भारत, भारतीयता, भारत की नागरिकता और विदेशी आर्थिक बहुरूपिये प्रवासी (भाग 1)


भारत की आव्रजन नीति में आमूलचूल रूप से नियमों में बदलाव प्रस्तावित होनें ही चाहिये,जिनके अनुसार कुछ आप्रवासियों के भारत पहुँचने पहले ही उनके शिक्षा के प्रमाण पत्रों को मूल्यांकित और सत्यापित कर लिया जायेे।
नई आवश्यकताओं का अर्थ होगा कि जो आप्रवासी भारतीय स्किल्ड वर्कर्ज़ प्रोग्राम के अंतर्गत आयें , उन्हें यहाँ भारत पहुँचने से पहले ही आभास हो जाए कि क्या उन्हें यहाँ आने के बाद उनके क्षेत्र में काम मिल सकेगा कि नहीं।
विदेशी शिक्षा और प्रशिक्षण का मूल्यांकन आव्रजन नीति का एक विवादस्पद विषय रहा है।
मेरा यह कहना है कि पहले से प्रमाण पत्रों की जाँच कर लेने से स्किल्ड वर्कर्ज़ को कठोर भारतीय मानदण्डों का पता चल जाएगा और उन्हें यह भी समझ आ जाएगा कि भारतीय नियोक्ता उनकी शिक्षा और प्रशिक्षण को किस तरह आँकते हैं।इससे उन लोगों के बारे में भी पता चल जाएगा जिनके प्रमाणपत्र सही नहीं हैं।
इम्मिग्रेशन के बारें में मेरा यह कहना है कि इस बदलाव का उद्देश्य प्रशिक्षित लाभकारी आप्रवासियों की समस्या का समाधान खोजना होना चाहिये जो भारत में आते हैं परन्तु उन्हें उनके चुने हुए क्षेत्र में काम नहीं मिलता।और विदेशी कतई यह ना सोचें कि इस पूर्व जाँच का यह अर्थ है कि नौकरी पक्की है, और इसका यह अर्थ भी नहीं है कि आप्रवासियों को नियंत्रित पेशों जैसे कि चिकित्सा संबंधी, में काम करने की अनुमति होगी।
इन पेशों में जाने के इच्छुक आवेदकों के प्रमाणपत्रों का प्रांतों के पेशेवर नियामक निकाय (प्रोफेशनल रेगुलेटरी बोडीज़) अधिक गहराई से मूल्यांकन करें।सरकार का एक समीक्षक कार्यालय हो जो विदेशी प्रमाणपत्रों की समस्याओं का अध्ययन करे और विदेशी प्रशिक्षण और विशेषज्ञता के मूल्यांकन के बारे में सुझाव दे किस तरह यह विदेशी भारतीय आवश्यकताओं को पूरा करता है।

मित्रों , मेरा पाकिस्तान, बंगलादेशी और हर जगह से मुंह उठा कर भारत आने वालों को यही कहना है कि “अगर आपकी शिक्षा या आपकी योग्यता को भारत में मान्यता मिलने की संभावना नहीं है तो भारत आने की परेशानी मत उठाएँ।“”

मेरा सोचना है कि –
“हम उन लोगों पर एहसान कर रहे हैं और हम भारत पर भी एहसान कर रहे हैं। यहाँ पर आने के इच्छुक लोगों की कोई कमी नहीं है। आइए हम उन लोगों को यहाँ बुलाएँ, जिनके सफल होने की अधिक संभावनाएँ हैं।”

बिना देश के , यतीम बेचारे का दिखावा करके दरअसल कूटरचित छद्मवेशियों (Charlatans) के शरणार्थी बन कर सरकारी सुविधाएँ भोगने की चाह रखने वाले विदेशी आर्थिक बहुरूपिये यानि Economic Impostors की यहाँ भारत में और हमें कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए , क्योंकि यह हम 120 करोड का देश, मातृभूमि पहले है किन्ही आर्थिक बहुरूपियों की बहुमूल्य धर्मशाला नहीं और किन्हीं भिखारियों और लुटेरों की तो यहाँ बिलकुल आवश्यकताऐं बची ही नहीं क्योंकि इस देश को सब मुसीबतें झेलकर विदेश को ललचाये जैसा हमने अपने खून पसीने और कर/टैक्सों से बनाया है सो भारतीय हक का यानि स्थानीय के हक का हनन करके विदेशी से प्रेम और उनकी ही फिक्र हमारे संवैधानिक अधिकारों और राष्ट्रीयता का ही हनन है।
सोचें, विचारों …मैं जो आज कह रहा हूँ वो अंधकारमय भविष्य की पहली टंकार है,,,!

वन्दे मातरम्

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