस्तान द्वारा (1947) में हस्तगत कर लिये गये, वह हम वापिस लेकर रहेंगे, और इन क्षेत्रों के बारे में कोई सरकार समझौता नहीं कर सकती।

भारत की अखंडता को दफनाने की कब्र खोदने की कुचेष्टाओं के अलावा अब तक काँग्रेस और कांग्रेसनीत सरकारों ने क्या किया ही है…???

जनता अब दमनात्मक तरीकों और डंडे की भाषा से ही असलियतें और अबतक के निहित मंतव्य पूछने लगे उससे पहले कांग्रेसी बतलाओ कि अब तक क्या किया ही गया है…??

Note : इस संपादित लेख में मेरे अपने शब्दों सहित बहुत से तथ्य व लिखित सामग्रियों को ज्यों का त्यों कई दूसरी वेबसाईटों, ब्लॉग्स से जुटा कर संपादित व संकलित किया गया है ताकि उन्हे सिलेसिलवार एक जगह उपयुक्त व प्रभावी रूप से पढा जा सके ।

image

Advertisements

One Comment Add yours

  1. sudhirvyas says:

    मित्रों, बंधुओं यदि पोस्ट पसंद आये तो ब्लॉग को फॉलो करने हेतु Follow का बटन भी अपने मोबाईल, लैपटॉप, कंप्यूटर द्वारा जरूर दबा कर अनुग्रहित करावें और लेखन व तथ्यों अथवा विचारों में, वास्तविकता में, व्याख्या में कोई कमीबेशी हो तो अपने अमूल्य सुझावों द्वारा सहयोगात्मक भी रहें…!!
    सदैव शुभैच्छु
    मंगलकामनाएँ
    वन्दे मातरम्

    Like

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s