भारतीय लोकतंत्र की सबसे बडी समस्या ‘दल’ और समाधान :


जन प्रतिनिधियों को स्वतंत्रता के तत्काल बाद की तरह जेब से धन खर्च कर राजनीति करना पड़े तो सिर्फ सही लोग शेष रहेंगे…!!

चुनाव दलगत न हों तो चंदा देने की जरूरत ही न होगी , कोई उम्मीदवार ही न हो, न कोई दल हो…!
ऐसी स्थिति में चुनाव प्रचार या प्रलोभन की जरूरत न होगी…अधिकृत मतपत्र केवल कोरा कागज़ हो जिस पर मतदाता अपनी पसंद के व्यक्ति का नाम लिख दे और मतपेटी में डाल दे. उम्मीदवार, दल, प्रचार न होने से मतदान केन्द्रों पर लूटपाट न होगी….कोई अपराधी चुनाव न लड़ सकेगा…कौन मतदाता किस का नाम लिखेगा कोई जान ही नहीं सकेगा…हो सकता है हजारों व्यक्तियों के नाम आयें पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा….सब मतपत्रों की गणना कर सर्वाधिक मत पानेवाले को विजेता घोषित किया जाए…इससे चुनाव खर्च नगण्य होगा,, कोई प्रचार नहीं होगा, ना ही कोई दबंग, बाहुबली या पेटीदाता धनवान हमारे मतदान को प्रभावित कर सकेंगे…!!

चुने गये जन प्रतिनिधियों के जीवन काल का विवरण सभी प्रतिनिधियों को दिया जाए, वे इसी प्रकार अपने बीच में से मंत्री चुन लें. सदन में न सत्ता पक्ष होगा न विपक्ष, इनके स्थान पर कार्य कार्यकारी पक्ष और समर्थक पक्ष होंगे जो दलीय सिद्धांतों के स्थान पर राष्ट्रीय और मानवीय हित को ध्यान में रखकर नीति बनायेंगे और क्रियान्वित कराएँगे….!!

इसके लिये संविधान में संशोधन करना होगा. यह सब समस्याओं को मिटा देगा…हमारी व हमारे देश की सभी राजनैतिक, प्रशासनिक तथा आर्थिक समस्याओं की असली जड़ या यूँ कहें कि असली समस्या दलतंत्र है जिसके कारण विपक्ष ,सत्ता पक्ष की सही नीति का भी विरोध करता है और सत्ता पक्ष विपक्ष की सही बात को भी नहीं मानता…बोलो हाँ कि ना…?

भारत के संविधान में अल्प अवधि में दुनिया के किसी भी देश और संविधान की तुलना में सर्वाधिक संशोधन हो चुके हैं, तो एक और संशोधन करने में कोई कठिनाई नहीं है…नेता इसका विरोध करेंगे क्योंकि उनके विशेषाधिकार समाप्त हो जायेंगे किन्तु जनमत का दबाव उन्हें स्वीकारने पर बाध्य कर ही सकता है….!!

ऐसी जन-सरकार बनने पर कानूनों को कम करने की शुरुआत हो…हमारी मूल समस्या कानून न होना नहीं बल्कि कानून न मानना है… राजनीति शास्त्र में ‘लेसीज़ फेयर’ सिद्धांत के अनुसार सर्वोत्तम सरकार न्यूनतम शासन करती है क्योंकि लोग आत्मानुशासित होते हैं…!!

भारत में इतने कानून हैं कि कोई नहीं जानता कि हर पल हम और आप किसी न किसी कानून का जाने-अनजाने उल्लंघन कर ही रहे होते हैं…. इससे कानून के अवहेलना की प्रवृत्ति उत्पन्न हो गयी है और मेरी समझ में इसका निदान केवल अत्यावश्यक कानून रखना, लोगों को आत्म विवेक के अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता देना तथा क्षतिपूर्ति अधिनियम (law of tort) को लागू करना है..!!

मानो या ना मानो, शुरूआत देर या सवेर ऐसे ही होगी …!!

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