क्या भारत में हिन्दू राष्ट्रवादिता की बात करना गुनाह है…?


यह मेरे भगवा रंग की अतिसहिष्णुता ही है की अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंगलादेश, कश्मीर और भारत के कई हिस्सों में इसने अपना सनातन भगवा रंग त्यागकर हरा रंग धारण कर लिया है,,यदि फिर भी इसे इस तरह अपमानित और बदनाम होना पड़े और बारंबार निर्दोष हो कर भी स्वयं को सिर्फ हरे रगं को संतुष्ट करने हेतु बात बेबात सही साबित करना पडे तो मै कहूँगा की इसे इतना पक्का हो जाना चाहिए की इसे दूसरे रंग में समाहित हो जाने की जगह अन्य रंगों को खुद में समाहित कर ले या फिर सामने आनेवाले दूसरे रंगों को प्रभावशून्य कर दे….क्योंकि यही अब वर्तमान में समय और धर्मसम्मत मांग है..!!

कांग्रेसियों और सेक्यूलर सहयोगी दलों के लिए अल्पसंख्यक का एकमात्र अर्थ मुस्लिम ही होता है और अल्पसंख्यक हित के नाम पर सारे कार्य का एकमात्र उद्देश्य मुस्लिम वोट बैंक पर तथाकथित पकड़ मजबूत करना होता है यहाँ तक की इस धुन में देश हित व अहित का भी ख्याल रखने की आवश्यकता महसूस नहीं होती है ना ही देश की अखंडता, संप्रभुता के बारे में सोचने जितनी ही जरूरतें…!!

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पाकिस्तान में हजारों मदरसे इस कारण से बंद कर दिए गए क्योंकि उसमे कट्टरवाद की तथा धर्म के साथ साथ बन्दूक की जेहादपरक शिक्षा भी दी जा रही थी, परन्तु भारत में मदरसा को बढ़ावा दिया जा रहा है और इसके दुष्प्रभाव की व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है,, मुस्लिमों के तथाकथित पिछडेपन और उनमे अराष्ट्रवादी तत्वों की पैदाईश का बीज इनमे ढूंढा जा सकता है ,,इसी कारण कांग्रेस के हालिया विज्ञापनी प्रचार तक में इस घटिया तुष्टिकरण की नीति को बढावा देने के लिये ‘विख्यात’ हो चुकी हसीबा अमीन कहती थी कि “कोई रॉकेट साईन्स नहीं…” यानि समसामयिक शिक्षा इतनी आवश्यक ही नहीं जितने कट्टरवादी मुस्लिम ‘सांप्रदायिकता की जड़ मदरसे’..!!
हमारे दानवी सोच के छद्म धर्मनिरपेक्षवादियों ने संचार साधनों को भी अपने गिरफ्त में ले लिया है और पेड मिडिया इन का सहयोगी बन गया है…!!

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इन छद्म धर्मनिरपेक्षवादियों ने भारतीय इतिहास को विकृत कर हमारे गौरवशाली अतीत, हमारी सभ्यता और संस्कृति, हमारे परम वैभवशाली पूर्वज आदि की अवहेलना कर हमारे गौरव और हमारे पुरुषार्थ को अपमानित किया है…सबसे दुखद तो यह है की आक्रमणकारियों को हीरो और हमें, देश की रक्षा के लिए लड़नेवालों को विलेन के रूप में उल्लेख किया है…देश में छद्म धर्मनिरपेक्षवादियों की पौबारह होने का एकमात्र कारण ही यह है की हम सनातनी हिंदुओं में एकता का अभाव है और वे इसी कमजोरी का फायदा उठाते रहे है…!!

1946 का चुनाव इस केन्द्रीय प्रश्र पर ही लड़ा गया था कि भारत अखंड रहे या उसका विभाजन हो और उस चुनाव के परिणामों से स्पष्ट है कि 99 प्रतिशत हिन्दुओं ने ‘अखंड भारत’ के समर्थन में वोट दिए तो 97 प्रतिशत से अधिक मुस्लिमों ने विभाजन और ‘पाकिस्तान’ की मांग के समर्थन में वोट डाले, तत्पश्चात भी पाकिस्तान तो हमारा और हिंदुस्तान पर कब्जा बनाये रखें की घृणित मानसिकता के कारण मुसलमान यहाँ भारत में इस्लामिक शरिया के अपने अधिकार को कायम रखते हुऐ मनमाफिक सेक्यूलरिज्म की मांग सिर्फ हिंदुओं से करते हैं, किस लिये ..???

1947 में मिली विभाजित आजादी से लेकर आज तक हुए छोटे-बड़े एक हजार हिन्दू-मुस्लिम दंगे किसने किए?
इसकी विश्लेषणात्मक जाँच होना भी जरूरी है..!!

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सब जानते हैं कि राष्ट्रीय एकता की स्थापना तब तक नहीं हो सकती जब तक सब के मन में स्वदेशी पूर्वजों के प्रति सम्‍मान, इस देश की पुरातन संस्कृति के प्रति अपनत्व और गौरव और मातृभूमि के प्रति भक्ति का भाव न हो..!!
हमारे नेता राष्ट्रीय एकता, धर्मनिरपेक्षता, साम्‍प्रदायिक सद्भाव,जाति विहीन समाज, सामाजिक न्याय आदि की लम्‍बी-चौड़ी बातें करते आ रहे हैं तो फिर हम उससे एकदम उल्टी दिशा में बढ़ते हुए क्‍यों दीख रहे हैं जो देश को पुन: विभाजन के निकट ला रही है? हम लम्‍बे समय से इस विनाशकारी राजनीतिक प्रणाली का सक्रिय अंग हो चुके हैं और इससे यह विश्वासपूर्वककहा जा सकता है कि हमारा राजनीतिक नेतृत्व अपनी चुनाव रणनीति और वादे गणित का पूरा गुलाम बन चुका है। उनकी धारणा पक्की बन चुकी है कि मुस्लिम समुदाय ही सबसे पक्का और सबसे बड़ा आधार है क्‍योंकि मुस्लिम मतदाता अपने वोट मजहबी आधार पर ही प्रयोग करते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि उनका धर्मनिरपेक्षता का अर्थ ‘हिन्दू आक्रामकता’ कहां है ?
इसी हिन्दू समाज ने ‘अपने ही’ गद्दार नेताओं द्वारा ‘छाती पर लगे विभाजन के ताजे घाव’ को झेलकर भी मुसलमानों को स्वाधीन भारत के’संविधान’ में अपने से भी अधिक अधिकार और विशेषाधिकारों समेत अघोषित प्राथमिक नागरिक ही होने के कुअवसर प्रदान करने दिए..!!

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जैसे साम्‍प्रदायिकता तथा लक्षित हिंसा विधेयक के प्रस्तावित प्रारूप का अध्ययन करने के बाद हर कोई इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि इस विधेयक के इरादे यही हैं कि अपना देश एक न रहे, समाज में सदभाव समाप्त हो जाए, संविधान की भावना के उलट सभी कार्य हों,, इस प्रारूप को राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने तैयार किया है, इस परिषद के संवैधानिक अधिकार क्‍या हैं .देश में लोकतंत्र है, संसद है, तो फिर हम तथाकथित सलाहकारों के जाल में क्‍यों फंस रहे हैं..?

न्याय, संविधान आदि की अवहेलना करने वाला यह विधेयक क्‍या विचार करने योग्य है..?
इस विधेयक को और इसका समर्थन करते सभी दलों व लोगों को तो रद्दी की ऐतिहासिक टोकरी में डाल देना ही बेहतर है क्‍योंकि इस विधेयक के पीछे की राष्ट्र विरोधी,घृणित, षड्यंत्रकारी मानसिकता इस पहले व बदले दोनो प्रारूपों में ही साफ हो गई है.. यह कुत्सित विधेयक देश के सार्वभौम नागरिकों को अल्पसंख्‍यक (मुस्लिम) और बहुसंख्‍यक (हिन्दू) में बांटकर देखता है,,, विधेयक के अनुसार हिन्दू, मुस्लिमों के लिए अलग-अलग आपराधिक दण्ड संहिता (फौजदारी कानून) होंगे,,किंतु देश में मुसलमानों के लिये इस्लाम के शरिया आधारित कानूनों का मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड होने के बावजूद मात्र मुसलमान अपराधी को शरियत आधारित दंड संहिता से ‘वंचित’ रख कर उनसे उनके ‘अधिकार’ और हमसे शांति क्यों छीनी जा रही है,इसका जवाब देने में सभी सांप्रदायिक मानसिकता वाले सेक्यूलर दल व लोग खामोश हो जाते हैं परिणामस्वरूप साम्‍प्रदायिक हिंसा विधेयक हिन्दू बहुसंख्‍यकों के लिए भस्मासुर बनेगा। उसका दुरुपयोग होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है.. विश्व के किसी भी देश में धर्म के नाम पर कोई साम्‍प्रदायिक हिंसा विधेयक नहीं है..यह सच स्वीकार करने में अलगाववादी सेक्यूलरिज्म समेत फिर से धार्मिक द्विराष्ट्रवादी विभाजन हेतु प्रयासरत जनद्रोही, देशद्रोही सेक्यूलर राजनीति को शर्म आती है…??

क्या 68 साल से विभाजित भारत में हिन्दू संस्कृति और हिन्दू राजनीति समेत हिन्दू राष्ट्रवादिता की बात करना गुनाह है…?

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Posted By Dr. Sudhir Vyas at sudhirvyas’s blog in WordPress

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