देशद्रोही काँग्रेस द्वारा हमेशा से ही भारत के गद्दारों का ही महिमामंडन


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हमेशा से ही बात बेबात पर कांग्रेस और कूढ़मगज देशद्रोही कांग्रेसियों द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर अंग्रेजों की मुखबिरी और आजादी के आंदोलन में शामिल ना होने का झूठा आरोप लगाया जाना उनकी कुंठाओं समेत कांग्रेस के ही देशद्रोही गद्दार होने के कटु सत्य को छुपाये जाने का प्रयास किया जाता है…!!
मेरा प्रश्न आज भी जनद्रोहिता और गद्दारी की पर्याय काँग्रेस और उसके देशद्रोही कांग्रेसियों से है कि कोई उदाहरण तो दें वो आरएसएस के अंग्रेज़ के मुखबिर य़ा गद्दार होने का….??

अन्यथा मैं पूछता हूँ काँग्रेस और समस्त देशद्रोही कांग्रेसियों से कि ऐसा क्या रहा कि सिर्फ अश्लील व भौंडे साहित्यकार खुशवंत सिंह के बाप ‘सर’शोभा सिंह को जिस भगत सिंह. साथियों को सरकार व ‘भारतीय’ इतिहासकार मात्र शहीद नहीं उग्रवादी ही मानते हैं आधिकारिक रूप से, ,उससे गद्दारी कर फांसी दिलवाने वाले सोभा सिंह और शादीलाल को कांग्रेस के कारण आर्थिक और राजनीतिक दोनों तरह का फायदा मिला,, इतना ही नहीं, उनके पूरे परिवार का बेड़ा पार कर दिया गया।
कांग्रेस के आंखों के तारे गद्दार शोभा सिंह को अंग्रेजों ने ‘ सर ’ की उपाधि  दी थी। खुशवंत सिंह ने खुद भी लिखा है कि ब्रिटिश सरकार ने उनके पिता को न सिर्फ महत्वपूर्ण ठेके दिए बल्कि उनका नाम नॉर्थ ब्लॉक में लगे पत्थर पर भी खुदवाया था। ‘ सर ’ शोभा सिंह और उसके परिवार को दो रुपए प्रति वर्ग गज पर वह जमीन मिली थी जो कनॉट प्लेस के पास है और आज दस लाख रुपए वर्ग गज पर भी उपलब्ध नहीं है,, अंग्रेजों ने तो जो किया वह ‘ वफादारी ’ की कीमत थी, लेकिन आजादी के बाद भी कांग्रेस ने शोभा सिंह के परिवार पर भरपूर मेहरबानी बरपाई। उज्जल सिंह को न सिर्फ कांग्रेसी विधायक, मंत्री और सांसद बनाया गया बल्कि उन्हें वित्त आयोग का सदस्य और बाद में पंजाब तथा तमिलनाडु का राज्यपाल भी बनाया गया। अभी हाल ही में दिल्ली के कस्तूरबा गांधी मार्ग पर मौजूद उनकी 18,000 वर्गफुट की एक कोठी की डील तय हुई तो उसकी कीमत 160 करोड़ आंकी गई थी,, तक कि जवाहरलाल नेहरू ने भी अपनी आत्मकथा में यह वर्णन किया है– “भगत सिंह एक प्रतीक बन गया। सैण्डर्स के कत्ल का कार्य तो भुला दिया गया लेकिन चिह्न शेष बना रहा और कुछ ही माह में पंजाब का प्रत्येक गांव और नगर तथा बहुत कुछ उत्तरी भारत उसके नाम से गूंज उठा। उसके बारे में बहुत से गीतों की रचना हुई और इस प्रकार उसे जो लोकप्रियता प्राप्त हुई वह आश्चर्यचकित कर देने वाली थी।”

लेकिन कम ही लोगों को याद होगा कि  भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी के तख्ते तक पहुंचाने वालों में अंग्रेजों का साथ दिया था उनका तन-मन-धन से साथ देने वाले कौम के गद्दारों ने। अंग्रेजों ने तो उन्हें वफ़ादारी का इनाम दिया ही, आजाद भारत की कांग्रेसी सरकार भी उन गद्दारों को महमामंडित करने से नहीं चूक रही। कुछ गद्दारों को तो समाज के बहिष्कार का दंश भी सहना पड़ा, लेकिन कुछ ने अपनी पहचान बदल कर सम्मान और पद भी हासिल किया.. जब दिल्ली में भगत सिंह पर अंग्रेजों की अदालत में असेंबली में बम फेंकने का मुकद्दमा चला तो भगत सिंह और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त के खिलाफ गवाही देने को कोई तैयार नहीं हो रहा था। बड़ी मुश्किल से अंग्रेजों ने कुछ लोगों को गवाह बनने पर राजी कर लिया। इनमें से एक था शोभा सिंह। मुकद्दमे में भगत सिंह को पहले देश निकाला मिला फिर लाहौर में चले मुकद्दमें में उन्हें उनके दो साथियों समेत फांसी की सजा मिली जिसमें अहम गवाह था शादी लाल,,दोनों को वतन से की गई इस गद्दारी का इनाम भी मिला। दोनों को न सिर्फ सर की उपाधि दी गई बल्कि और भी कई दूसरे फायदे मिले। शोभा सिंह को दिल्ली में बेशुमार दौलत और करोड़ों के सरकारी निर्माण कार्यों के ठेके मिले जबकि शादी लाल को बागपत के नजदीक अपार संपत्ति मिली। आज भी श्यामली में शादी लाल के वंशजों के पास चीनी मिल और शराब कारखाना है,, खुशवंत सिंह ने खुद को इतिहासकार भी साबित करने की भी कोशिश की और कई घटनाओं की अपने ढंग से व्याख्या भी की। खुशवंत सिंह ने भी माना है कि उसका पिता शोभा सिंह 8 अप्रैल 1929 को उस वक्त सेंट्रल असेंबली मे मौजूद था जहां भगत सिंह और उनके साथियों ने धुएं वाला बम फेका था। बकौल खुशवंत सिह, बाद में शोभा सिंह ने यह गवाही तो दी, लेकिन इसके कारण भगत सिंह को फांसी नहीं हुई। शोभा सिंह 1978 तक जिंदा रहा और दिल्ली की हर छोटे बड़े आयोजन में बाकायदा आमंत्रित अतिथि की हैसियत से जाता था। हालांकि उसे कई जगह अपमानित भी होना पड़ा लेकिन उसने या उसके परिवार ने कभी इसकी फिक्र नहीं की। खुशवंत सिंह का ट्रस्ट हर साल सर शोभा सिंह मेमोरियल लेक्चर भी आयोजित करवाता है जिसमे बड़े-बड़े नेता और लेखक अपने विचार रखने आते हैं, बिना शोभा सिंह की असलियत जाने (य़ा फिर जानबूझ कर अनजान बने) उसकी तस्वीर पर फूल माला चढ़ा आते हैं।
अब हम सबके समक्ष यही यक्ष प्रश्न है कि श्रीलंका के तमिल आंदोलन विरोधी ‘शहीद’ राजीव गांधी के हत्यारों के महिमामंडन का विरोध करती कांग्रेस कबतक भारत की आजादी के असली शहीदे आजम समेत अन्य क्रांतिकारियो के व आजादी के गद्दारों का महिमामंडन जारी रखती है …?

और समस्त कांग्रेसी जो आरएसएस पर प्रश्नात्मक उँगलियाँ उठाने के मानसिक कैंसर से ही ग्रस्त हैं वो मेरे इस प्रश्न का ही जवाब दें कि जिनका भारत की आजादी और क्रांतिकारियो के विरूद्ध ही रहने का दस्तावेज़ी सुप्रसिद्ध इतिहास है उन गद्दारों का यह अबतक जारी महिमामंडन कब और कैसे और क्यों कर होता ही है …??
वन्दे मातरम्
जय हिन्द

Posted By Dr. Sudhir Vyas at sudhirvyas’s blog in WordPress

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