भारत-पाक के कांग्रेसी हित के समझौते – 1972 का शिमला ‘समझौता’ या देश सम्मान का बेचान


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आत्मसमर्पण का सा ही पर्याय बना 1972 का शिमला समझौता क्यों किया इंदिरा व कांग्रेस ने… और किसके दबाव में किया…??
भारतीय मित्रों ,, स्वतंत्रता के बाद जितनी भी सरकारें बनीं, चाहे वे किसी भी पार्टी की हों, हमेशा इस सिद्धान्त पर चलती रहीं कि देश के हितों से ज्यादा उन्हें देश की छवि की चिन्ता करनी है और बस यही कारण है कि हमारे वीर जवानों ने विभिन्न युद्धों में, जो वास्तव में हमारे ऊपर थोपे गये थे, अपने बलिदान देकर जो कुछ भी पाया, वह हमने उन युद्धों के बाद हुई वार्ताओं की मेज पर गँवा दिया, केवल झूठी शान की और भारत के प्रत्यक्ष कलंक ‘भाईचारे’ की मूढ़ आशा में और 1972 में शिमला में भारत-पाकिस्तान के बीच हुआ ‘शिमला समझौता’ इसका बेहतरीन उदाहरण है,,,,  भाईचारा – किसके भाई का चारा और क्यों …??

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यह समझना कठिन नहीं है कि 1972 में “शिमला समझौता” करने के लिए भारत के ऊपर किसी बड़ी विदेशी ताकत का दबाव था। इस समझौते से भारत को पाकिस्तान के सभी 93000 से अधिक युद्धबंदी छोड़ने पड़े और युद्ध में जीती गयी 5600 वर्ग मील जमीन भी लौटानी पड़े। इसके बदले में भारत को क्या मिला यह कोई नहीं जानता।

यहाँ तक कि पाकिस्तान में भारत के जो 54 युद्धबंदी थे, उनको भी भारत वापस नहीं ले सका और वे 41 साल से आज भी अपने देश लौटने की प्रतीक्षा करते हुऐ मर चुके अथवा मृतक समान ही हैं,पर इस देश को और कांग्रेस की सरकारों को उनकी फिक्र ही नहीं क्योंकि घोषित व आधिकारिक रूप से बलिदानी और शहीद तो सिर्फ इंदिरा व राजीव गांधी ही है ना ….??

वही राजीव गांधी जो 1971 के युद्ध में कायरता व देशद्रोह के वीआईपी पर्याय थे.. 1971 के युद्धकालीन आपात काल के तहत इंडियन एयरलाइंस के सभी पायलटों की छुटिटयां रद्द कर दी गयी थी, जिससे इंडियन एयरलाइंस के पायलटों का प्रयोग रसद आपूर्ती हेतु किया जा सके किंतु अगर ऐसे मौके पर किसी का लड़का अवकाश लेकर घर आ जाए तो मां-बाप उसे देशद्रोही ही समझने लगते हैं, परंतु उस समय भी देश के एक ‘बहादुर व जांबाज पायलट’ को अवकाश दिया गया था, जिससे वह इन खतरों से दूर अपनी ससुराल इटली मे जाकर शांति के वातावरण में अपनी विदेशी पत्नी की बांहो में प्यार से समय गुजार सके, जी हां आप एकदम सही समझ रहे हैं, वह बहादुर व जाबांज पायलट कोई और नही तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का वीर पुत्र राजीव गाँधी ही था,,, अब उसकी मृत्यु के बाद उनकी देशभक्ति और वीरता, बलिदान के ऐसे कशीदे पढ़े जा रहे हैं जैसे उन्होने देश को अपनी देशभक्ति से नये मार्गों के चमत्कार दिखाये हों ,बताया जाता है कि राजीव गाँधी ने युद्ध के समय इटली जाने के पीछे किसी और का नही बल्कि तत्कालीन इटली नागरिक (इस बात पर अभी भी संदेह है कि उन्होने इटली की नागरिकता छोड़ दी है) व भारत के वतन का होने का ढिंढोरा पीटने वाली सोनिया गाँधी का ही दिमाग काम कर रहा था,,शायद …??
सोनिया गाँधी को इस बात का जवाब अवश्य देना चाहिये कि क्यों 1971 के भारत पाक युद्ध के समय वे खुद इटली भाग गयीं थी व तभी वापस आई जब जनरल नियाजी ने समर्पण पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया था… स्वभाविक है उस समय उनके खून का एक-एक कतरा कह रहा होगा कि इटली अपना वतन है इटली अपना वतन है,,,भारत अपना वतन है ,कहने की आवश्यकता तो अभी इन दिनो सिर्फ राजनैतिक व सत्ता चाह की मजबूरी में ही आई है क्योंकि पहले खुद भारत का प्रधानमंत्री बनना चाहती थी और अब अपने शहजादे राहुल के लिये जमीन तैयार कर सुरक्षित हो रही हैं..पर 1971 के उस युद्धकालीन संकट के समय तो इटली अपना वतन है का नारा लगा रही होंगी…नहीं…??

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चलो छोडो मित्रों, मूल मुद्दे पर लौटतें हैं कि 1972 के शिमला समझौते में अपना सब कुछ लेकर कुटिल पाकिस्तान ने एक थोथा-सा आश्वासन बेवकूफ और मूढमगज़ राजनीतिज्ञों के ही देश भारत को फिर दिया कि भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर सहित जितने भी विवाद हैं, उनका समाधान ‘आपसी बातचीत’ से ही किया जाएगा और उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर नहीं उठाया जाएगा लेकिन इस अकेले आश्वासन का भी पाकिस्तान ने सैकड़ों बार उल्लंघन किया है और कश्मीर विवाद को पूरी निर्लज्जता के साथ अनेक बार अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाया है,और इसी साल की 7 फरवरी 2014 को आधिकारिक तौर पर कुटिल पाकिस्तान ने कहा कि शिमला समझौते का उसके लिये कोई अर्थ नहीं है सिर्फ संयुक्त राष्ट्र की गाईडलाईन व चार्टर अनुसार ही चले भारत …तो इस तरह  वास्तव में पाकिस्तान के लिए किसी समझौते का मूल्य उतना भी नहीं है, जितना उस कागज का मूल्य है, जिस पर वह समझौता लिखा गया है…!!

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वास्तव में हमारे देश के शासक यह समझने में असफल रहे और अभी भी असफल ही हैं कि पाकिस्तान दुनिया का सबसे अधिक अविश्वसनीय और झूठा देश है। इसका और इसके नेताओं का एक भी शब्द विश्वास करने लायक नहीं है। हम पाकिस्तान से चाहे जितनी वार्ताएँ कर लें, चाहे जितने समझौते कर लें, चाहे जितना व्यापार कर लें और चाहे जितनी क्रिकेट खेल लें, लेकिन भारत और पाकिस्तान के सम्बंधों में सुधार आने की रत्तीभर भी सम्भावना नहीं है। भारत और पाकिस्तान के बीच के सम्बंध हमेशा उसी प्रकार ‘मित्रतापूर्ण’ बने रहेंगे, जितने 1947 से आज तक रहते आये हैं।

मित्रों, इतिहास खोदने की कोशिश करते करते शायद 2014 के इस चुनावी रण में सांप्रदायिक व देशद्रोही कांग्रेस की कब्र खुदने में काम आ जाये ऐसी कोशिशें ….!!
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भारत माता की जय
वन्दे मातरम्

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