सिख नरसंहारी ‘दंगे’ ☞ काँग्रेस का घिनौना काला चेहरा


image

सन् 1984 के कांग्रेस के शासन में जब सिखों को मौत के घाट उतारा जा रहा था, उनकी दुकानों को आग के हवाले किया जा रहा था, उनके घर लूटे जा रहे थे और उनकी पत्नियों के साथ बलात्कार किया जा रहा था, तब पुलिस और प्रशासन ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की. इसे हर लिहाज़ से घृणित और जघन्य अपराध कहा जाएगा. 1947 – जब से भारत आजाद हुआ- से लेकर आज तक इतनी बडी और भयानक घटना कभी नहीं हुई है. यहां तक कि मुंबई और गुजरात के दंगे भी सिख विरोधी दंगों की तुलना में कमतर ही ठहरते हैं. इस वर्ष नवंबर में इस नरसंहार के 25 वर्ष पूरे हो जाएंगे. लेकिन कितनी अजीब बात है कि अभी तक बहुत कम लोगों को ही सज़ा मिल पाई है. यह कटु सत्य है कि इस घटना को अंजाम देनेवाले और उनके राजनीतिक संरक्षकों में से 99.9 प्रतिशत सज़ा से साफ बच गए हैं और उन्हें उनके कृत्यों के लिए कभी कठघरे में खड़ा नहीं किया जा सकेगा. तो क्या हमें दिल्ली और देश के दूसरे हिस्से में घटे उस सिख विरोधी दंगे को एक बुरा सपना मानते हुए भूल जाना चाहिए ..??

image

image

image

क्यों अपने देश में धर्मनिरपेक्षता के हिमायती इस तरह के काले अध्याय पर पहले से विश्लेषण या शोध नहीं करते, जबकि वे गुजरात नरसंहार और कंधमाल की घटना को याद कराने में कभी असफल नहीं होते. क्यों इतने बडे और भयानक नरसंहार को भारत में भुला दिया जाता है. क्या इसलिए कि एक अल्पसंख्यक दूसरे अल्पसंख्यक की तुलना में कम महत्वपूर्ण है या फिर इस दुखद सत्य के लिए कि कांग्रेस पार्टी के कई मुख्य नेता और उनके अधीनस्थ दंगे के अभियुक्त हैं….बस इसीलिये …??
इंदिरा गांधी के उन हत्यारों के बारे में बात की जाए, जो उनके अंगरक्षक थे. जिसमें बेअंत सिंह, सतवंत सिंह और एक तीसरे केहर सिंह को दोषी पाते हुए महज कुछ ही वर्षों में फांसी पर लटका दिया गया,,, लेकिन उनका क्या हुआ, जिन्होंने हज़ारों लोगों को बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्‌ में (पूरे देश में करीबन 10,000 सिख मारे गए थे) मौत के घाट उतार दिया था…??
25 साल बाद भी इस घटना के ऐसे कितने जिम्मेदार व्यक्तियों को दोषी ठहराया गया और उन्हें फांसी की सजा दी गई है…??
अनुमान लगाने की कोशिश करें,,, शायद 1000 या 500 या 300,, जी नहीं,,,
सिर्फ 17 लोगों को इस मामले में दोषी पाया गया और उन्हें उम्र कैद की सजा सुनाई गई…!
एक भी व्यक्ति को दिल्ली की अदालतों द्बारा फांसी की सजा नहीं सुनाई गई… जरा सोचिए उन कातिलों के बारे में जो अब भी हजारों लोगों को मौत की नींद सुलाकर दिल्ली की सड़कों पर घूम रहे हैं. इन सुस्पष्ट तथ्यों की एक के बाद एक सरकारों, न्यायपालिका, बुद्धिजीवियों यहां तक कि मीडिया ने भी जान बूझ कर उपेक्षा की…क्योंकि सिख मुसलमानो की तरह घोषित वोट बैंक नहीं है,उनकी सचाई, बनाई गई नौटंकी की तरह पेश नहीं की जा सकती, , मात्र इसीलिये …??

image

image

1984 में क्यों सेना को दिल्ली की देख- रेख करने के लिए 31अक्टूबर को ही तुरंत आदेश नहीं दिए गए….?
दिल्ली में स्थिति को काबू करने के लिए सेना मुश्किल से दो या तीन घंटे का समय लेती, क्योंकि सेना की छावनी शहर के बीचोंबीच है. वस्तुत: इंदिरा गांधी की हत्या के एक घंटे बाद राजीव गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में चुना लिया गया… निस्संदेह इस घटना से राजीव गांधी चकित और शोकाकुल थे, लेकिन दूसरे लोग तो थे जो इस दंगे को रोकने के कोई ठोस निर्णय ले सकते थे फिर भी तुरंत कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई,,,ऐसा क्यों नहीं हुआ….?
बहुत लोग तो सिख दंगे को भडकाने के लिए राजीव गांधी को भी दोषी मानते हैं, क्योंकि इस नरसंहार के कुछ महीने बाद उन्होंने इसकी निंदा करते हुए कहा कि जब एक विशाल पेड गिरता है तो पृथ्वी हिलती ही है इस तरह से यह महाधूर्त कुटिल लफ्फाजी वाला सांप्रदायिकता का संदेश प्रशासन तक पहुंच गया…!!
अगर हम यह विरोधी विचार मान भी लें कि प्रशासनिक अमला सदमे और सकते की हालत में होने की वजह से तुरंत कार्रवाई न कर सका, और इसी वजह से ख़ूनखराबा हुआ हालांकि यह दलील भी घटना के वास्तविक रूप, को सामने नहीं ला सकती है ,,, ख़ूनखराबा इंदिरा गांधी की हत्या के घंटों बाद शुरू हुआ…!
राजनीतिक व्यवस्था और सरकार के पास 24 घंटे का खासा वक्त यह सुनिश्चित करने के था कि दिल्ली की सड़कों पर इस तरह की कोई घटना नहीं घटे… पहले सिख की हत्या 31 अक्टूबर को नहीं हुई थी (जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी), बल्कि उसके अगले दिन 10 बजे के आसपास हुई थी… उसके बाद तीन दिन तक दिल्ली की सड़कों पर मौत का नंगा नाच जारी रहा…जयपुर के राजापार्क और संबंधित इलाकों की घटनाओं व खबरों का तो मेरे बालमन पर गहरा और लंबे समय तक असर रहा था,मैं उस समय राजापार्क के निकट की ही आदर्श विध्या मंदिर, आदर्श नगर जयपुर में ही पढता था,,,!
अगर तत्कालीन भारत सरकार चाहती तो कम से कम दिल्ली में तो तुरंत कार्रवाई कर सकती थी, कोई दंगाई, हत्यारा पुलिस या सेना की गोली से नहीं मरा…2002 के गुजरात दंगों पर विधवा विलाप कर कर के अपनी रोटियां और बोटियां सेंकने वाले यह कैसे भूले जातें हैं..??
लेकिन इससे तो यही स्पष्ट है कि ऐसा करने के लिए कोई नहीं था…काँग्रेस और कांग्रेसियों का संदेश स्पष्ट था कि सिखों के सुनियोजित नरसंहार किये जाने से कांग्रेसी प्रतिशोध लिया जा चुका था….बिलकुल वैसा ही जैसा 30 जनवरी 1948 से 4 फरवरी तक 6000 से ज्यादा ब्राह्मणों के नरसंहार द्वारा ‘गांधीवध’ के नाम पर लिया गया था, और इस पर भी काँग्रेस समेत सब आजतक खामोश हैं,,क्यों..??

image

वर्ष 1984 में हुए सिख दंगा के संबंध में पुलिस या सीबीआइ ने अब तक कुल कितने केस दर्ज किए हैं, कितने मामलों में अभियुक्तों को सजा हो चुकी है और कितने मामलों में आरोपी बरी हुए हैं? ऐसे कितने मामले हैं, जिनमें अभियोजन ने बरी हुए आरोपियों के खिलाफ अपील दायर की और कितने मामले अनट्रेस रहे हैं? यह जानकारी दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति पीके भसीन व न्यायमूर्ति जेआर मिढ़ा की खंडपीठ ने सिख विरोधी दंगा मामले में उम्रकैद की सजा पाए पूर्व पार्षद बलवान खोखर की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए सीबीआइ से मांगी है। वहीं, हाईकोर्ट ने खोखर की जमानत याचिका पर सुनवाई 12 मार्च तक के लिए टाल दी है।
अब यह प्रश्न लाज़मी है कि 1984 में सिख विरोधी दंगों के लिये special investigation team सिर्फ दिल्ली में ही क्यों ? जबकि दंगे ना सिर्फ दिल्ली में, कानपुर भी बुरी तरह प्रभावित रहा था देश के कितने छोटे बड़े शहरों में दंगे फैले थे जिसको कोई भी नागरिक जायज़ नहीं ठहरा सकता, मैने स्वयं अपनी आँखों से लखनऊ स्टेशन पर सर फूटते हुये देखा था और सर के बीच सफेद रंग की वस्तु होती है यह मुझे उस बीस साल की उम्र में पहली बार मालूम हुआ इतनी नृशंस घटना शायद आजतक नहीं देखी जब लोग बिना वजह पागल की भाँती सिर्फ सरदारों के पीछे पड़े थे कितने सरदारों ने बाल कटवाकर जान बचाई सिख महिलाएं भी सुरक्षित नहीं थी, सरदार की दुकानों पर ऐसी लूट मची कि लोग दुकान से टीवी, फ्रिज़, साबुन की टिकिया, जैसी चीजें भी लूट रहे थे कानून व्यवस्था पूरी तरह असामाजिक तत्वों के कब्जे में रही. पड़ोसियों ने ही अपने घर में लड़कियों और महिलाओं की मदद की, दंगे हुये लेकिन मानवता नहीं मरी, कितने लोगों ने अपने पड़ोसियों को बचाने में भरसक मदद भी की लेकिन सरकारी कदम पूरी तरह से नाकाफी थे

http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/…/sit…

एक अलग SIT जांच मुसलमानो की 84 दंगों की भागीदारी तथा गोधरा साबरमती ट्रेन कांड पर होनी ही चाहिए.

image

मेरा व्यक्तिगत शक है, सिखों के प्रति हरे शांतिदूतों की ऐतिहासिक तथा कुप्रसिद्ध नरसंहारी हिंसक नफरत दस्तावेजी सबूत रही है, ,वो तुष्टिकारक काँग्रेस के समर्थन से इन 84 के नरसंहारों में सक्रिय ना रहे हों, ,ऐसा सोचना भी गुनाह है…
1984 के काँग्रेस समर्थित सिख नरसंहारों में कांग्रेस के मानसपुत्र शांतिदूत समुदाय की छिपती भूमिका पर भी अलग एसआईटी जांच होनी चाहिए, ,,मुझको निजी तौर पर शक है कि इन नरसंहारों में दिल्ली समेत सब जगह शांतिदूतों की सक्रिय भूमिका रही है जिसे 1984 से ही तुष्टिकरण हेतु सरकारी व राजनैतिक तौर पर दबाया गया है,,,जानबूझकर हरे ,सफेद शांतिदूतों की निकृष्ट भूमिका को देश व समाज के सामने नहीं आने दिया गया है ….क्यों आप पाठकों का क्या कहना है शांतिदूतों के 1984 के इस सिख नरसंहार में सक्रियरूप से शामिल होने संभावनाएं प्रबल है या नहीं …?

जो बोले सो निहाल, सत् श्री अकाल
वाहे गुरूजी का खालसा, वाहे गुरूजी की फतेह

वन्दे मातरम्

Advertisements

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s