भारत कोई धर्मशाला या वोटबैंक हेतु विदेशियों की सराय नहीं


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शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसंपदा
शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते

मित्रों, जिस वर्तमान भारत के लिये लाखों नागरिकों, सैनिकों नें सीमा सुरक्षा तथा अखंडता हेतु अपना जीवन और सुख शांति तक का बलिदान किया है, वर्तमान के ‘भारत निर्माण’ हेतु हमने सबकुछ सहन करके सिर्फ कागजों और टीवी विज्ञापनों पर ही निर्माण देखा है पर फिर भी ‘हमने’ भारत की संप्रभुता से कभी समझौते नहीं किये ,,और आज यदि उस भारत में लगे हम सभी भारतवासियों के खून, पसीने और मेहनत पर थूकते हुऐ कोई अनैतिक व अराजक नेता, पार्टी के नीच लोग यहां मौके ढूंढते अवैध विदेशी घुसपैठियों को चोरो ,डाकुओं ,आतंकियों की ही तरह रहने के बावजूद हकदार मानते हुऐ हमारे भारत की नागरिकता बांटने की बात करें तो वह सिवाय देशद्रोही व जनगद्दारी के अतिरिक्त और कुछ समझे जाने काबिल नहीं है..!!


हमारे भारत की भारतीयता किसी भी टुकड़ाखोर दलाल व जलील पार्टी की सदस्यता नहीं है जो सिर्फ समर्थन और संभावित वोट के टुकडे हेतु अवैधों में ‘उनके’ हक की तरह बांट दी जाये…यह मेरा, ,हमारा भारत है कोई धर्मशाला या सराय नहीं कि हर ऐरा गैरा यहां बुलावे पर भारतीय बनने, वोट करने चला आये..!!

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विगत वर्षों में असम मतदाता सूची मे रेकॉर्ड वृद्धि हुई है जिसमें सबसे अधिक बंगलादेश से सटे जिले आगे रहे हैं। 2010 में धुबरी में मतदाता सूची में 6.81% तक की आश्चर्यजनक वृद्धि अंकित की गई थी जबकि 13 अन्य जनपदों में 3.13% से लेकर 6.79% तक की जबर्दस्त वृद्धि देखने को मिली थी। सरकार कई बार दबे मुंह स्वीकार कर चुकी है कि देश में 20 लाख से 30 लाख बंगलादेशी घुसपैठिए अवैध रूप से रह रहे हैं जबकि अन्य स्पष्ट सूत्रों के अनुसार इस समय कम से कम 2 करोड़ से 3 करोड़ बंगलादेशी घुसपैठिए पूरे देश में फैले हुए हैं, असम व पश्चिम बंगाल बंगलादेश सीमा से लगे होने के कारण सबसे अधिक चपेट में आए हैं। 1971 में बंगलादेश के स्वतन्त्र होने के बाद से 1991 तक असम में हिंदुओं की जनसंख्या में 41.89% की वृद्धि हुई जबकि इसी अंतराल में मुस्लिम जनसंख्या 77.42% की वृद्धि बेलगाम वृद्धि हुई। 1991 से 2001 के मध्य असम में हिन्दुओं की जनसंख्या 14.95% बढ़ी जबकि मुस्लिमों की जनसंख्या में 29.3% की वृद्धि दर्ज की गई। यद्यपि मुस्लिमों की जनसंख्या पूरे भारत में हिन्दुओं की अपेक्षा काफी तेजी से बढ़ रही है और 2001 की जनगणना में आँखें खोलने वाले आंकड़े सामने आए थे कि 1961-2001 के बीच मुस्लिमों की जनसंख्या में 2.7% की वृद्धि हुई थी जबकि हिन्दुओं की जनसंख्या में 3% की कमी आ चुकी थी, किन्तु असम के संदर्भ में ज्ञात आंकड़े और भी गंभीर हैं क्योंकि सम्पूर्ण भारत में 1971-91 की हिन्दू मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि में जहां 19.79% का अंतर रहा वहीं असम में यह अंतर 35.53% था। 1991-2001 में भी यह अंतर 9.3% की अपेक्षा 14.35% रहा। 

असम के बांग्लादेश से सटे अथवा निकटवर्ती 9 जनपदों के 2001 के जनसंख्या आंकड़े बताते हैं कि इन जिलों में मुस्लिम वृद्धि-दर न्यूनतम 24.6% से लेकर अधिकतम 32.1% तक रही जबकि हिन्दुओं की वृद्धि-दर न्यूनतम 7.1% से लेकर अधिकतम 16.3% तक ही थी। अर्थात हिन्दुओं की अधिकतम वृद्धि-दर इन जनपदों में मुस्लिमों की न्यूनतम वृद्धि-दर से भी 8.3% कम थी। पश्चिम बंगाल के भी बंगलादेश से सटे अथवा निकटवर्ती लगभग 18 जनपदों में इसी प्रकार का जन सांख्यकीय असंतुलन पैदा हो चुका है।वर्तमान में असम में फैली अनियंत्रित हिंसा के लिए, जिसमें अभी तक कम से कम 44 लोगों के मारे जाने व 1.75 लाख लोगों के विस्थापित होने की सूचना है, यही अनियंत्रित घुसपैठ उत्तरदाई है। 

हमें इस अवैध घुसपैठ के दूरगामी दुष्परिणामों को समझना होगा एक ओर जहां ये घुसपैठिए असम की संस्कृति को नष्ट कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर राष्ट्रद्रोह व आतंकवाद के बीज भी बो रहे हैं। 

2008 में असम के सोनालीपाड़ा और मोहनपुर में मुस्लिम घुसपैठियों द्वारा पाकिस्तानी झण्डा तक फहरा दिया गया था। इसे इन घुसपैठियों के दुस्साहस की पराकाष्ठा कहा जाए अथवा भारतीय अन्धस्वार्थ व उपेक्षापूर्ण नीतियों की पराकाष्ठा कि ये घुसपैठिए पहले तो अपने देश से बेधड़क भारत में घुसते चले आते हैं और उसके बाद AAMSU जैसे संगठन बनाकर बेधड़क भारतीय संविधान, व्यवस्था व नागरिकों को चुनौती देते हैं विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली देशों में गिने जाने वाले भारत के नागरिकों के साथ इससे भद्दा और बेहूदा मज़ाक कुछ और नहीं हो सकता कि बंगलादेश,बर्मा जैसे एक अदने से देश के लोग घुसपैठ करके पहले बेधड़क उनके इलाकों में रहते हैं और फिर उन्हीं के घरों को जलाते हैं और उनके सर कलम करते हैं! 

असम दशकों से, विषेशरूप से 1979 से, रोहिंग्या बंगलादेशी घुसपैठियों के खिलाफ संघर्ष कर रहा है किन्तु घुसपैठियों की संख्या अनियंत्रित रूप से बढ़ती जा रही है और परिणाम स्वरूप जनसंहार और त्रासदी का वे परिदृश्य पैदा हो रहे हैं जिनसे आज असम गुजर रहा है! 

प्रश्न यह उठता है कि क्या भारत के अतिरिक्त विश्व के किसी अन्य सार्वभौमिक देश में भी देश के संविधान व संप्रभुता को तमाचा मारता हुआ ऐसा फूहड़ मज़ाक देखने को मिल सकता है ?

हमें समझना होगा कि बंगलादेशी, रोहिंग्या घुसपैठ न केवल असम या बंगाल जैसे राज्यों की संस्कृति व शांति के लिए एक बड़ा संकट है वरन पूरे देश के लिए एक विभीषिका है, सड़कों पर भीख मांगने व व सीमा पर तस्करी करने से लेकर हरा झण्डा फहराने व बम फोड़ने तक हर काम ये घुसपैठिए भारत में कर रहे हैं। 

अभी कुछ ही समय पूर्व इलाहाबाद में हुए बम विस्फोट में बंगलादेशी रोहिंंग्या घुुसपैठियों का हाथ होने की बात फिर सामने आई थी, 2 करोड़ से 3 करोड़ तक बढ़ चुके ये रोहिंग्या मिश्रित घुसपैठिए भारत की लगभग 2 प्रतिशत जनसंख्या का हक मार रहे हैं और बदले में देश को खूनखराबा, बम-विस्फोट और वैश्विक पटल पर बदनामी दे रहे हैं। दुर्भाग्य देश का कि यह सब जानते हुए भी विदेशियों की नाजायज बाढ़ को हमारे घर में दामाद बनाकर रखा जा रहा है, सीमाएं तो तब टूट जाती हैं जब तथाकथित मानवता के कुछ ठेकेदार मानवाधिकारों का बेसुरा शोर मचाते हुए बिना किसी झिझक के इन घुसपैठियों के अधिकारों की बात करने लगते हैं।

भारत की आव्रजन नीति में आमूलचूल रूप से नियमों में बदलाव प्रस्तावित होनें ही चाहिये,जिनके अनुसार कुछ आप्रवासियों के भारत पहुँचने पहले ही उनके शिक्षा के प्रमाण पत्रों को मूल्यांकित और सत्यापित कर लिया जायेे।
नई आवश्यकताओं का अर्थ होगा कि जो आप्रवासी भारतीय स्किल्ड वर्कर्ज़ प्रोग्राम के अंतर्गत आयें , उन्हें यहाँ भारत पहुँचने से पहले ही आभास हो जाए कि क्या उन्हें यहाँ आने के बाद उनके क्षेत्र में काम मिल सकेगा कि नहीं।
मेरा यह कहना है कि पहले से इनके सर्टिफिकेट, डिग्री,प्रमाण पत्रों की जाँच कर लेने से स्किल्ड वर्कर्ज़ को कठोर भारतीय मानदण्डों का पता चल जाएगा और उन्हें यह भी समझ आ जाएगा कि भारतीय नियोक्ता उनकी शिक्षा और प्रशिक्षण को किस तरह आँकते हैं।इससे उन लोगों के बारे में भी पता चल जाएगा जिनके प्रमाणपत्र सही नहीं हैं।

इमिग्रेशन के बारें में मेरा यह कहना है कि इस बदलाव का उद्देश्य प्रशिक्षित लाभकारी आप्रवासियों की समस्या का समाधान खोजना होना चाहिये जो भारत में आते हैं परन्तु उन्हें उनके चुने हुए क्षेत्र में काम नहीं मिलता।और विदेशी कतई यह ना सोचें कि इस पूर्व जाँच का यह अर्थ है कि नौकरी पक्की है, और इसका यह अर्थ भी नहीं है कि आप्रवासियों को नियंत्रित पेशों जैसे कि चिकित्सा संबंधी, में काम करने की अनुमति होगी।

इन पेशों में जाने के इच्छुक आवेदकों के प्रमाणपत्रों का प्रांतों के पेशेवर नियामक निकाय (प्रोफेशनल रेगुलेटरी बोडीज़) अधिक गहराई से मूल्यांकन करें।सरकार का एक समीक्षक कार्यालय हो जो विदेशी प्रमाणपत्रों की समस्याओं का अध्ययन करे और विदेशी प्रशिक्षण और विशेषज्ञता के मूल्यांकन के बारे में सुझाव दे किस तरह यह विदेशी भारतीय आवश्यकताओं को पूरा करता है।

मित्रों , मेरा पाकिस्तान, म्यांमार के रोहिंग्या, बंगलादेशी और हर जगह से मुंह उठा कर भारत आने वालों को यही कहना है कि “अगर आपकी शिक्षा या आपकी योग्यता को भारत में मान्यता मिलने की संभावना नहीं है तो भारत आने की परेशानी मत उठाएँ।”

मेरा तो यही सोचना है कि –
“हम उन लोगों पर एहसान कर रहे हैं और हम भारत पर भी एहसान कर रहे हैं। यहाँ पर आने के इच्छुक लोगों की कोई कमी नहीं है। आइए हम उन लोगों को यहाँ बुलाएँ, जिनके सफल होने की अधिक संभावनाएँ हैं।”

बिना देश के , यतीम, बेचारे का दिखावा करके दरअसल कूटरचित छद्मवेशियों (Charlatans) के शरणार्थी बन कर सरकारी सुविधाएँ भोगने की चाह रखने वाले विदेशी आर्थिक बहुरूपिये यानि Economic Impostors की यहाँ भारत में और हमें कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए , क्योंकि यह हम 120 करोड का देश, मातृभूमि पहले है किन्ही आर्थिक बहुरूपियों की बहुमूल्य धर्मशाला नहीं और किन्हीं भिखारियों और लुटेरों की तो यहाँ बिलकुल आवश्यकताऐं बची ही नहीं क्योंकि इस देश को सब मुसीबतें झेलकर विदेश को ललचाये जैसा हमने अपने खून पसीने और कर/टैक्सों से बनाया है सो भारतीय हक का यानि स्थानीय के हक का हनन करके विदेशी से प्रेम और उनकी ही फिक्र हमारे संवैधानिक अधिकारों और राष्ट्रीयता का ही हनन है।
सोचें, विचारों …मैं जो आज कह रहा हूँ वो अंधकारमय भविष्य की पहली टंकार है,,,!

जिस किसी भारतीय नागरिक की आंख में सिर्फ भारतीय नागरिक होने के गर्व का जरा भी पानी बचा है वह कश्मीर के अलग करने का समर्थन करते और बंगलादेशी मियाँ कचरे को यहां कानूनन खपाने की बात करते लोगों पर जूते, चप्पल और मुक्का लात सहित पिल पडे जहां दिखे टोपी समर्थक उसका बेंत स्वागत करे … अन्यथा फूल लेकर अवैध घुसपैठिए रोहिंग्या और बंगलादेशी मियों को अपना भाई, जीजा व दामाद बना ले …!!

“मेरे भारत” की रीढ़ इतनी कमजोर नहीं आपियों और कांग्रेसियों, ,,हम सब से भारतीय लौहे इसकी आंतरिक संरचनाएँ हैं…जो गर्व से कहतें हैं कि मैं ही भारतीय हूँ ..मैं ही भारत हूँ … !!

इँकलाब जिन्दाबाद
भारत माता की जय
वन्दे मातरम्

Posted By Dr. Sudhir Vyas at sudhirvyas’s blog in WordPress


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