1857 के स्वतंत्रता आँदोलन के अनजाने तथ्य : 1857 सैनिक विद्रोह नहीं अपितु आजादी का जन आँदोलन था


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1857 के कुछ प्रमुख क्रांतिकारियों का संक्षेप में परिचय देकर लेख पूर्ण करूँगा –

• रानी लक्ष्मी बाई – 1857 के आजादी आँदोलन की महान स्वतंत्रता सेनानी औऱ झांसी की रानी लक्ष्मी बाई का जन्म वाराणसी में 19 नवम्बर 1835 में हुआ था , बचपन में उनका नाम मणिकर्णिका था तथा सब उनको प्यार से मनु कह कर पुकारा करते थे।
उनके पिता का नाम मोरपंत व माता का नाम भागीरथी बाई था जो धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी, उनके पिता ब्राह्‌मण थे, सिर्फ़ 4 साल की उम्र में ही उनकी माता की मृत्यु हो गई थी इसलिये मनु के पालन पोषण की जिम्मेदारी उनके पिता पर आ गई थी।   

• नाना साहब पेशवा-  नाना साहब का जन्म 1824 में महाराष्ट्र के वेणु गांव में हुआ था। बचपन में इनका नाम भोगोपंत था इन्होंने 1857 की क्रांति का कुशलता पूर्वक नेतृत्व किया,, नाना साहब सुसंस्कृत, सुन्दर व प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे साथ ही नाना साहब मराठों में अत्यंत लोकप्रिय थे इनके पिता का नाम माधव राव व माता का नाम गंगाबाई था।   

• तात्या टोपे – 1857 की क्रांति के इस महानायक का जन्म 1814 में हुआ था। बचपन से ही ये अत्यंत सुंदर थे। तांत्या टोपे ने देश की आजादी के लिये हंसते-हंसते प्राणो का त्याग कर दिया। इनका जन्म स्थल नासीक था। इनके बचपन का नाम रघुनाथ पंत था। ये जन्म से ही बुद्धिमान थे। इनके पिता का नाम पांडुरंग पंत था। जब रघुनाथ छोटे थे उस समय मराठों पर पेशवा बाजीराव द्वितीय का शासन था।   

• बाबु कुंवर सिंह – बाबू कुंवर सिंह का जन्म 1777 ई. में जगदीशपुर ( बिहार ) में हुआ था। ये अन्याय विरोधी व स्वतंत्रता प्रेमी थे। बाबू कुंवर सिंह कुशल सेना नायक, व महा मानव थे। इनके पिता का नाम साहबजादा सिंह था, पहली बार सशस्त्र रूप से आरा में आन्दोलन की एवं लडाई की कमान बाबू कुंवर सिंह ने संभाल ली थी और जगदीशपुर में विदेशी सेना से मोर्चा लेकर सहसराम और  रोहतास में विद्रोह की प्रचंड़ अग्नि प्रज्ज्वलित की। उसके बाद वे 500 सैनिकों के साथ रीवा पहुँचे और वहाँ के ज़मींदारों को अंग्रेज़ों से युद्ध के लिए तैयार किया वहाँ से बांदा होते हुए कालपी और फिर कानपुर पहुँचे तब तककानु विख्यात सेनापति व क्रांति के नायक तात्या टोपे से उनका सम्पर्क हो चुका था, कानपुर की फिरंगी सेना पर आक्रमण करने के बाद वे आज़मगढ़ गये और वहाँ के सरकारी ख़ज़ाने पर अधिकार कर छापामार शैली में युद्ध जारी रखा यहाँ भी अंग्रेज़ी सेना को पीछे हटना पड़ा।

• मंगल पाण्डे – मंगल पांडे 1857 की क्रांति के महानायक थे। ये वीर पुरुष आज़ादी के लिये हंसते-हंसते फ़ांसी पर लटक गये। इनके जन्म स्थान को लेकर शुरू से ही वैचारिक मतभेद हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इनका जन्म जुलाई 1827 में उत्तर प्रदेश (बालिया) जिले के सरयूपारी (कान्यकुब्ज) ब्राह्मण परिवार में हुआ कुछ इतिहासकार अकबरपुर को इनका जन्म स्थल मानते हैं।   

• बहादुर शाह जफ़र – बहादुर शाह जफ़र का जन्म 24 अक्टूबर, 1775 को दिल्ली में हुआ था। इनकी माता का नाम लाल बाई व पिता का नाम अकबर शाह ( द्वितीय ) था। 1837 को ये सिंहासन पर बैठे। ये मुगलों के अंतिम सम्राट थे। जब ये गद्‌दी पर बैठे उस समय भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का राज था। इनको शायरी बेहद पसंद थी। ये उर्दू के जाने माने शायर थे व इनके दरबार में भी कई बडे शायरों को आश्रय दिया जाता था।   

• बेगम हजरत महल – बेगम हजरत महल 1857 की क्रांति की एक महान क्रांतिकारी महिला थी। एक ब्रितानी इतिहासकार ने उन्हें नर्तकी बताया है। यह अवध के नवाब वाजिद अली शाह की बेगम बन गई। उनमें अनेक गुण विद्यमान थे। 1857 की क्रांति का व्यापक प्रभाव कानपुर, झांसी, अवध, लखनऊ, दिल्ली, बिहार आदि में था।   

• मौंलवी अहमद शाह –  मौलवी अहमद शाह 1857 के एक प्रमुख नेता, कुशल योद्धा व देश भक्त थे। ये फ़ैजाबाद नगर के मौलवी थे। ये फ़ैजाबाद के साधारण तालुकेदार थे और आजादी के लिये सदा तड़पते रहे। 1847 में वाजिद अली शाह अवध के नवाब बने। उनकी राजधानी लखनऊ थी। उनके शासन में हिन्दू-मुसलमान बड़े प्रेम से रहते थे।  

• अजीमुल्ला खाँ  – अजीमुल्ला खाँ 1857 की क्रांति के आधार स्तंभो में से थे। उन्होंने नाना साहब दंतोपंत के साथ मिलकर क्रांति की योजना तैयार की थी नाना साहब ने इनके साथ भारत के कई तीर्थ स्थलों की यात्रा भी की व क्रांति का संदेश भी फैलाया।   

• अमरचंद बांठिया – ग्वालियर राज्य के कोषाध्यक्ष अमर शहीद अमरचंद बांठिया ऐसे देशभक्त महापुरुषों में से थे, जिन्होंने 1857 के महासमर में जूझ कर क्रांतिवीरों को संकट के समय आर्थिक सहायता देकर मुक्ति-संघर्ष के इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया।

1857 की क्रांति एक क्रांति है जिसे इतिहास ने गाया नहीं भारत का इतिहास बताता हैं की प्रथम संग्राम की ज्वाला मेरठ की छावनी में भड़की थी किन्तु इन ऐतिहासिक तथ्यों के पीछे एक सचाई गुम है, वह यह कि आजादी की लड़ाई शुरू करने वाले मेरठ के संग्राम से भी 15 साल पहले बुन्देलखंड की धर्मनगरी चित्रकूट में एक क्रांति का सूत्रपात हुआ था।
पवित्र मंदाकिनी के किनारे गोकशी के खिलाफ एकजुट हुई जनता ने मऊ तहसील में अदालत लगाकर पांच फिरंगी अफसरों को फांसी पर लटका दिया। इसके बाद जब-जब अंग्रेजों या फिर उनके किसी पिछलग्गू ने बुंदेलों की शान में गुस्ताखी का प्रयास किया तो उसका सिर कलम कर दिया गया।
इस क्रांति के नायक थे आजादी के प्रथम संग्राम की ज्वाला के सीधे-साधे हरबोले।
संघर्ष की दास्तां को आगे बढ़ाने में महिलाओं की ‘घाघरा पलटन’ की भी अहम हिस्सेदारी थी।
आजादी के संघर्ष की पहली मशाल सुलगाने वाले बुन्देलखंड के रणबांकुरे इतिहास के पन्नों में जगह नहीं पा सके, लेकिन उनकी शूरवीरता की तस्दीक फिरंगी अफसर खुद कर गये हैं। अंग्रेज अधिकारियों द्वारा लिखे बांदा गजट में एक ऐसी कहानी दफन है, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं।
गजेटियर के पन्ने पलटने पर मालूम होता है कि वर्ष 1857 में मेरठ की छावनी में फिरंगियों की फौज के सिपाही मंगल पाण्डेय के विद्रोह से भी 15 साल पहले चित्रकूट में क्रांति की चिंगारी भड़क चुकी थी। दरअसल अतीत के उस दौर में धर्मनगरी की पवित्र मंदाकिनी नदी के किनारे अंग्रेज अफसर गायों का वध कराते थे।
गौमांस को बिहार और बंगाल में भेजकर वहां से एवज में रसद और हथियार मंगाये जाते थे। आस्था की प्रतीक मंदाकिनी किनारे एक दूसरी आस्था यानी गोवंश की हत्या से स्थानीय जनता विचलित थी, लेकिन फिरंगियों के खौफ के कारण जुबान बंद थी।कुछ लोगों ने हिम्मत दिखाते हुए मराठा शासकों और मंदाकिनी पार के ‘नया गांव’ के चौबे राजाओं से फरियाद लगायी, लेकिन दोनों शासकों ने अंग्रेजों की मुखालफत करने से इंकार कर दिया। गुहार बेकार गयी, नतीजे में सीने के अंदर प्रतिशोध की ज्वाला धधकती रही। इसी दौरान गांव-गांव घूमने वाले हरबोलों ने गौकशी के खिलाफ लोगों को जागृत करते हुए एकजुट करना शुरू किया। फिर वर्ष 1842 के जून महीने की छठी तारीख को वह हुआ, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। हजारों की संख्या में निहत्थे मजदूरों, नौजवानों और महिलाओं ने मऊ तहसील को घेरकर फिरंगियों के सामने बगावत के नारे बुलंद किये। तहसील में गोरों के खिलाफ आवाज बुलंद हुई तो बुंदेलों की भुजाएं फड़कने लगीं।देखते-देखते अंग्रेज अफसर बंधक थे, इसके बाद पेड़ के नीचे ‘जनता की अदालत’ लगी और बाकायदा मुकदमा चलाकर पांच अंग्रेज अफसरों को फांसी पर लटका दिया गया। जनक्रांति की यह ज्वाला मऊ में दफन होने के बजाय राजापुर बाजार पहुंची और अंग्रेज अफसर खदेड़ दिये गये। वक्त की नजाकत देखते हुए मर्का और समगरा के जमींदार भी आंदोलन में कूद पड़े। दो दिन बाद 8 जून को बबेरू बाजार सुलगा तो वहां के थानेदार और तहसीलदार को जान बचाकर भागना पड़ा। जौहरपुर, पैलानी, बीसलपुर, सेमरी से अंग्रेजों को खदेड़ने के साथ ही तिंदवारी तहसील के दफ्तर में क्रांतिकारियों ने सरकारी रिकार्डो को जलाकर तीन हजार रुपये भी लूट लिये। आजादी की ज्वाला भड़कने पर गोरी हुकूमत ने अपने पिट्ठू शासकों को हुक्म जारी करते हुए क्रांतिकारियों को कुचलने के लिए कहा। इस फरमान पर पन्ना नरेश ने एक हजार सिपाही, एक तोप, चार हाथी और पचास बैल भेजे, छतरपुर की रानी व गौरिहार के राजा के साथ ही अजयगढ़ के राजा की फौज भी चित्रकूट के लिए कूच कर चुकी थी। दूसरी ओर बांदा छावनी में दुबके फिरंगी अफसरों ने बांदा नवाब से जान की गुहार लगाते हुए बीवी-बच्चों के साथ पहुंच गये। इधर विद्रोह को दबाने के लिए बांदा-चित्रकूट पहुंची भारतीय राजाओं की फौज के तमाम सिपाही भी आंदोलनकारियों के साथ कदमताल करने लगे। नतीजे में उत्साही क्रांतिकारियों ने 15 जून को बांदा छावनी के प्रभारी मि. काकरेल को पकड़ने के बाद गर्दन को धड़ से अलग कर दिया। इसके बाद आवाम के अंदर से अंग्रेजों का खौफ खत्म करने के लिए कटे सिर को लेकर बांदा की गलियों में घूमे।काकरेल की हत्या के दो दिन बाद राजापुर, मऊ, बांदा, दरसेंड़ा, तरौहां, बदौसा, बबेरू, पैलानी, सिमौनी, सिहुंडा के बुंदेलों ने युद्ध परिषद का गठन करते हुए बुंदेलखंड को आजाद घोषित कर दिया। जब इस क्रांति के बारे में स्वयं अंग्रेज अफसर लिख कर गए हैं तो भारतीय इतिहासकारों ने इन तथ्यों को इतिहास के पन्नों में स्थान क्यों नहीं दिया?

सच पूछा जाये तो यह एक वास्तविक जनांदोलन था क्योकि इसमें कोई नेता नहीं था बल्कि आन्दोलनकारी आम जनता ही थी इसलिए इतिहास में स्थान न पाना बुंदेलों के संघर्ष को नजर अंदाज करने के बराबर है..!!

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1857 में मेरठ में तैनात ईस्ट इंडिया कंपनी की थर्ड कैवेलरी, 11वीं और 12वीं इन्फेंट्री के ब्रिटिश जवान पारंपरिक चर्च परेड में हिस्सा लेने वाले थे। गर्मी का मौसम था इसीलिए परेड आधे घंटे की देरी से शुरू होनी थी। इस परेड में अंग्रेज सैनिक निहत्थे हुआ करते थे।

राइफल में इस्तेमाल के लिए गाय व सूअर की चर्बी से बने कारतूस दिए जाने को लेकर इस इन्फेंट्री में तैनात भारतीय जवानों में गुस्सा 6 मई से ही था। 90 भारतीय जवानों को ये कारतूसें दी गई थीं और इनमें से 85 में इनका इस्तेमाल करने से इन्कार कर दिया था। नतीजा यह हुआ कि इनका कोर्ट मार्शल किया गया और इन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गई। उसी दिन भारतीय जवानों ने बगावत का मन बना लिया। इन जवानों ने सोच-समझ कर रविवार का दिन चुना क्योंकि इन्हें मालूम था कि अंग्रेज सैनिक निहत्थे चर्च परेड में जाएंगे। लेकिन आधे घंटे की देरी की जानकारी उन्हें नहीं थी। लिहाजा वे बैरक में रखे हथियार व कारतूसों पर तो कब्जा नहीं जमा पाए लेकिन कई अफसरों को मौत के घाट जरूर उतार दिया। अंग्रेज सैनिकों ने खुद की और हथियारों की रक्षा जरूर की लेकिन भारतीय जवानों का सामना नहीं कर पाए। इधर ये क्रांतिकारी हिंदुस्तानी सैनिक आजीवन कारावास में कैद अपने साथियों को छुड़ाकर ‘मारो फिरंगियों को’ के नारे बुलंद करने लगे। इससे पहले कि अंग्रेज बहादुर और उनके सैनिक कुछ समझ पाते इन सैनिकों का यह जत्था दिल्ली के लिए रवाना हो गया।
महत्वपूर्ण यह है कि मेरठ में इतना बड़ा कांड हो चुका था लेकिन शहर में आमतौर पर शांति थी और किसी को इस पूरे वाकये का ठीक-ठीक पता भी नहीं था!

1857 के स्वतंत्रता संग्राम पर उपलब्ध तथ्य और कथ्य बताते हैं कि हिंदुस्तानी सैनिकों ने मई की रात विक्टोरिया जेल तोड़कर अपने 85 सैनिकों को रिहा कराकर कच्चे रास्ते से दिल्ली की ओर कूच किया। यह कच्चा रास्ता और बैरक आज भी बरकरार है। उन्होंने बताया कि तब मेरठ से दिल्ली के लिए सड़क नहीं बनी थी। सैनिकों ने छोटा रास्ता अपनाया। सैनिक कच्चे रास्ते से मोहिद्दीनपुर, मोदीनगर, गाजिउद्दीनपुर से बागपत में यमुना पुल पार करके दिल्ली पहुंच गए। दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्राध्यापक डॉ. विजय काचरू का कहना है कि यह क्रांति इतिहास की एक विभाजन रेखा है। इसे केवल सैन्य विद्रोह नहीं कह सकते। क्योंकि जिन लोगों ने दिल्ली कूच किया वह समाज के हर वर्ग से आए थे। यह व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह था। इस विद्रोह के बाद भारतीय और अंग्रेज दोनों की विचारधारा में परिवर्तन आया। भारतीय और राष्ट्रवादी हुए और अंग्रेज और प्रतिरक्षात्मक। दादरी क्षेत्र के जिन क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने फांसी पर लटकाया था, उनके नाम का शिलालेख दादरी तहसील में लगा हुआ है। यहां एक छोटा स्मारक भी बना है। यहां राव उमराव सिंह की मूर्ति दादरी तिराहे पर लगी है। इसके अलावा, शहीदों का कोई चिन्ह जिले में शेष नहीं बचा है।
1857 के गदर में 10 मई को मेरठ के ज्वाला की आग जब कानपुर पहुंची तो कई नवाब यहां से लखनऊ चले गए। जिन्हें बाद में अंग्रेज गिरफ्तार करके ऊंट पर बिठाकर कानपुर ले आए और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया। सामान कुर्क कर उन्हें कैद कर लिया। 1अक्टूबर 1896 में सैयद कमालुद्दीन हैदर ने अपनी पुस्तक तारीख-ए-अवध में लिखा है कि नवाब दूल्हा हाता पटकापुर में एक मेम मारी गईं। इस जुर्म में अंग्रेजों ने नवाब दूल्हा और उनके भांजे नवाब मौतमुद्दौला को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद नवाब निजामुद्दौला, नवाब बाकर अली खां लखनऊ चले गए। अंग्रेजों ने नवाबों को लखनऊ में गिरफ्तार किया और उन्हें ऊंट से कानपुर लाकर अदालत के सामने पेश किया। नवाबों के घर का सारा सामान कुर्क कर उन्हें कैद कर लिया। इस सदमे में नवाब बाकर खां के बेटे की मौत हो गई।
इलाहाबाद से कत्लेआम करते हुए जनरल हैवलाक की फौज बकरमंडी स्थित सूबेदार के तालाब पर पहुंची तो अहमद अली वकील और कुछ महाजनों ने जनरल का स्वागत किया। लेकिन अंदर ही अंदर वे अंग्रेजों के खिलाफ रणनीति तैयार करते रहे। 
जनरल हैवलाक की फौज ने 3000 लोगों को फांसी दी। बड़ी करबला नवाबगंज में सबील के लिए लगाए गए अहमद अली वकील के कारखास राना को अंग्रेजों ने पकड़ लिया तो राना ने पूछा कि मेरा कसूर क्या है। जनरल हैवलाक ने कहा कि तुम्हें तीसरे दिन फांसी देंगे। तुम्हारी कौम हमारे बेगुनाह लोगों को मार रही है।
1857 के मुगलिया सल्तनत दिल्ली में 10 मई के बाद हालत पूरी तरह से बेकाबू हो गए थे। बागी सैनिकों और आम जन का आक्रोश चरम पर था। यमुना पार करके दिल्ली पहुंचे विद्रोही सैनिकों की टुकड़ियों ने दरियागंज से शहर में प्रवेश करना शुरू कर दिया था।
यमुना नदी (दरिया) के करीब होने कारण इस जगह का नाम दरियागंज पड़ा। दरियागंज से हथियारों से लैस बागी सैनिक नारे लगाते जा रहे थे। फौजियों को आता देख पहले तो अंग्रेज छिप गए लेकिन कुछ ने मुकाबला किया। दरिया गंज की गलियों और भवनों में हुई मुठभेड़ में दोनों ओर से लोग घायल हुए और मारे गए। इस दौरान अंग्रेजों के घरों में आग लगा दी गई। कुछ अंग्रेज भागकर बादशाह के पास पहुंचे और पनाह कीे गुहार की। लेकिन दिल्ली के हालात बेकाबू थे ,,बागी सैनिकों और आम जन का गुस्सा चरम पर था। ऐसे भी प्रमाण हैं कि अंग्रेजों के नौकर भी उन दिनों विद्रोह में शामिल हुए थे। लाल किले के दक्षिण में बसाई गई दरिया गंज पहली बस्ती थी। यहां पर आम लोग नहीं रहते थे। यह जगह धनी वर्ग के लिए थी यहां नवाब, सूबेदार और पैसे वाले रहा करते थे। किले के समीप इस बस्ती में शानदार कोठियां और बंगले बने थे। कुछ के अवशेष अब भी देखे जा सकते हैं।
1803 में जब अंग्रेज अपनी फौज के साथ दिल्ली पहुंचे तो किले के पास ही नदी के किनारे अपना डेरा जमाया और इसे छावनी का रूप दिया। इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि दरियागंज दिल्ली में अंग्रेजों की सबसे पहली छावनी थी। और शायद इसीलिए बागियों ने इसके महत्व को समझ कर इसे निशाना भी बनाया। इस संबंध में प्रसिद्ध इतिहासकार इरफान हबीब का कहना है कि शाहजहांनाबाद की दीवार से दरियागंज लगा था।
इसका नाम दरियागंज कब पड़ा इसकी बारे में जानकारी नहीं है लेकिन यह जगह भी 1857 में प्रभावित थी। 1857 की क्रांति पर पुस्तकों का संपादन करने वाले मुरली मनोहर प्रसाद सिंह का कहना है कि उस दौर में दरियागंज में आतंक का माहौल था। अंग्रेजों द्वारा आसपास के इलाके से मुस्लिम आबादी हटा दी गई थी। अजमेरी गेट, कश्मीरी गेट,तुर्कमान गेट आदि जगहों से भी अंग्रेजों ने मुस्लिम बस्तियों को उजाड़ दिया था। 

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1857 की क्रान्ति का विस्तार एवं फैलाव लगभग समूचे देश में था। यद्यपि अंग्रेज एवं अंग्रेजी के इतिहासकार ऐसा मानते है कि यह एक स्थानीय गदर था पंरतु वास्तविकता ऐसी नहीं थी यह बात जरुर सही है कि इसका केन्द्रीय क्षेत्र दिल्ली एवं उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में था लेकिन व्यापकता का असर लगभग समूचे देश में था।

उत्तर भारत मे देखे तो इसके मुख्य स्थान बैरकपुर, मेरठ, दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, झाँसी, बुंदेलखंड़, बरेली, बनारस व इलाहाबाद रहे जहाँ इस क्रांति का पूरा जोर था।

बंगाल व असम का पूरा क्षेत्र उस समय कलकत्ता रेजीड़ेसी के अधीन पड़ता था वहाँ कलकत्ता व असम में आम जनता व राजाओं व रियासतों ने भाग लिया।

बिहार में यह संघर्ष पटना,दानापुर, जगदीशपुर (आरा) आदि अनेक स्थानों पर हुआ था।

उस समय में पंजाब में आधुनिक भारत व पाकिस्तान के क्षेत्र आते थे। वहाँ लाहोर, फ़िरोजपुर, अमृतसर, जांलधर, रावलपिड़ी, झेलम, सियालकोट, अंबालातथा गुरुदासपुर में सैनिको व आम जनता ने इस संग्राम में बढ़ चढकर हिस्सा लिया था।

हरियाणा का योगदान भी इस संग्राम में महत्वपूर्ण था यहाँ के गुड़गाँव, मेवात, बहादुरगढ़, नारनोल, हिसार, झज्झर आदि स्थानों पर यह संग्राम अपने परवान पर था।

उस समय में मध्य भारत में इंदौर, ग्वालियर, महू सागर, बुंदेलखंड़ व रायपुर स्थानों को केन्द्र में रखते हुए यह संग्राम आगे बढ़ा था।

भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को यह कहना कि यह केवल उत्तर भारत तक सीमित था असत्य एवं भ्रामक है। दक्षिण भारत में यह संघर्ष करीब- करीब हर जगह व्याप्त था।

महाराष्ट्र में यह संघर्ष जिन स्थानों पर हुआ था उनमें सतारा, कोल्हापुर, पूना, मुम्बई, नासिक, बीजापुर, औरंगाबाद, अहमदनगर मुख्य थे।

आंध्र प्रदेश में यह संग्राम रायल सीमा, हैदराबाद, राजमुड़ी, तक फ़ैला हुआ था जहाँ किसानों ने भी इस संघर्ष में भाग लिया था।

कर्नाटक में हम देखते है तो पाते है कि मैसूर, कारवाड़, शोरापुर, बैंगलोर स्थानों पर इस संग्राम में लोगों ने अपनी आहुति दी।

तमिलनाडु के मद्रास, चिगंलपुर, आरी, मदुरै में जनता व सिपाहियों ने इस विद्रोह में भाग लिया। यहाँ में भी गुप्त कार्यवाही एवं संघर्ष के केन्द्र थे।

केरल में यह संघर्ष मुख्यतया कालीकट, कोचीन नामक स्थानों पर केन्द्रित था।

उपरोक्त से यह स्पष्ट होता है कि इस संग्राम का फ़ैलाव लगभग पूरे देश में था व इस संघर्ष में प्राय प्रत्येक वर्ग, समुदाय व जाति के लोग़ों ने भाग लिया था।

अंग्रेजों के खिलाफ़ देश के इस संघर्ष से प्रभावित होकर पुर्तगाल की बस्तियों में ग़ोवा में विद्रोह हुआ। फ़्रांसिसियों के अधीन पांड़िचेरी में भी बगावत हुई। यह एक ऐसा समय था जब समूचे दक्षिण एशिया में हलचल व्याप्त रही इसमें नेपाल, अफ़गानिस्तान, भूटान, तिब्बत आदि देश शामिल थे।

यह भारत में महाभारत के बाद लड़ा गया सबसे बडा युद्ध था। इस संग्राम की मूल प्रेरणा स्वधर्म की रक्षा के लिये स्वराज की स्थापना करना था। यह स्वाधीनता हमें बिना संघर्ष, बिना खड़ग-ढ़ाल के नहीं मिली, लाखों व्यक्तियों द्वारा इस महायज्ञ में स्वयं की आहुति देने से मिली है।

लार्ड डलहौजी ने 10 साल के अन्दर भारत की 21 हजार जमीदारियाँ जब्त कर ली और हजारों पुराने घरानों को बर्बाद कर दिया।

ब्रितानियों ने अपने अनुकूल नवशिक्षित वर्ग तैयार किया तथा भारतीय शिक्षा पर द्विसूत्रीय शिक्षा प्रणाली लागू की ताकि ये लोग ब्रितानी सरकार को चलाने मे मदद कर सके।

ब्रिटिश सरकार ने 1834 में सभी स्कूलों में बाइबिल का अध्ययन अनिवार्य बना दिया क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी के सभी अधिकारी सामान्यत: अपने व्यापारिक काम के साथ-साथ ईसाई मत का प्रचार करते हुए लोगों को धर्मांतरित करना अपना धर्मिक कर्त्तव्य मानते थे।

विश्‍व में चित्तौड ही एक मात्र वह स्थान है, जहाँ 900 साल तक आजादी की लड़ाई लड़ी गई।

भारत में ब्रिटिश सरकार के शासन काल के समय जहां-जहां ब्रितानियों का राज था वहाँ आम लोग उनके सामने घुड़सवारी नहीं कर पाते थे।

क्रांति के समय प्रत्येक गाँव में रोटी भेजी जाती थी जिसे सब मिलकर खाते व क्रांति का संकल्प करते थे। कई रोटियाँ बनकर आस पास के गाँवो में जाती। सिपाहियों के पास कमल के फ़ूल जाते व हर सैनिक इसे हाथ में लेकर क्रांति की शपथ लेता था।

दिल्ली पर चारों तरफ़ से ब्रितानियों ने हमला किया जिसमें पहले ही दिन उनके तीन मोर्चो के प्रमुख कमांडर भयंकर रू प से घायल हुए, 66 अधिकारी व 404 जवान मृत हुए।

बनारस के आसपास जनरल नील ने बदले की भावना से भंयकर अत्याचार किए। हजारों लोगों को फ़ांसी देना, गाँव जलाकर लोगों को जिन्दा जलाना जैसे कई प्रकार के अत्याचार किए। वे बड़े वृक्ष की हर डाली पर लोगों को फ़ांसी पर लटकाते चले गये।

24 जुलाई को क्रांतिकारी पीर अली को ब्रितानियों ने पटना में फ़ांसी देते ही दानापुर की पलटन ने संग्राम प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने जगदीशपुर के 80 साल के वयोवृद्ध राजपूत कुंवरसिह को अपना नेता बनाया। कुंवरसिह ने इस उम्र में जिस तरह से कई लड़ाइयां लड़ी वह वास्तव में प्रेरणादायी है। उनकी प्रेरणा से पटना आरा, गया, छपरा, मोतीहरी, मुज्जफ़रनगर आदि स्थानों पर भी क्रांति हो पाई थी।

भारत के वीर सेनानी तांत्या टोपे को ब्रितानियों ने 7 अप्रेल 1859 की सुबह गिरफ़्तार किया और 15 अप्रैल को ग्वालियर के निकट शिवपुरी में सैनिक न्यायालय में मुकदमे का नाटक किया गया और उनको फ़ांसी देने की घोषणा की गई। 18 अप्रैल 1859 को शाम 7 बजे उन्होंने वीर योद्धा की तरह खुद ही अपनी गर्दन फ़ांसी के फ़ंदे में डाली व अनंत यात्रा पर निकल पडे।

यह बात सरासर झूठ है कि 1857 की क्रांति केवल सिपाही विद्रोह था क्योंकि शहीद हुए 3 लाख लोगों में आधे से ज्यादा आम लोग थे। जब इतनी बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं तो वह विद्रोह नहीं बल्कि क्रांति या संग्राम कहलाता है।

केवल दिल्ली में 27,000 लोगों को फ़ांसी दी ग़यी।

भगवा, विरसामुंडा जैसे कई जनजाति नेता, क्रांतिकारी वसुदेव, बलदेव फ़डके से लेकर सावरकर, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह जैसे कई दीवाने एवं सुभाष की आजाद हिन्द फ़ौज तथा गाँधीजी का अहिंसक आंदोलन आदि सभी ने इसी 1857 की क्रांति से प्रेरणा पाई थी।

इस क्रांति के समय मुम्बई में 1213, बंगाल में 1994, मद्रास में 1044 सैनिकों के कोर्ट मार्शल किये गये थे।

इस आंदोलन में तीन लाख से भी अधिक लोग शहीद हुए, अकेले अवध में 1 लाख 20 हजार लोगेंे ने अपनी आहुति दी थी। लखनऊ में 20 हजार, इलाहबाद में 6000 लोगों को ब्रितानियों ने सरेआम कत्ल किया था।

1857 के स्वाधीनता संग्राम के बाद 1857 में ईस्ट इंडिया कम्पनी के 100 पौंड की कीमत का शेयर 10000 पौंड में खरीदकर ब्रिटिश सरकार ने भारत पर अपना अधिकार कर लिया था।

1857 में ब्रिटिश अत्याचारों के कुछ अमानवीय उदाहरण –

ब्रिटिश सरकार ने मौलवी अहमद शाह की मृत्यु के बाद उनके सिर को कोतवाली में लटका दिया व मौलवी साहब को मौत के घाट उतारने वाले ब्रितानियों के समर्थक पवन राजा जगन्नाथ सिंह को 5000 रु का इनाम भी दिया।

एक बार ब्रितानी कानपुर के बहुत से ब्राह्मणों को पकड़ कर लाये ओर उनमें से जिनका सम्पर्क क्रांतिकारियों से था, उन्हें फ़ांसी पर चढ़ाया। इतना ही नहीं फ़ांसी देने से पूर्व वह रक्त की भूमि जिस पर क्रांतिकारियों ने ब्रितानियों को मारा था उसको चाटने के लिये और बुहारी से रक्त के धब्बे धोने के लिये उन्हें बाध्य किया गया क्योंकि हिन्दू धर्म की दृष्टि से इन कृत्यों से उच्च वर्ण के लोगों का पतन होता है।

ब्रितानियों ने रानी लक्ष्मी बाई की उत्तराधिकार वाली याचिका खारिज कर दी व डलहौजी ने बालक दामोदर को झाँसी का उत्तराधिकारी मानने से इन्कार कर दिया क्योंकि वे झाँसी को अपने अधिकार में लेना चाहते थे। मार्च 1854 में ब्रिटिश सरकार ने रानी को महल छोड़ने का आदेश दिया साथ ही उनकीसालाना राशि में से 60,000 रुपये हर्जाने के रूप में हड़प लिये।

बितानी सेना का विरोध करने के कारण बहादुर शाह को बंदी बनाकर बर्मा भेज दिया गया । उनके साथ उनके दोनों बेटों को भी कारावास में डाल दिया गया। वहाँ उनके दोनों बेटों को मार दिया गया।

26 जनवरी 1851 में जब बाजीराव द्वितीय की मृत्यु हो गई तो ब्रिटिश सरकार ने उनके दत्तक पुत्र नाना साहब को पेशवा की उपाधि व व्यक्तिगत सुविधाओं से वंचित कर दिया।

ब्रितानियों ने भारतीय सिपाहियों व मंगल पांडे आदि को उनकी धार्मिक भावनाओं व उनकी हिन्दू धर्म की मान्यताओ को ठेस पहुँचाने के लिये गाय व सुअर की चर्बी वाले कारतूसों का प्रयोग करने के लिये बाध्य किया। जब उन लोगों ने विरोध किया तो ब्रिटिश सरकार ने मंगल पांड़े का कोर्ट मार्शल किया व उनको फ़ांसी पर चढ़ा दिया। रेजिमेंट के जिन सिपाहियों ने मंगल पांड़े का विद्रोह में साथ दिया था। ब्रिटिश सरकार ने उनकों सेना से निकाल दिया और पूरी रेजिमेंट को खत्म कर दिया।

जबलपुर के राजा शंकर शाह ने नागपुर व जबलपुर की फ़ौज में विद्रोह का काम किया। उन्हें तोप से बांधकर निर्दयता से उड़ा दिया गया।

संदर्भ- 
हिंदी पत्रिका : पाथेय कण, अंक : 1,
दिनांक 13 अप्रैल (संयुक्तांक) 2007

ब्रितानियोें के राक्षसी कृत्य 
(चाँद के फाँसी अंक (1928) का एक लेख)

आज से सौ वर्ष पूर्व पत्रकारिता का उद्देश्य राष्ट्र का पुनर्जागरण था। पं. सुंदर लाल का ‘कर्मयोगी’, कृष्णकांत मालवीय का ‘अभ्युदय’, गणेश शंकर विद्यार्थी का ‘प्रताप’, पं. पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र का ‘स्वदेश’, प्रयाग से निकलने वाला ‘चाँद’ और कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले ‘हिंदू पंच’ ऐसे ही पत्र-पत्रिकाएँ थे जिन्होंने ब्रिटिश-काल में राष्ट्रभक्ति की अलख जगाई। ‘चाँद’ का प्रकाशन वर्ष 1922 में रामरिख सहगल ने शुरू किया था। इस तरह ‘हिन्दूपंच’ का प्रकाशन ईश्वरीदत्त शर्मा ने 1926 में प्रारंभ किया। ‘चाँद’ का फाँसी अंक, ‘हिंदू पंच’ का बलिदान अंक (1930) और ‘स्वदेश’का विजयांक (1924) उस समय काफ़ी चर्चित हुए तथा प्रकाशन से पहले ही प्रतिबंधित कर दिए गए। मासिक ‘चाँद’ का वर्ष 1928 में नवंबर माह का अंक ‘फाँसी अंक’ था। इसके संपादक प्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य चतुरसेन शास्त्री थे। इस अंक में अमर हुतात्माओं पं. राम प्रसाद बिस्मिल, भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त तथा शिव वर्मा के लेख भी छद्म नामों से प्रकाशित हुए थे। मासिक के सातवें वर्ष का यह पहला अंक था। ब्रितानियोें ने इस फाँसी अंक का प्रकाशन होते ही इस पर रोक लगा कर पत्रिका के कार्यालय पर छापा मारा और वहाँ बची सारी प्रतियाँ ज़ब्त कर लीं। मासिक ‘चाँद’ के इस अंक में ‘सन् 57 के कुछ संस्मरण’ नाम से एक लेख प्रकाशित हुआ था। इसमें प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में ब्रितानियोें के नृशंस अत्याचारों का वर्णन किया गया है। अँग्रेज़ लेखकों के पत्र, लेख, पुस्तकों आदि के अंशों को उदृत कर लेख में सभ्यता का ढिंढोरा पीटने वाले ब्रितानियोें की वास्तविकता बताई गई है। इस लेख के कुछ अंश वहाँ आभार सहित दिए जा रहे हैं- सं.

एक अँग्रेज़ अपने पत्र में लिखता है-

“हमने एक बड़े गाँव में आग लगा दी, जो कि लोगों से भरा हुआ था। हमने उन्हें घेर लिया और जब वे आग की लपटों से निकलकर भागने लगे तो हमने उन्हें गोलियों से उड़ा दिया।” (Charles Ball’s Indian Mutiny, vol. 1, pp 243-44)

ग्राम-निवासियों सहित ग्रामो को जलाया जाना 

इलाहाबाद के अपने एक दिन के कृत्यों का वर्णन करते हुए एक अँग्रेज़ अफ़सर लिखता है – “एक यात्रा में मुझे अद्भुत आनंद आया। हम लोग एक तोप लेकर एक स्टीमर पर चढ़ गए। सिक्ख और गोरे सिपाही शहर की तरफ़ बढ़े। हमारी किश्ती ऊपर को चलती जाती थी और हम अपनी तोप से दाएँ और बाएँ गोले फेंकते जाते थे। यहाँ तक कि हम बुरे-बुरे ग्रामों में पहुँचे। किनारे पर जाकर हमने अपनी बंदूकों से गोलियाँ बरसानी शुरू कीं। मेरी पुरानी दोनली बंदूक ने कई काले आदमियो को गिरा दिया। मैं बदला लेने का इतना प्यासा था कि हमने दाएँ और बाएँ गाँवों में आग लगानी शुरू की, लपटें आसमान तक पहुँची और चारों ओर फैल गई। हवा ने उन्हें फैलाने में और भी मदद दी, जिससे मालूम होता था कि बाग़ी और बदमाशों से बदला लेने का मौक़ा आ गया है। हर रोज़ हम लोग विद्रोही ग्रामों को जलाने और मिटा देने के लिए निकलते थे और हमने बदला ले लिया है। लोगों की जान हमारे हाथों में है और मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि हम किसी को नहीं छोड़ते। अपराधी को एक गाड़ीं के ऊपर बैठा कर किसी दरख़्त के नीचे ले ज़ाया जाता है। उसकी गर्दन में रस्सी का फँदा डाल दिया जाता है और फिर गाड़ीं हटा दी जाती है और वह लटका हुआ रह जाता है।” (Charles Ball’s Indian Mutiny, vol. L. P. 257.)

असहाय स्त्रियों और बच्चों का संहार 

इतिहास-लेखक होम्स लिखता है- 
“बूढ़ें आदमियों ने हमें कोई नुकसान न पहुँचाया था; असहाय स्त्रियों से, जिनकी गोद में दूध पीते बच्चे थे, हमने उसी तरह बदला लिया जिस तरह बुरे से बुरे आदमियों से।” 
(Holmes, Sepoy War, pp. 229-30)

सर र्जोर्ज कैम्पवेल लिखता है- 
“और में जानता हूँ कि इलाहाबाद में बिना किसी तमीज़ के कत्लेआम किया गया था और इसके बाद नील ने वे काम किए थे जो कत्लेआम से अधिक मालूम होते थे। उसने लोगों को जान-बूझकर इस तरह की यातनाएँ दे-देकर मारा इस तरह की यातनाएँ, जहाँ तक हमें सुबूत मिलें हैं, भारतवासियों ने कभी किसी को नहीं दीं।” 
(Sir George Campbell Provisional Civil commissioner in the Mutiny, as quotexd in the other side of Medal by Edward Thomson. P. 18)

एक अंग्रेज लेखक लिखता है- 
“55 नवम्बर पलटन के कैदियों के साथ अधिक भयंकर व्यवहार किया गया, ताकि दूसरों को शिक्षा मिले। उनका कोर्ट-मार्शल हुआ, उन्हे दण्ड दिया गया और उनमें से हर तीसरे मनुष्य को तोप के मुँह से उड़ाने के लिए चुन लिया गया।” 
(Narative of the Indian Revolt P. 36)

एक अंग्रेज अफसर जो इन लोगों के तोप से उड़ाए जाने के समय उपस्थित था, उस दृश्य का वर्णन करते हुए लिखता है-

“उस दिन की परेड का दृश्य विचित्र था। परेड पर लगभग नौ हजार सिपाही थे। एक चौरस मैदान के तीनों और फौज खड़ी कर दी गई। चौथी और दस तोपे थीं। पहले दस कैदी तोपों के मुँह से बाँध दिए गए। इसके बाद तोपखाने के अफसर ने अपनी तलवार हिलाई, तुरन्त तोपों की गरज सुनाई दी और धुँए के ऊपर हाथ, पैर और सिर हवा में उड़ते हुए दिखाई देने लगे। यह दृश्य चार बार दुहराया था। हर बार समस्त सेना में से जोर की गूंझ सुनाई देती थी, जो दृश्य की वीभत्सता के कारण लोगों के हृदयों से निकलती थी। उस समय से हर सप्ताह में एक या दो बार उस तरह के प्राण-दण्ड की परेड होती रहती है और हम अब उससे ऐसे अभ्यस्त हो गए हैं कि हम पर उसका कोई असर नहीं होता।” 
(Narrative of the Indian Revolt, p. 36)

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मनुष्यों का शिकार –
सन् 57 में जनरल हेवलॉक और रिर्नाड के अधीन कम्पनी की सेना की इहालाबाद से कानपुर तक की यात्रा के विषय में सर चार्ल्स डिल्क लिखाता है-

“सन 1857 में जो पत्र इंगलिस्तान पहुँचे उनमें एक ऊँचे दर्ज का अफसर, जो कानपुर की ओर सेना की यात्रा में साथ था, लिखता है- ‘ मैंने आज की अंग्रेजी तारीख में खूब शिकार मारा। बागियों को उड़ा दिया। यह याद रखना चाहिए कि जिन लोगों को इस प्रकार फाँसी दी गई या तोप से उड़ाया गया, वे सशस्त्र बागी न थे , बल्कि गाँव के रहने वाले थे, जिन्हें केवल सन्देह पर पकड़ लिया जाता था। इस कूच में गाँव के गाँव इस क्रूरता के साथ जला डाले गए और इस निर्दयता के साथ निर्दोष ग्रामवासियों का संहार किया गया कि जिसे देखकर एक बार मुहम्मद तुगलक भी शरमा जाते।” 
(Greater Britian, by Sir Charles Dilke.)

कानपुर में फाँसियाँ 
17 जुलाई, सन् 57 को जनरल हेवलॉक की सेना ने कानपुर में प्रवेश किया। उस समय चार्ल्स बॉल लिखता है- 
“जनरल हेवलॉक ने सर ह्यू व्हीलर की मृत्यु के लिए भयंकर बदला चुकाना शुरू किया। हिंदुस्तानियों के गिरोह के गिरोह फाँसी पर लटका दिया गए। मृत्यु के समय कुछ विप्लवकारियों ने जिस प्रकार चित्त की शान्ति और अपने व्यवहार में ओज का परिचय दिया, वह उन लोगों के सर्वथा योग्य था, जो किसी सिद्धान्त के कारण शहीद होते हैं।” 
(Charles Balls Indian Muting, Vol. 1, p. 338)

दिल्ली में कत्लेआम और लूट 
सन् 57 में दिल्ली के पतन के बाद दिल्ली के अन्दर कम्पनी के अत्याचारों के विषय में लॉर्ड एल्फिस्टन ने सर जॉन लॉरेन्स को लिखा है- 
“मौहासरे के खत्म होने के बाद से हमारी सेना ने जो अत्याचार किया हैं, उन्हें सुनकर हृदय फटने लगता है। बिना मित्र अथवा शत्रु में भेद किए ये लोग सबसे एक सा बदला ले रहे हैं। लूट में तो वास्तव में हम नादिरशाह से भी बढ़ गए।” 
(Life of Lord Lawrence, Vol. II, P. 262)

मॉण्टगुमरी मार्टिन लिखता है- 
“जिस समय हमारी सेना ने शहर में प्रवेश किया जो जितने नगर-निवासी शहर की दीवारों के अन्दर पाए जाए, उन्हें उसी जगह मार डाला गया। आप समझ सकते हैं कि उनकी संख्या कितनी अधिक रही होगी, जब मैं आपको यह बतलाऊँ कि एक-एक मकान में चालीस-चालीस, पचास-पचास आदमी छिपे हुए थे। ये लोग विद्रोही न थे, बल्कि नगर-निवासी थे, जिन्हें हमारी दयालुता और क्षमाशीलता पर विश्वास था। मुझे खुशी है कि उनका भ्रम दूर हो गया। ”
(Letter in the Bombay Telegraph by Mont-gomery Martin.)

रसल लिखता है- 
“मुसलमानों को मारने से पहले उन्हे सुअर की खालों में सी दिया जाता था, उन पर सूअर की चर्बीं मल दी जाती थी, और फिर उनके शरीर जला दिए जाते थे और हिन्दूओं का भी जबरदस्ती धर्मभ्रष्ट किया जाता था।” 
(Russell ‘s Diary, Vol. II P. 43.)

पंजाब का ब्लैक होल और अजनाले का कुआँ 

26 नवम्बर पलटन के कुछ थके हुए सिपाही अमृतसर की एक तहसील अजनाले से 6 मील दूर रावी नदी के किनार पड़े हुए थे। ये वे सिपाही थे जो 30 जुलाई को रात को लाहौर की छावनी के पहरे से निकल भागे थे। इन लोगों ने विद्रोह में किसी प्रकार का भाग नहीं लिया था, परन्तु केवल सन्देह के कारण इनसे हथियार रखवा लिए गए थे और इन्हें कैद कर लिया गया था। इन निर्दोष सिपाहियों के साथ जुडीशल कमिश्नर सर रॉबर्ट मॉण्टगुमरी ने जैसा व्यवहार किया उसका वर्णन अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर फ्रेड्रिक कूपर ने अपनी “The Crisis in the Punjab ” नामक पुस्तक में बड़े विस्तार के साथ किया है। उसका सारांश संक्षेप में कूपर के ही शब्दो में नीचे दिया जाता है-

31 जुलाई को दोपहर के समय जब हमें मालूम हुआ कि ये लोग रावी के किनारे पड़े हुए तो हमने अजनाले के तहसीलदार को कुछ सशस्त्र सिपाहियों सहित उन्हें घेरने के लिए भेज दिया। शाम को चार बजे के करीब हम 80 या 90 सवारों को लेकर मौके पर पहुँचे। बस फिर क्या था। शीघ्र ही उन थके-माँदे लोगों पर गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं गई। उनमें से बहुत तो रावी में कूद पडे और बहुत से बुरी तरह घायल होकर निकल भागे। उनकी संख्या पाँच सौ थी। भूख-प्यास के कारण वे इतने निर्बल हो गए थे कि रावी नदी की धारा में न ठहर सके। नदी के ऊपर की ओर लगभग एक मील के फासले पर एक टापु था। जो लोग तैरते हुए रावी पार कर गए उन्होंने भाग कर यहाँ शरण ली पर यहाँ भी भाग्य ने उनका साथ न दिया। दो किश्तियाँ मौके पर मौजूद थीं। तीन सशस्त्र सवार इन किश्तियों पर बैठाकर उन्हें पकड़ने के लिए भेज दिए गए तथा 60 बन्दूकों के मुँह उनकी तरफ कर दिए गए। जब उन लोगों ने बन्दूकें देखी तो उन्होंने हाथ जोड़कर अपनी निर्दोषता प्रकट की और प्राण-भिक्षा माँगी। परन्तु इन्हें शीध्र ही गिरफ्तार कर लिया गया और थोड़े थोड़े कर रावी के पास उस पार पहुँचा दिया गया। गिरफ्तार होने से पहले इनमें से करीब पचास निराश होकर रावी में कूद पड़े और फिर न दिखाई दिए। किनारे पर पहुँचकर इन लोगों को खूब कसकर बाँध दिया गया और उनकी कण्ठी-मालाएँ तोड़कर पानी में फेंक दी गई। उस समय जोर की वर्षा हो रही थी, पर उस वर्षा में ही उन्हें सिक्ख सवारों की देख-रेख में अजनाले पहुँचा दिया गया।

अजनाले के थाने में हमने इनको फाँसी देने के लिए और गोलियों से उड़ाने के लिए रस्सियों एवं पचास सशस्त्र सिक्ख सिपाहियों का प्रबन्ध कर रखा था। 282 बँधे हुए सिपाही, जिनमें कई देशी अफसर भी थे, आधी रात के समय अजनाले के थाने पर पहुँचे। सब को अजनाले के थाने में बन्द कर दिया गया। जो थाने में न आ सके उन्हें पास ही की तहसील में जो कि बिलकुल नई बनी थी, एक छोटे से गुम्बद में भर दिया गया। वह गुम्बद बहुत तंग था, पर तो भी उसके दरवाजे चारों तरफ से बन्द कर दिए गए और वर्षा के कारण फाँसी दूसरे दिन सवेरे के लिए स्थगित कर दी गई।

दूसरे दिन बकरीद थी। प्रात: काल इन अभागों को दस-दस करके बाहर निकाला गया। दस सिक्ख एक ओर बन्दूकें लिए खड़े हुए थे और चालीस उनकी मदद के लिए। सामने आते ही इन लोगों को गोली से उड़ा दिया जाता था।

जब थाना खाली हो गया तो तहसील की बारी आई। जब गुम्बद के 21 सिपाही बन्दूक का निशाना बन चुके तो मालूम हुआ कि बाकी सिपाही गुम्बद में से बाहर नहीं निकलना चाहते। अन्दर जाकर देखा तो 45 सिवाही पड़े-पड़े सिसक रहे थे। अनजाने ही हौल-वेल का ब्लैक होल हत्याकाण्ड फिर से दुहराया गया।

शीघ्र ही इन लोगों की लाशें घसीट कर बाहर निकाली गईं और उन्हे एक पुराने कुएँ में, जो कि अजनाले के धाने से सौ गज के फासले पर था, डाल दिया गया। कुएँ में जो जगह बाकी रही थी वह ऊपर से मिट्टी डलवा कर भर दी गई और उस पर एक ऊँचा टीला बना दिया गया। एक कुआँ कानपुर में है, परन्तु एक कुआँ अजनाले मे भी है। जो सिपाही गोली से उड़ा दिए गए अथवा कुएँ में डाल दिए गए, उनमें से अधिकांश हिन्दू थे। उन्होंने मरते समय सिक्खों को गंगाजी की दुहाई देकर लानत-मलामत की।

संदर्भ- 
हिंदी पत्रिका : पाथेय कण 
अंक : 1,
दिनांक 13 अप्रैल (संयुक्तांक) 2007

1857 की क्रांति के असफलता के कारण

आजादी के लिये 1857 की क्रांति में सभी वर्ग के लोगों ने अपना सहयोग दिया था परन्तु यह क्रांति विफ़ल रही। इतिहासकार इस क्रांति की विफ़लता के निम्न कारण बताते है।

निश्चित तिथि के पूर्व क्रांति का भड़कना

क्रांति का स्थानीय स्वरूप

क्रांतिकारियों में प्रभावी नेता की कमी

निश्चित लक्ष्य का अभाव

साधन का अभाव

कैनिंग की उदारता

जन साधारण का क्रांति के प्रति उदासीन होना

अन्य कारण

निश्चित तिथि के पूर्व क्रांति का भड़कना

लक्ष्मी बाई, नाना साहब, अजीमुल्ला खां, बहादुर शाह जफ़र, तांया टोपे आदि क्रांतिकारियों ने 31 मई को क्रांति आरम्भ करने के बारे में योजना बनाई। इन सबने इस दिन बंदियों को मुक्त कराने, ब्रिटिश पदाधिकारियो को जान से मारने, ब्रितानियों के हथियारों व सरकारी खजाने को लूटने जैसी कई योजनाएं बनाई। इस योजना की खबर ब्रितानियों को नहीं थी। लेकिन उसी समय 24 मार्च को मंगल पांडे ने आवेश में आकरचर्बी वाले कारतूसों का विरोध करके क्रांति की शुरूआत कर दी। यह क्रांति बंगाल के अलावा दिल्ली, मेरठ, कानपुर, इलाहाबाद, बनारस आदि जगह फ़ैल गई। अगर क्रांति निश्चित समय पर हुई होती तो वह जरूर सफ़ल हुई होती।

क्रांति का स्थानीय स्वरूप

1857 की क्रांति पूरे राष्ट्र तक नहीं फ़ैल पाई। देश के सिंध, नर्मदा का दक्षिण हिस्सा, आदि भागों में क्रांति की लहर बिल्कुल भी नहीं पहुँच पाई। कई देशी राजाओं ने क्रांतिकारियों का साथ दिया लेकिन कुछ देशी राजाओं व अन्य लोगों ने ब्रितानियों का साथ दिया।

क्रांतिकारियो में प्रभावी नेता की कमी

इस क्रांति की विफ़लता का एक कारण यह भी था कि इसमें कुशल सेनानायक का अभाव था। यद्यपि ये सब साहसी, व कष्ट सहिष्णु थे लेकिन ये सब सही तरीके से एकत्रित नहीं हो पाए। कई बार ये आपस में ही लड़ते रहते थे। कई लोग लक्ष्मी बाई जैसी बहादुर क्रांतिकारी को सिर्फ़ महिला होने के कारण क्रांति का नेतृत्व नहीं करने दे रहे थे। इसी तरह बख्त खां को भी सिर्फ़ साधारण परिवार से सम्बंधित होने के कारण बहादुर होते हुए भी क्रांति का नेतृत्व नहीं करने दिया गया। इस क्रांति की विफ़लता के पीछे सफ़ल नेता का अभाव व आपसी फ़ूट ही था। यदि सब आपस में मिलकर ब्रितानियों का विरोध करते तो निश्चित ही सफ़ल हो जाते।

निश्चित लक्ष्य का अभाव

सभी क्रांतिकारियों के क्रांति के पीछे उद्धेश्य अलग-अलग थे। जैसेे बेगम हजरत महल अवध को कंपनी सरकार में मिलाने के कारण ब्रितानियों की विद्रोही बनी। कुंवरसिंह ब्रिटिश सरकार के व्यवहार से खुश नहीं थे। नाना साहब पेंशन ना मिलने के कारण ब्रितानियों के खिलाफ़ हुए। सबका उद्धेश्य साझा या आम नहीं था लेकिन वे सभी ब्रितानियों को भारत से निकालना चाहते थे। अगर सभी देशी राजाओं ने उनका साथ दिया होता वएक सुनिश्चित उद्धेश्य होता तो ब्रितानियों को इंग्लैंड की ओर भागना ही पड़ता।

साधन का अभाव

क्रांतिकारियों के पास पुराने शस्त्र थे जबकि ब्रितानियों के पास आधुनिक शस्त्र थे। क्रांतिकारियों के पास संदेश भेजने का भी साधन नहीं था तथा उनके पास धन की भी कमी थी, इसलिये सेना में नये लोग भर्ती नहीं होते थे। अत: क्रांति विफ़ल रही।

कैनिंग की उदारता

1857 में ब्रितानियों द्वारा भारत सरकार अधिनियम पारित किया गया जिसमे भारतीय लोगों को कई सब्जबाग दिखलाये गये। डलहौजी के बाद कैनिंग को गवर्नर जनरल बनाया गया जो क्रांति को दबाना चाहता था। जिसमें वह कुछ सफ़ल भी रहा। क्रांति के दमन के बाद सेनापति निकोलसन ने आदेश दिया की बचे हुए क्रांतिकारियों को फ़ांसी पर चढ़ा दिया जाए। कैनिंग द्वारा क्रांति का दमन करने के बाद क्रांति फ़िर नहीं भड़की।

जन साधारण का क्रांति के प्रति उदासीन होना

इस क्रांति में अधिकांश सैनिकों राजाओं व कुछ लोगों के अलावा व्यापक जनता ने हिस्सा नहीं लिया था इसके अलावा कुछ किसानों व मजदूरों ने भी हिस्सा नहीं लिया। इसका एक कारण अशिक्षा भी था जिससे जनता क्रांति का उद्धेश्य नहीं समझ पाई। एक तरफ़ क्रांतिकारियों ने लूटपाट मचाई, जेल तोड़ने से सिपाहियों के साथ चोर डाकू भी बाहर निकल गये जिससे समाज में फ़िर से अशान्ति फ़ैल गई। लोगों ने इन सबका जिम्मेदार सरकार की बजाय क्रांतिकारियों को बताया जिससे क्रांति विफ़ल रही थी।

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कुछ अनजाने तथ्य:

1857 का क्रांति युद्ध भारत में महाभारत के बाद लड़ा गया सबसे बडा युद्ध था। इस संग्राम की मूल प्रेरणा स्वधर्म की रक्षा के लिये स्वराज की स्थापना करना था। यह स्वाधीनता हमें बिना संघर्ष, बिना खड़ग-ढ़ाल के नहीं मिली, लाखों व्यक्तियों द्वारा इस महायज्ञ में स्वयं की आहुति देने से मिली है।

लार्ड डलहौजी ने 10 साल के अन्दर भारत की 21 हजार जमीदारियाँ जब्त कर ली और हजारों पुराने घरानों को बर्बाद कर दिया।

ब्रितानियों ने अपने अनुकूल नवशिक्षित वर्ग तैयार किया तथा भारतीय शिक्षा पर द्विसूत्रीय शिक्षा प्रणाली लागू की ताकि ये लोग ब्रितानी सरकार को चलाने मे मदद कर सके।

ब्रिटिश सरकार ने 1834 में सभी स्कूलों में बाइबिल का अध्ययन अनिवार्य बना दिया क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी के सभी अधिकारी सामान्यत: अपने व्यापारिक काम के साथ-साथ ईसाई मत का प्रचार करते हुए लोगों को धर्मांतरित करना अपना धर्मिक कर्त्तव्य मानते थे।

विश्‍व में चित्तौड ही एक मात्र वह स्थान है, जहाँ 900 साल तक आजादी की लड़ाई लड़ी गई।

भारत में ब्रिटिश सरकार के शासन काल के समय जहां-जहां ब्रितानियों का राज था वहाँ आम लोग उनके सामने घुड़सवारी नहीं कर पाते थे।

क्रांति के समय प्रत्येक गाँव में रोटी भेजी जाती थी जिसे सब मिलकर खाते व क्रांति का संकल्प करते थे। कई रोटियाँ बनकर आस पास के गाँवो में जाती। सिपाहियों के पास कमल के फ़ूल जाते व हर सैनिक इसे हाथ में लेकर क्रांति की शपथ लेता था।

दिल्ली पर चारों तरफ़ से ब्रितानियों ने हमला किया जिसमें पहले ही दिन उनके तीन मोर्चो के प्रमुख कमांडर भयंकर रू प से घायल हुए, 66 अधिकारी व 404 जवान मृत हुए।

बनारस के आसपास जनरल नील ने बदले की भावना से भंयकर अत्याचार किए। हजारों लोगों को फ़ांसी देना, गाँव जलाकर लोगों को जिन्दा जलाना जैसे कई प्रकार के अत्याचार किए। वे बड़े वृक्ष की हर डाली पर लोगों को फ़ांसी पर लटकाते चले गये।

24 जुलाई को क्रांतिकारी पीर अली को ब्रितानियों ने पटना में फ़ांसी देते ही दानापुर की पलटन ने संग्राम प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने जगदीशपुर के 80 साल के वयोवृद्ध राजपूत कुंवरसिह को अपना नेता बनाया। कुंवरसिह ने इस उम्र में जिस तरह से कई लड़ाइयां लड़ी वह वास्तव में प्रेरणादायी है। उनकी प्रेरणा से पटना आरा, गया, छपरा, मोतीहरी, मुज्जफ़रनगर आदि स्थानों पर भी क्रांति हो पाई थी।

भारत के वीर सेनानी तांत्या टोपे को ब्रितानियों ने 7 अप्रेल 1859 की सुबह गिरफ़्तार किया और 15 अप्रैल को ग्वालियर के निकट शिवपुरी में सैनिक न्यायालय में मुकदमे का नाटक किया गया और उनको फ़ांसी देने की घोषणा की गई। 18 अप्रैल 1859 को शाम 7 बजे उन्होंने वीर योद्धा की तरह खुद ही अपनी गर्दन फ़ांसी के फ़ंदे में डाली व अनंत यात्रा पर निकल पडे।

यह बात सरासर झूठ है कि 1857 की क्रांति केवल सिपाही विद्रोह था क्योंकि शहीद हुए 3 लाख लोगों में आधे से ज्यादा आम लोग थे। जब इतनी बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं तो वह विद्रोह नहीं बल्कि क्रांति या संग्राम कहलाता है।

केवल दिल्ली में 27,000 लोगों को फ़ांसी दी ग़यी।

भगवा, विरसामुंडा जैसे कई जनजाति नेता, क्रांतिकारी वसुदेव, बलदेव फ़डके से लेकर सावरकर, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह जैसे कई दीवाने एवं सुभाष की आजाद हिन्द फ़ौज तथा गाँधीजी का अहिंसक आंदोलन आदि सभी ने इसी 1857 की क्रांति से प्रेरणा पाई थी।

इस क्रांति के समय मुम्बई में 1213, बंगाल में 1994, मद्रास में 1044 सैनिकों के कोर्ट मार्शल किये गये थे।

इस आंदोलन में तीन लाख से भी अधिक लोग शहीद हुए, अकेले अवध में 1 लाख 20 हजार लोगों ने अपनी आहुति दी थी। लखनऊ में 20 हजार, इलाहबाद में 6000 लोगों को ब्रितानियों ने सरेआम कत्ल किया था।

1857 के स्वाधीनता संग्राम के बाद 1857 में ईस्ट इंडिया कम्पनी के 100 पौंड की कीमत का शेयर 10000 पौंड में खरीदकर ब्रिटिश सरकार ने भारत पर अपना अधिकार कर लिया था।

अन्य कारण

यद्यपि कई क्रांतिकारियों ने साहस के साथ दुश्मन के छक्के छुड़ाये लेकिन कुछ दूसरे कारण भी थे जिनके कारण यह क्रांति विफ़ल रही ।

ब्रिटिश सेना का एक संगठन व एक केन्द्र होता था। एक सेना के हटने पर दूसरी सेना आ जाती थी। जबकि भारतीय सेना में यदि युद्ध में कोई सैनिक मारा जाता तो सैनिक अपनी हार मान लेते थे व कई बार युद्ध बंद कर देते थे। उनमे धैर्य की कमी थी लेकिन ब्रितानियों की सेना में यह नहीं होता था उनका युद्ध जारी रहता था। इस कारण क्रांति विफ़ल रही। फ़िर भी, इन सब के बावजूद 1857 की क्रांति का विवरण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है।

1857 की क्रांति के अन्य अनजाने तथ्य –

1857 के समय राजस्थान के कई राजपूत ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ थे। ये ब्रितानियों के शासन से संतुष्ट नहीं थे जिससे इनके मन में सरकार के खिलाफ़ क्रांति के बीज उत्पन्न होने लगे। इन लोगों के साथ आम जनता भी शामिल हो गई। राजस्थान के कई इलाकों में इस विद्रोह की ज्वाला भड़की थी जिनमें निम्न नाम उल्लेखनीय हैं।

नसीराबाद 
सबसे पहले नसीराबाद में इस विद्रोह की शुरू आत हुई थी। इसके पीछे मुख्य कारण यह था कि ब्रिटिश सरकार ने अजमेर की 15वीं बंग़ाल इन्फ़ेन्ट्री को नसीराबाद भेज दिया था क्योंकि सरकार को इस पर विश्‍वास नहीं था। सरकार के इस निर्णय से सभी सैनिक नाराज हो गये थे और उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ क्रांति का आगाज कर दिया। इसके अतिरिक्त ब्रिटिश सरकार ने बम्बई के सैनिकों को नसीराबाद में बुलवाया और पूरी सेना की जंाच पड़ताल करने को कहा। ब्रिटिश सरकार ने नसीराबाद में कई तोपे तैयार करवाई। इससे भी नसीराबाद के सैनिक नाराज हो गये और उन्होंने विद्रोह कर दिया। सेना ने कई ब्रितानियों को मौत के घाट उतार दिया साथ ही साथ उनकी सम्पत्ति को भी नष्ट कर दिया। इन सैनिकों के साथ अन्य लोग भी शामिल हो गये।

नीमच 
नसीराबाद की घटना की खबर मिलते ही 3 जून 1857 को नीमच के विद्रोहियों ने कई ब्रितानियों को मौत के घाट उतार दिया। फ़लस्वरू प ब्रितानियों ने भी बदला लेने की योजना बनाई। उन्होंने 7 जून को नीमच पर अपना अधिकार कर लिया। बाद में विद्रोही राजस्थान के दूसरे इलाकों की तरफ़ बढ़ने लगे।

जोधपुर 
यहाँ के कुछ लोग राजा तख्त सिंह के शासन से रुष्ट थे। जिसके कारण एक दिन यहाँ के सैनिकों ने इनके खिलाफ़ विद्रोह कर दिया। उनके साथ आउवा के ब्रिटिश विरोधी कुशाल सिंह भी थे। 
कुशाल सिंह का सामना करने के लिये लेफ़्टिनेंट हीथकोट के साथ जोधपुर की सेना आई थी लेकिन कुशाल सिंह ने इन को परास्त कर दिया। बाद में ब्रितानी सेना ने आउवा के किले पर आक्रमण किया लेकिन उनको भी हार का मुँह देखना पड़ा लेकिन ब्रिगेडियर होम्स उस पराजय का बदला लेना चाहता था इसलिये उसने आउवा पर आक्रमण किया अब कुशाल सिंह ने किले को छोड़ दिया और सलुम्बर चले गये। कुछ दिनों बाद ब्रितानियों ने आउवा पर अधिकार कर लिया और वहा आतंक फ़ैलाया ।

मेवाड़ 
मेवाड़ के सामंत ब्रितानियों व महाराणा से नाराज थे। इन सामन्तों में आपसी फ़ूट भी थी । महाराणा ने मेवाड़ के सामन्तों को ब्रितानियों की सहायता करने की आज्ञा दी। इसी समय सलुम्बर के रावत केसरी सिंह ने उदयपुर के महाराणा को चेतावनी दी कि यदि आठ दिन में उनके परम्पराग़त अधिकार को स्वीकार न किया गया तो वह उनके प्रतिद्वंदी को मेवाड़ का शासक बना देंगे। सलुम्बर के रावत केसरी सिंह ने आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह को अपने यहा यहा शरण दी। इसी समय तांत्या टोपे ने राजपूताने की ओर कूच किया। 1859 में नरवर के मान सिंह ने उसके साथ धोखा किया और उसे गिरफ़्तार कर लिया। यद्यपि सामंतों ने प्रत्यक्ष रू प से ब्रिटिश सरकार का विद्रोह नहीं किया परन्तु विद्रोहियों को शरण देकर इस क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कोटा 
ब्रिटिश अधिकारी मेजर बर्टन ने कोटा के महाराजा को बताया यहां के दो चार ब्रिटिश विरोधी अधिकारियों को ब्रिटिश सरकार को सौंप देना चाहिये। लेकिन महाराजा ने इस काम में असमर्थता जताई तो ब्रितानियों ने महाराजा पर आरोप लगाया कि वह विद्रोहियों से मिले हुए हैं। इस बात की खबर मिलते ही सैनिकों ने मेजर बर्टन को मार डाला। विद्रोहियों ने राजा के महल को घेर लिया, फ़िर राजा ने करौली के शासक से सैनिक सहायता मांगी। करौली के शासक ने सहयोग किया और विद्रोहियों को महल के पीछे खदेड़ा। इसी समय जनरल एच.जी.राबर्टस अपनी सेना के साथ चम्बल नदी के किनारे पहुंचा उसे देखकर विद्रोही कोटा से भाग गये।

राज्य के अन्य क्षेत्रों में विद्रोह 
इस विद्रोह में अलवर के कई नेताओ ने हिस्सा लिया। जयपुर में उस्मान खां और सादुल्ला खां ने विद्रोह कर दिया। टोंक में सैनिकों ने विद्रोह कर दिया ओर नीमच के विद्रोहियों को टोंक आने का निमंत्रण दिया। इन्होने टोंक के नवाब का घेरा डाल कर उनसे बकाया वेतन वसूल किया। इसी तरह बीकानेर के शासक ने नाना साहब को सहायता का आश्‍वासन दिया था। और तांत्या टोपे की सहायता के लिये द्स हजार घुड़सवार सैनिक भेजे। यद्यपि राजस्थान के अधिकांश शासक पूरे विद्रोह काल में ब्रितानियों के प्रति वफ़ादार रहे, फ़िर भी विद्रोहियों के दबाव के कारण उन्हें यत्र-तत्र विद्रोहियों को समर्थन प्रदान करना पड़ा।

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में राजस्थान

कोटा के शहीद लाल जयदयाल 
रचनाकार : कन्हैया लाल जी

ब्रितानियों को भारत से बाहर निकालने के लिए युगाब्द 4659 (सन् 1857) में हुआ स्वतंत्रता का युद्ध भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है। देखा जाए तो स्वतंत्रता के संघर्ष की शुरुआत महाराणा हम्मीर सिंह ने की थी। वीरों में वीरोत्तम महाराणा हम्मीर ने मुस्लिम आक्रमणकारियों का बढ़ाव काफ़ी समय तक रोके रखा। वस्तुतः सिसोदिया वंश का पूरा इतिहास ही भारत की स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्ष का इतिहास है। लेकिन ब्रितानियों के ख़िलाफ़ पूरे भारत में एक साथ और योजनाबद्ध युद्ध सन् 1857 में लड़ा गया, इसीलिए इतिहासकारों ने इसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम बताया।

क्रांति के इस महायज्ञ को धधकाने की योजना अजीमुल्ला खाँ तथा रंगोबापूजी ने लंदन में बनाई थी। योजना बनाकर ये दोनों उत्कट राष्ट्र-भक्त पेशवा के पास आए और उन्हें इस अद्भुत समर का नेतृत्व करने को कहा। सैनिक अभियान के नायक के रूप में तात्या टोपे को तय किया गया। संघर्ष के लिए संगठन खड़ा करने तथा जन-जागरण का काम पूरे दो साल तक किया गया।

मौलवी, पंडित और संन्यासी पूरे देश में क्रांति का संदेश देते हुए घूमने लगे। नाना साहब तीर्थ-यात्रा के बहाने देशी रजवाड़ों में घूमकर उनका मन टटोलने लगे। आल्हा के बोल, नाटक मंडलियाँ और कठपुतलियों के खेल के द्वारा स्वधर्म और स्वराज्य का संदेश जन-जन में पहुँचाया जाने लगा। क्रांति का प्रतीक लाल रंग का कमल सैनिक छावनियों में एक से दूसरे गाँव में घूमते पूरे देश की यात्रा करने लगा। इतनी ज़बरदस्त तैयारी के बाद संघर्ष की रूप-रेखा बनी। यह सब काम इतनी सावधानी से हुआ कि धूर्त ब्रितानियों को भी इसका पता तोप का पहला गोला चलने के बाद ही लगा।

राजस्थान में पहली चिंगारी 
इस अपूर्व क्रांति-यज्ञ में राजसत्ता के सपूतों ने भी अपनी समिधा अर्पित की। देश के अन्य केंद्रों की तरह राजस्थान में भी सैनिक छावनियों से ही स्वतंत्रता-संग्राम की शुरुआत हुई। उस समय ब्रितानियों ने राजपूताने में 6 सैनिक छावनियाँ बना रखी थी। सबसे प्रमुख छावनी थी नसीराबाद की। अन्य छावनियाँ थी- नीमच, ब्यावर, देवली (टोंक), एरिनपुरा (जोधपुर) तथा खैरवाड़ा (उदयपुर से 100 कि.मी. दूर)। इन्हीं छावनियों की सहायता से ब्रितानियों ने राजपूताना के लगभग सभी राजाओं को अपने वश में कर रखा था। दो-चार राजघरानों के अतिरिक्त सभी राजवंश ब्रितानियों से संधि कर चुके थे और उनकी जी हजूरीमें ही अपनी शान समझते थे। इन छावनियों में भारतीय सैनिक पर्याप्त संख्या में थे तथा रक्त कमल और रोटी का संदेश उनके पास आ चुका था।

राजपूताने (राजस्थान) में क्रांति का विस्फोट 28 मई 1857 को हुआ। राजस्थान के इतिहास में यह तिथि स्वर्णाक्षरों में लिखी जानी चाहिए तथा हर साल इस दिन उत्सव मनाया जाना चाहिए। इसी दिन दोपहर दो बजे नसीराबाद में तोप का एक गोला दाग़ कर क्रांतिकारियों ने युद्ध का डंका बजा दिया। संपूर्ण देश में क्रांति की अग्नि प्रज्जवलित करने के लिए 31 मई, रविवार का दिन तय किया गया था, किंतु मेरठ में 10 मई को ही स्वातंत्र्य समर का शंख बज गया। दिल्ली में क्रांतिकारियों ने ब्रितानियों के ख़िलाफ़ शस्त्र उठा लिए। ये समाचार नसीराबाद की छावनी में भी पहुँचे तो यहाँ के क्रांति वीर भी ग़ुलामी का कलंक धोने के लिए उठ खड़े हुए। नसीराबाद में मौजूद ’15 वीं नेटिव इन्फेन्ट्री’ के जवानों ने अन्य भारतीय सिपाहियों को साथ लेकर तोपख़ाने पर कब्जा कर लिया। इनका नेतृत्व बख्तावर सिंह नाम के जवान कर रहे थे। वहाँ मौजूद अँग्रेज़ सैन्य अधिकारियों ने अश्वारोही सेना तथा लाइट इन्फेन्ट्री को स्वतंत्रता सैनिकों पर हमला करने का आदेश दिया। आदेश माने के स्थान पर दोनों टुकड़ियों के जवानों ने अँग्रेज़ अधिकारियों पर ही बंदूक तान दी। कर्नल न्यूबरी तथा मेजर स्पाटवुड को वहीं ढेर कर दिया गया। लेफ्टिनेण्ट लॉक तथा कप्तान हार्डी बुरी तरह घायल हुए।

छावनी का कमांडर ब्रिगेडियर फेनविक वहाँ से भाग छूटा और उसने ब्यावर में जाकर शरण ली. नसीराबाद छावनी में अब भारतीय सैनिक ही बचे। वे सबके सब स्वातंत्र्य सैनिकों के साथ हो गए। छावनी को तहस-नहस कर स्वातंत्र्य सैनिकों ने दिल्ली की ओर कूच किया।

कमांडर गुरेस राम 
नसीराबाद के स्वतंत्रता संग्राम का समाचार तुरंत-फुरत नीमच पहुँच गया। 3 जून की रात नसीराबाद से तीन सौ कि. मी. की दूरी पर स्थित नीमच सैनिक छावनी में भी भारतीय सैनिको ने शस्त्र उठा लिए। रात 11 बजे 7वीं नेटिव इन्फेण्ट्री के जवानों ने तोप से दो गोले दागे। यह स्वातंत्र्य सैनिकों के लिए संघर्ष शुरू करने का संकेत था। गोलों की आवाज़ आते ही छावनी को घेर लिया गया तथा आग लगा दी गई। नीमच क़िले की रक्षा के लिए तैनात सैनिक टुकड़ी भी स्वातंत्र्य-सैनिकों के साथ हो गई। अँग्रेज़ सैनिक अधिकारियों ने भागने में ही अपनी कुशल समझी। सरकारी ख़ज़ाने पर क्रांतिकारियों का अधिकार हो गया।

आक्रमणकारी फ़िरंगियों के विरुद्ध सामान्य जनता तथा भारतीय सैनिकों में काफ़ी ग़ुस्सा था। इसके बावजूद क्रांतिकारियों ने हिंदू-संस्कृति की परंपरा निभाते हुए न तो व्यर्थ हत्याकांड किए, नहीं अँग्रेज़ महिलाओं व बच्चों को परेशान किया। नसीराबाद से भागे अँग्रेज़ सैनिक अधिकारियों के परिवारों को सुरक्षित रूप से ब्यावर पहुँचाने में भारतीय सैनिकों व जनता ने पूरी सहायता की। इस तरह नीमच से निकले अंग्रेज महिलाओं व बच्चों को डूंगला गाँव के एक किसान रूंगाराम ने शरण प्रदान की और उनके भोजन आदि की व्यवस्था की। ऐसे ही भागे दो अँग्रेज़ डाक्टरों को केसून्दा गाँव के लोगों ने शरण दी। इसके उलट जब स्वातंत्र्य सैनिकों की हार होलने लगी तो ब्रितानियों ने उन पर तथा सामान्य जनता पर भीषण और बर्बर अत्याचार किए।

नीमच के क्रांतिकारियों ने सूबेदार गुरेसराम को अपना कमांडर तय किया। सुदेरी सिंह को ब्रिगेडियर तथा दोस्त मोहम्मद को ब्रिगेड का मेजर तय किया। इनके नेतृत्व में स्वातंत्र्य सैनिकों ने देवली को ओर कूच किया। रास्तें में चित्तौड़, हम्मीरगढ़ तथा बनेड़ा पड़ते थे। स्वातंत्र्य सेना ने तीनों स्थानों पर मौजूद अँग्रेज़ सेना को मार भगाया तथा शाहपुरा पहुँचे। शाहपुरा के महाराज ने क्रांतिकारियों का खुले दिल से स्वागत किया। दो दिन तक उनकी आवभगत करने के बाद अस्त्र-शस्त्र व धन देकर शाहपुरा नरेश ने क्रांतिकारियों को विदा किया। इसके बाद सैनिक निम्बाहेडा पहुँचे, जहाँ की जनता तथा जागीरदारों ने भी उनकी दिल खोलकर आवभगत की।

देवली की सेना जंग में शामिल 
देवली ब्रितानियों की तीसरी महत्वपूर्ण छावनी थी। नसीराबाद तथा नीमच में भारतीय सैनिकों द्वारा शस्त्र उठा लेने के समाचार देवली पहुँच गए थे, अतः अँग्रेज़ पहले ही वहाँ से भाग छूटे। वहाँ मौजूद महीदपूर ब्रिगेड आज़ादी के सेनानियों की प्रतीक्षा कर रही थी। निम्बाहेड़ा से जैसे ही भारतीय सेना देवली पहुँची, यह ब्रिगेड भी उनके साथ हो गई। उनका लक्ष्य अब टोंक था, जहाँ का नवाब ब्रितानियों का पिट्ठु बने हुए थे। मुक्तिवाहिनी टोंक पहुँची तो वहाँ की जनता उसके स्वागत के लिए उमड़ पडी। टोंक नवाब की सेना भी क्रांतिकारियों के साथ हो गई। जनता ने नवाब को उसके महल में बंद कर वहाँ पहरा लगा दिया। भारतयीय सैनिकों की शक्ति अब काफ़ी बढ़ गई थी। उत्साहित होकर वह विशाल सेना आगरा की ओर बढ़ गई। रास्त में पड़ने वाली अँग्रेज़ फ़ौजों को शिकस्त देते हुए सेना दिल्ली पहुँच गई और फ़िरंगियों पर हमला कर दिया।

कोटा के दो सपूत 
1857 के स्वतंत्रता संग्राम का एक दुःखद पक्ष यह था कि जहाँ राजस्थान की जनता और अपेक्षाकृत छोटे ठिकानेदारों ने इस संघर्ष में खुलकर फ़िरंगियों का विरोध किया, वहीं अधिकांश राजघरानों ने ब्रितानियों का साथ देकर इस वीर भूमि की परंपरा को ठेस पहुँचाई।

कोटा के उस समय के महाराव की भी ब्रितानियों से संधि थी पर राज्य की जनता फ़िरंगियों को उखाड़ फैंकने पर उतारू थी। कोटा की सेना भी महाराव की संधि के कारण मन ही मन ब्रितानियों के ख़िलाफ़ हो गई थी। भारतीय सैनिकों में आज़ादी की भावना इतनी प्रबल थी कि घ् कोटा कण्टीजेंट ‘ नाम की वह टुकड़ी भी गोरों के ख़िलाफ़ हो गई, जिसे ब्रितानियों ने ख़ास तौर पर अपनी सुरक्षा के लिए तैयार किया था। कोटा में मौजूद भारतीय सैनिकों तथा जनता में आज़ादी की प्रबल अग्नि प्रज्जवलित करने वाले देश भक्तों के मुख्य थे लाला जयदलाय तथा मेहराब खान। भारत माता के इन दोनों सपूतों के पास क्रांति का प्रतीक घ् रक्त-कमल ‘ काफ़ी पहले ही पहुँच चुका था तथा छावनियों में घ् रोटी ‘ के जरिये फ़िरंगियों के ख़िलाफ़ उठ खड़े होने का संदेश भी भेजा जा चुका था।

गोकुल (मथुरा) के रहने वाले लाला जयदयाल को महाराव ने हाड़ौती एजेंसी के लिए अपना वकील नियुक्त कर रखा था। ब्रितानियों को 35 वर्षीय लाला जी की गतिविधियों पर कुछ संदेह हो गया, अतः उन्होंने उनको पद से हटवा दिया। जयदयाल अब सावधानी से जन-जागरण का काम करने लगे। इस बीच नीमच, नसीराबाद और देवली के संघर्ष की सूचना कोटा पहुँच चुकी थी। मेहराब खान राज्य की सेना की एक टुकड़ी घ् पायगा पलटन ‘ में रिसालदार थे। सेना को क्रांति के लिए तैयार करने में मुख्य भूमिका मेहराब खान की ही थी।

कोटा में स्वराज्य स्थापित हुआ 
15 अक्टूबर 1857 को कोटा राज्य की घ् नारायण पलटन ‘ तथा घ् भवानी पलटन ‘ के सभी सैनिकों ने तोपें व अन्य हथियार लेकर कोटा में मौजूद अँग्रेज़ सैनिक अधिकारी मेजर बर्टन को घेर लिया। संख्या में लगभग तीन हज़ार स्वराज्य सैनिकों का नेतृत्व लाला जयदयाल और मेहराब खान कर रहे थे। स्वातंत्र्य सेना ने रेजीडेंसी (मेजर बर्टन का निवास) पर गोलाबारी शुरू कर दी। संघर्ष में मेजर बर्टन व उसके दोनों पुत्रों सहित कई अँग्रेज़ मारे गए। रेजीडेन्सी पर अधिकार कर क्रांतिकारियो ने राज्य के भंडार, शस्त्रागारों तथा कोषागारों पर कब्जा करते हुए पूरे राज्य को ब्रितानियों से मुक्त करा लिया। पूरे राज्य की सेना, अधिकारी तथा अन्य प्रमुख व्यक्ति भी घ्स्वराज्य व स्वधर्म ‘ के सेनानियों के साथ हो गए।

राज्य के ही एक अन्य नगर पाटन के कुछ प्रमुख लोग ब्रितानियों से सहानुभूति रखते थे। स्वातंत्र्य सैनिकों ने पाटन पर तोपों के गोले बरसाकर वहाँ मौजूद ब्रितानियों को हथियार डालने को बाध्य कर दिया। अब पूरे राजतंत्र पर लाला जयदयाल और मेहराब खान का नियंत्रण था। छह महीनों तक कोटा राज्य में स्वतंत्रता सैनानियों का ही अधिकार रहा।

इस बीच कोटा के महाराव ने करौली के शासन मदन सिंह से सहायता माँगी तथा स्वराज्य सैनिकों का दमन करने को कहा। हमारे देश का दुर्भाग्य रहा कि स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं को अपने ही देशवासियों से युद्ध करना पड़ा। करौली से पन्द्रह सौ सैनिकों ने कोटा पर आक्रमण कर दिया। उधर मेजर जनरल राबर्ट्स भी पाँच हज़ार से अधिक सेना के साथ कोटा पर चढ़ आया। राजस्थान और पंजाब के कुछ राज घरानों की सहायता से अँग्रेज़ अब भारतीय योद्धाओं पर हावी होने लगे थे।

विकट परिस्थिति देख कर मेहराब खान तथा उनके सहयोगी दीनदयाल सिंह ने ग्वालियर राज के एक ठिकाने सबलगढ के राजा गोविन्दराव विट्ठल से सहायता माँगी। पर लाला जयदयाल को कोई सहायता मिलने से पहले ही मेजर जनरल राबर्ट्स तथा करौली और गोटेपुर की फ़ौजों ने 25 मार्च 1858 को कोटा को घेर लिया। पाँच दिनों तक भारतीय सैनिकों तथा फ़िरंगियों में घमासान युद्ध हुआ। 30 मार्च को ब्रितानियों को कोटा में घुसने में सफलता मिल गई। लाला जयदयाल के भाई हरदयाल युद्ध में मारे गए तथा मेहराब खान के भाई करीम खाँ को पकड़कर ब्रितानियों ने सरे आम फाँसी पर लटका दिया।

लाला जयदयाल और मेहराब खान अपने साथियों के साथ कोटा से निकलकर गागरोन पहुँचे। अँग्रेज़ भी पीछा करते हुए वहाँ पहुँच गए तथा गागरोन के मेवातियों का बर्बरता से कल्ते आम किया। ब्रितानियों की बर्बरता यहीं नहीं रुकी, भँवर गढ़, बड़ी कचेड़ी, ददवाडा आदि स्थानों पर भी नरसंहार तथा महिलाओं पर अत्याचार किए गए। उक्त सभी स्थानों के लोगों ने पीछे हटते स्वातंत्र्य-सैनिकों की सहायता की थी। ब्रितानियों ने इन ठिकानों के हर घर को लूटा और फ़सलों में आग लगा दी।

देशभक्तों का बलिदान 
अब सभी स्थानों पर स्वतंत्रता सेनानियों की हार हो रही थी। लाला जयदयाल तथा मेहराब खान भी अपने साथियों के साथ अलग-अलग दिशाओं में निकल गए। अँग्रेज़ लगातार उनका पीछा कर रहे थे। डेढ़ साल तक अंग्रजों को चकमा देने के बाद दिसंबर, 56 में गुड़ गाँव में मेहराब खान ब्रितानियों की पकड़ में आ गए। उन पर देवली में मुकदमा चलाया गया तथा मृत्युदंड सुनाया गया।

इस बीच लाला जयदयाल की गिरफ़्तारी के लिए ब्रितानियों ने 12 हज़ार रू. के इनाम की घोषणा कर दी थी। जयदयाल उस समय फ़क़ीर के वेश में अलवर राज्य में छिपे हुए थे। रुपयों के लालच में एक देशद्रोही ने लाला जी को धोखा देकर गिरफ़्तार करवा दिया। उन पर भी देवली में ही मुकदमा चलाया गया। 17 सितम्बर 1860 को लाला जयदयाल और मेहराब खान को कोटा एजेंसी के बग़लें के पास उसी स्थान पर फाँसी दी गई जहाँ उन्होंने मेजर बर्टन का वध किया था। इस तरह दो उत्कट देशभक्त स्वतंत्रता के युद्ध में अपनी आहुति दे अमर हो गए। उनका यह बलिदान स्थान आज भी कोटा में मौजूद है पर अभी तक उपेक्षित पड़ा हुआ है।

सन 1857 के अमर सेनानी ठाकुर कुशाल सिंह 
रचनाकार : पूना राम जी चौधरी

जिस तरह से वीर कुँवर सिंह ने भारत की आज़ादी के लिए अपना रण-रंग दिखाया उसी तरह राजस्थान में आउवा ठाकुर कुशाल सिंह ने भी अपनी अनुपम वीरता से ब्रितानियों का मान मर्दन करते हुए क्रांति के इस महायज्ञ में अपनी आहुति दी। पाली ज़िले का एक छोटा सा ठिाकाना था आउवा , लेकिन ठाकुर कुशाल सिंह की प्रमुख राष्ट्रभक्ति ने सन् सत्तावन में आउवा को स्वातंत्र्य-संघर्ष का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना दिया। ठाकुर कुशाल सिंह तथा मारवाड़ का संघर्ष प्रथम स्वतंत्रता का एक स्वर्णिम पृष्ठ है।

जोधपुर के देशभक्त महाराजा मान सिंह के संन्यासी हो जाने के बाद ब्रितानियों ने अपने पिट्ठु तख़्त सिंह को जोधपुर का राजा बना दिया। तख़्त सिंह ने ब्रितानियों की हर तरह से सहायता की। जोधपुर राज्य उस समय ब्रितानियों को हर साल सवा लाख रुपया देता था। इस धन से ब्रितानियों ने अपनी सुरक्षा के लिए एक सेना बनाई, जिसका नाम जोधपुर लीजन ‘ रखा गया। इस सेना की छावनी जोधपुर से कुछ दूर एरिनपुरा में थी। अँग्रेज़ सेना की राजस्थान की छह प्रमुख छावनियों में यह भी एक थी। राजस्थान में स्वाधीनता संग्राम की शुरुआत 28 मई, 1857 को नसीराबाद से हुई थी। इसके बाद नीमच और देवली के भारतीय सैनिक भी संघर्ष में कूद चूके थे। अब बारी थी एरिनपुरा के जोधपुर लीजन ‘ की, जिसे फ़िरंगियों ने ख़ासकर अपनी सुरक्षा के लिए बनाया था।

सूबेदार गोजन सिंह का आबू पर हमला 
जोधपुर के महाराज तख़्त सिंह ब्रितानियों की कृपा से ही सुख भोग रहे थे, अतः स्वतंत्रता यज्ञ की जवाला भड़कते ही उन्होंने तुरंत ब्रितानियों की सहायता करने की तैयार कर ली। जोधपुर की जनता अपने राजा के इस आचरण से काफ़ी ग़ुस्से में थी। राज्य की सेना भी मन से स्वाधीनता सैनानियों के साथ थी तथा जोधपुर लीजन ‘ भी सशस्त्र क्रांति के महायज्ञ में कूद पड़ना चाहती थी। नसीराबाद छावनी में क्रांति की शुरुआत होते ही जोधपुर-नरेश ने राजकीय सेना की एक टुकड़ी गोरों की मदद के लिए अजमेर भेद दी। इस सेना ने ब्रितानियों का साथ देने से इंकार कर दिया। कुशलराज सिंघवी ने सेनापतित्व में जोधपुर की एक और सेना नसीराबाद के भारतीय सैनिकों को दबाने के लिए भेजी गई। इस सेना ने भी ब्रितानियों का साथ नहीं दिया। हिण्डौन में जयपुर राज्य की सेना भी जयपुर नरेश की अवज्ञा करते हुए क्रांतिकारी भारतीय सेना से मिल गई। इस सब घटनाओं का अंग्रेजों की विशेष सेना जोधपुर लीजन ‘ पर भी असर पड़ा। इसके सैनिकों ने स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ने का निश्चय कर लिया।

अगस्त 1857 में इस लीजन ‘ की एक टुकड़ी को रोवा ठाकुर के ख़िलाफ़ अनादरा भेजा गया। इस टुकड़ी के नायक हवलदार गोजन सिंह थे, रोवा ठाकुर पर आक्रमण के स्थान पर 21 अगस्त की सुबह तीन बजे यह टुकड़ी आबू पहाड़ पर चढ़ गई। उस समय आबू पर्वत पर काफी संख्या में गोरे सैनिक मौजूद थे। गोजन सिंह के नेतृत्व में जोधपुर लीजन के स्वतंत्रता सैनिकों ने दो तरफ़ से फ़िरंगियों पर हमला कर दिया। सुबह के धुंधलके में हुए इस हमले से अँग्रेज़ सैनिकों में भगदड़ मच गई। आबू से ब्रितानियों को भगा कर गोजन सिंह एरिनपुरा की और चल पड़े। गोजन सिंह के पहुँचते ही लीजन की घुड़सवार टुकड़ी तथा पैदल सेना भी स्वराज्य-सैनिकों के साथ हो गई। तोपखाने पर भी मुक्ति-वाहिनी का अधिकार हो गया। एरिनपुरा छावनी के सैनिकों ने मेहराब सिंह को अपना मुखिया चुना। मेहराब सिंह को लीजन ‘ का जनरल मान कर यह सेना पाली की ओर चल पड़ी।

आउवा में स्वागत 
आउवा में चम्पावत ठाकुर कुशाल सिंह काफ़ी पहले से ही विदेशी (अँग्रेज़ी) शासकों के ख़िलाफ़ संघर्ष करने का निश्चय कर चुके थें। अँग्रेज़ उन्हें फूटी आँखों भी नहीं सुहाते थे। नाना साहब पेशवा तथा तात्या टोपे से उनका संपर्क हो चूका था। पूरे राजस्थान में ब्रितानियों को धूल चटाने की एक व्यापक रणनीति ठाकुर कुशाल सिंह ने बनाई थी।

सलूम्बर के रावत केसरी सिंह के साथ मिलकर जो व्यूह-रचना उन्होंने की उसमें यदि अँग्रेज़ फँस जाते तो राजस्थान से उनका सफाया होना निश्चित था। बड़े राजघरानों को छोड़कर सभी छोटे ठिकानों के सरदारों से क्रांति के दोनों धुरधरों की गुप्त मंत्रणा हुई इन सभी ठिकानों के साथ जोधपुर लीजन ‘ को जोड़कर कुशाल सिंह और केसरी सिंह ब्रितानियों के ख़िलाफ़ एक अजेय मोर्चेबन्दी करना चाहते थे।

इसीलिए जब जनरल मेहरबान सिंह की कमान में जोधपुर लीजन के जवान पाली के पास आउवा पहुँचे तो ठाकुर कुशाल सिंह ने स्वातंत्र्य-सैनिकों का क़िले में भव्य स्वागत किया। इसी के साथ आसोप के ठाकुर शिवनाथ सिंह, गूलर के ठाकुर बिशन सिंह तथा आलयनियावास के ठाकुर अजीत सिंह भी अपनी सेना सहित आउवा आ गए। लाम्बिया, बन्तावास तथा रूदावास के जागीरदार भी अपने सैनिकों के साथ आउवा आ पहुँचे। सलूम्बर, रूपनगर, लासाणी तथा आसीन्द के स्वातंत्र्य-सैनिक भी वहाँ आकर ब्रितानियों से दो-दो हाथ करने की तैयारी करने लगे। स्वाधीनता सैनिकों की विशाल छावनी ही बन गया आउवा। दिल्ली गए सैनिकों के अतिरिक्त हर स्वातंत्रता-प्रेमी योद्धा के पैर इस शक्ति केंद्र की ओर बढ़ने लगे। अब सभी सैनिकों ने मिलकर ठाकुर कुशाल सिंह को अपना प्रमुख चुन लिया।

मॉक मेसन का सर काटा 
आउवा में स्वाधीनता- सैनिकों के जमाव से फ़िरंगी चिंतित हो रहे थे अतः लोहे से लोहा काटने की कूटनीति पर अमल करते हुए उन्होंने जोधपुर नरेश को आउवा पर हमला करने का हुक्म दिया। अनाड़सिंह की अगुवाई में जोधपुर की एक विशाल सेना ने पाली से आउवा की ओर कूच किया। आउवा से पहले अँग्रेज़ सेनानायक हीथकोटा भी उससे मिला। 8 सितम्बर को स्वराज्य के सैनिकों ने मारो फ़िरंगी को ‘ तथा हर-हर महादेव ‘ के घोषों के साथ इस सेना पर हमला कर दिया। अनाड़सिंह तथा हीथकोट बुरी तरह हारे। बिथौड़ा के पास हुए इस युद्ध में अनाड़ सिंह मारा गया और हीथकोट भाग खड़ा हुआ। जोधुपर सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इस सेना की दुर्गति का समाचार मिलते ही जार्ज लारेंस ने ब्यावर में एक सेना खड़ी की तथा आउवा की ओर चल पड़ा। 18 सितम्बर को फ़िरंगियों की इस विशाल सेना ने आउवा पर हमला कर दिया। ब्रितानियों के आने की ख़बर लगते ही कुशाल सिंह क़िले से निकले और ब्रितानियों पर टूट पड़े। चेलावास के पास घमासान युद्ध हुआ तथा लारेन्स की करारी हार हुई। मॉक मेसन युद्ध में मारा गया। क्रांतिकारियों ने उसका सिर काट कर उसका शव क़िले के दरवाज़े पर उलटा लटका दिया। इस युद्ध में ठाकुर कुशाल सिंह तथा स्वातंत्र्य-वाहिनी के वीरों ने अद्भूत वीरता दिखाई। आस-पास से क्षेत्रों में आज तक लोकगीतों में इस युद्ध को याद किया जाता है। एक लोकगीत इस प्रकार है 

ढोल बाजे चंग बाजै, भलो बाजे बाँकियो। 
एजेंट को मार कर, दरवाज़ा पर टाँकियो। 
झूझे आहूवो ये झूझो आहूवो, मुल्कां में ठाँवों दिया आहूवो।

इस बीच डीसा की भारतीय सेनाएँ भी क्रांतिकारियों से मिल गई। ठाकुर कुशाल सिंह की व्यूह-रचना सफ़ल होने लगी और ब्रितानियों के ख़िलाफ़ एक मजूबत मोर्चा आउवा में बन गया। अब मुक्ति-वाहिनी ने जोधपुर को ब्रितानियों के चंगुल से छुड़ाने की योजना बनाई। उसी समय दिल्ली में क्रांतिकारियों की स्थिति कमज़ोर होने के समाचार आउवा ठाकुर को मिले कुशल सिंह ने सभी प्रमुख लोगों के साथ फिर से अपनी युद्ध-नीति पर विचार किया। सबकी सहमति से तय हुआ कि सेना का एक बड़ा भाग दिल्ली के स्वाधीनता सैनिकों की सहायता के लिऐ भेजा जाए तथा शेष सेना आउवा में अपनी मोर्चेबन्दी मज़बूत कर ले। दिल्ली जाने वाली फ़ौज की समान आसोप ठाकुर शिवनाथ सिंह को सौंपी गई।

शिवनाथ सिंह आउवा से त्वरित गति से निकले तथा रेवाड़ी पर कब्जा कर लिया। उधर ब्रितानियों ने भी मुक्ति वाहिनी पर नज़र रखी हुई थी। नारनौल के पास ब्रिगेडियर गेरार्ड ने क्रांतिकारियों पर हमला कर दिया। अचानक हुए इस हमले से भारतीय सेना की मोर्चाबन्दी टूट गई। फिर भी घमासान युद्ध हुआ तथा फ़िरंगियों के कई प्रमुख सेनानायक युद्ध में मारे गए।

बड़सू का भीषण संग्राम 
जनवरी में मुम्बई से एक अंग्रेज फौज सहायता के लिए अजमेर भेजी गई। अब कर्नल होम्स ने आउवा पर हमला करने की हिम्मत जुटाई। आस-पास के और सेना इकट्ठी कर कर्नल होम्स अजमेर से रवाना हुआ। 20 जनवरी, 1858 को होम्स ने ठाकुर कुशाल सिंह पर धावा बोला दिया। दोनों ओर से भीषण गोला-बारी शुरू हो गई। आउवा का किला स्वतंत्रता संग्राम के एक मजबूत स्तंभ के रूप में शान से खड़ा हुआ था। चार दिनों तक ब्रितानियों और मुक्ति वाहिनी में मुठभेड़ें चलती रहीं। ब्रितानियों के सैनिक बड़ी संख्या में हताहत हो रहे थे। युद्ध की स्थिति से चिंतित होम्स ने अब कपट का सहारा लिया। आउवा के कामदार और क़िलेदार को भारी धन देकर कर्नल होम्स ने उन्हें अपनी ही साथियों की पीठ में छुरा घौंपने के लिए राज़ी कर लिया। एक रात क़िलेदार ने कीलें का दरवाजा खोल दिया। दरवाज़ा खुलते ही अँग्रेज़ क़िले में घुस गए तथा सोते हुए क्रांतिकारियों को घेर लिया। फिर भी स्वातंत्र्य योद्धाओं ने बहादुरी से युद्ध किया, पर अँग्रेज़ क़िले पर अधिकार करने में सफल हो गए। पासा पटलते देख ठाकुर कुशाल सिंह युद्ध जारी रखने के लिए दूसरा दरवाज़े से निकल गए। उधर ब्रितानियों ने जीत के बाद बर्बरता की सारी हदें पार कर दी। उन्होंने आउवा को पुरी तरह लूटा, नागरिकों की हत्याएँ की तथा मंदिरों को ध्वस्त कर दिया। क़िले कि प्रसिद्ध महाकाली की मूर्ति को अजमेर ले ज़ाया गया। यह मूर्ति आज भी अजमेर के पुरानी मंडी स्थित संग्रहालय में मौजूद है।

इसी के साथ कर्नल होम्स ने सेना के एक हिस्से को ठाकुर कुशाल सिंह का पीछा करने को भेजा। रास्ते में सिरियाली ठाकुर ने अंग्रेजों को रोका। दो दिन के संघर्ष के बाद अंग्रेज सेना आगे बढ़ी तो बडसू के पास कुशाल सिंह और ठाकुर शिवनाथ सिंह ने अंग्रेजों को चुनौती दी। उनके साथ ठाकुर बिशन सिंह तथा ठाकुर अजीत सिंह भी हो गए। बगड़ी ठाकुर ने भी उसी समय अंग्रेजों पर हमला बोल दिया। चालीस दिनों तक चले इस युद्ध में कभी मुक्ति वाहीनी तो कभी अंग्रेजों का पलड़ा भारी होता रहा। तभी और सेना आ जाने से अंग्रेजों की स्थिति सुधर गई तथा स्वातंत्र्य-सैनिकों की पराजय हुई। कोटा तथा आउवा में हुई हार से राजस्थान में स्वातंत्र्य-सैनिकों का अभियान लगभग समाप्त हो गया। आउवा ठाकुर कुशाल सिंह ने अभी भी हार नहीं मानी थी। अब उन्होंने तात्या टोपे से सम्पर्क करने का प्रयास किया। तात्या से उनका सम्पर्क नहीं हो पाया तो वे मेवाड़ में कोठारिया के राव जोधसिंह के पास चले गए। कोठारिया से ही वे अंग्रेजों से छुट-पुट लड़ाईयाँ करते रहे।

जन-नायक कुशाल सिंह –

ठाकुर कुशालसिंह के संघर्ष ने मारवाड़ का नाम भारतीय इतिहास में पुनः उज्ज्वल कर दिया। कुशाल सिंह पूरे मारवाड़ में लोकप्रिय हो गए तथा पूरे क्षेत्र के लोग उन्हें स्वतंत्रता संग्राम का नायक मानने लगे। जनता का उन्हें इतना सहयोग मिला था कि लारेंस तथा होम्स की सेनाओं पर रास्ते में पड़ने वाले गाँवों के ग्रामीणों ने भी जहाँ मौक़ा मिला हमला किया। इस पूरे अभियान में मुक्ति-वाहिनी का नाना साहब पेशवा और तात्या टोपे से भी संपर्क बना हुआ था। इसीलिए दिल्ली में स्वातंत्र्य-सेना की स्थिति कमज़ोर होने पर ठाकुर कुशाल सिंह ने सेना के बड़े भाग को दिल्ली भेजा था। जनता ने इस संघर्ष को विदेशी आक्रान्ताओं के विरुद्ध किया जाने वाला स्वाधीनता संघर्ष माना तथा इस संघर्ष के नायक रूप में ठाकुर कुशाल सिंह को लोक-गीतों में अमर कर दिया। उस समय के कई लोक-गीत तो आज भी लोकप्रिय हैं। होली के अवसर पर मारवाड़ में आउवा के संग्राम पर जो गीत गाया जाता है, उसकी बानगी देखिये

वणिया वाली गोचर मांय कालौ लोग पड़ियौ ओ 
राजाजी रे भेळो तो फिरंगी लड़ियो ओ 
काली टोपी रो! 
हाँ रे काली टोपी रो। फिरंगी फेलाव कीधौ ओ 
काली टोपी रो! 
बारली तोपां रा गोळा धूडगढ़ में लागे ओ 
मांयली तोपां रा गोळा तम्बू तोड़े ओ 
झल्लै आउवौ! 
मांयली तोपां तो झूटे, आडावली धूजै ओ 
आउवा वालौ नाथ तो सुगाली पूजै ओ 
झगड़ौ आदरियौ! 
हां रे झगड़ौ आदरियो, आउवौ झगड़ा में बांकौ ओ 
झगडौ आदरियौ! 
राजाजी रा घेड़लिया काळां रै लारे दोड़ै ओ 
आउवौ रा घेड़ा तो पछाड़ी तोड़े ओ 
झगड़ौ होवण दो! 
हाँ रे झगड़ौ होवण दो, झगड़ा में थारी जीत व्हैला ओ 
झगड़ौ होवण दो!

1857 राजस्थानी लोकगीतों में –

रचनाकार : राज चतुर्वेदी 
संदर्भ : विचार दृष्टि (हिंदी पत्रिका) 
दिनांक : 9 अक्टूबर-दिसंबर 2007
अंक : 33, पेज न. 36

राजस्थानी धरती पर उत्पन्न 1857 की क्रांति से संबंधित अनेक लोक गीत-गाथाएँ मिलती हैं। 1857 की आजादी की पहली लडाई से पूर्व राजस्थान में जिन लोगों ने ब्रितानियों से टक्कर ली उसमें राजस्थान के भरतपुर रियासत प्रमुख थी। इसके साथ ही जोधपुर के राजा मानसिंह का चरित्र भी राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत था। महाराव डूंगरपुर जसवंत सिंह नरसिंहगढ़, राजकुंवर चैन सिंह, डूंगजी जवारजी और उमरकोट के रतन राणा, राव गोपाल सिंह खरवा के कार्य 1857 की क्रांति की भूमिका बने। भरतपुर के घेरे से संबंधित लोकगीत अभी भी होली के अवसर पर गाए जाते हैं। जिसके बोल में जनता का विरोध झलकता है-

गोरा हट जा! 
राज भरतपुर के रे गोरा हट जा 
भरतपुर गढ़ बंका रे गेरा हट जा। 
यूं मत जाणै गोरा लड़ै बेटौ जाट के 
ओ तो कुंवर लड़ै रे राजा दशरथ को 
गोरा हट जा।

इसके साथ ही डुंगरजी की गाथा बी कवियों ने गाई है,
जिसके पद-पद में ब्रितानियों का विरोध है-

सन् सत्तावन सूं पैलीई, ए जोत जगावण वाण्ठा रहा। 
आजादी बाण्ठै दिवलैरी, वण्ठरी लौ का रखवाला हा।

इस जंगे आजादी की आहट लोक और कवियों ने सुन ली थी इसीलिए महाराज मानसिंह के आश्रितकवि बाँकी दास ने लिखा था-

आयौ इंगरेज मुलक है ऊपर आहंस लीथा खैंचि उरा,
धणियं मरै नदीधी धरती, धणियां ऊभां गई धरा।

इसी तरह मानसिंह से जोधपुर की संधि में सांभरझील ब्रितानियों के हड़प ली थी। उसकी पीड़ा एक लोकगीत में व्यक्त हुई है-

म्हारौ राजा भोण्ठौ, सांभर तौ दे दीनी रे 
अँगरेज नै म्हारौ राजा मोण्ठौ,

बाँकीदास ने तत्कालीन मारवाड़ के चौहटन ठिकाने के ठाकुर की प्रशंसा में गीत लिखा है, जिन्होंने गोरी सत्ता के विस्तार को रोका था तथा वीरतापूर्वक लड़ते हुए ठाकुर श्याम सिंह चौहान शहीद हुए थे-

हट वदी जद नहर हो फरिया, सादी 
जिसड़ा साथ सिपाइ,
मेरी जदीमंड बाहड़ मेरै, गोरां सू रचियौ 
गज गज-गाह।

डिंगल के सुप्रसिद्ध कवि सूर्यमल्ल मिश्रण तो स्पष्ट लिखते हैं-

जिण बन भूल नजावता गैंदगवय गिडराज। 
तिणबन जंबुक तारवड़ा, ऊधम मंडै आज।

अर्थात् राजस्थानी रूपी जिस वन में गेंडे, हाथी और सूकर सिंधों के भय से भूलकर भी नहीं जाते थे आज उस जंगल में अँग्रज रूपी लोमड़ियाँ और सियार उत्पात मचा रहे हैं।

क्रांतिकारी वीरों 1857 के नायक तात्या टोपे के बारे में डिंगल के कवि शंकर दान सामोर का एक गीत देखें-

मचायौ हिंद में आखी तइलकौ तांतिय-मोटो,
घोम जेम घुमायो लंक में हणु घोर। 
रचायौ रूण्ठंती राजपूती रौ आखरी जंग 
जंग में दिखायौ सुवायौ अभाग जोर।

शंकरदान सामोर ने ही 1857 की नायिका रानी लक्ष्मीबाई के लिए इस तरह अपने भाव व्यक्त किए हैं-

हुयौ जाण बेहाल, भाल हिंदरी मोम ठरे। 
झगड़ौ निज भुज झाल, लिछमी झांसी री लड़ी।

जोधपुर मारवाड़ में 1857 की क्रांति के अग्रदूत थे आऊवा के ठाकुर खुशाल सिंह, जिन्होंने ब्रितानियों और रियासत की सेना से जबरदस्त लोहा लिया था। जिसे तत्कालीन कवियों- महाकवि सूर्य मल्ल मिश्रण, गिरवरदान और तिलोकदान व शंकर दाने सामोर जैसे कवियों ने अनेक डिंगल गीतों में बखाना है, परंतु ‘भाऊवा’ और ठाकुर खुशाल सिंह के बलिदान को लोकगीतों में आज तक गाया जा रहा है-

वणिया वाली गोचर मांय, रालौ पड़ियौ ओ 
राजाजी रै मेलौ तो फिरंगी लड़ियौ ओ 
काली टोपी रो। 
हां रै काली टोपी रो। 
फिरंगी फैलाव कीधौ ओ 
काली टोपी रो।

इस संबंध में एक और लोकगीत दृष्टव्य है, जिसमें ब्रितानियों संबंधी उद्गार व लोक धारणाएँ इतनी स्पष्ट है कि लोक की नफरत साफ दिखाई देती है-

देस में अंगरेज आयो, कोई कांई चीजां लायो रे। 
फूट जाली भायां में, बेगार लायो रे 
काली टोपी रौ। 
हां रे काली टोपी रो अंगेरज देस में 
छावनियां नांखै रे 
काली टोपी रौ।

आऊवा के युद्ध में अँग्रेज सेनापति मारा गया जिसे गढ़ के दरवाजे पर टांग दिया गया था, इसे एक लोकगीत में इस तरह गाया गया है-

ढोल बाजै, थाली बाजै, मेलौ बाजै बां कियौ 
अजंट नै भार नै दरवाजै नांखियौ जूंझे आऊवौ। 
हां रे जूंझै आऊवौ, आऊवौ, मुल्का में चावौं ओ। जूंझे आऊवौ।

1857 के संघर्ष की वाणी राजस्थानी-किंगल कविता का अद्भूत अध्याय है, जिस पर राष्ट्र को नाज है। इस लोकगीतों के प्रकरण में एक लोकगीत की यह शब्दावली कितनी व्यंग्यपूर्ण हैं जो ब्रितानियों की प्रवृतियों को समाने लाती हैं-

गिटपिट गिटपिट बोली बोलै बातां मारै घूणा की 
मत मूडै लगाऔ 
ई नै मत बतलाऔ।

1857 के संघर्ष के एक नायक का बखान एक फाग में इस तरह किया गया है-

देखो मेड़तिया और डावै कांन मुस्की रे 
बारै बरस दिखा में रिया आँख फुटकी रे 
लौगो आऊवौ। 
हां रे लेणौ आऊवौ, झगड़ां में थारी 
जीत होती मो लेणौ आऊवौ।

और अंत में ये लोकगीत आज भी 1857 की याद दिलाते हैं-

मुजरौ ले बोनीं बाबलिया होली रंच राची। 
मुजरौ ले लोनीं। 
टोली रे टीकायत माथै थारा हाकम चढ़िया ओ 
गोली रा लोगाड़ा भाई भाखर मिलिया हो झड़ी झंगा में।

राजस्थानी, भोजपुरी, मगही, मैथिली, बघेली, बुंदेली, ब्रजी, मालवी, अवधी की तरह कुछ वाह धारी बोली में कवियों ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम-सेनानियों के बलिदानों को बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ लोकगीतों में उनके शौर्य गान कर स्मरण किया है। कुछवाहधर अर्थात् भिण्ड (म.प्र.) अंचल की बोली में आज तक प्रचलित कतिपय लोकगीत द्रष्टव्य हैं-

राखो पुरखन को सम्मान 
इन भइया बाब को तनिक न जानों,
इन भइया बाबो को तनिक मानों 
गोरा आए इनकी भूमि में तेगन सौं 
काटे थो फरमान। 
राखो पुरखन को सम्मान। 
भुतहाकछार जो बजत है 
बिलाव गाँव से जो लगत हैछ 
मूंडन के खरियान बनाए, गोरा छोड़ गण मैदान। 
वीर भूमि के वीर हैं भइया 
वीर भूमि के सूर हैं भइया 
दिल दहलाए जिन गोरन के, राखो 
आपनों मान। 
राखो पुरखन को सम्मान।

इसी प्रकार होली के अवसर पर शहीदों के स्मारकों पर ग्रामीण जन अबीर लगाकर होली खेलते हैं और साज-बाज के साथ होली आनराय गीत गाते हैं। उन्नीसवीं सदी के इस गीत को आप देखें-

मैने ढूढ़े चारहुँ ओर में, बिछुरे भइया न मिले,
कै भइया बन को गए हाॐऽऽ कै गए ससुराल,
मैंने ढूढ़े चारहुँ ओर में………..। 
ना भइया वन कों गए न गए ससुराल। 
मैंने ढूँढ़े चरहुँ ओर में………….। 
घोड़ा बँधा न घुड़साल में हाऽऽ ना 
खूँटी टंगी तलवार 
मैंने ढूढ़े चारहुँ ओर में………..। 
युद्धन में मइया गए सो भारत, माँ के मये दुलार। 
मैंने ढूढ़े चारहुँ ओर में, बिछुरे भइया ना मिले।

1857 की क्रांति के परिणाम

1857 की क्रांति जल्दी ही समाप्त हो गई। क्रांतिकारियों को अधिक सफ़लता हाथ नहीं लगी, परन्तु क्रांति पूर्णतया विफ़ल भी नहीं रही। इस क्रांति का प्रभाव ब्रितानियों व भारतीयों दोनों पर पड़ा। इस क्रांति के निम्न परिणाम देखने में आते हैं:

ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन व नियमों का अंत

ब्रिटिश सरकार ने 2 अगस्त 1858 को कम्पनी के शासन व नियमों का अंत कर दिया, व भारत का शासन ब्रिटिश सरकार ने अपने हाथ में ले लिया। यहाँ पर भारत सचिव का एक पद बनाया गया व उसके हाथ में भारत का कार्य भार सौंप दिया। उसके अधीन भारत परिषद का ग़ठन किया गया। यहाँ पर दोहरी शासन प्रणाली को समाप्त कर दिया गया।

हिन्दू मुस्लिम विभाजन

इस क्रांति में हिन्दू व मुस्लिम दोनों वर्गों ने भाग लिया था। ब्रितानी समझ चुके थे कि अगर इनमें एकता रही तो ये उनके लिये खतरा बन सकते हैं, इसीलिये ब्रितानियों ने हिन्दू व मुस्लिम दोनों सम्प्रदायों के लोगों को आपस में भड़काना शुरू किया व मुसलमानों को समझाया की अगर आपको अपना लाभ चाहिए तो आपको हमारा साथ देना होगा। ब्रितानी अपनी फ़ूट डालोव राज करों की नीति में सफ़ल हुए और उन्होनें दोनों को अलग कर दिया जिसके फ़लस्वरू प पाकिस्तान की स्थापना हुई।

भारतीय सेना का पुनर्गठन

ब्रितानी यह समझ गये कि भारतीय सेना उनका विरोध कर सकती है। इसके लिये उन्होंने भारतीय सेना का पुनर्गठन किया और भारतीय सैनिकों की संख्या घटा दी तथा जाति व प्रांत के अनुसार सेनाओं का पुनर्गठन किया ताकि कभी भी इनमें एकता ना रहे। हर रेजिमेंट में ब्रितानी सैनिकों की संख्या भारतीय सैनिकों से ज्यादा रखी गई। तोपखानों पर ब्रितानियों का अधिकार रखा गया।

भारतीय सरकार व ब्रितानियों में मतभेद

1857 की क्रांति के बाद ब्रितानियों व भारतीयों में मतभेद की स्थिति पैदा हो गई। ब्रितानियों ने भारतीयों पर विश्‍वास करना उचित नहीं समझा। भारतीय भी उनकी कूटनीति व भेदभावपूर्ण नीति से परेशान थे। ब्रितानियों ने हमारी प्रगति के रास्ते बन्द कर दिये। उन्होंने भारतीय बंदियों को मार डाला। जिससे भारतीय उनसे घृणा करने लगे। फ़लस्वरू प ब्रितानी भी यहां ठहरना नहीं चाहते थे।

रानी विक्टोरिया का घोषणा पत्र

इस क्रांति के बाद रानी विक्टोरिया ने भारतीयों को खुश करने के लिये एक घोषणा पत्र जारी किया जिसका उद्धेश्य भारतीय जनता के घावों पर मरहम लगाना था। इस घोषणा पत्र की बातें निम्न थी :

ब्रिटिश सरकार द्वारा कम्पनी के शासन को समाप्त कर दिया जाएगा।

लोगों के धार्मिक विश्‍वासों में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।

भारतीय राजाओं के साथ जो भी संधिया हुई हैं उनका पालन किया जाएगा और उनकी छीनी हुई चीजें फ़िर से लौटा दी जाएगी।

भारतीयों के प्रति हमारा व्यवहार ब्रिटिश जनता के समान ही किया जाएगा।

सामन्तों व जागीरदारों को उनके अधिकार फ़िर से दिये जाएँगे।

भारत में फ़िर से शांति की स्थापना की जाएगी।

किसी भी देशी राज्य को ब्रितानी राज्य में नहीं मिलाया जाएगा।

भारतीय नरेशों को गोद लेने का अधिकार फ़िर से दिया जाएगा।

भारतीय राजाओं का सम्मान किया जाएगा।

ब्रितानी शिक्षा का प्रसार

ब्रितानियों ने भारत में ब्रितानी शिक्षा का तेजी से प्रसार किया जिससे भारतीय उनकी संस्कृति की ओर झुकें। इसके लिए कई कॉलेज, स्कूल, व विश्‍वविद्यालय खोले गये ताकि भारतीय जनता उनके कानून व न्याय पद्धति को अच्छा समझे। भारत में ब्रितानी शिक्षा के प्रसार से भारतीयों को नयी शिक्षा के अवसर मिले। अब भारतीयों को न्यायाधीश का पद भी दिया गया।

अन्य परिणाम

1857 की क्रांति के कुछ परिणाम भारतीयों के हित में थे तो कुछ से उनका अहित भी हुआ, इनका विवरण निम्नानुसार है:

भारत में राष्ट्रीय जागरण तेजी से होने लगा।

कांग्रेस की स्थापना।

1878 में भारतीय संघ की स्थापना।

1935 में भारत को प्रांतीय स्वायत्तता दी गई। ब्रितानी शिक्षा के प्रसार व नये उद्योगों की स्थापना के कारण भारत का आर्थिक विकास हुआ।

मुगलों के शासन का अंत हुआ।

धीरे-धीरे भारत में स्वतन्त्रता का उदय हुआ।

भारत में संघीय न्यायपालिका की स्थापना की गई।

विदेशी वस्तुओं के प्रचार के कारण भारत में हस्तशिल्प कला का ह्रास हुआ।

नये उद्योगों के विकास के कारण भारत के छोटे-मोटे घरेलू उद्योग धंधों वाले लोग बेरोजगार हो गये।

4 जुलाई 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पारित किया गया।

15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ।

क्रांतिकारियों का आजादी का सपना साकार हुआ।

वन्दे मातरम्

Dr. Sudhir  Vyas द्वारा इस लेख पर वैचारिक सारांश – इधर उधर से और इंटरनेट से तथ्य और कथ्य संकलित करने के पश्चात संपादित करके मैंने उनको एक संपादित विस्तृत लेख का रूप देने का प्रयत्न मात्र ही किया है और मेरा बहुत कठोरता तथा स्पष्टता से मानना है कि 1857 की क्रांति हम भारतीयों लिये कोई सैनिक विद्रोह नहीं था अपितु वह भारत की आजादी का पहला जन आँदोलन ही था! 

 

Posted By Dr. Sudhir Vyas at sudhirvyas’s blog in WordPress

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8 Comments Add yours

  1. Dr. Sudhir Vyas. Thanks for such valuable post. Once my bhanja who is neurosurgeon at Chandigarh expressed, “I would like to throw bomb on parliament.” I said, Oh! you’re n euro surgeon and have such revolutionary view.” By reading your view I find you revolutionary. I congratulate you for such views. Let me know ,how can be helpful to you at the age of 70 yrs. I’m free person not doing any thing for earning bread since my son feed me. I may write and speak.

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    1. sudhirvyas says:

      सुस्वागतम् Dr. Kanhaiyalal sharma जी
      आप लेखों व पोस्टों पर अपनी जानकारियां और दृष्टिकोण हम सब के साथ शेयर कर सकते हैं,मेरा और हम सब मित्रों का सौभाग्य होगा.

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  2. sunil brahmbhatt says:

    अहोभाग्य है मेरा जो इस न्यूज पोस्ट से जुड पाया हू ।
    कुछ कोपी करे तो दिक्कत न होगी न ?

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    1. sudhirvyas says:

      दिक्कत…?? बिलकुल नहीं मित्र…ज्ञान पर मेरा कोई एकाधिकार नहीं है ..सचाई और ज्ञान सूरज की रोशनी की तरह चहुंओर फैलनी ही चाहिए .. माध्यम चाहे जैसा हो.
      मंगलकामनाएँ

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    2. sudhirvyas says:

      बिलकुल नहीं…

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  3. बहुत अच्छा जी, भारतीयता के वास्ते यह बेहद प्रसंशनीय कार्य है, धन्यवाद

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