जातिगत आरक्षण – अब अप्रासंगिक ‘हक’ अथवा राजनैतिक डाका


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सरकारी सेवाओं और संस्थानों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं रखने वाले पिछड़े समुदायों तथा अनुसूचित जातियों और जनजातियों से सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए भारत सरकार ने अब भारतीय कानून के जरिये सरकारी तथा सार्वजनिक क्षेत्रों की इकाइयों और धार्मिक/भाषाई अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों को छोड़कर सभी सार्वजनिक तथा निजी शैक्षिक संस्थानों में पदों तथा सीटों के प्रतिशत को आरक्षित करने की कोटा प्रणाली प्रदान की है !
भारत के संसद में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधित्व के लिए भी आरक्षण नीति को विस्तारित किया गया है. भारत की केंद्र सरकार ने उच्च शिक्षा में 27% आरक्षण दे रखा है और विभिन्न राज्य आरक्षणों में वृद्धि के लिए क़ानून बना सकते हैं. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार 50% से अधिक आरक्षण नहीं किया जा सकता, लेकिन राजस्थान जैसे कुछ राज्यों ने 68% आरक्षण का प्रस्ताव रखा है, जिसमें अगड़ी जातियों के लिए 14% आरक्षण भी शामिल है..!
आम आबादी में उनकी संख्या के अनुपात के आधार पर उनके बहुत ही कम प्रतिनिधित्व को देखते हुए शैक्षणिक परिसरों और कार्यस्थलों में सामाजिक विविधता को बढ़ाने के लिए कुछ अभिज्ञेय समूहों के लिए प्रवेश मानदंड को नीचे किया गया है… कम-प्रतिनिधित्व समूहों की पहचान के लिए सबसे पुराना मानदंड जाति है. भारत सरकार द्वारा प्रायोजित राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार, हालांकि कम-प्रतिनिधित्व के अन्य अभिज्ञेय मानदंड भी हैं; जैसे कि लिंग (महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम है), अधिवास के राज्य (उत्तर पूर्व राज्य, जैसे कि बिहार और उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व कम है), ग्रामीण जनता आदि…किंतु मूलभूत सिद्धांत यह है कि अभिज्ञेय समूहों का कम-प्रतिनिधित्व भारतीय जाति व्यवस्था की विरासत है…भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के संविधान ने पहले के कुछ समूहों को अनुसूचित जाति (अजा) और अनुसूचित जनजाति (अजजा) के रूप में सूचीबद्ध किया….संविधान निर्माताओं का मानना था कि जाति व्यवस्था के कारण अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति ऐतिहासिक रूप से दलित रहे और उन्हें भारतीय समाज में सम्मान तथा समान अवसर नहीं दिया गया और इसीलिए राष्ट्र-निर्माण की गतिविधियों में उनकी हिस्सेदारी कम रही,, संविधान ने सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं की खाली सीटों तथा सरकारी/सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में अजा और अजजा के लिए 15% और 7.5% का आरक्षण रखा था, जो पांच वर्षों के लिए था, उसके बाद हालात की समीक्षा किया जाना तय था. यह अवधि नियमित रूप से अनुवर्ती सरकारों द्वारा बढ़ा दी जाती रही,, बाद में, अन्य वर्गों के लिए भी आरक्षण शुरू किया गया…50% से अधिक का आरक्षण नहीं हो सकता, सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से (जिसका मानना है कि इससे समान अभिगम की संविधान की गारंटी का उल्लंघन होगा) आरक्षण की अधिकतम सीमा तय हो गयी. हालांकि, राज्य कानूनों ने इस 50% की सीमा को पार कर लिया है और सर्वोच्च न्यायलय में इन पर मुकदमे चल रहे हैं. उदाहरण के लिए जाति-आधारित आरक्षण भाग 69% है और तमिलनाडु की करीब 87% जनसंख्या पर यह लागू होता है..!

आरक्षण का इतिहास –

विंध्य के दक्षिण में प्रेसीडेंसी क्षेत्रों और रियासतों के एक बड़े क्षेत्र में पिछड़े वर्गो (बीसी) के लिए आजादी से बहुत पहले आरक्षण की शुरुआत हुई थी,,महाराष्ट्र में कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति साहूजी महाराज ने 1902 में पिछड़े वर्ग से गरीबी दूर करने और राज्य प्रशासन में उन्हें उनकी हिस्सेदारी देने के लिए आरक्षण का प्रारम्भ किया था,,,कोल्हापुर राज्य में पिछड़े वर्गों/समुदायों को नौकरियों में आरक्षण देने के लिए 1902 की अधिसूचना जारी की गयी थी, यह अधिसूचना भारत में दलित वर्गों के कल्याण के लिए आरक्षण उपलब्ध कराने वाला पहला सरकारी आदेश था,,देश भर में समान रूप से अस्पृश्यता की अवधारणा का अभ्यास नहीं हुआ करता था, इसलिए दलित वर्गों की पहचान कोई आसान काम नहीं है इसके अलावा, अलगाव और अस्पृश्यता की प्रथा भारत के दक्षिणी भागों में अधिक प्रचलित रही और उत्तरी भारत में अधिक फैली हुई थी, एक अतिरिक्त जटिलता यह है कि कुछ जातियां/समुदाय जो एक प्रांत में अछूत माने जाते हैं लेकिन अन्य प्रांतों में नहीं. परंपरागत व्यवसायों के आधार पर कुछ जातियों को हिंदू और गैर-हिंदू दोनों समुदायों में स्थान प्राप्त है,,जातियों के सूचीकरण का एक लंबा इतिहास है, मनु के साथ हमारे इतिहास के प्रारंभिक काल से जिसकी शुरुआत होती है,मध्ययुगीन वृतांतों में देश के विभिन्न भागों में स्थित समुदायों के विवरण शामिल हैं,ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान, 1806 के बाद व्यापक पैमाने पर सूचीकरण का काम किया गया था. 1881 से 1931 के बीच जनगणना के समय इस प्रक्रिया में तेजी आई, पिछड़े वर्गों का आंदोलन भी सबसे पहले दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में जोर पकड़ा,देश के कुछ समाज सुधारकों के सतत प्रयासों से अगड़े वर्ग द्वारा अपने और अछूतों के बीच बनायी गयी दीवार पूरी तरह से ढह गयी,,उन सुधारकों में शामिल हैं रेत्तामलई श्रीनिवास पेरियार, अयोथीदास पंडितर, ज्योतिबा फुले, बाबा साहेब अम्बेडकर, छत्रपति साहूजी महाराज और अन्य..!!
जाति व्यवस्था नामक सामाजिक वर्गीकरण के एक रूप के सदियों से चले आ रहे अभ्यास के परिणामस्वरूप भारत अनेक अंतर्विवाही समूहों, या जातियों और उपजातियों में विभाजित है,,आरक्षण नीति के समर्थकों का कहना है कि परंपरागत रूप से चली आ रही जाति व्यवस्था में निचली जातियों के लिए घोर उत्पीड़न और अलगाव है और शिक्षा समेत उनकी विभिन्न तरह की आजादी सीमित है. “मनु स्मृति” जैसे प्राचीन ग्रंथों के अनुसार जाति एक “वर्णाश्रम धर्म” है, जिसका अर्थ हुआ “वर्ग या उपजीविका के अनुसार पदों का दिया जाना”. वर्णाश्रम (वर्ण + आश्रम) के “वर्ण” शब्द के समानार्थक शब्द ‘रंग’ से भ्रमित नहीं होना चाहिए, भारत में जाति प्रथा ने इस नियम का पालन किया,,,,
1882 – हंटर आयोग की नियुक्ति हुई. महात्मा ज्योतिराव फुले ने नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के साथ सरकारी नौकरियों में सभी के लिए आनुपातिक आरक्षण/प्रतिनिधित्व की मांग की.
1891- त्रावणकोर के सामंती रियासत में 1891 के आरंभ में सार्वजनिक सेवा में योग्य मूल निवासियों की अनदेखी करके विदेशियों को भर्ती करने के खिलाफ प्रदर्शन के साथ सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए मांग की गयी.
1901- महाराष्ट्र के सामंती रियासत कोल्हापुर में शाहू महाराज द्वारा आरक्षण शुरू किया गया. सामंती बड़ौदा और मैसूर की रियासतों में आरक्षण पहले से लागू थे.
1908- अंग्रेजों द्वारा बहुत सारी जातियों और समुदायों के पक्ष में, प्रशासन में जिनका थोड़ा-बहुत हिस्सा था, के लिए आरक्षण शुरू किया गया.
1909 – भारत सरकार अधिनियम 1909 में आरक्षण का प्रावधान किया गया.
1919- मोंटागु-चेम्सफोर्ड सुधारों को शुरु किया गया.
1919 – भारत सरकार अधिनियम 1919 में आरक्षण का प्रावधान किया गया.
1921 – मद्रास प्रेसीडेंसी ने जातिगत सरकारी आज्ञापत्र जारी किया, जिसमें गैर-ब्राह्मणों के लिए 44 प्रतिशत, ब्राह्मणों के लिए 16 प्रतिशत, मुसलमानों के लिए 16 प्रतिशत, भारतीय-एंग्लो/ईसाइयों के लिए 16 प्रतिशत और अनुसूचित जातियों के लिए आठ प्रतिशत आरक्षण दिया गया था.
1935 – भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रस्ताव पास किया, जो पूना समझौता कहलाता है, जिसमें दलित वर्ग के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र आवंटित किए गए.
1935- भारत सरकार अधिनियम 1935 में आरक्षण का प्रावधान किया गया.
1942 – बी आर अम्बेडकर ने अनुसूचित जातियों की उन्नति के समर्थन के लिए अखिल भारतीय दलित वर्ग महासंघ की स्थापना की. उन्होंने सरकारी सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण की मांग की.
1946 – 1946 भारत में कैबिनेट मिशन अन्य कई सिफारिशों के साथ आनुपातिक प्रतिनिधित्व का प्रस्ताव दिया.
1947 में भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की. डॉ. अम्बेडकर को संविधान भारतीय के लिए मसौदा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया. भारतीय संविधान ने केवल धर्म, नस्ल, जाति, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान अवसर प्रदान करते हुए सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछले वर्गों या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की उन्नति के लिए संविधान में विशेष धाराएं रखी गयी हैं, 10 सालों के लिए उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए अलग से निर्वाचन क्षेत्र आवंटित किए गए हैं.(हर दस साल के बाद सांविधानिक संशोधन के जरिए इन्हें बढ़ा दिया जाता है).
1947-1950 – संविधान सभा में बहस.
26/01/1950- भारत का संविधान लागू हुआ.
1953 – सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए कालेलकर आयोग को स्थापित किया गया. जहां तक अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का संबंध है रिपोर्ट को स्वीकार किया गया. अन्य पिछड़ी जाति (ओबीसी (OBC)) वर्ग के लिए की गयी सिफारिशों को अस्वीकार कर दिया गया.
1956- काका कालेलकर की रिपोर्ट के अनुसार अनुसूचियों में संशोधन किया गया.
1976- अनुसूचियों में संशोधन किया गया.
1979 – सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए मंडल आयोग को स्थापित किया गया,,आयोग के पास उपजाति, जो अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी (OBC)) कहलाती है, का कोई सटीक आंकड़ा था और ओबीसी की 52% आबादी का मूल्यांकन करने के लिए 1930 की जनगणना के आंकड़े का इस्तेमाल करते हुए,पिछड़े वर्ग के रूप में 1,257 समुदायों का वर्गीकरण किया..!

1980 – आयोग ने एक रिपोर्ट पेश की, और मौजूदा कोटा में बदलाव करते हुए 22% से 49.5% वृद्धि करने की सिफारिश की
2006 के अनुसार  पिछड़ी जातियों की सूची में जातियों की संख्या 2297 तक पहुंच गयी, जो मंडल आयोग द्वारा तैयार समुदाय सूची में 60% की वृद्धि है.

1990 मंडल आयोग की सिफारिशें विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा सरकारी नौकरियों में लागू किया गया. छात्र संगठनों ने राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन शुरू किया. दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र राजीव गोस्वामी ने आत्मदाह की कोशिश की. कई छात्रों ने इसका अनुसरण किया.
1991- नरसिम्हा राव सरकार ने अलग से अगड़ी जातियों में गरीबों के लिए 10% आरक्षण शुरू किया.
1992- इंदिरा साहनी मामले में सर्वच्च न्यायालय ने अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण को सही ठहराया. आरक्षण और न्यायपालिका अनुभाग भी देखें
1995- संसद ने 77वें सांविधानिक संशोधन द्वारा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की तरक्की के लिए आरक्षण का समर्थन करते हुए अनुच्छेद 16(4)(ए) डाला. बाद में आगे भी 85वें संशोधन द्वारा इसमें अनुवर्ती वरिष्ठता को शामिल किया गया था.
1998- केंद्र सरकार ने विभिन्न सामाजिक समुदायों की आर्थिक और शैक्षिक स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए पहली बार राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण किया. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण का आंकड़ा 32% है .
जनगणना के आंकड़ों के साथ समझौतावादी पक्षपातपूर्ण राजनीति के कारण अन्य पिछड़े वर्ग की सटीक संख्या को लेकर भारत में काफी बहस चलती रहती है. आमतौर पर इसे आकार में बड़े होने का अनुमान लगाया गया है, लेकिन यह या तो मंडल आयोग द्वारा या और राषट्रीय नमूना सर्वेक्षण द्वारा दिए गए आंकड़े से कम है,, मंडल आयोग ने आंकड़े में जोड़-तोड़ करने की आलोचना की है. राष्ट्रीय सर्वेक्षण ने संकेत दिया कि बहुत सारे क्षेत्रों में ओबीसी (OBC) की स्थिति की तुलना अगड़ी जाति से की जा सकती है.

12 अगस्त 2005- उच्चतम न्यायालय ने पी. ए. इनामदार और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य के मामले में 12 अगस्त 2005 को 7 जजों द्वारा सर्वसम्मति से फैसला सुनाते हुए घोषित किया कि राज्य पेशेवर कॉलेजों समेत सहायता प्राप्त कॉलेजों में अपनी आरक्षण नीति को अल्पसंख्यक और गैर-अल्पसंख्यक पर नहीं थोप सकता हैं.
2005- निजी शिक्षण संस्थानों में पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लिए आरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए 93वां सांविधानिक संशोधन लाया गया. इसने अगस्त 2005 में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को प्रभावी रूप से उलट दिया.
2006- सर्वोच्च न्यायालय के सांविधानिक पीठ में एम. नागराज और अन्य बनाम यूनियन बैंक और अन्य के मामले में सांविधानिक वैधता की धारा 16(4) (ए), 16(4) (बी) और धारा 335 के प्रावधान को सही ठहराया गया.
2006- से केंद्रीय सरकार के शैक्षिक संस्थानों में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण शुरू हुआ. कुल आरक्षण 49.5% तक चला गया. हाल के विकास भी देखें.
2007- केंद्रीय सरकार के शैक्षिक संस्थानों में ओबीसी (OBC) आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय ने स्थगन दे दिया.
2008-भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 10 अप्रैल 2008 को सरकारी धन से पोषित संस्थानों में 27% ओबीसी (OBC) कोटा शुरू करने के लिए सरकारी कदम को सही ठहराया. न्यायालय ने स्पष्ट रूप से अपनी पूर्व स्थिति को दोहराते हुए कहा कि “मलाईदार परत” को आरक्षण नीति के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए.
क्या आरक्षण के निजी संस्थानों आरक्षण की गुंजाइश बनायी जा सकती है, सर्वोच्च न्यायालय इस सवाल का जवाब देने में यह कहते हुए कतरा गया कि निजी संस्थानों में आरक्षण कानून बनने पर ही इस मुद्दे पर निर्णय तभी लिया जा सकता है. समर्थन करनेवालों की ओर से इस निर्णय पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं आयीं और तीन-चौथाई ने इसका विरोध किया..!!

मलाईदार परत को पहचानने के लिए विभिन्न मानदंडों की सिफारिश की गयी, जो इस प्रकार हैं…
साल में 250,000 रुपये से ऊपर की आय वाले परिवार को मलाईदार परत में शामिल किया जाना चाहिए और उसे आरक्षण कोटे से बाहर रखा गया. इसके अलावा, डॉक्टर, इंजीनियर, चार्टर्ड एकाउंटेंट, अभिनेता, सलाहकारों, मीडिया पेशेवरों, लेखकों, नौकरशाहों, कर्नल और समकक्ष रैंक या उससे ऊंचे पदों पर आसीन रक्षा विभाग के अधिकारियों, उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों, सभी केंद्र और राज्य सरकारों के ए और बी वर्ग के अधिकारियों के बच्चों को भी इससे बाहर रखा गया. अदालत ने सांसदों और विधायकों के बच्चों को भी कोटे से बाहर रखने का अनुरोध किया है.

आरक्षण के प्रकार

शैक्षिक संस्थानों और नौकरियों में सीटें विभिन्न मापदंड के आधार पर आरक्षित होती हैं. विशिष्ट समूह के सदस्यों के लिए सभी संभावित पदों को एक अनुपात में रखते हुए कोटा पद्धति को स्थापित किया जाता है,,जो निर्दिष्ट समुदाय के तहत नहीं आते हैं, वे केवल शेष पदों के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, जबकि निर्दिष्ट समुदाय के सदस्य सभी संबंधित पदों (आरक्षित और सार्वजनिक) के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं. उदाहरण के लिए, रेलवे में जब 10 में से जब 2 कार्मिक पद सेवानिवृत सैनिकों, जो सेना में रह चुके हैं, के लिए आरक्षित होता है तब वे सामान्य श्रेणी के साथ ही साथ विशिष्ट कोटा दोनों ही श्रेणी में प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं.

जातिगत आधार

केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा विभिन्न अनुपात में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ी जातियों (मुख्यत: जन्मजात जाति के आधार पर) के लिए सीटें आरक्षित की जाती हैं,,यह जाति जन्म के आधार पर निर्धारित होती है और कभी भी बदली नहीं जा सकती जबकि कोई व्यक्ति अपना धर्म परिवर्तन कर सकता है और उसकी आर्थिक स्थिति में उतार -चढ़ाव हो सकता है, लेकिन जाति स्थायी होती है…!!
केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित उच्च शिक्षा संस्थानों में उपलब्ध सीटों में से 22.5% अनुसूचित जाति (दलित) और अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) के छात्रों के लिए आरक्षित हैं (अनुसूचित जातियों के लिए 15%, अनुसूचित जनजातियों के लिए 7.5%). ओबीसी के लिए अतिरिक्त 27% आरक्षण को शामिल करके आरक्षण का यह प्रतिशत 49.5% तक बढ़ा दिया गया है,, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में सीटें 14% अनुसूचित जातियों और 8% अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं. इसके अलावा, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के विद्यार्थियों के लिए केवल 50% अंक ग्रहणीय हैं यहां तक कि संसद और सभी चुनावों में यह अनुपात लागू होता है, जहां कुछ समुदायों के लोगों के लिए चुनाव क्षेत्र निश्चित किये गये हैं…!!
तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों में आरक्षण का प्रतिशत अनुसूचित जातियों के लिए 18% और अनुसूचित जनजातियों के लिए 1% है, जो स्थानीय जनसांख्यिकी पर आधारित है. आंध्र प्रदेश में, शैक्षिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों के लिए 25%, अनुसूचित जातियों के लिए 15%, अनुसूचित जनजातियों के लिए 6% और मुसलमानों के लिए 4% का आरक्षण रखा गया है.

प्रबंधन कोटा

जाति-समर्थक आरक्षण के पैरोकारों के अनुसार प्रबंधन कोटा सबसे विवादास्पद कोटा है. प्रमुख शिक्षाविदों द्वारा भी इसकी गंभीर आलोचना की गयी है क्योंकि जाति, नस्ल और धर्म पर ध्यान दिए बिना आर्थिक स्थिति के आधार पर यह कोटा है, जिससे जिसके पास भी पैसे हों वह अपने लिए सीट खरीद सकता है. इसमें निजी महाविद्यालय प्रबंधन की अपनी कसौटी के आधार पर तय किये गये विद्यार्थियों के लिए 15% सीट आरक्षित कर सकते हैं. कसौटी में महाविद्यालयों की अपनी प्रवेश परीक्षा या कानूनी तौर पर 10+2 के न्यूनतम प्रतिशत शामिल हैं…!

लिंग आधारित

महिला आरक्षण महिलाओं को ग्राम पंचायत (जिसका अर्थ है गांव की विधानसभा, जो कि स्थानीय ग्राम सरकार का एक रूप है) और नगर निगम चुनावों में 33% आरक्षण प्राप्त है. संसद और विधानसभाओं तक इस आरक्षण का विस्तार करने की एक दीर्घावधि योजना है इसके अतिरिक्त, भारत में महिलाओं को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण या अधिमान्य व्यवहार मिलता है ,, कुछ पुरुषों का मानना है कि भारत में विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में प्रवेश में महिलाओं के साथ यह अधिमान्य व्यवहार उनके खिलाफ भेदभाव है.
उदाहरण के लिए, भारत में अनेक कानून के विद्यालयों में महिलाओं के लिए 30% आरक्षण है,भारत में प्रगतिशील राजनीतिक मत महिलाओं के लिए अधिमान्य व्यवहार प्रदान करने का जोरदार समर्थन करता है ताकि सभी नागरिकों के लिए समान अवसर का निर्माण हो सके…महिला आरक्षण विधेयक 9 मार्च 2010 को 186 सदस्यों के बहुमत से राज्य सभा में पारित हुआ, इसके खिलाफ सिर्फ एक वोट पड़ा…अब यह लोक सभा में जायेगा और अगर यह वहां पारित हो गया तो इसे लागू किया जाएगा…पर अब तक यह बिल अटका ही हुआ है और 2014 के लोकसभा चुनाव सर पर हैं!!

धर्म आधारित

तमिलनाडु सरकार ने मुसलमानों और ईसाइयों प्रत्येक के लिए 3.5% सीटें आवंटित की हैं, जिससे ओबीसी आरक्षण 30% से 23% कर दिया गया, क्योंकि मुसलमानों या ईसाइयों से संबंधित अन्य पिछड़े वर्ग को इससे हटा दिया गया, तमिलनाडु सरकार की दलील है कि यह उप-कोटा धार्मिक समुदायों के पिछड़ेपन पर आधारित है न कि खुद धर्मों के आधार पर…वहीं आंध्र प्रदेश प्रशासन ने मुसलमानों को 4% आरक्षण देने के लिए एक क़ानून बनाया. इसे अदालत में चुनौती दी गयी. केरल लोक सेवा आयोग ने मुसलमानों को 12% आरक्षण दे रखा है…धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों के पास भी अपने विशेष धर्मों के लिए 50% आरक्षण है. केंद्र सरकार ने अनेक मुसलमान समुदायों को पिछड़े मुसलमानों में सूचीबद्ध कर रखा है, इससे वे आरक्षण के हकदार होते हैं.

अधिवासियों के राज्य

कुछ अपवादों को छोड़कर, राज्य सरकार के अधीन सभी नौकरियां उस सरकार के तहत रहने वाले अधिवासियों के लिए आरक्षित होती हैं. पीईसी (PEC) चंडीगढ़ में, पहले 80% सीट चंडीगढ़ के अधिवासियों के लिए आरक्षित थीं और अब यह 50% है.

पूर्वस्नातक महाविद्यालय

जेआईपीएमईआर (JIPMER) जैसे संस्थानों में स्नातकोत्तर सीट के लिए आरक्षण की नीति उनके लिए है, जिन्होंने जेआईपीएमईआर (JIPMER) से एमबीबीएस (MBBS) पूरा किया है.[एआईआईएमएस] (एम्स) में इसके 120 स्नातकोत्तर सीटों में से 33% सीट 40 पूर्वस्नातक छात्रों के लिए आरक्षित हुआ करती हैं (इसका अर्थ है जिन्होंने एम्स से एमबीबीएस पूरा किया उन प्रत्येक छात्रों को स्नातकोत्तर में सीट मिलना तय है, इसे अदालत द्वारा अवैध करार दिया गया.)

अन्य मानदंड

कुछ आरक्षण निम्नलिखित के लिए भी बने हैं:

स्वतंत्रता सेनानियों के बेटे/बेटियों/पोते/पोतियों के लिए.
शारीरिक रूप से विकलांग.
खेल हस्तियों.
शैक्षिक संस्थानों में अनिवासी भारतीयों (एनआरआई (NRI)) के लिए छोटे पैमाने पर सीटें आरक्षित होती हैं. उन्हें अधिक शुल्क और विदेशी मुद्रा में भुगतान करना पड़ता है (नोट: 2003 में एनआरआई आरक्षण आईआईटी से हटा लिया गया था).
विभिन्न संगठनों द्वारा उम्मीदवार प्रायोजित होते हैं.
जो सशस्त्र बलों में काम कर चुके हैं (सेवानिवृत सैनिक कोटा), उनके लिए.
कार्रवाई में मारे गए सशस्त्र बलों के कर्मियों के आश्रितों के लिए.
स्वदेश लौट आनेवालों के लिए.
जो अंतर-जातीय विवाह से पैदा हुए हैं.
सरकारी उपक्रमों/सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) के विशेष स्कूलों (जैसे सेना स्कूलों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) के स्कूलों आदि) में उनके कर्मचारियों के बच्चों के लिए आरक्षण.
पूजा स्थलों (जैसे तिरूपति (बालाजी) मंदिर, तिरुथानी मुरुगन (बालाजी) मंदिर) में भुगतान मार्ग आरक्षण है.
वरिष्ठ नागरिकों/पीएच (PH) के लिए सार्व‍जनिक बस परिवहन में सीट आरक्षण…!

यह एक तथ्य है कि दुनिया में सबसे ज्यदा चुने जाने वाले आईआईएम (IIMs) में से भारत में शीर्ष के बहुत सारे स्नातकोत्तर और स्नातक संस्थानों जैसे आईआईटी (IITs) हैं, यह बहुत चौंकानेवाली बात नहीं है कि उन संस्थानों के लिए ज्यादातर प्रवेशिका परीक्षा के स्तर पर ही आरक्षण के मानदंड के लिए आवेदन पर ही किया जाता है आरक्षित श्रेणियों के लिए कुछ मापदंड में छूट दे दी जाती है, जबकि कुछ अन्य पूरी तरह से समाप्त हो जाते हैं. इनके उदाहरण इस प्रकार हैं –

आरक्षित सीटों के लिए उच्च विद्यालय के न्यूनतम अंक के मापदंड पर छूट दिया जाता है.
आयु
शुल्क, छात्रावास में कमरे के किराए आदि पर.
हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी संस्थान से स्नातक करने के लिए आवश्यक मापदंड में छूट कभी नहीं दी जाती, यद्यपि कुछ संस्थानों में इन छात्रों की विशेष जरूरत को पूरा करने के लिए बहुत ज्यादातर कार्यक्रमों के भार (जैसा कि आईआईटी (IIT) में किसी के लिए) को कम कर देते हैं…!!

तमिलनाडु में आरक्षण व्यवस्था शेष भारत से बहुत अलग है; ऐसा आरक्षण के स्वरूप के कारण नहीं, ‍बल्कि इसके इतिहास के कारण है. मई 2006 में जब पहली बार आरक्षण का जबरदस्त विरोध नई दिल्ली में हुआ, तब चेन्नई में इसके विपरीत एकदम विषम शांति देखी गयी थी. बाद में, आरक्षण विरोधी लॉबी को दिल्ली में तरजीह प्राप्त हुई, चेन्नई की शांत गली में आरक्षण की मांग करते हुए विरोध देखा गया. चेन्नई में डॉक्टर्स एसोसिएशन फॉर सोशल इक्विलिटी (डीएएसई (DASE)) समेत सभी डॉक्टर केंद्रीय सरकार द्वारा चलाये जानेवाले उच्च शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण की मांग पर अपना समर्थन जाताने में सबसे आगे रहे.

वर्तमान परंपरा

मौजूदा समय में, दिन-प्रतिदिन के अभ्यास में, आरक्षण 69% से कुछ हद तक कम हुआ करता है, यह इस पर निर्भर करता है कि गैर-आरक्षित श्रेणी के विद्यार्थियों का प्रवेश कितनी अतिउच्च-संख्यांक सीटों में हुआ. अगर 100 सीटें उपलब्ध हैं, तो पहले समुदाय का विचार किये बिना (आरक्षित या अनारक्षित) दो योग्यता सूची तैयार की जाती है, 31 सीटों के लिए एक और 50 सीटों के लिए एक दूसरी, क्रमशः 69% आरक्षण और 50% आरक्षण के अनुरूप. किसी भी गैर-आरक्षित श्रेणी के छात्र को 50 सीट सूची में रखा जाता है और 31 सीट सूची में नहीं रखा जाता तो उन्हें अतिउच्च-संख्यांक कोटा सीटों के तहत (अर्थात) इन विद्यार्थियों के लिए जोड़ी जाने वाली सीटों में प्रवेश दिया जाता है. 31 सीट सूची का गैर-आरक्षित खुले प्रवेश सूची के रूप में प्रयोग किया जाता है और 69% आरक्षण का प्रयोग करके 69 सीटें भरी जाती हैं (30 सीटें अन्य पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़े वर्गों के 20 सीटें, 18 सीटें अनुसूचित जाति और 1 सीट अनुसूचित जनजाति के लिए). प्रभावी आरक्षण प्रतिशत इस पर निर्भर करता है कि कितने गैर-आरक्षित श्रेणी के विद्यार्थी 50 की सूची में आते हैं और न कि 31 सूची में. एक चरम पर, सभी 19 (31 से 50 की सूची बनाने के लिए जोड़ा जाना) गैर-आरक्षित श्रेणी के विद्यार्थी हो सकते हैं, इस मामले में कुल आरक्षण 58%(69/119) हो जाता है; यह भी तर्क दिया जा सकता है कि गैर-आरक्षित श्रेणी के विद्यार्थियों के लिए इसे 19% ‘आरक्षण’ मानने से यह (69+19)/119 या 74% हो जाता है! दूसरे चरम पर, 31 की सूची में 19 में कोई भी गैर-आरक्षित श्रेणी से नहीं जोड़ा जाता है, तो इस मामले में कोई भी अतिउच्च-संख्यांक सीटों का निर्माण नहीं किया जाएगा और राज्य क़ानून के आदेश के अनुसार 69% आरक्षण किया जाएगा…!!

Rediff.com के नए आलेख के स्रोत से.

1951
16% आरक्षण अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए और 25% आरक्षण ओबीसी (OBC) के लिए शुरू हुआ. कुल आरक्षण हुआ 41%
1971
सत्तनाथान आयोग ने “मलाईदार परत” के लिए आरक्षण शुरू करने और पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण प्रतिशत में फेरबदल कर उसे 16% करने और ज्यादातर पिछड़े वर्ग (MBCs) के लिए अलग से 17% आरक्षण की सिफारिश की.
द्रमुक सरकार ने ओबीसी (OBC) के लिए 31% और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए 18% आरक्षण में वृद्धि की. कुल आरक्षण हुआ 49%
1980
अन्ना द्रमुक सरकार ने ओबीसी आरक्षण लाभ से “मलाईदार परत” को अलग कर दिया. आरक्षण का लाभ उठाने के लिए आय सीमा 9000 रुपए प्रति वर्ष निर्धारित किया गया है. द्रमुक और अन्य विपक्षी दलों ने फैसले का विरोध किया.
मलाईदार परत योजना वापस ले ली गई और ओबीसी के लिए आरक्षण प्रतिशत बढ़ा कर 50% कर दिया गया. कुल आरक्षण हुआ 68%
1989
वन्नियार जाति के लिए विशेष रूप से राज्य सरकार की नौकरियों में 20% आरक्षण और केंद्रीय सरकार की नौकरियों में 2% आरक्षण की मांग करते हुए वन्नियार संगम (पट्टाली मक्कल काची की जनक संस्था) द्वारा राज्यव्यापी चक्का जाम आंदोलन शुरू किया गया.
द्रमुक सरकार ने ओबीसी (OBC) आरक्षण को 2 भागों में बांट दिया, 30% ओबीसी (OBC) के लिए और 20% अति पिछड़े वर्गों (MBC) के लिए. 1% अनुसूचित जनजातियों के लिए अलग से आरक्षण शुरू किया. कुल आरक्षण का प्रतिशत रहा 69%.
1992
मंडल फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि आरक्षण का प्रतिशत 50% से अधिक नहीं हो सकता और आरक्षण के लाभ से “मलाईदार परत” को अलग कर देने के लिए कहा गया.
1994
वीओआईसीई (VOICE) उपभोक्ता फोरम की ओर से प्रसिद्ध वकील के. एम. विजयन द्वारा दायर किए गए मामले में अदालत ने तमिलनाडु सरकार को 50% आरक्षण के पालन का निर्देश दिया. निगरानी समिति के एक सदस्य आनंदकृष्णन और अन्ना विश्वविद्यालय के तत्कालीन अध्यक्ष ने घोषणा की कि 50% आरक्षण का पालन किया जाएगा.
9वीं अनुसूची में 69% आरक्षण को शामिल किया गया था.
9 वीं अनुसूची में 69% आरक्षण शामिल किए जाने के खिलाफ एक मामला सर्वोच्च न्यायालय में दायर करने के लिए नई दिल्ली जाते समय के. एम. विजयन पर निर्दयतापूर्वक हमला हुआ और उन्हें घायल कर दिया गया.
2006
सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार से आरक्षण लाभ से मलाईदार परत को अलग कर देने को कहा.
मुख्य लेख : 2006 Indian anti-reservation protests और Reservation policy in Indian Institutes of Technology
मई 2006-अगस्त 2006
भारत के विभिन्न हिस्सों में आरक्षण का विरोध तेज हो गया, मीडिया पूर्वाग्रह के कारण आरक्षण के समर्थन में विरोध तेज हो गया”.
तमिलनाडु शांत रहा. भारत में 36% की तुलना में तमिलनाडु (13%) में अगड़ी जातियों के कम प्रतिशत के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है.
मल्टीपल इंडेक्स रिलेटेड अफर्मटिव एक्शन एमआईआरएए (MIRAA) -http://www.sabrang.com/cc/archive/2006/june06/report3.html के रूप में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल और सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज – http://www.hindu.com/2006/05/22/stories/2006052202261100.हतं के प्रो. सतीश देशपांडे और डॉ. योगेंद्र यादव द्वारा द्वारा प्रस्तावित वैकल्पिक प्रणालियों के सकारात्मक कार्रवाई
उच्च शिक्षा (http://www.indiadaily.org/entry/sam-pitroda-review-quota-policy/) संस्थानों में ओबीसी (OBC) के लिए जाति आधारित आरक्षण के विस्तार की प्रस्तावित योजना का राष्ट्रीय ज्ञान आयोग [प्रधानंमत्री मनमोहन सिंह द्वारा गठित एक सलाहकार मंडल] के अध्यक्ष डॉ. सैम पित्रोदा ने विरोध किया.
आरक्षण नीति के विरोध में राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के ससदस्य-संयोजक डॉ. प्रताप भानु मेहता ने अपने पद से इस्तीफा दिया.
[डॉ. मेहता के इस्तीफे का खुला पत्र – http://www.indianexpress.com/story/4916.html%5D.
अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण को लागू करने के लिए सुझाव और शैक्षिक संस्थानो में सीटों में वृद्धि करने के उपाय के लिए सुझाव देने के लिए भारत के प्रधानमंत्री ने कर्नाटक के भूतपूर्व मुख्यमंत्री एम. वीरप्पा मोइली के नेतृत्व में निगरानी समिति नियुक्त किया.
निगरानी समिति ने अंतरिम रिपोर्ट पेश किया और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए केंद्रीय शैक्षिक संस्थानों में चरणबद्ध रूप से आरक्षण के कार्यान्वयन का सुझाव दिया.
लोकसभा में ओबीसी आरक्षण बिल पेश हुआ और स्थाई समिति को संदर्भित किया गया. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के आधार पर इसने मलाईदार परत (अमीर और पिछड़े वर्गों में धनाढ्य) को आरक्षण का लाभ लेने से अलग नहीं किया,,सर्वोच्च न्यायालय ने 9 सदस्यीय पीठ को तमिलनाडु में 9 अनुसूची में 69% आरक्षण को शामिल करने के लिए कहा.
सितंबर 2006-2007
सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि केंद्रीय सरकार बगैर पर्याप्त डेटा के कोटा शुरू करने की कोशिश में है.
निगरानी समिति ने अंतरिम रिपोर्ट पेश की.
अनुसूचित जातियों और जनजातियों के विकास के लिए प्रोन्नतियों में आरक्षण प्रदान करने के लिए सांविधानिक संशोधन को सर्वोच्च न्यायालय ने सही ठहराया. इसने 50% की सीमा और आरक्षण की सुविधा उठा रहे मलाईदार परत को बाहर करने को दोहराया.
संसदीय स्थायी समिति ने पिछड़े वर्गों के बीच आरक्षण में गैर-मलाईदार परत (पिछड़ों में गरीब) को प्राथमिकता देने और असली पिछड़े लोगों की पहचान के लिए व्यापक जनसंख्या सर्वेक्षण करने की सिफारिश की.
सच्चर समिति ने भारतीय मुसलमानों के पिछड़ेपन के बारे में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की. भारतीय मुसलमानों के उत्थान के लिए इसने कई सिफारिशें की हैं. इसने शिक्षण संस्थानों में गैर-मुस्लिम ओबीसी नामांकन को लगभग उनकी आबादी के बराबर/करीब बताया. इसने जरूरतमंदों की पहचान करने के लिए वैकल्पिक प्रणाली की भी सिफारिश की.
केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक ने संसदीय स्थायी समिति की सिफारिशों को अस्वीकार कर दिया और मलाईदार परत (अति धनी) को शामिल करके आरक्षण विधेयक लाने का फैसला किया. संसद ने ध्वनि मत से ओबीसी आरक्षण पारित किया.
अप्रैल 2008
10 अप्रैल 2008, भारत के सर्वोच्च न्यायलय ने केंद्र सरकार द्वारा समर्थित शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़े वर्गों को 27% आरक्षण देने के क़ानून का अनुमोदन किया, जबकि ओबीसी के बीच के मलाईदार परत को कोटा से बाहर करने करने का सुझाव दिया…!!
जनसंख्या आंकड़े –
मुख्य लेख : Scheduled Castes and Tribes, Other Backward Classes, और Forward Castes

**एनएफएचएस (NFHS) सर्वेक्षण केवल हिन्दू ओबीसी (OBC) आबादी का अनुमान है.कुल ओबीसी (OBC) जनसंख्या व्युपत्रित करते हैं यह अभिमान करते हुए के हिंदू ओबीसी (OBC) आबादी मुसलमान ओबीसी जनसंख्या के बराबर है
अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति
भारतीय जनगणना में केवल अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति जनसंख्या का विवरण जमा किया गया. अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या 24.4% है.

अन्य पिछड़े वर्ग

1931 के बाद, जनगणना में गैर-अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति जाति समूहों के जाति के आकड़े जमा नहीं किये गये. मंडल आयोग ने 1931 की जनगणना के आधार पर ओबीसी आबादी 52% होने का अनुमान लगाया.ओबीसी जनसंख्या की गणना के लिए मंडल आयोग द्वारा आकलन के लिए इस्तेमाल किये गये तर्क पर विवाद जारी है. प्रसिद्ध चुनाव विश्लेषक और शोधकर्ता, सीएसडीएस के डा. योगेन्द्र यादव [जो सकारात्मक कार्रवाई के एक ज्ञात पैरोकार हैं और अब AAP के बड़े नेता और तथा  केजरीवाल व आपा के प्रमुखतम रणनीतिकार ,बिचौलिये हैं] मानते हैं कि मंडल के आंकड़े का कोई अनुभवजन्य आधार नहीं है. उनके अनुसार “अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति, मुसलमानों और अन्य की संख्या को कम करके फिर एक संख्या पर पहुंचने पर आधारित यह एक कल्पित रचना है.”
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 1999-2000 (एनएसएस 99-00) चक्र के अनुमान में देश की आबादी के लगभग 36 प्रतिशत हिस्से को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के रूप में परिभाषित किया गया है. मुसलमान ओबीसी को हटा देने से अनुपात 32 प्रतिशत हो जाता है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सांख्यिकी (एनएफएचएस) द्वारा 1998 में किये गये एक सर्वेक्षण ने गैर-मुसलमान ओबीसी का अनुपात 29.8 प्रतिशत बताया. निरीक्षण समिति द्वारा अपनी अंतिम रिपोर्ट में और डॉ. योगेंद्र यादव द्वारा इन सर्वेक्षणों को बड़े हद तक स्वीकार किया गया. निरीक्षण समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट में इन सर्वेक्षणों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया..!
एनएसएस 99-00 में पिछड़े वर्ग की राज्य जनसंख्या इस लेख के अन्य भाग में पायी जा सकती है.

आरक्षण के समर्थन और विरोध में अनेक तर्क दिए गये हैं. एक पक्ष की ओर से दिए गये तर्कों को दूसरे पक्ष द्वारा खंडित किया जाता है, जबकि अन्य दोनों पक्षों से सहमत हुए हैं, ताकि दोनों पक्षों को समायोजित करने के लिए एक संभाव्य तीसरा समाधान प्रस्तावित हो.

आरक्षण समर्थकों द्वारा प्रस्तुत तर्क

आरक्षण भारत में एक राजनीतिक आवश्यकता है क्योंकि मतदान की विशाल जनसंख्या का प्रभावशाली वर्ग आरक्षण को स्वयं के लिए लाभप्रद के रूप में देखता है. सभी सरकारें आरक्षण को बनाए रखने और/या बढाने का समर्थन करती हैं. आरक्षण कानूनी और बाध्यकारी हैं. गुर्जर आंदोलनों (राजस्थान, 2007-2008) ने दिखाया कि भारत में शांति स्थापना के लिए आरक्षण का बढ़ता जाना आवश्यक है.
हालांकि आरक्षण योजनाएं शिक्षा की गुणवत्ता को कम करती हैं लेकिन फिर भी अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, मलेशिया, ब्राजील आदि अनेक देशों में सकारात्मक कार्रवाई योजनाएं काम कर रही हैं. हार्वर्ड विश्वविद्याल में हुए शोध के अनुसार सकारात्मक कार्रवाई योजनाएं सुविधाहीन लोगों के लिए लाभप्रद साबित हुई हैंअध्ययनों के अनुसार गोरों की तुलना में कम परीक्षण अंक और ग्रेड लेकर विशिष्ट संस्थानों में प्रवेश करने वाले कालों ने स्नातक के बाद उल्लेखनीय सफलता हासिल की. अपने गोरे सहपाठियों की तुलना में उन्होंने समान श्रेणी में उन्नत डिग्री अर्जित की हैं. यहां तक कि वे एक ही संस्थाओं से कानून, व्यापार और औषधि में व्यावसायिक डिग्री प्राप्त करने में गोरों की तुलना में जरा अधिक होनहार रहे हैं. वे नागरिक और सामुदायिक गतिविधियों में अपने गोरे सहपाठियों से अधिक सक्रिय हुए है हालांकि आरक्षण योजनाओं से शिक्षा की गुणवत्ता में कमी आई है लेकिन विकास करने में और विश्व के प्रमुख उद्योगों में शीर्ष पदों आसीन होने में, अगर सबको नहीं भी तो कमजोर और/या कम प्रतिनिधित्व वाले समुदायों के अनेक लोगों को सकारात्मक कार्रवाई से मदद मिली है. (तमिलनाडु पर अनुभाग देखें) शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण एकमात्र समाधान नहीं है, यह सिर्फ कई समाधानों में से एक है. आरक्षण कम प्रतिनिधित्व जाति समूहों का अब तक का प्रतिनिधित्व बढ़ाने वाला एक साधन है और इस तरह परिसर में विविधता में वृद्धि करता है.
हालांकि आरक्षण योजनाएं शिक्षा की गुणवत्ता को कमजोर करती हैं, लेकिन फिर भी हाशिये में पड़े और वंचितों को सामाजिक न्याय प्रदान करने के हमारे कर्तव्य और उनके मानवीय अधिकार के लिए उनकी आवश्यकता है. आरक्षण वास्तव में हाशिये पर पड़े लोगों को सफल जीवन जीने में मदद करेगा, इस तरह भारत में, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी व्यापक स्तर पर जाति-आधारित भेदभाव को ख़त्म करेगा. (लगभग 60% भारतीय आबादी गांवों में रहती है)
आरक्षण-विरोधियों ने प्रतिभा पलायन और आरक्षण के बीच भारी घाल-मेल कर दिया है. प्रतिभा पलायन के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार बड़ी तेजी से अधिक अमीर बनने की “इच्छा” है. अगर हम मान भी लें कि आरक्षण उस कारण का एक अंश हो सकता है, तो लोगों को यह समझना चाहिए कि पलायन एक ऐसी अवधारणा है, जो राष्ट्रवाद के बिना अर्थहीन है और जो अपने आपमें मानव जाति से अलगाववाद है. अगर लोग आरक्षण के बारे में शिकायत करते हुए देश छोड़ देते हैं, तो उनमें पर्याप्त राष्ट्रवाद नहीं है और उन पर प्रतिभा पलायन लागू नहीं होता है.
आरक्षण-विरोधियों के बीच प्रतिभावादिता (meritrocracy) और योग्यता की चिंता है. लेकिन प्रतिभावादिता समानता के बिना अर्थहीन है. पहले सभी लोगों को समान स्तर पर लाया जाना चाहिए, योग्यता की परवाह किए बिना, चाहे एक हिस्से को ऊपर उठाया जाय या अन्य हिस्से को पदावनत किया जाय. उसके बाद, हम योग्यता के बारे में बात कर सकते हैं. आरक्षण या “प्रतिभावादिता” की कमी से अगड़ों को कभी भी पीछे जाते नहीं पाया गया. आरक्षण ने केवल “अगड़ों के और अधिक अमीर बनने और पिछड़ों के और अधिक गरीब होते जाने” की प्रक्रिया को धीमा किया है. चीन में, लोग जन्म से ही बराबर होते हैं. जापान में, हर कोई बहुत अधित योग्य है, तो एक योग्य व्यक्ति अपने काम को तेजी से निपटाता है और श्रमिक काम के लिए आता है जिसके लिए उन्हें अधिक भुगतान किया जाता है. इसलिए अगड़ों को कम से कम इस बात के लिए खुश होना चाहिए कि वे जीवन भर सफेदपोश नागरिक हुआ करते हैं.

आरक्षण-विरोधियों के तर्क

जाति आधारित आरक्षण संविधान द्वारा परिकल्पित सामाजिक विचार के एक कारक के रूप में समाज में जाति की भावना को कमजोर करने के बजाय उसे बनाये रखता है. आरक्षण संकीर्ण राजनीतिक उद्देश्य की प्राप्ति का एक साधन है.
कोटा आवंटन भेदभाव का एक रूप है, जो कि समानता के अधिकार के विपरीत है.
आरक्षण ने चुनावों को जातियों को एक-दूसरे के खिलाफ बदला लेने के गर्त में डाल दिया है और इसने भारतीय समाज को विखंडित कर रखा है. चुनाव जीतने में अपने लिए लाभप्रद देखते हुए समूहों को आरक्षण देना और दंगे की धमकी देना भ्रष्टाचार है और यह राजनीतिक संकल्प की कमी है. यह आरक्षण के पक्ष में कोई तर्क नहीं है.
आरक्षण की नीति एक व्यापक सामाजिक या राजनीतिक परीक्षण का विषय कभी नहीं रही. अन्य समूहों को आरक्षण देने से पहले, पूरी नीति की ठीक से जांच करने की जरूरत है, और लगभग 60 वर्षों में इसके लाभ का अनुमान लगाया जाना जरूरी है.
शहरी संस्थानों में आरक्षण नहीं, बल्कि भारत का 60% जो कि ग्रामीण है उसे स्कूलों, स्वास्थ्य सेवा और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की जरूरत है.
“अगड़ी जातियों” के गरीब लोगों को पिछड़ी जाति के अमीर लोगों से अधिक कोई भी सामाजिक या आर्थिक सुविधा प्राप्त नहीं है. वास्तव में परंपरागत रूप से ब्राह्मण गरीब हुआ करते हैं.
आरक्षण के विचार का समर्थन करते समय अनेक लोग मंडल आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हैं. आयोग मंडल के अनुसार, भारतीयों की 52% आबादी ओबीसी श्रेणी की है, जबकि राष्ट्रीय सर्वेक्षण नमूना 1999-2000 के अनुसार, यह आंकड़ा सिर्फ 36% है (मुस्लिम ओबीसी को हटाकर 32%) सरकार की इस नीति के कारण पहले से ही प्रतिभा पलायन  में वृद्धि हुई है और आगे यह और अधिक बढ़ सकती है. पूर्व स्नातक और स्नातक उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालयों का रुख करेंगे.
अमेरिकी शोध पर आधारित आरक्षण-समर्थक तर्क प्रासंगिक नहीं हैं क्योंकि अमेरिकी सकारात्मक कार्रवाई में कोटा या आरक्षण शामिल नहीं है. सुनिश्चित कोटा या आरक्षण संयुक्त राज्य अमेरिका में अवैध हैं. वास्तव में, यहां तक कि कुछ उम्मीदवारों का पक्ष लेने वाली अंक प्रणाली को भी असंवैधानिक करार दिया गया था इसके अलावा, सकारात्मक कार्रवाई कैलिफोर्निया, वाशिंगटन, मिशिगन, नेब्रास्का और कनेक्टिकट में अनिवार्य रूप से प्रतिबंधित है “सकारात्मक कार्रवाई” शब्दों का उपयोग भारतीय व्यवस्था को छिपाने के लिए किया जाता है जबकि दोनों व्यवस्थाओं के बीच बड़ा फर्क है.
आधुनिक भारतीय शहरों में व्यापारों के सबसे अधिक अवसर उन लोगों के पास हैं जो ऊंची जातियों के नहीं हैं. किसी शहर में उच्च जाति का होने का कोई फायदा नहीं है.

समस्या का समाधान खोजने के लिए नीति में परिवर्तन के सुझाव निम्नलिखित हैं –

सच्चर समिति के सुझाव

सच्चर समिति जिसने भारतीय मुसलमानों के पिछड़ेपन का अध्ययन किया है, ने असली पिछड़े और जरूरतमंद लोगों की पहचान के लिए निम्नलिखित योजना की सिफारिश की है.

योग्यता के आधार पर अंक: 60
घरेलू आय पर आधारित (जाति पर ध्यान दिए बिना) अंक : 13
जिला (ग्रामीण/शहरी और क्षेत्र) जहां व्यक्ति ने अध्ययन किया, पर आधारित अंक : 13
पारिवारिक व्यवसाय और जाति के आधार पर अंक : 14
कुल अंक : 100
सच्चर समिति ने बताया कि शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग हिंदुओं की उपस्थिति उनकी आबादी के लगभग बराबर/आसपास है. भारतीय मानव संसाधन मंत्री ने भारतीय मुसलमानों पर सच्चर समिति की सिफारिशों के अध्ययन के लिए तुरंत एक समिति नियुक्त कर दी, लेकिन किसी भी अन्य सुझाव पर टिप्पणी नहीं की. इस नुस्खे में जो विसंगति पायी गयी है वो यह कि प्रथम श्रेणी के प्रवेश/नियुक्ति से इंकार की स्थिति भी पैदा हो सकती है, जो कि स्पष्ट रूप से स्वाभाविक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है.

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज के सुझाव –

यह सुझाव दिया गया है कि यद्यपि भारतीय समाज में काम से बहिष्करण में जाति एक महत्वपूर्ण कारक है; लेकिन लिंग, आर्थिक स्थिति, भौगोलिक असमानताएं और किस तरह की स्कूली शिक्षा प्राप्त हुई; जैसे अन्य कारकों को पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता हैं. उदाहरण के लिए, किसी गांव या नगर निगम के स्कूल में पढ़नेवाला बच्चा समाज में उनके समान दर्जा प्राप्त नहीं करता है जिसने अभिजात्य पब्लिक स्कूल में पढ़ाई की है, भले ही वह किसी भी जाति का हो. कुछ शिक्षाविदों का कहना है कि सकारात्मक कार्रवाई की बेहतर प्रणाली यह हो सकती है कि जो समाज में काम में बहिष्करण के सभी कारकों पर ध्यान दे, जो किसी व्यक्ति की प्रतिस्पर्धी क्षमताओं को प्रतिबंधित करते हैं. इस संबंध में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल द्वारा मल्टीपल इंडेक्स अफर्मटिव एक्शन
[एमआईआरएए (MIRAA)] प्रणाली (यहां देखें: http://www.sabrang.com/cc/archive/2006/june06/report3.html) के रूप में और सेंटर फॉर द स्टडी डेवलपिंग सोसाइटीज [सीएसडीएस (CSDS)] के डॉ. योगेंद्र यादव और डॉ. सतीश देशपांडे द्वारा उल्लेखनीय योगदान किया गया है.

अन्य द्वारा दिये गये सुझाव –

आरक्षण का निर्णय उद्देश्य के आधार पर लिया जाना चाहिए.
प्राथमिक (और माध्यमिक) शिक्षा पर यथोचित महत्व दिया जाना चाहिए ताकि उच्च शिक्षा संस्थानों में और कार्यस्थलों में अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व करनेवाले समूह स्वाभाविक प्रतियोगी बन जाएं.
प्रतिष्ठित उच्च शिक्षा संस्थानों (जैसे आईआईटी (IITs)) में सीटों की संख्या को बढ़ाया जाना चाहिए.
आरक्षण समाप्त करने के लिए सरकार को दीर्घकालीन योजना की घोषणा करनी चाहिए.
जाति व्यवस्था के उन्मूलन के लिए सरकार को बड़े पैमाने पर अंतर्जातीय विवाह को बढ़ावा देना चाहिए, जैसा कि तमिलनाडु द्वारा शुरू किया गया.
ऐसा इस कारण है क्योंकि जाति व्यवस्था की बुनियादी परिभाषिक विशेषता सगोत्रीय विवाह है. ऐसा सुझाव दिया गया है कि अंतर्जातीय विवाह से पैदा हुए बच्चों को आरक्षण प्रदान किया जाना समाज में जाति व्यवस्था को कमजोर करने का एक अचूक तरीका होगा.

जाति आधारित आरक्षण के बजाए आर्थिक स्थिति के आधार पर आरक्षण होना चाहिए (लेकिन मध्यम वर्ग जो वेतनभोगी हैं, को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा और सभी जमींदार तथा दिग्गज व्यापारी वर्ग इसका लाभ उठा सकते हैं)
वे लोग, जो करदाता हैं या करदाताओं के बच्चों को आरक्षण का पात्र नहीं होना चाहिए. इससे यह सुनिश्चित होता है कि इसका लाभ गरीबों में गरीबतम तक पहुंचे और इससे भारत को सामाजिक न्याय प्राप्त होगा जाएगा. इसका विरोध करनेवाले लोगों का कहना है कि यह लोगों को कर भुगतान न करने के लिए प्रोत्साहित करेगा और यह उनके साथ अन्याय होगा जो ईमानदारी से टैक्स भुगतान करते हैं.
आईटी (IT) का उपयोग करना सरकार को जातिगत आबादी, शिक्षा योग्यता, व्यावसायिक उपलब्धियों, संपत्ति आदि का नवीनतम आंकड़ा इकट्ठा करना होगा और इस सूचना को राष्ट्र के सामने पेश करना होगा. अंत में यह देखने के लिए कि इस मुद्दे पर लोग क्या चाहते हैं, जनमत संग्रह करना होगा. लोगों क्या चाहते हैं, इस पर अगर महत्वपूर्ण मतभेद (जैसा कि हम इस विकि में देख सकते हैं) हो तो सरकार हो सकती है विभिन्न जातियों को अपने शैक्षिक संस्थानों चल रहा है और किसी भी सरकार के हस्तक्षेप के बिना रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के द्वारा अपने ही समुदाय की देखभाल कर रहे हैं.
अभी फरवरी 2014 में ही कांग्रेस के महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने हाल में जब जाति के आधार पर आरक्षण को ख़त्म करने की मांग की तो लोग उन पर टूट पड़े.

भाजपा ने कहा कि ये बयान जानबूझ कर दिया गया है ताकि मतदाताओं का ध्यान सरकार पर लग रहे भ्रष्टाचार जैसे आरोपों से हटाया जा सके.

मायावती ने भी इसे कांग्रेस पार्टी का बयान माना है और पार्टी से आरक्षण पर अपना पक्ष साफ़ करने की मांग की है.

सोनिया गांधी ने आरक्षण पर कांग्रेस का रुख़ साफ़ करते हुए कहा कि उनकी पार्टी इसे ख़त्म करने का कोई इरादा नहीं रखती…!!

पिछले बीस वर्षों से दी जा रही एक-एक छूट तथा ढील और आरक्षण की सूची में शामिल की जा रही एक-एक जाति-सबकुछ एक ही बात को ध्यान में रखकर किया जा रहा है – वोट बैंक, जिसके लिए अच्छा संकेत देने की आवश्यकता है।

हमारा राजनीतिक वर्ग किसी समूह या समुदाय विशेष को छूट देता है, किसी समस्या या क्षेत्र के लिए धन उपलब्ध कराता है – और बस, वह गरीबों, दलितों, वंचितों का समर्थक होने का दावा करने लगता है। पूर्वोत्तर के राज्यों और जम्मू व कश्मीर जैसे राज्यों के मामले में केंद्र सरकार पैसा बहाकर इस भ्रम में रह जाती है कि उसने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया है। यह पैसा विद्रोही गुटों के पास पहुंच जाता है। और यदि आप इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करें तो आरोप लगा दिया जाएगा कि आप तो कश्मीर-विरोधी हैं या पूर्वोत्तर-विरोधी हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के मामले में राजनीतिक वर्ग यह मानकर बैठ गया है कि गरीबों के प्रति उसने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया है, क्योंकि अनाज राशन की दुकानों तक पहुंच गया है। जबकि योजना आयोग स्वयं अपनी रिपोर्ट में लिखता है कि “30 से 100 प्रतिशत राशन खुले बाजार में पहुंच जाता है।” यह सबकुछ सार्वजनिक वितरण प्रणाली तक ही सीमित नहीं है। योजना आयोग ने अपनी रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि गरीबी-निवारण कार्यक्रमों पर खर्च की जानेवाली कुल धनराशि-अन्य क्षेत्रों, जैसे ढांचागत विकास और सामाजिक कल्याण आदि पर की जानेवाली धनराशि को छोडक़र उस समय 40,000 करोड़ प्रति वर्ष थी, देश भर में गरीब परिवारों की संख्या लगभग 5 करोड़ थी। फिर भी एक गरीब परिवार के पीछे प्रतिवर्ष मात्र 8,000 रुपये आ रहे थे। उसने आगे लिखा था – “यदि यह भी मान लिया जाए कि इन 5 करोड़ गरीब परिवारों में प्रत्येक परिवार पूरी तरह से निर्धन था और उसके पास आय का कोई अन्य स्रोत नहीं था, तो भी इस पैसे से वह न रुपये प्रति कि.ग्रा. की दर से 3 कि.ग्रा अनाज प्रतिदिन बाजार से खरीद सकता था और इस प्रकार न वह गरीबी रेखा से ऊपर आ सकता था।”
लेकिन जैसे ही आप इन योजनाओं पर सवाल उठाएंगे या आधिकारिक रिपोर्टों का उध्दरण देकर यह कहेंगे कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली गरीबी दूर करने में मूल्य सापेक्षता की दृष्टि से बहुत कम सफल है, तुरंत आपके ऊपर यह आरोप मढ़ दिया जाएगा कि आप गरीब-विरोधी हैं।

आरक्षण के मामले में भी बिल्कुल यही स्थिति है। ए. परियाकरुप्पन मामले में स्वयं सर्वोच्च न्यायालय ने ही कहा था कि आरक्षण किसी के निहित स्वार्थ के लिए नहीं होना चाहिए। शोषित कर्मचारी संघ मामले में भी न्यायालय ने कहा था कि आरक्षण नीति की सफलता की कसौटी यही होगी कि कितनी जल्दी आरक्षण की आवश्यकता को समाप्त किया जा सकता है। “सेवायोजन, शिक्षा, विधायी संस्थाओं में लागू आरक्षण नीति की हर पांच वर्ष में एक बार समीक्षा की जानी चाहिए।” वसंत कुमार मामले में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश वाई.वी. चंद्रचूड ने सुझाव दिया था। लेकिन आज स्थिति यह है कि यदि आप केवल इतना ही पूछ लें कि आरक्षण कब खत्म होगा, तो तुरंत आपको दलित-विरोधी की उपाधि से लाद दिया जाएगा।

क्या केवल कुछ उपजातियां ही अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए आरक्षित सीटोंपदों पर कब्जा जमा रही हैं? क्या जातियों को पिछडे वर्ग की सूची में इसलिए शामिल किया जा रहा है कि वे सचमुच पिछड़ी और वंचित हैं? या इसलिए कि उनकी शक्ति और प्रभावशीलता को देखते हुए राजनेताओं को ऐसा करना पड़ रहा है?
सर्वोच्च न्यायालय ने कार्यपालिका को निर्देश दिया था कि वह बराबर नजर रखें कि आरक्षण का वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है। यह पैंतीस वर्ष पहले की बात है, लेकिन आज भी यदि आप पूछें कि “सामान्य श्रेणी की कितने प्रतिशत सीटें उन जातियों को मिल रही हैं, जिनके लिए पहले ही आरक्षण की व्यवस्था की गई?” तो उत्तर नहीं मिलेगा बल्कि एक आरोप और मढ़ दिया जाएगा, “यह सबकुछ पूरी आरक्षण नीति को संदेह के घेरे में डालने और इस प्रकार पिछड़े वर्गों द्वारा अंतहीन संघर्ष के बाद प्राप्त किए थोड़े-बहुत लाभों को भी हथिया लेने के एक षडयंत्र का हिस्सा है।”

इस प्रकार हम लगातार निम्न से निम्नतर स्तर पर उतरते जा रहे हैं। सरकारी कार्य-प्रणाली का कुशलता स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है, जिसका अन्य वर्ग के लोगों के साथ-साथ इन पिछड़े एवं वंचित वर्ग के लोगों पर भी पड़ रहा है। सार्वजनिक बहस का स्तर और पैमाना भी गिरता चला जा रहा है और ये स्थितियां जिस प्रकार अपरिहार्य बन गई हैं, उसी प्रकार इनका परिणाम भी परिहार्य है, जो निम्लिखित रूपों में हमारे सामने है –
* विधायिकाओं को सुविधा और आवश्यकता के अनुसार संचालित करनेवाले व्यक्ति की प्रकृति और प्रवृत्ति के रूप में।

* शिक्षण संस्थानों और सिविल सेवाओं में गिरते कुशलता-गुणवत्ता स्तर के रूप में।

* मतदान प्रणाली और विधायिकाओं के साथ-साथ सेवाओं का भी जाति के आधार पर विभाजन के रूप में।

* कुशलता-उत्कृष्टता पर एक संगठित हमले के रूप में।

ऑर्टेगा गैसेट की बात सच साबित होती है;
पैमाने हटा दिए गए हैं; औसत दर्जा ही मानक पैमाना बन गया है। अभद्रता ही प्रमाणिकता बन गई है; अभित्रास (धमकी) ही दलील बन गई है; हमला प्रमाण….।
इस रास्ते में- जैसा पं. नेहरू ने दशकों पहले ही कह दिया था – बेवकूफी ही नहीं, आपदा भी है।
संविधान ने जिन मुद्दों को ध्यान में रखते हुए आरक्षण की वकालत की थी क्या अब भी वो मुद्दे प्रांसगिक हैं। दरअसल ये बहस बहुत पुरानी है, समाज में गैर बराबरी खत्म करने, सामाजिक आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े हए लोगों को सशक्‍त करने के लिए जिस आरक्षण व्यवस्था की शुरुआती की गई थी अब उसी व्यवस्था की वजह से धीरे-धीरे एक नई तरह की विसंगति को बढ़ावा मिलता दिखाई दे रहा है।

आज़ादी के बाद भारतीय संविधान में समाजिक तौर पर पिछड़े लोगों को आगे लाने के मकसद से आरक्षण का प्रावधान शामिल किया गया था। ये प्रावधान भी रखा गया कि हर दस साल पर हालात की समीक्षा की जाएगी और उसके बाद आरक्षण की व्यवस्था पर पुनर्विचार किया जाएगा लेकिन इसकी समीक्षा आज तक नहीं हुई, बल्कि समय गुजरने के साथ आरक्षण का दायरा बढ गया।

इस आरक्षण की व्यवस्था की वजह से पिछले कुछ दशक में समाज में एक नया कुलीन वर्ग पैदा हुआ है। ये वो लोग हैं जिन्हें आरक्षण की व्यवस्था से सबसे ज्यादा फायदा हुआ। ये लोग आर्थिक,सामाजिक और शैक्षिक रूप से काफी आगे निकल चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही लोगों के लिए 1992 में पहली बार क्रीमी लेयर शब्द का इस्तेमाल किया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि क्रीमी लेयर यानि संवैधानिक पद मसलन प्रेसीडेंट, सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट के जज और ब्यूरोक्रेसी, पब्लिक सेक्टर कर्मचारी सेना और अर्धसैनिक बल में कर्नल से ऊपर का रैंक पा चुके बैकवर्ड क्लास के लोगों के बच्चों को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। इसके अलावा आर्थिक आधार पर भी क्रीमी लेयर तय किया गया। इसके मुताबिक जिस परिवार की आय तीन साल लगातार 6 लाख सालाना से ज्यादा है वो सामाजिक या शैक्षिक रूप से भी पिछड़े नहीं माने जाएंगे, उन्हें क्रीमी लेयर माना जाएगा और ऐसे परिवारों के बच्चों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से बार-बार कहे जाने के बाद भी क्रीमी लेयर का फॉर्मुला लागू करने से राजनीतिक दल घबराते हैं। राजनीति से लेकर सरकारी पदों पर एससी/एसटी, ओबीसी के अंदर के कुलीन वर्ग के लोगों का कब्जा है और ऐसे में वो लोग बिल्कुल नहीं चाहते कि क्रीमी लेयर फॉर्मूला लागू हो और एससी/एसटी और ओबीसी वर्ग के उन लोगों को फायदा होने लगे जो वाकई बेहद पिछड़े हुए हैं। आरक्षण व्यवस्था के चलते अगड़ी जातियों के साथ-साथ अब अति पिछड़े अति दलित वर्गों में भी धीरे-धीरे आक्रोश बढ़ता दिखाई दे रहा है। इकोनॉमिक लिबरेलाइजेशन की वजह से धीरे -धीरे सरकारी नौकरियों में लगातार नौकरियों की तादाद घटती जा रही है और प्राइवेट सेक्टर में रोजगार के जो अवसर बढ़ रहे हैं उसका आधार क्वालीफिकेशन है।
निजी क्षेत्र योग्य और कुशल लोगों को ही रोज़गार मुहैया कराना प्रमुखतम बिंदु रखता है। ऐसे हालात में सरकारी आरक्षण की व्यवस्था बनाए रखना सिर्फ और सिर्फ एससी, एसटी औऱ ओबीसी के कुलीन वर्ग के हितों को प्रोटेक्ट करना है।
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आरक्षण की प्रासंगिकता

ऐसे में अगर कांग्रेस पार्टी के नेता जनार्दन द्विवेदी सही मायने में जाति के आधार पर आरक्षण खत्म करने के मसले पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस करना चाहते हैं तो इस पर बयानबाजी करने के बजाय सभी राजनैतिक दलों को गंभीरता से सोचना चाहिए। ये भी एक सच है कि दुनिया के जिस किसी मुल्क में परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से रिजर्वेशन की व्यवस्था लागू हुई है वो देश विकास की दौड़ में आगे बढ़ने के बदले पिछड़ते ही गए हैं। आज जितने भी विकसित या विकासशील देश हैं उनमें आरक्षण की व्यवस्था नहीं है। उदाहरण के तौर पर हमारे सामने अमेरिका, चीन और रूस सरीखे देश हैं और अगर परिस्थितियों के हिसाब से भारतीय संविधान में सैकड़ों संशोधन किए जा सकते हैं तो फिर आरक्षण के सवाल पर राष्ट्रीय बहस चलाना कोई अपराध नहीं होगा।

यहां दुनिया में हुई कुछ घटनाओं को याद रखना भी जरूरी है। श्रीलंका सरकार ने तीन बार अपना संविधान बदला और शुरुआती दौर में तमिलों के मुकाबले सिंहालीज़ को आगे बढ़ाने के लिए शिक्षा, व्यापार से लेकर ट्रांसपोर्ट तक में आरक्षण व्यवस्था लागू कर दी थी। आरक्षण के पहले श्रीलंका की अर्थव्यवस्था, शिक्षा और सरकारी काम-काज में तमिलों का दबदबा था। ये सच है कि सिंहली वहां के मूल निवासी थे और वहां के संसाधन और संपदा को अपना नेचुरल राइट समझते थे, लेकिन तमिलों की कठिन मेहनत उद्यमशीलता के सामने सिंहलीज़ कहीं टिक नहीं पाते थे। नतीजा ये था कि वहां की राजनीतिक ताकतों ने वोटबैंक को ध्यान में रखते हुए जो आरक्षण व्यवस्था लागू की उसके चलते श्रीलंका को कई दशक तक गृहयुद्ध की आग में जलना पड़ा।

इतिहास गवाह है कि किसी जाति या वर्ग को एक लंबे अरसे तक उसके हक़ और हुकूक से मरहूम रखना सामाजिक असंतोष और गृहयुद्ध को बढ़ावा देता है फिर चाहे वो बोलशेविक क्रांति हो, फ्रेंच रिवॉल्यूशन हो, चाइनीज वार ऑफ इंडीपेंडेंस हो या फिर फ्रीडल मूवमेंट, ये सब उदाहरण हमारे सामने हैं इसीलिए अब समय रहते भारत की सभी जिम्मेदार पार्टियों और संस्थाओं को आरक्षण व्यवस्था पर गंभीरता से मंथन करना चाहिए।

जय हो

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