सेक्यूलरिज्म और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड = सेक्यूलर समान नागरिक संहिता का ‘सेक्यूलर विरोध’ – राज क्या है??


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सेक्यूलरिज्म की जड़ में मार्क्सवाद है … वामपंथ और ‘समाजवाद’ का बुरका ओढा घृणास्पद काला चेहरा ही भारतीय सेक्यूलरिज्म का मूल है पर यहां वोटबैंक हेतु समाजवाद और मार्क्सवाद भी संक्रमित हो जाता है क्योंकि ,असल में नकली के मेल का और हर प्रकार का ‘जुगाड़’ करना भारतीय अतिविशिष्टता है …!!

मित्रों एक नामी भुखमरे और गैरजिम्मेदार भगौडे कार्ल मार्क्स बाबा कह गये थे कि –

1.) Religion is the opium of the masses अर्थात धर्म लोगों का अफीम है !

2.) The first requisite for the happiness of the people is the abolition of religion अर्थात  लोगों की ख़ुशी के लिए पहली आवश्यकता धर्म का अंत है !

तथा

3.) Religion is the impotence of the human mind to deal with occurrences it cannot understand अर्थात धर्म मानव मस्तिष्क जो न समझ सके उससे निपटने की नपुंसकता है !

सो हमारे जुगाडु विधा के पर्याय तथाकथित आजादी के पुरोधे और लोकतांत्रिक समाजवादी चचाजान की मानसिक गंदगी कई पीढियों तक सब लोकतांत्रिक ‘राज’ नेताओं ने अपनाई और उस मानसिक गंदगी को छान छान कर कई शाखाएँ समाजवाद, बहुजन समाजवाद समेत वामपंथवाद सहित कम्युनिज्म के नाम पर बनती गई …!!

किंतु असलियत में भगौडे भुखमरे कार्ल मार्क्स बाबा की वैचारिक उलटियां हमारे जुगाड विधा में अतिदक्ष भारतीय राजनीतिज्ञों ने अपनी तरफ से पंथनिरपेक्षता और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सिर्फ बहुसंख्यक समाज पर लादने का ही काम किया क्योंकि मुस्लिम एकता सहित मुस्लिम धार्मिक आक्रामकता से अच्छे अच्छे सेक्यूलरिस्टों की पेचिश तब भी उतरती थी और आज भी प्रत्यक्ष में उतरती ही रहती है …!!

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सेक्यूलरिज्म का रोना रोते मीम अफजल, शकील अहमद, कपिल सिब्बल,  अरविंद केजरीवाल आजम खां, तारिक रजा, बकरूद्दीन कुत्तैसी, सूअरूद्दीन कुत्तैसी , सोनिया गांधी सपरिवार समेत हर वो कट्टर सेक्यूलर राजनेता जरा यह तो बतायें कि भारत में समान नागरिक संहिता या यूनिवर्सल सिविल कोड़ 1947 के धार्मिक आधार के विभाजन के बावजूद पिछले 66 साल में क्यों नहीं लागू किया जा सका है….??

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नाम के लिये ही भारत धर्मनिरपेक्ष देश है जहां कानून का राज है,, संसद जो कानून बनाती है वे मुसलमानों सहित तमाम समुदायों पर एक तरह से लागू होते हैं,फिर अलग शरिया कानून हो, मुसलमानों को ऐसी मांग करने की कोई जरूरत नहीं है, इबादत से जुड़े मामलों में वे शरिया के हिसाब से चलने के लिए आजाद हैं जो कि बेहद निजी मसला है. लेकिन सामाजिक मसलों में उन्हें उन्हीं कानूनों के हिसाब से चलना होगा जो बाकी सभी समुदायों पर लागू होते हैं…सो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्डों को कायम रखने का औचित्य सिवाय सांप्रदायिक अलगाववादिता के और कुछ दूसरा औचित्य तो बिलकुल समझ नहीं आता है ..!

मुसलमानों के लिए एक अलग कानूनी दर्जे की अवधारणा अंग्रेजों की देन है, ऐसा उन्होंने 1937 में मुस्लिम पर्सनल लॉ बनाकर किया और कांग्रेस नें राजीव गांधी के शासनकाल में इसे अधिक स्वायत्त, निरंकुश और संवैधानिक कट्टर प्रारूप प्रदान करके देश को दो हिस्सों में फिर से बांटने की नींव रख ही दी जो फिर से मुस्लिम और गैर मुस्लिम बँटवारे का ही अब प्रत्यक्षदर्शी जेहादी सूत्रधार सिद्ध हो चुका है .. भारत में मुसलमान “मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अनुप्रयोग अधिनियम, 1937 द्वारा शासित हैं.” यह मुसलमानों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ को निर्देशित करता है जिसमें शादी, मेहर (दहेज), तलाक, रखरखाव, उपहार, वक्फ, चाह और विरासत शामिल है,,आम तौर पर अदालत सुन्नियों, के लिए हनाफी सुन्नी कानून को लागू करती है, शिया मुसलमान उन स्थानों में सुन्नी कानून से अलग है जहां बाद में सुन्नी कानून से शिया कानून अलग हैं. हालांकि, वर्ष 2005 में, भारतीय शिया ने सबसे महत्वपूर्ण मुस्लिम संगठन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ से नाता तोड़ दिया और उन्होंने ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के रूप में स्वतंत्र लॉ बोर्ड का गठन किया…जो कि स्पष्टत: इस्लामिक अलगाववादिता की भारतीय नागरिकों में धार्मिक मान्यताओं और धर्मानुसार भेद करने का घृणित उदाहरण है और भारत के संविधान की मूल भावना समेत समानता के अधिकार तक का अपमान है तथा 1947 में धार्मिक आधार पर विभाजित स्वयं भारत व हर बहुसंख्यक का अपमान है…!!

भारतीय संविधान, बिना धर्म का विचार किए सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करता है,, संविधान का अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता की सिफारिश करता है हालांकि , देश में लगातार राजनीतिक नेतृत्वों ने समान नागरिक संहिता के तहत भारतीय समाज को एकीकृत करने के प्रयासों का जोरदार विरोध किया है और भारतीय मुसलमानों द्वारा इसे देश के अल्पसंख्यक समूहों की सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करने की कोशिश के रूप में देखा जाता है जबकि इसका कोई वास्तविक आधार है ही नहीं सिवाय मुसलमान के रूप में जानबूझकर ‘अतिविशिष्ट नागरिक और मुस्लिम अल्पसंख्यकवाद’ के स्वरूप को कायम रखने की तुच्छ मानसिकता के अलावा, क्योंकि जब यही भारतीय मुसलमान यूरोप, अमेरिका, रूस,ब्रिटेन व लातिन अमेरिकी देशों में जा कर रहते हैं तो उन्हे वहां के यूनिवर्सल सिविल कोड से कोई परेशानी नहीं होती उल्टा बढचढ कर आगे आकर मानते हैं किंतु वो ही सब भारत में आकर नागरिक नहीं मुसलमान मात्र बन जाते हैं।
इस प्रकार भारत में एक अद्वितीय स्थिति मौजूद है जहां एक धर्मनिरपेक्ष कानून का समर्थन करने वालों को फासीवादी या सांप्रदायिक माना जाता है जबकि जो भारतीय मुसलमानों के लिए शरीयत का समर्थन करते हैं उन्हें धर्मनिरपेक्ष के रूप में समझा जाता है….है ना जुगाड प्रदत्त अतिविशिष्टता वाला राजनैतिक भारतीय विरोधाभास ….??


इसलिए यह मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड तो विशुद्धतम रूप से अंग्रेजों की अलगाववादी विरासत है, कोई इस्लामी सिद्धांत नहीं, दरअसल कानूनी रूप से एक समुदाय को अलग दर्जा देकर अंग्रेज शासकों ने और फिर अंग्रेजभगत कांग्रेस ने शुरू से अपना राजनीतिक हित साधा था लेकिन आज के आतंकवाद और कट्टर जेहादवाद, फतवावाद से ग्रसित आजाद भारत में इस मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, वक्फ बोर्ड सहित हज कमेटी बोर्ड नीति को जारी रखने की कोई जरूरत नहीं है…!!

अप्रैल 2011 की एक प्रमुख घटना सहित हमारे देश के इस्लामिक सांप्रदायिकताकरण सहित कट्टरता फैलाने में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सरीखी संवैधानिक संस्था के हाथ की ओर ध्यान दिलाना चाहूँगा –
” ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने नए वक्फ़ क़ानून और शिक्षा के अधिकार क़ानून को अस्वीकार कर दिया है.

बोर्ड की कार्यकारिणी का कहना है कि अगर इसमें ज़रूरी संशोधन नहीं किए गए तो केंद्र सरकार को समूचे मुसलिम समुदाय के विरोध का सामना करना पड़ेगा.

बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना राबे हसन नदवी ने ऐसे क़ानूनों और न्यायिक फ़ैसलों पर भी चिंता जताई जो शरीया के ख़िलाफ़ हैं.

बोर्ड की कार्यकारिणी की दो दिवसीय बैठक रविवार की रात हैदराबाद में आयोजित एक विशाल जन सभा के साथ सम्पन्न हुई जिसमें बोर्ड ने दोनों क़ानूनों को सांविधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए ठुकरा दिया.

बैठक के बाद बोर्ड के सचिव मौलाना अब्दुल रहमान क़ुरैशी और हैदराबाद से लोकसभा सदस्य असदुद्दीन ओवैसी ने एक पत्रकार सम्मेलन में कहा कि वक्फ़ क़ानून को लोकसभा में चालाकी से पास किया गया.

उनका कहना था कि इसे सदन में शुक्रवार को दोपहर बाद रखा गया था जब आमतौर से कोई मुसलिम सांसद सदन में मौजूद नहीं होता.

नए क़ानून पर आपत्तियां

इस क़ानून पर आपत्ति जताते हुए मौलाना क़ुरैशी ने कहा कि इससे वक्फ़ की सम्पत्ति का फ़ायदा अन्य समुदायों को पहुंचाने का रास्ता खोलने की कोशिश की गई है जबकि ये सिर्फ़ मुसलमानों के लिए होना चाहिए.

उन्होने कहा कि वक्फ़ की सम्पत्ति की देखभाल की ज़िम्मेदारी ऐसे वक्फ़ बोर्ड पर होनी चाहिए जिसमें मुस्लिम उलेमा और मुसलिम संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हों लेकिन उसमें सरकारी अधिकारियों को शामिल किया जा रहा है.

जहां तक शिक्षा अधिकार क़ानून का सवाल है ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा कि इस क़ानून के लागू होने के बाद मुसलमान अपने मदरसे और अन्य समुदाय अपने धार्मिक शिक्षा केंद्र नहीं चला सकेंगे.

इस क़ानून के अनुसार पहली से आठवीं कक्षा तक सरकारी पाठ्यक्रम पढ़ाना अनिवार्य कर दिया गया है.

मौलाना अब्दुल रहमान क़ुरैशी ने कहा कि इस क़ानून के अधीन शैक्षणिक संस्थाओं और अल्पसंख्यक संस्थाओं की प्रबंधन समितियों में 75 प्रतिशत प्रतिनिधित्व छात्रों के माता-पिता और अभिभावकों का रहेगा और वह वक्फ़ के हाथों से निकल जाएगा.

उन्होने बताया कि इस विधेयक को राज्य सभा में रोक लिया गया है और उसे सिलेक्ट कमेटी को सौंप दिया गया है जिसकी अध्यक्षता सैफ़ुद्दीन सोज़ करेंगे.

बाबरी मस्जिद पर विचार

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक में बाबरी मस्जिद मामले पर भी विचार हुआ.

मस्जिद के ध्वंस के मामले में भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और अन्य नेताओं के बरी होने की आलोचना की गई.

इन लोगों को बरी करने के फ़ैसले को सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है और बोर्ड ने ख़ुद भी इस मुक़दमे में शामिल होने पर विचार किया.

बोर्ड ने मांग की कि मस्जिद को गिराने के लिए ज़िम्मेदार लोगों को सज़ा दिलाने के लिए ज़रूरी क़दम उठाए जाएं.

बोर्ड का अनुमान है कि सुप्रीम कोर्ट में बाबरी मस्जिद मिल्कियत का मुक़दमा लड़ने के लिए दस से बारह करोड़ रुपए का ख़र्च आ सकता है.

इसके लिए हैदराबाद की मजलिस-ए-इत्तेहादुल-मुसलमीन ने बोर्ड को 55 लाख रुपए दिए हैं ,कुल मिलाकर इस बैठक का संदेश यही था कि बोर्ड ऐसे हर क़ानून और अदालती फ़ैसले के ख़िलाफ़ लड़ेगा जो शरीयत के ख़िलाफ़ हो…!!”

इस खबर रूपी बैठक व निर्णयों के सबूत के रूप में लिंक की जकात सेक्यूलरों और इस्लामी कट्टरवादी जेहादियों हेतु नीचे दे रहा ही हूँ मित्रों ..!

http://www.bbc.co.uk/hindi/mobile/india/2011/04/110425_muslim_board_mg.shtml

अब आखिरकार तो सार्वजनिक धन की आधिकारिक व धार्मिक रूप से हजारों करोड की ‘सेमेस्टरानुसार’ जकात बांटना बंद किया जाये और अब तो समान नागरिक संहिता तुरंत प्रभाव से लागू की जाये अन्यथा सारे सेक्यूलर नेता कृपया पूरे देश को अब यह बतायें कि समान नागरिक संहिता भारत में क्यों नहीं लागू की जा सकती और सेक्यूलर इंडिया के नामधारी बुरके में इस्लामी नियमों को संवैधानिक रूप से मानता व कानूनी छूटें देता यह छद्म इस्लामी भारत का अगला धार्मिक बंटवारा कब आयोजित किया जाना है…अथवा समान नागरिक संहिता क्यों नहीं…अन्यथा यदि मुसलमानों हेतु शरिया आधारित मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को यूंही तुष्टिकरण व वोटबैंक हेतु कायम रखना है तो मुस्लिम अपराधियों को दंड भी शरियत कानूनों द्वारा हर अपराध के मामलों में दिया ही जाये अन्यथा धर्म आधारित कानूनों का औचित्य ही क्या है….??

जब मुसलमानों हेतु हमारे ‘सेक्यूलर’ न्यायालय गंभीर अपराधों में मुसलमान अपराधी के गैरकानूनी बचाव हेतु भी शरियत की आड़ ले कर फैसले देने लगे हैं तो आपराधिक दंड संहिता और भारतीय दंड संहिता (CRPC & IPC) की जगह मुसलमानों हेतु शरीयत आधारित दंड संहिता ही क्यों ना लागू कर दी जाये…ताकि इस्लामीकरण सुनियोजित तो हो सके अन्यथा मीठा मीठा गप गप और कडवा कडवा थू थू सरीखा दोगला राजनैतिक व्यवहार अब बहुत हो चुका ….!!

http://navbharattimes.indiatimes.com/delhi/other-news/delhi-court-cites-mahomedan-law-to-absolve-man-of-raping-minor/articleshow/21625794.cms

अब सारे राजनैतिक दल और विशेषकर मोहरबंद सेक्यूलर मंगते यह सुनिश्चित कर लें कि मुसलमानों के लिये यदि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्डस् जरूरी ही हैं तो शरिया आधारित दंड संहिताऐं भी मुसलमान अपराधियों हेतु हों ही और उन्हे अपराधिता हेतु शरिया आधारित दंड ही मिले ….अन्यथा भारत में यह इस्लामीकरण का पर्सनल लॉ बोर्ड ड्रामेबाजी खत्म करके तुरंत प्रभाव से समान नागरिक संहिता यानि कॉमन सिविल कोड़ लागू कर ही दिया जाये….!!

जवाब दे कांग्रेस और दोगले सेक्यूलर जिनके लिये सेक्यूलरिज्म का मतलब सिर्फ असहिष्णु सांप्रदायिक इस्लाम को और शरियत को ही बढावा दे कर संरक्षित करना है।

हिंदू हिंदुत्व हिंदुस्तान
वन्दे मातरम् 

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Posted By Dr. Sudhir Vyas at sudhirvyas’s blog in WordPress

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