मानवतावाद और मानवतावादी – मूर्खता और कायरता के राष्ट्रद्रोही पुजारी


image

मानवतावाद मानव मूल्यों और चिंताओं पर ध्यान केंद्रित करने वाला अध्ययन, दर्शन या अभ्यास का एक दृष्टिकोण है !
इस शब्द के कई मायने/अर्थ हो सकते हैं, उदाहरण के लिए :
• एक ऐतिहासिक आंदोलन, विशेष रूप से इतालवी पुनर्जागरण के साथ जुड़ा हुआ !

• शिक्षा के लिए एक ऐसा दृष्टिकोण जिसमें छात्रों को जानकारी देने के लिए साहित्यिक अर्थों का उपयोग होता है या मानव तत्वज्ञान पर ध्यान केंद्रित किया जाता है !

• दर्शन और सामाजिक ज्ञान के क्षेत्र में कई तरह के दृष्टिकोण जो ‘मानव स्वभाव’ के कुछ भावों की पुष्टि करता है !

• एक नाममात्र की ही धर्म निरपेक्ष विचारधारा जो नैतिकता और निर्णय लेने की क्षमता के एक आधार के रूप में विशेष रूप से अलौकिक और धार्मिक हठधर्मिता को अस्वीकार करते हुए हित, नैतिकता और न्याय का धर्म आधारित पक्ष ही लेती है !

और अन्य संक्षिप्त व्याख्या में धर्मनिरपेक्ष मानवतावाद को एक विशिष्ट मानववादी जीवन के उद्देश्य और जीने के रूप में ही जिम्मेदार माना जा सकता है जिसे VVIP Luxurious उपभोग्या जीवनशैली ही कहा जाता है ,, किंतु वास्तविकता में मानवतावाद और मानवतावादी , एक मतिभ्रमित वर्णसंकर प्रजाती और छिछली मौकापरस्त मानसिकताऐं मात्र है मित्रों ..!!
मानवतावाद (ह्यूमनिज्म)” शब्द के अनेक अर्थ हैं,, 1806 के आसपास जर्मन स्कूलों द्वारा पेश किये गए पारंपरिक पाठ्यक्रमों की व्याख्या के लिए ह्युमानिस्मस का इस्तेमाल किया गया था और 1836 में “ह्यूमनिज्म ” को इस अर्थ में अंग्रेजी को प्रदान किया गया था,, 1856 में महान जर्मन इतिहासकार और भाषाविद जॉर्ज वोइट ने ह्यूमनिज्म/मानवतावाद का इस्तेमाल पुनर्जागरण संबंधी मानवतावाद की व्याख्या के लिए किया था, यह आंदोलन पारंपरिक शिक्षा को पुनर्जीवित करने के लिए इतालवी पुनर्जागरण के दौरान खूब फला-फूला था, जिसमें इसके इस्तेमाल को कई देशों, विशेषकर इटली में इतिहासकारों के बीच व्यापक स्वीकृति मिली थी..!
“ह्युमनिस्ट” शब्द का ऐतिहासिक और साहित्यिक प्रयोग 15वीं सदी के इतालवी शब्द “युमनिस्ता” से निकला है जिसका अर्थ पारंपरिक ग्रीक और इतालवी साहित्य का एक शिक्षक या विद्वान और इसके पीछे का नैतिक दर्शन है लेकिन 18वीं सदी के मध्य में इस शब्द का एक अलग तरह का उपयोग होना शुरू हो गया था, 1765 में एक फ्रेंच एनलाइटमेंट पत्रिका में छपे एक गुमनाम आलेख में कहा गया था “मानवतावाद के प्रति एक सामान्य प्रेम… एक सदाचार जो अभी तक हमारे बीच बेनाम है और एक ऐसी सुंदर और आवश्यक चीज के लिए एक शब्द तैयार करने का समय आ गया है, जिसे हम “ह्यूमनिज्म” कहना पसंद करेंगे.”
18वीं सदी के उत्तरार्द्ध और 19वीं सदी की शुरुआत में मानव भलाई और ज्ञान के प्रसार के लिए समर्पित (कुछ ईसाई, कुछ नहीं) अनेकों जमीनी “परोपकारी” और उदार समाजों का निर्माण होता देखा गया, फ्रांस की क्रांति के बाद यह विचार कि मानव सदाचार का निर्माण परंपरागत धार्मिक संस्थानों से अलग स्वतंत्र रूप से केवल मानवीय हितों के जरिये किया जा सकता है, ज्ञानोदय के सिद्धांत की क्रांति के विरोध के लिए जिम्मेदार रूसो जैसे इंसान को देवता के सामान या मूर्ति के रूप में माने जाने पर एडमंड बर्क और जोसेफ डी मैस्ट्रे जैसे प्रभावशाली धार्मिक और राजनीतिक परंपरावादियों द्वारा हिंसक हमले किये गए , मानवतावाद के लिए एक नकारात्मक अर्थ के अधिग्रहण शुरू किया,, ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी में “ह्यूमनिज्म” शब्द का इस्तेमाल 1812 में एक अंग्रेज पादरी द्वारा उन लोगों के बारे में बताने के लिए दर्ज है जो ईसा मसीह (क्राइस्ट) “सिर्फ मानवता” (ईश्वरीय प्रकृति के विपरीत) में विश्वास करते हैं यानी एकेश्वरवादी और प्रकृतिवादी…यानि Sovereignty ; Sovereigns.
इस ध्रुवीकृत माहौल में जहाँ सुव्यवस्थित चर्च संबंधी निकायों ने वैगनों को घेरने की कोशिश की और राजनीतिक एवं सामाजिक सुधारों का विरोध करने के लिए बाध्य किया जैसे कि फ्रैंचाइजी, सार्वभौमिक शिक्षा और इसी तरह की चीजों का विस्तार करना, इस तरह उदार सुधारकों और प्रजातंत्रवादियों ने मानवतावाद के विचार को मानवता के एक वैकल्पिक धर्म के रूप में अपना लिया,, अराजकतावादी प्रौढ़ों (जिन्हें इस घोषणा के लिए जाना जाता है कि “संपत्ति का मतलब है चोरी”) ने “ह्युमानिस्म” शब्द का इस्तेमाल एक “कल्ट, डाइफिकेशन डी ला’ह्युमेनाइट ” (“सम्प्रदाय, मानवता का ईश्वरवाद”) की व्याख्या के लिए किया (बिलकुल आज की AAP पार्टी के नेताओं और केजरीवाल की ही तरह); और ला’अवेनिर डी ला साइंस: पेन्सीज डी 1848 (“द फ्यूचर ऑफ नॉलेज: थॉट्स ऑन 1848”) ,(1848-49) में अर्नेस्ट रेनान कहते हैं: “इसमें मेरी गहरी आस्था है कि विशुद्ध मानवतावाद भविष्य का धर्म होगा जो मनुष्य के जीवन भर में, पवित्रिकृत और नैतिक मूल्य के स्तर तक उन्नत की गयी हर चीज का एक संप्रदाय है.”

तकरीबन उसी दौरान “मानवतावाद (ह्यूमनिज्म) ” शब्द मानव मात्र के आसपास (संस्थागत धर्म के खिलाफ) एक दर्शन के रूप में केंद्रित हुआ जिसका इस्तेमाल जर्मनी में तथाकथित लेफ्ट हेजेलियंस, अर्नोल्ड रयूज और कार्ल मार्क्स द्वारा भी किया जा रहा था जो दमनकारी जर्मन सरकार में चर्च की नजदीकी भागीदारी के आलोचक थे,, इन शब्दों के कई उपयोगों के बीच लगातार एक भ्रम की स्थिति आजतक भी बनी हुई है..जो कि एक अकाट्य एवं कटु सत्य है !

image

ब्रिटिश मानवतावादी धार्मिक संगठन का गठन समकालीन चार्टर्ड मानवतावादी संगठनों के सबसे पहले अग्रणी के रूप में 1853 में लन्दन में हुआ था. यह शुरूआती समूह लोकतांत्रिक रूप से संगठित था जिसमें पुरुष और महिला सदस्य नेतृत्त्व के चुनाव में भाग लेते थे और इसने ज्ञान, दर्शन और कलाओं को बढ़ावा दिया,, फ़रवरी 1877 में इस शब्द को जाहिर तौर पर पहली बार अमेरिका में फेलिक्स एडलर का विवरण देने के लिए निंदनीय रूप से प्रयोग किया गया था. हालांकि एडलर ने इस शब्द को नहीं अपनाया और इसके बजाए अपने नए आन्दोलन  – के लिए “नैतिक संस्कृति” नाम को प्रचलित किया, एक ऐसा आन्दोलन जिसका अस्तित्व आज भी अब मानवतावाद से सम्बद्ध न्यूयॉर्क सोसाइटी फॉर एथिकल कल्चर में मौजूद है,,, 2008 में एथिकल कल्चर लीडर्स ने लिखा: “आज ऐतिहासिक पहचान, नैतिक संस्कृति और आधुनिक विवरण, नैतिक मानवतावाद को एक दूसरे के लिए प्रयोग किया जाता है.”
1920 के आरंभ में सक्रिय, एफ.सी.एस. शिलर ने अपने लेखन को “मानवतावाद” नाम दिया लेकिन शिलर के लिए यह शब्द विलियम जेम्स के साथ साझा किये गए बुद्धिवादी दर्शन के सन्दर्भ में था,,, 1929 में चार्ल्स फ्रांसिस पॉटर ने न्यूयॉर्क की पहली मानवतावादी सोसाइटी की स्थापना की जिसके सलाहकार बोर्ड में जुलियन हक्सले, जॉन ड्युईट, अल्बर्ट आइंस्टीन और थॉमस मैन शामिल थे,,,पॉटर युनिटेरियाई परंपरा से एक मंत्री थे और 1930 में उन्होंने और उनकी पत्नी क्लारा कुक पॉटर ने ह्यूमनिज्म: ए न्यू रिलिजन को प्रकाशित किया.
1930 के पूरे दशक के दौरान पॉटर इस तरह के उदार मुद्दों जैसे कि महिलाओं के अधिकार, जन्म नियंत्रण तक पहुँच, नागरिक तलाक़ कानून और मौत की सजा की समाप्ति के पक्षधर थे !
“द न्यू ह्युमनिस्ट” के सह सम्पादक रेमंड बी. ब्रैग ने वेस्टर्न युनिटेरियन कॉन्फ्रेस के लिओन मिल्टन बर्कहेड, चार्ल्स फ्रांसिस पॉटर और कई अन्य सदस्यों के नज़रिए को मजबूती देने की कोशिश की… ब्रैग ने रॉय वुड सेलर्स से इस सूचना के आधार पर एक दस्तावेज़ का प्रारूप तैयार करने को कहा जिसका नतीजा 1933 में ह्युमनिस्ट मेनिफेस्टो के प्रकाशन के रूप में निकला,, पॉटर की किताब और यह मेनिफेस्टो आधुनिक मानवतावाद की आधारशिला बन गयी, मेनिफेस्टो एक नए धर्म की घोषणा करते हुए कहता है “किसी भी धर्म को जो आज की समन्वय करने वाली और गत्यात्मक शक्ति बनने की उम्मीद करता है, उसे इस युग की ज़रूरतों के अनुरूप ढलना चाहिए, इस तरह के धर्म की स्थापना के लिए वर्तमान की एक प्रमुख आवश्यकता है.” इसके बाद इसने इस नए धर्म के लिए मूलभूत सिद्धांतों के रूप में मानवतावाद की 15 परिकल्पनाओं को प्रस्तुत किया था वैसे आप सब मित्रों की स्पष्ट जानकारी हेतु बता दूँ कि आधिकारिक व घोषित रूप से 1933 में पहले मानवतावादी मेनिफेस्टो के मूल हस्ताक्षरकर्ताओं ने खुद को धार्मिक मानवतावादी घोषित किया था क्योंकि उनके नज़रिए में परंपरागत धर्म उनके समय की ज़रूरतों को पूरा करने में असफल हो रहा था, 1933 के हस्ताक्षरकर्ताओं ने एक ऐसे धर्म की स्थापना को एक बड़ी जरूरत घोषित किया जिसमें वक़्त की ज़रूरतों को पूरा करने की गत्यात्मक शक्ति हो. (हालांकि यहाँ पर यह ध्यान रखना चाहिए कि इस धर्म ने किसी तरह के ईश्वर में विश्वास का दावा नहीं किया.) तब से पहले का स्थान लेने के लिए दो अतिरिक्त मेनिफेस्टो लिखे गए…!!

दूसरे मेनिफेस्टो की भूमिका में लेखक पॉल कुर्त्ज़ और एडविन एच. विल्सन (1973) ने दृढ़तापूर्वक कहा कि भविष्य की आशावादी दृष्टि के लिए विश्वास और ज्ञान की आवश्यकता है..!!

दूसरा मेनिफेस्टो एक खंड में धर्म और राज्यों के परंपरागत धर्म के मानवता के लिए अनुपयोगी हो जाने का सन्दर्भ देता है,,दूसरा मेनिफेस्टो निम्नलिखित समूहों को अपने यथार्थवादी दर्शन के एक हिस्से के रूप में मान्यता देता है: “वैज्ञानिक”, “नैतिक”, “लोकतांत्रिक”, “धार्मिक” और “मार्क्सवादी” मानवतावाद…!!

20वीं और 21वीं सदी में मानवतावादी संगठनों के सदस्यों में इस बात पर मतभेद था कि मानवतावाद धर्म है या नहीं…जो आज तक कायम है ..!!

” चूंकि ना तो आत्मा और ना ही आत्मा से जुड़ी कोई भी चीज वास्तव में और सचमुच अस्तित्व में रह सकती है, यह विचार जिसमें कहा जाता है कि मैं ही “दुनिया” हूँ, मैं ही “आत्मा” हूँ, इसके बाद स्थायी रूप से मौजूद, कायम, अपरिवर्तनीय, अनंत काल तक माना जाता रहेगा: क्या यह एक बिलकुल और पूरी तरह से मूर्खतापूर्ण सिद्धांत नहीं है ..? ”

“मानवता का धर्म” मुहावरे के प्रचलन का श्रेय कभी-कभी अमेरिकी संस्थापक फादर थॉमस पेन को दिया जाता है, हालांकि उनकी उपलब्ध रचनाओं से अभी यह साबित नहीं हुआ है. टोनी डेवीस के अनुसार : पेन स्वयं को धार्मिक मानवतावादी (थियोफिलेंथ्रोपिस्ट) कहते थे, यह एक ऐसा शब्द है जिसमें “ईश्वर”, “प्रेम” और “मनुष्य” के लिए यूनानी शब्द सम्मिलित हैं जो इस बात का संकेत है कि हालांकि वह ब्रह्माण्ड में एक सृजानात्मक ज्ञान के अस्तित्त्व पर विश्वास करते थे लेकिन उन्होंने समस्त अस्तित्ववान धार्मिक सिद्धांतों को विशेषकर उनके चमत्कारी, अलौकिक और मुक्तिदायी पाखंडों को नकार दिया. उनके द्वारा प्रायोजित पेरिस की “सोसाएटी ऑफ थियोफिलेंथ्रोपी” को उनके जीवनी लेखक द्वारा “बाद के समय में प्रचुर मात्रा में बनने वाली नैतिकतावादी और मानवतावादी संस्थाओं के अग्रदूत” के रूप में अंकित किया गया है” … [पेन की पुस्तक] ज़बरदस्त रूप से कटाक्षपूर्ण एज ऑफ रीज़न (1793) …धार्मिक ग्रंथों के परालौकिक पाखंडों पर उपहास की बौछार करती है जिसमें लेवांट की बेमेल लोक कथाओं के संग्रह पर बनाए गए धार्मिक सिद्धांतों के बेतुकेपन का पर्दाफाश करने के लिए पेन की शराबखाने के उपहास वाली अपनी शैली में वोल्टेयेर के व्यंग्य को मिलाया गया है !
मानवतावाद और मानवतावादियों की एक मुख्य धारणा है कि, मानवतावाद सिर्फ इंसान और इंसान के बीच का साहचर्य है जो कि सामाजिक और नैतिक विकास का मूल तत्त्व रहा है, इस अवधारणा पर निर्भर नहीं रहा है कि मनुष्य क्या नहीं है …ईश्वर का विचार जो कि अभी तक एक उच्च आध्यात्मिक प्रभाव रहा है, अच्छाई का आदर्श है जो पूरी तरह से मानवीय है यानि मनुष्य का एक उन्नयन !

image

मानवतावाद उत्तरोत्तर हमारी प्रजातियों, धरती और जीवन की एक समग्र संवेदनशीलता को दर्शाता है, व्यक्ति की जीवन दृष्टि के संबंध में आईएचईयू की परिभाषा को बनाए रखते हुए समग्र मानवतावादमानव की उदारता की शक्तियों और दायित्वों पर विचार करने के लिए मनुष्यों (होमो सेपियेंस) के बीच अपने क्षेत्र को व्यापक बनाता है,,,यह स्वीकार करने योग्य दृष्टिकोण पुनर्जागरण मानवतावाद की ओर वापसी करता है जिसमें यह शासन प्रणाली की ओर मानवतावादियों की पक्षधरता की भूमिका की पूर्व कल्पना करता है और यह अति सक्रिय जीवन दृष्टि की बराबरी के उत्तरदायित्त्व से लबालब है जो व्यक्तिगत मानवतावाद से आगे है, यह ” प्रदूषण, सैन्यवाद, राष्ट्रवाद, सेक्सवाद, निर्धनता और भ्रष्टाचार” को हमारी प्रजातियों के हितों से असंगत, मानवीय चरित्र के स्थाई और ध्यान देने योग्य मुद्दों के रूप में पहचान करता है, यह जोर देकर कहता है कि मानवीय शासन प्रणाली एकीकृत होनी चाहिए और यह समग्र है , जिसमें यह किसी व्यक्ति को महज़ उसके अनुषांगिक विश्वासों के तर्क के आधार पर अलग नहीं करता है, इसे अपने आप में अघोषित मानवतावाद का पात्र कहा जा सकता है जो मनुष्य के व्यक्तिगत सिद्धांतों की पूर्ति करने के लिए प्रजाति के सिद्धांतों और विश्वासों की शिक्षा देता है.
यह अनूठा सा समग्र मानवतावाद समकालीन अमेरिकी और ब्रिटिश मानवतावाद के विपरीत है जिनकी प्रवृत्ति धर्म पर इस सीमा तक केन्द्रित रहने की है कि इन समाजों में अक्सर और विशेषकर नए अनुयाइयों द्वारा “मानवतावाद” को सामान्य नास्तिकता के पक्षधर तथा राष्ट्रवाद के विरोधी के समतुल्य रखा जाता है,, एकल अविश्वास के साथ इस अति अंतिम द्रोही पहचान करने को संभवतः अब मानवतावाद के व्यापक और योग्य अंगीकरण को हटाकर मानवता की सबसे मूल्यवान और संभावनाओं से पूर्ण बौद्धिक परंपराओं में से एक की अनुचित काट-छांट के रूप में देखा जा रहा है…जो बहुत आश्चर्यजनक है जबकि यह सिर्फ निरंकुश उच्छंख्रलता / Sovereignty मात्र है!
ड्वाइट गिल्बर्ट जोन्स लिखते हैं कि मानवतावाद हमारी प्रजातियों द्वारा पूरी तरह से अंगीकार किया जा सकने वाला अकेला दर्शन हो सकता है – इसलिए समग्र मानवतावादियों द्वारा अपने संभावी अनुयायियों पर ना तो बेबुनियाद और स्वार्थी शर्तें लगाना उचित है और ना ही इसको धार्मिक उग्रता से जोड़ना

अब मैं और अधिक गूढ उद्धरणों को ना देते हुऐ और मूढ विवेचनाऐं ना बढ़ाते हुऐ अंत में बस यही कहूँगा कि आज वर्तमान समय और चहुंओर फैली समग्र मानवतावादी और सेक्यूलर विचारधारा ने ही देश सहित “मानव मात्र” को वो नुकसान पहुँचाना शुरू कर दिया है जो कट्टर सांप्रदायिकता अथवा देशद्रोही आतंकवादी भी नहीं पहुंचा सकते,,, मानो या ना मानो पर सच यही है कि आज का नित नई व्याख्याओं वाला निरंकुश व द्रोही समग्र मानवतावाद ही मानव मात्र तथा राष्ट्र तक का प्राथमिक शत्रु है क्योंकि वह निरंकुशता के साथ स्वतंत्र उच्छंख्रलता ( Sovereignty ) का ही पक्षधर है….इसी कारण मेरा आज के समय में हमारे भारतदेश और वैश्विक वातावरण को देखते हुऐ व्यक्तिगत रूप से बहुत ही स्पष्टता से मानना है कि Humanitarianism is the expression of stupidity and cowardice अर्थात्  मानवतावाद मूर्खता और कायरता की अभिव्यक्ति मात्र ही है…!!

वन्दे मातरम्

मानवतावाद और मानवधर्म पर एक और अच्छा लेख आप मित्रों हेतु ढूंढा है जिसका लिंक नीचे दे रहा हूँ, मैं उन सम्मानीय लेखक की तरह विशिष्टता से लिख पाने में नितांत असमर्थ हूँ ….और मात्र कॉपी पेस्ट करने की गवाही मन ने दी नहीं!

http://kg70.jagranjunction.com/2012/08/05/%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%89%E0%A4%A8%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%A7/

Posted By Dr. Sudhir Vyas at sudhirvyas’s blog in WordPress

Advertisements

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s