Students Islamic Movement Of India (सिमी) भारत का तालिबान = तुष्टिकरण की आतंकवादी ‘सेक्यूलर वोट’ नीति


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स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) यानि ‘भारतीय तालिबान’ का गठन 25 अप्रैल 1977 को यूपी के अलीगढ़ में हुआ, इसका फाउंडर प्रेजिडेंट मोहम्मद अहमदुल्ला सिद्दीकी था,, सिमी मूल रूप से जमात-ए-इस्‍लामी(JIH)के लिए छात्रों को, 1956 में स्थापित इस्‍लामी छात्र संगठन (SIO) के पुनर्जीवित करने के लिए बनाया गया था,,1981 में सिमी कार्यकर्ताओं ने पीएलओ नेता यासिर अराफात की भारत यात्रा के खिलाफ विरोध किया और उन्हें नई दिल्ली में काले झंडे दिखाए।

सिमी के सिद्धांतों का मूल सिद्धांत पूरी तरह कट्टर इस्लामिक राज्य/देश की स्थापना है जिसमें हर मानव जीवन को पवित्र कुरान के हिसाब से चलाना, इस्लाम का प्रसार और इस्लाम की खातिर जिहाद करना ही सिमी का मूल विचार है यानि सिमी (SIMI) या स्टुडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया  के अनुसार इनका ध्येय ‘पश्चिमी भौतिकवादी सांस्कृतिक प्रभाव को एक इस्लामिक समाज में रूपांतरित करना है कई लोगों और खुद भारत सरकार की भी य़ही मान्यता है की सिमी आतंकवादी गतिविधियों से जुडा एक इस्लामिक आतंकवादी संगठन ही जो हर तरह से भारतीय तालिबान का ही प्रारूप है यहां यह बतलाना भी प्रमुख रहेगा कि सिमी भारत में आतंकवादी गतिविधियों में अपनी भागीदारी के लिए 2002 में भारत सरकार द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया था, हालांकि, अगस्त 2008 में एक विशेष न्यायाधिकरण में सिमी पर प्रतिबंध हटा लिया फिर ये प्रतिबंध बाद में भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा 6 अगस्त 2008 पर बहाल किया गया.. साथ ही हाल में ही 2015 में वर्तमान मोदी सरकार ने सिमी पर प्रतिबंध अनिश्चितकालीन समय हेतु बढा कर सिमी के खिलाफ कार्यवाही सख्त करके बढा दी है।

2001 में प्रतिबन्ध लगने के बाद भी यह संगठन कभी निष्क्रिय नहीं हुआ और पिछ्ले दो तीन वर्षों में देश में हुई बडी आतंकवादी घटनाओं में इसका हाथ रहा है या इसी संगठन ने उन्हें अंजाम दिया है। इस संगठन की सक्रियता के मूल कारण पर जब हम विचार करते हैं तो हमें कुछ तथ्य स्पष्ट रूप से दिखायी पडते हैं एक तो हमारे राजनीतिक दलों द्वारा इस्लामी आतंकवाद के मुद्दे को वोट बैंक की राजनीति से जोड्कर देखना और दूसरा इस्लामी धार्मिक नेतृत्व या बुध्दिजीवियों द्वारा आतंकवाद को हतोत्साहित करने के स्थान पर मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा को प्रोत्साहित कर सरकार, राज्य, प्रशासन, सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया एजेंसियों को कटघरे में खडा कर इस्लामी प्रतिरोध की शक्तियों को कुण्ठित करना, सिमी का घोषित मकसद इस्लामी समाज पर पश्चिम के भौतिकवादी सांस्कृतिक प्रभाव को कम करके खासकर युवाओं को इस्लामी परंपराओं की ओर प्रवृत्त करना था. 9 सितंबर, 2001 को सिमी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. शाहिद बद्र फलाही ने मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में मीडिया से बातचीत में कहा था की सिमी की बजरंग दल या विश्व हिंदू परिषद् से तुलना ठीक नहीं है. उनका दावा था कि सिमी मुस्लिम छात्रों का शरीयत के मुताबिक, चरित्र निर्माण में जुटा है. तब उनका दावा था कि देश के 17 राज्यों में संगठन के 950 अंसार (सक्रिय सदस्य) हैं.
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मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में इसके साधारण सदस्यों की संख्या लाखों में है. फलाही ने सिमी पर पाबंदी पर कड़ा एतराज जताते हुए इसे गैर-लोकतांत्रिक कहा था. 27 सितंबर 2001 को सिमी पर प्रतिबंध लगाए जाने वाली रात ही फलाही को गिरफ्तार कर लिया गया था. उनके ऊपर लगाए गए आरोप सही न पाए जाने पर 7 अप्रैल, 2004 को उन्हें बरी कर दिया गया. हालांकि कुछ मुकदमों में वे अब भी आरोपी हैं. हालांकि, अगस्त 2008  में एक विशेष न्यायाधिकरण ने सिमी पर से प्रतिबंध हटा लिया लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 6 अगस्त 2008 को प्रतिबंध उचित ठहराया और पुन: अब 2015 में सिमी पर मोदी सरकार ने अनिश्चितकालीन प्रतिबंध बढा कर उसके खिलाफ कार्यवाही बढा दी है, सख्त कर दी है!

सिमी से ही इंडियन मुजाहिदीन संगठन उपजा, जो देश में आतंक का एक नया चेहरा बना. इसकी कमान, बताते हैं मध्य प्रदेश के सफदर नागौरी ने संभाली और इसे ज्यादा हिंसक बनाया. मुंबई के डॉ. अबू फैजल को संगठन में मध्य प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी गई. इसने एटीएस जवानों के साथ निर्दोष नागरिकों की हत्या कर अपने इरादे जता दिए. संगठन चलाने के लिए पैसों की खातिर बैंक भी लूटे गए. सितंबर 2010 में इन्होंने भोपाल में मणप्पुरम फाइनेंस लि. में डकैती डालकर 13 किलो सोना और 40,000 रु. नगदी भी लूटी. मंदसौर की पीपल्या मंडी में स्टेट बैक ऑफ इंदौर और जावरा में पंजाब नेशनल बैंक में भी डकैती डाली. छात्रों के चरित्र निर्माण के नाम पर खड़ा किया गया संगठन इस तरह अपराधी व अलगाववादी चरित्र का इस्लामिक आतंकी और दंगाई नृशंस गिरोह बन बैठा…!

सिमी के लीडर- सिमी पर प्रतिबंध लगने से पहले तक शाहिद बदर फलाह इसके नैशनल प्रेजिडेंट और सफदर नागौरी सेक्रेटरी था, 28 सितंबर 2001 को पुलिस ने फलाह को दिल्ली के जाकिर नगर इलाके से गिरफ्तार किया,,माना जा रहा है कि फिलहाल सिमी नागौरी के सहयोगियों के नेतृत्व में गुपचुप तरीके से अपनी गतिविधियां चला रहा है,, प्रतिबंधित संगठन सिमी (स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया) अब सीधे तौर पर स्पेशल सेल की रडार पर आ गया है। अहमदाबाद की साबरमती जेल में बंद सिमी महासचिव सफदर नागोरी को पूछताछ के लिए दिल्ली लाना इसी प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है। तेरह साल पूर्व जामिया नगर थाने में दर्ज मामले में नागोरी को स्पेशल सेल ने हिरासत में लिया है। फरवरी में राजस्थान जेल से लाकर की गई शाहबाज हुसैन से पूछताछ के बाद अब नागोरी को हिरासत में लेना काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है,, स्पेशल सेल के अधिकारियों के अनुसार केंद्र सरकार द्वारा सिमी को प्रतिबंधित किए जाने के विरोध में सितंबर 2001 में जाकिर नगर में देशद्रोही बयानबाजी कर रहे सिमी अध्यक्ष शाहिद बदर समेत नौ लोगों को पकड़ा गया था। आरोपियों द्वारा प्रेसवार्ता करने की जानकारी के बाद पुलिस ने छापेमारी की थी। मौके से बड़ी मात्रा में देश विरोधी दस्तावेज, भड़काऊ भाषण की ऑडियो व वीडियो कैसेट, मैग्जीन, फोटो आदि बरामद हुए थे। इस दौरान मौके से अब्दुल्ला दानिश, हनीफ शेख, अब्दुल सुब्हान उर्फ अब्दुल्ला व सफदर नागोरी तथा शाहबाज हुसैन फरार हो गए थे। वर्ष 2008 में नागोरी को गिरफ्तार किया गया था। फरार आरोपियों में से एक शाहबाज को भी वर्ष 2008 में उत्तर प्रदेश व राजस्थान में हुए बम धमाकों के आरोप में पकड़ा गया था। बाकी आरोपी अभी तक फरार हैं, अखबारी व पुलिस सूत्रों के अनुसार राजस्थान जेल से लाए गए शाहबाज ने पूछताछ में नागोरी को लेकर कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। हाल में पकड़े गए भारत में आइएम के चीफ तहसीन अख्तर उर्फ मोनू से भी जांच एजेंसियों को काफी जानकारियां हाथ लगी हैं। बताया जा रहा है कि जेल में रहते हुए नागोरी ही आजकल सिमी की कमान संभाल रहा था। मध्य प्रदेश की खंडवा जेल तोड़कर फरार हुए अबू फैजल ने भी गिरफ्तारी के बाद कई अहम खुलासे किए थे। जिसमें जेल में बंद सिमी के बड़े नाम सफदर नागोरी की रिहाई की कोशिश तथा राजनेताओं पर हमले की साजिश रचने की बात सामने आई थी। स्पेशल सेल के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार सिमी को लेकर जिस तरह के खुलासे हाल फिलहाल में हुए हैं उससे कहा जा सकता है कि उसके मंसूबे बेहद खतरनाक हैं। रांची में सिमी के ‘ब्लैक ब्यूटी’ मॉडयूल का हैदर अली तथा लश्कर से संपर्क रखने वाला सुब्हान अभी फरार है। इसके अलावा कई राज्यों में सिमी के मॉडयूल काम कर रहे हैं।

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प्रतिबन्धित इस्लामी संगठन स्टूडेंटस इस्लामिक मूवमेंट आफ इण्डिया या संक्षिप्त रूप में जिसे सिमी के नाम से जाना जाता है अब खुफिया एजेंसियों के लिये काफी बडा सिरदर्द बनता जा रहा है। खुफिया एजेंसियों के अनुसार सिमी ऐसा पहला आतंकवादी संगठन है जिसने देश के अन्दर बडे पैमाने पर देशी आतंकवादियों का नेटवर्क खडा कर लिया है और इन खुफिया एजेंसियों का यह भी मानना है कि यह देश में कार्यरत अनेक मुस्लिम चरमपंथी संगठनों के साथ मिलकर काम ही नहीं कर रहा है वरन उनके साथ मिलकर नेटवर्क को और अधिक व्यापक बना रहा है। यह खुलासा मार्च के महीने में इन्दौर से पकडे गये सिमी के 13 सदस्यों में से एक अमील परवेज के साथ पुलिस की पूछताछ के दौरान हुआ। परवेज ने बताया कि सिमी हैदराबाद स्थित चरमपंथी इस्लामी संगठन दर्सगाह जिहादो शहादत के साथ के साथ काफी निकट से सम्बद्ध है और इसके साथ मिलकर काम कर रहा है,, इससे पूर्व भी हैदराबाद में दर्सगाह की गतिविधियों के बारे में और इसके उग्र स्वरूप के बारे में पहली बार तब पता चला था जब गुजरात के पूर्व मंत्री हरेन पाण्ड्या की हत्या के आरोपी मौलाना नसीरुद्दीन को पुलिस ने पकडा तो दर्सगाह के सदस्यों ने पुलिस पर पथराव कर उसे पुलिस की पकड से छुडाने का प्रयास किया और जबरन पुलिस की गाडी से उसे ले जाने का प्रयास करने लगे। इस घटना के उपरांत पुलिस ने जब भीड को तितर बितर करने के लिये गोली चलाई तो दर्सगाह का कार्यकर्ता मुजाहिद सलीम इस्लाही गोलीबारी में मारा गया।.

हैदराबाद के पुलिस आयुक्त ने भी स्वीकार किया कि वे इस संगठन के बारे में जानते हैं और सम्भव है कि सिमी के कुछ पूर्व सदस्य इस संगठन से सम्बद्ध हों। दर्सगाह के सम्बन्ध में उसकी वेबसाइट से जानकारी प्राप्त की जा सकती है –

http://www.djsindia.org
http://www.djsindia.org/
www.djsindia.org

इसकी वेबसाइट के अनुसार इस संगठन का उद्देश्य मुस्लिम युवकों को शारीरिक और मानसिक रूप से सशक्त बनाना और इस हेतु उन्हें प्रशिक्षण देना जो कि सशस्त्र भी हो सकता है। इस संगठन के अनुसार उसका प्रमुख उद्देश्य हिजाब के सिद्धांत को सख्ती से लागू कराना, शरियत, मस्जिद और कुरान की पवित्रता और सुरक्षा सुनिश्चित करना, स्त्रियों की पवित्रता की रक्षा करना,  इस्लामी सुधार के लिये मार्ग प्रशस्त करना और अंत में इसके उद्देश्य में कहा गया है कि अल्लाह और इस्लाम  की सर्वोच्चता स्थापित करना। लेकिन जिस बात ने खुफिया एजेंसियों को इस संगठन के सम्बन्ध में सर्वाधिक सतर्क किया है वह है इसके प्रशिक्षण की एक व्यवस्था जिसके अंतर्गत हैदराबाद के बाहरी क्षेत्रों में कुछ विशिष्ट लोगों को छांटकर प्रशिक्षण दिया जाता है। परवेज ने पुलिस को बताया कि उसने 2007 में दो प्रशिक्षण शिविरों में भाग लिया था और इन शिविरों में अनेक कठिन प्रशिक्षण दिये गये जिनमें चाकू छूरी चलाने से लेकर पेट्रोल बम बनाने तक का प्रशिक्षण था। इस वेबसाइट ने एक किशोर का चित्र भी लगा रखा था जिसके हाथ में एक पट्टिका थी जिस पर लिखा था “ कुरान हमारा संविधान है और मैं उसका सिपाही” परंतु कुछ समाचार पत्रों में इसके बारे में समाचार प्रकाशित होने के बाद फिलहाल इस चित्र को वहाँ से हटा दिया गया है।

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परवेज की पूछ्ताछ में सिमी के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस्लामी संगठनों से सम्पर्क की बात सामने आयी है 1997 में अलीगढ में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया था जिसकी अध्यक्षता सिमी के तत्कालीन अध्यक्ष शाहिद बद्र फलाही ने की थी और उस सम्मेलन में परवेज के साथ 20 वर्षीय फिलीस्तीनी मूल के हमास नामक फिलीस्तीनी आतंकवादी संगठन के सदस्य शेख सियाम ने भी भाग लिया था। परवेज ने पूछ्ताछ के दौरान यह भी स्पष्ट किया है कि 2001 में इस संगठन पर प्रतिबन्ध लग जाने के बाद भी किस प्रकार यह सक्रिय रहा और अपनी गतिविधियाँ चलाता रहा। परवेज के अनुसार काफी सदस्यों की गिरफ्तारी के बाद सफदर नागौरी और नोमन बद्र ने इस संगठन को नये सिरे से खडा किया। परवेज के अनुसार नागौरी ने उससे कहा कि वह प्रतिबन्ध हटवाने का पूरा प्रयत्न करेगा और इस आन्दोलन को समाप्त नहीं होने देगा।
पुलिस और खुफिया एजैंसियों के लिए हाल ही में हॉट स्पॉट बने बिहार में सिमी (स्टूडैंट ऑफ इस्लामिक मुवमैंट ऑफ इंडिया) का वर्चस्व है। सिमी के स्लीपर सैल यहां आतंकियों की जमकर मदद करते हैं। इंडियन मुजाहिद्दीन की मदद भी यहां सिमी के लोग ही कर रहे थे। सिमी के लोगों को यहां सीधे रूप में आई.एस.आई. से भी आदेश आते हैं।

दिल्ली पुलिस के एक आला अधिकारी की मानें तो आई.एस.आई. द्वारा हवाला के जरिए भेजी गई सबसे ज्यादा रकम भी इसी राज्य में आती है। इसका एक कारण यह भी है कि यहां हवाला की रकम और विस्फोटक वाया बंगलादेश और नेपाल से होकर आसानी से आ जाता है। आंतकी तहसीन अख्तर उर्फ मोनू ने पूछताछ में बताया है कि 27 अक्तूबर को मोदी की पटना रैली में बम बलास्ट आई.एम. ने नहीं बल्कि सिमी ने करवाया था। हालांकि आई.एम. के लोगों को भी इन गतिविधियों के बारे में सारी जानकारी थी।

हाल में दिल्ली पुलिस की पूछताछ में पता चला कि ब्लैक ब्यूटी (सिमी)का बिहार-झारखंड में मुखिया हैदर अली है। हैदर अली से तहसीन अख्तर की मुलाकात नवम्बर 2011 में हुई थी। उन दोनों की पहली मुलाकात दरभंगा फिर पटना में हुई। उसके बाद हैदर के कहने पर वह रांची चला गया था। वहां पर उसे हैदर ने ही हिनू चौक स्थित किराए पर एक मकान दिलाया था। उस दौरान वह इम्तियाज के साथ भी वहां रहा। उस वक्त उसके सिमी के कई सदस्यों से उसकी मुलाकात हुई।

सिमी के तार- सिमी को वर्ल्ड असेंबली ऑफ मुस्लिम यूथ से आर्थिक मदद मिलती है। इसके कुवैत में इंटरनैशनल इस्लामिक फेडरेशन ऑफ स्टूडेंट्स से भी करीबी संबंध हैं। इसके अलावा पाकिस्तान से भी इन्हें मदद मिलती है। सिमी के तार जमात-ए-इस्लामी की पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल यूनिट से भी जुड़े हैं। सिमी पर हिज्बुल मुजाहिदीन से भी संबंधों के आरोप हैं और आईएसआई से भी इसके रिश्ते माने जाते हैं। सिमी के नेताओं के लश्कर-ए-तैबा और जैश-ए-मोहम्मद से भी नजदीकी रिश्ते हैं।

2001 में जब तत्कालीन एन.डी.ए सरकार ने सिमी पर पहली बार प्रतिबन्ध लगाया तो उस समय विपक्ष की नेत्री श्रीमती सोनिया गाँधी ने इसकी आलोचना की और उनका साथ उनके ही दल की सदस्या अम्बिका सोनी ने दिया। फिर जब सोनिया गाँधी की अध्यक्षता वाली यू.पी.ए की सरकार केन्द्र में बनी तो इस सरकार ने भी सिमी पर प्रतिबन्ध को जारी रखा। यह उदाहरण संकेत करता है कि आतंकवाद जैसे मह्त्वपूर्ण मुद्दे पर भी राजनीतिक दलों में आम सहमति नहीं बन पायी है और इसे भी राजनीतिक मोल तोल के हिसाब से देखा जा रहा है। राजनीतिक दलों के इस रवैये का सीधा असर सुरक्षा एजेंसियों पर पड्ता है जो तमाम जानकारियों और प्रमाणों के बाद भी आरोपियों पर कार्रवायी करने में हिचकती हैं या उन्हें कार्रवायी धीरे धीरे करने का निर्देश दिया जाता है। दोनों ही दशाओं में इस्लाम के नाम पर आतंकवाद करने वालों का मनोबल बढता है और वे अवसर पाकर अपनी ताकत और अपना नेटवर्क बढा लेते हैं।

मेंबरशिप- सिमी के करीब 400 फुल टाइम काडर और 20 हजार सामान्य सदस्य हैं। 30 साल की उम्र तक के स्टूडंट सिमी के सदस्य बन सकते हैं। इससे ज्यादा उम्र हो जाने पर वह संगठन से रिटायर हो जाते हैं।
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प्रतिबन्ध के बाद भी सिमी का इस मात्रा में सक्रिय रहना और ताकतवर रहना एक और मह्त्वपूर्ण तथ्य की ओर संकेत करता है जिसका उल्लेख ऊपर भी किया गया है कि इस्लामी धर्मगुरूओं और बुद्धिजीविओं की भूमिका इस सम्बन्ध में सन्दिग्ध है। अभी कुछ महीने पहले जब उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में स्थित प्रमुख इस्लामी संस्थान दारूल- उलूम – देवबन्द ने आतंकवाद के सम्बन्ध में एक बडा सम्मेलन आयोजित किया और उस सम्मेलन के द्वारा इस्लाम और आतंकवाद के मध्य किसी भी सम्बन्ध से इन्कार किया तो भी जैसे प्रस्ताव वहाँ पारित हुए उनमें राज्य, प्रशासन, पुलिस को ही निशाना बनाया गया और पूरे प्रस्ताव में सिमी जैसे संगठनों के बारे में एक भी शब्द नहीं बोला गया,, ये विडंबना रही है भारत की,कि एक ओर तो आतंकवाद के विरुद्ध फतवा जारी किया जा रहा है तो वहीं दूसरी ओर सिमी का नेटवर्क फैलता जा रहा है यहाँ तक कि तत्कालीन सरकार ने संसद में स्वीकार किया है कि सिमी का नेटवर्क दक्षिण भारत और पश्चिमी भारत के अनेक प्रांतों में फैल चुका है, इससे तो यही संकेत मिलता है कि ऐसे संगठनों को रोकने की इच्छा शक्ति का अभाव है। सरकार जिसका नेतृत्व राजनीतिक दल कर रहे है उनमें ऐसे तत्वों को रोकने की शक्ति नहीं है क्योंकि उनके लिये मुस्लिम वोट अधिक महत्व रखते हैं और इस्लामी धर्मगुरूओं या बुद्धिजीवियों में इस्लाम के नाम पर आतंक फैला रहे तत्वों को रोकने की इच्छा नहीं है क्योंकि यदि उनमें ऐसी इच्छा होती तो वे मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा को सशक्त बनाकर या खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों को निशाने पर लेकर इस्लामी आतंकवादियों को बचने का रास्ता नहीं प्रदान करते।

 

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देश भर में सिमी के फैलते जाल ने हमारे समक्ष अनेक प्रश्न खडे कर दिये हैं जिनके प्रकाश में इस्लामी आतंकवाद के सम्बन्ध में नये सिरे से विचार करने की आवश्यकता है। यह समस्या एक विचारधारा से जुडी है और उस विचारधारा की तह तक जाना होगा। इस समस्या को बेरोजगारी या अल्पसंख्यकों के देश की मुख्यधारा से अलग थलग रहने जैसे सतही निष्कर्षों से बाहर निकल कर पूरी समग्रता में लेने की आवश्यकता है। उन तथ्यों का पता लगाने की आवश्यकता है कि इस्लामी धर्मगुरु और बुध्दिजीवी आखिर क्योंकर इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाले संगठनों के विरुद्ध मुखर होकर उन्हें इस्लाम विरोधी घोषित नहीं करते।

अब तो पिछले 5-7 सालों से राजस्थान के जैसलमेर जोधपुर सहित कई सीमाई इलाकों में प्रतिबंधित संगठन स्टूडेन्ट इस्लामिक मूमेंन्ट ऑफ इंडिया (सिमी) के गुपचुप प्रवेश की आहट या यूँ कहें खुल्लमखुल्ला घनत्व सुनी जाने लगी है,, अलीगढ़ से संचालित हो रहे इस संगठन के लोगों द्वारा राजस्थान में अपना आधार मजबूत करने के लिए चुपचाप नए सदस्य बनाने की मुहिम शुरू की गई है , विश्वसनीय खुफिया सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र व दिल्ली के बाद प्रतिबंधित संगठन सिमी के नेताओं ने हाल ही में राजस्थान के जैसलमेर, जोधपुर सहित अन्य कई सीमाई इलाकों में गुपचुप रूप से दौरे कर यहाँ अपने प्रतिनिधि बनाए है। बताया जाता है कि इनके द्वारा बड़े पैमाने पर नए सदस्य भी बनाए जा रहे है, विभिन्न समाचारपत्रों और पुलिस सूत्रों के हवाले से बताया जा रहा है कि राजस्थान जैसे शांत व सौहार्द वाले प्रदेश में सिमी की गुपचुप दस्तक खतरे की घंटी साबित हो सकती है,, पहले भी उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र में कई आतंकवादी घटनाओं में सिमी की भूमिका प्रत्यक्ष रूप से सामने आई है, अब राजस्थान में अपना आधार तलाशने की सिमी की नई रणनीति कोई दूरगामी सोची-समझी साजिश हो सकती है जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण जोधपुर, जयपुर , सीकर, टोंक, अजमेर जैसे क्षेत्रों से सिमी और इंडियन मुजाहिदीन से जुडे स्थानीय, भारतीय व पाकिस्तानी आतंकवादियो और उनके स्लीपर नेटवर्किंग का कडी दर कडी पकडे जाना है ,, देश में आतंकी धमाकों की साजिश में इंडियन मुजाहिदीन ((आईएम)) और प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया ((सिमी)) के कई राजदार शामिल हैं। पकड़े गए आईएम के चीफ तहसीन अख्तर उर्फ मोनू और जैश ए मुहम्मद के कैडर कमांडर वकास समेत अन्य संदिग्ध आतंकियों ने दिल्ली स्पेशल सेल और इंटेलीजेंसी की जॉइंट इंट्रोगेशन में कई खुलासे किए हैं। देश में कई जगह आतंकी धमाके करने वाले इन दोनों आतंकियों के संपर्क में आने के बाद

खुफिया सूत्रों का मानना है कि राजस्थान के सीमाई इलाकों में धर्म प्रचार के लिए आने वाली जमातों के कारण भी यहाँ कट्टरता बढ़ी है तथा लोगों के खानपान, रहन सहन, पहनावे व संस्कृति में जबरदस्त बदलाव आया है। अब सिमी संगठन की सक्रियता से इन गतिविधियाँ में इजाफा हो सकता है।

इंडियन मुजाहिदीन के यूपी, बिहार और महाराष्ट्र मॉड्यूल के खुलासे के बाद यासीन भटकल ने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का आईएम पर से ध्यान हटाने के लिए सिमी को सक्रिय करने को कहा था.

आईएम सरगना यासीन भटकल ने आईएम पर से ध्यान हटाने के लिए असदुल्लाह अख्तर उर्फ हड्डी, तहसीन अख्तर उर्फ मोनू तथा कुछ अन्य आतंकियों को इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) को सक्रिय करने को कहा था. 

बताया जाता है कि अपने सरगना से मिले आदेश के बाद बिहार में छिपे हड्डी व मोनू ने बिहार व झारखंड के विभिन्न जिलों में जाकर सिमी के लिए न केवल ताबड़तोड़ भर्तियां की थी बल्कि पाक आतंकी जिया-उर-रहमान उर्फ वकास की देखरेख में सिमी में शामिल होने वाले जेहादियों को बम-गोला बनाने से लेकर आईईडी बनाने की ट्रेनिंग भी दी थी. 

मोनू की मानें तो पिछले साल अक्टूबर महीने में सिमी के रांची मॉड्यूल (ब्लैक ब्यूटी) ने पटना के गांधी मैदान में आयोजित नरेन्द्र मोदी की रैली में बम धमाका कराए थे और यह मॉड्यूल अभी भी देश के विभिन्न भागों में आतंकी वारदात को अंजाम देने के फिराक में जुटा हुआ है.
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पुलिस सूत्रों के अनुसार पटना रैली में बम धमाके को अंजाम देने के लिए सिमी के सदस्यों ने कई दिन पहले से ही पटना में डेरा डाल रखा था और इस धमाके को झारखंड के सिमी मॉड्यूल के मुखिया हैदर के देखरेख में अंजाम दिया गया था. हार्डकोर आतंकी तहसीन अख्तर उर्फ मोनू ने दिल्ली पुलिस के समक्ष खुलासा किया है कि उसकी हैदर से मुलाकात करीब तीन साल पहले दरभंगा में हुई थी, उस दौरान यासीन भटकल भी दरभंगा के उर्दू बाजार में बतौर यूनानी डॉक्टर रह रहा था. 

यासीन ने उसे बताया था कि वह हैदर के साथ मिलकर सिमी के लिए भी कार्य करे और यासीन के कहने पर ही उसने कई अन्य युवकों को सिमी से जोड़ा था. हैदर सिमी को सक्रिय करने के लिए अक्सर बिहार के शहर दरभंगा, मधुबनी व पटना आता जाता रहता था और वह उसके साथ कई बार झारखंड के शहर रांची व जमशेदपुर आदि शहरों में भी गया था. 

मोनू की माने तो हैदर के कहने पर वह कई बार रांची भी गया और रांची के हिनू चौक पर स्थित एक मकान में बतौर किरायेदार करीब पांच माह तक छिपा रहा था. रांची में रहने के दौरान वह हैदर के दोस्त इम्तियाज से भी कई बार मिला और वह इम्तियाज के आवास पर भी जाकर टिका था. इम्तियाज के बारे में बताया जाता है कि वह सिमी के ब्लैक ब्यूटी का हार्डकोर सदस्य था, जिसकी मौत पटना में हुए धमाके के दौरान हो गई थी. 

सूत्र बताते हैं कि  मोनू के झारंखड प्रवास के दौरान ही पाक आतंकी जिया-उर-रहमान उर्फ वकास रांची आया था, जहां उसने सिमी के सदस्यों को बम बनाने से लेकर बम में आईईडी लगाने आदि की ट्रेनिंग दी थी. दिल्ली पुलिस ने दावा किया कि भारतीय सुरक्षा एजेंसियों द्वारा लगातार की जा रही आईएम सदस्यों की गिरफ्तारी के चलते यासीन ने मोनू व हड्डी को सिमी को सक्रिय करने के लिए कहा था. चूंकि साल 2013 में यासीन भटकल व हड्डी खुद सुरक्षा एजेंसियों द्वारा धर दबोचा गया था, इस वजह से सिर्फ मोनू ही बचा था जो सिमी व आईएम के बीच कड़ी का काम कर रहा था. 

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भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह बड़ी चुनौती है कि जहां वह आईएम के सदस्यों को धर-पकड़ने में जुटी है वहीं सिमी के तौर पर एक अन्य आतंकी संगठन के सक्रिय होने से खतरा बढ़ गया है. पहले यह माना जा रहा था कि आईएम के गठन के बाद सिमी का कोई अस्तित्व नहीं बचा था लेकिन मोनू के खुलासे के बाद भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती शायद और बढ़ गई प्रतीत होती है. 

तहसीन अख्तर उर्फ मोनू की माने तो सिमी के हार्डकोर सदस्य भी भारत में आतंक फैलाने के लिए मुख्य तौर पर कार्य करने वाले रियाज और इकबाल भटकल के संपर्क में है और इनकी मदद भी पाक की खुफिया एजेंसी आईएसआई के अलावा आतंकी संगठन लश्कर ए तैयबा कर रही है. 

कम्प्यूटर में माहिर को बनाते थे आतंकी
आईएम के ऑपरेशनल चीफ रहे तहसीन अख्तर उर्फ मोनू समेत राजस्थान के शहर अजमेर, जोधपुर व जयपुर से पकड़े गए आतंकी जिया-उर-रहमान, मोहम्मद महरुफ, मोहम्मद बकार अजहर उर्फ हनीफ और शकीब अंसारी उर्फ खालिद कम्प्यूटर एक्सपर्ट बताए जाते हैं. 

पुलिस सूत्रों ने दावा किया कि पाक के रहने वाले अता भटकल उर्फ अफीफ ने आईएम सुप्रीमो रियाज व इकबाल भटकल के कहने पर सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिये ही राजस्थान मॉड्यूल को खड़ा किया था. जेहादी बनने के इच्छुक एक खास सम्प्रदाय के युवकों को अपनी ओर खींचने के लिए अता भटकल ने सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपनी फेक आईडी से एकाउंट खोल रखा था. 

अता के फेसबुक पर जुड़ने वाले युवक जहां खुद की आईडी से जुड़े हुए थे वहीं उनलोगों ने आपस में चैट या सूचनाओं का अदान-प्रदान करने के लिए फेक आईडी भी बना रखी थी. जब कोई मीटिंग या दावत की जाती तब सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिये ही इसमें भाग लेने के लिए आमत्रंण भेजा जाता था. राजस्थान मॉड्यूल में शामिल आतंकी आपस में बातचीत करने के लिए हमेशा नए-नए तकनीक का प्रयोग करते थे ताकि सुरक्षा एजेंसियों का उन पर नजर न पड़ सके.

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जोधपुर व जयपुर से पकडे गये आतंकियों को आईएम के संपर्क में आने के लिए आतंकी रियाज ने वकार और मारूफ को उपनाम दिए थे। वकार को हनीफ और मारूफ को आफताब के नाम से पुकारा जाता था। इसके अलावा जब तहसीन जयपुर में फरवरी 2013 में आया था। तब रियाज ने वकार और मारूफ को तहसीन का असली नाम बताने के बजाए साहिल बताया था। तहसीन की असली पहचान का मारूफ और वकार तब पता चला जब दूसरी बार वह जयपुर में ट्रेनिंग देने आया था। आईबी द्वारा जारी की गई तहसीन की फोटो और असली रूप में काफी अंतर था।

वकार निंबस सोशल साइट से करता था रियाज भटकल से बात

2011 में मस्जिद में मिले थे मारूफ और वकार

आतंकी गतिविधियों में शामिल मारूफ और वकार वर्ष 2011 में प्रतापनगर की एक मस्जिद में तबलीगी जमात के दौरान मिले थे। इस दौरान दोनों ने आपस में बात की थी। दोनों के विचार एक ही थे। वकार जेहादी बनना चाहता था। इसके बाद मारूफ ने वकार का आईएम के चीफ और रियाज भटकल से संपर्क कराया था। दिसंबर 2012 में मारूफ और वकार की जोधपुर में एक दावत के दौरान बरकत और शाकिब अंसारी से मुलाकात हुई थी। इसके बाद चारों ने आईएम के चीफ और रियाज भटकल से मोबाइल के जरिये बात करके बम धमाके करने का प्लान बनाया था।

दिल्ली स्पेशल सेल के कमिश्नर एसएन श्रीवास्तव ने बताया कि वकार और गंगापुर सिटी के मेहराजुद्दीन की दोस्ती जीआईटी कॉलेज में हुई थी। दोस्ती के बाद दोनों एक साथ ही कमरा किराए पर लेकर प्रतापनगर में रहने लगे थे। लेकिन मेहराजुद्दीन को वकार ने अपने इरादों की भनक तक नहीं लगने दी। वकार बम बनाने की सामग्री को कमरे में छिपाकर रखता था, ताकि मेहराजुद्दीन को इसकी भनक नहीं लगे। ऐसे में दिल्ली पुलिस ने मेहराजुद्दीन को सामान्य पूछताछ के बाद छोड़ दिया गया था।

जोधपुर, पाली, बाड़मेर व जैसलमेर में स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) के एक्टिव होने से खुफिया एजेंसियां चौकन्नी हो गई हैं। इसके साथ ही पाकिस्तान से सटे सीमावर्ती गांवों में दूसरे राज्यों से आने वाली तब्लीगी जमाते की गतिविधियां यकायक बढ़ गई हैं। बीते दिनों लीड एजेंसियों की बैठक में सिमी की गतिविधियों के इनपुट मिलने पर एजेंसियों ने पूर्व में सक्रिय सिमी नेताओं के रिकॉर्ड खंगालने शुरू कर दिए हैं।
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एक दशक पहले जोधपुर, पाली व सिरोही में यह संगठन सक्रिय था। जोधपुर में सिमी के दो नेता पकड़े भी गए थे। तीन साल पूर्व जोधपुर, पाली व जैसलमेर में सिमी के पोस्टर दीवारों पर दिखाई दिए, लेकिन गतिविधियां नजर नहीं आईं। खुफिया एजेंसियों के महाराष्ट्र व गुजरात में सक्रिय सिमी कार्यकर्ताओं पर नजर रखने पर उनके तार पश्चिमी राजस्थान से जुड़े होने की जानकारी मिली। फीडबैक के आधार पर यहां निगरानी रखने पर सिमी कार्यकर्ताओं का एक्टिव होना पाया गया।जोधपुर, जैसलमेर व पाली में सिमी कार्यकर्ताओं ने संगठन को मजबूत करने के लिए युवाओं को जोड़ने की मुहिम चला रखी है।

गुपचुप बैठकें कर सिमी की गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। लीड एजेंसियों ने एक-दूसरे से सिमी की गतिविधियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। एजेंसियां उस आधार पर सिमी नेटवर्क पर पूरी नजर रखे हुए हैं। बैठक में सीमावर्ती गांवों में उत्तर प्रदेश, बिहार व महाराष्ट्र से आने वाले तब्लीगी जमात की संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी मिलने पर खुफिया एजेंसियां उन पर कड़ी निगरानी रखे हुए है।

source :http://www.bhaskar.com/article/RAJ-JOD-simi-active-vigilant-intelligence-agencies-2258521.html

आतंकवादी हमलों के ई-मेल भेजकर जिम्मेदारी लेने की अपनी विशिष्ट शैली के लिए जाना जाने वाला प्रतिबंधित संगठन इंडियन मुजाहिदीन सिमी की चरमपंथी शाखा का बदला हुआ रूप है, जिसने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के समर्थन से पूर्ण आतंकवादी संगठन की शक्ल ले ली।

ऐसा कहा जाता है कि सिमी में विभाजन के बाद इसका गठन किया गया। जहाँ सफदर नागौरी के नेतृत्व वाला एक समूह चरमपंथी आतंकवादी विचाराधारा पर कायम रहा, वहीं सिमी के पूर्व मुख्य समन्वयक मोहम्मद इस्लाम के नेतृत्व वाले एक अन्य धड़े ने नरमपंथी नजरिए को तरजीह दी।

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साल 2002 में हुए गोधरा कांड (जिसमें स्थानीय कांग्रेसी और सिमी के लोग ही कर्ताधर्ता के रूप में शामिल थे)  के बाद सिमी में विभाजन हो गया और सिमी के कट्टरपंथी धड़े ने आतंकवादी संगठन शुरू करने का फैसला किया। इसे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से तुरंत समर्थन मिला।

आमिर रजा खान, रियाज शाहबंदरी और अब्दुल सुभान कुरैशी द्वारा स्थापित इस आतंकवादी संगठन में दक्षिणी गुजरात, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र के देवबंदी मदरसे में पढ़ने वाले छात्र शामिल हुए। इनमें से ज्यादातर कश्मीरी हैं। इस धड़े का नाम इंडियन मुजाहिदीन रखा गया।

खुफिया एजेंसियों के अनुसार इंडियन मुजाहिदीन का नेतृत्व फिलहाल फरार चल रहे इकबाल भटकल के हाथ में है। ऐसा समझा जाता है कि यह पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का मुखौटा संगठन बन गया है।

इस समूह ने 2005 में वाराणसी में हुए धमाकों की जिम्मेदारी लेकर पहली बार अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। इसके बाद उसने नवंबर 2007 में उत्तरप्रदेश में अदालतों के बाहर सिलसिलेवार विस्फोट की घटनाओं को अंजाम दिया। इंडियन मुजाहिदीन का देश भर में कम से कम 10 सिलसिलेवार धमाकों में हाथ है, मुंबई  के उपनगरीय ट्रेनों में जून 2006 में हुए धमाकों से पाँच मिनट पहले टेलीविजन चैनलों को भेजे गए ई-मेल से पर्याप्त संकेत मिलते हैं कि उन धमाकों में उसका हाथ हो सकता है। इन धमाकों में 187 लोग मारे गए थे, उसी वर्ष मई में जयपुर, बेंगलुरु, अहमदाबाद और दिल्ली में भी हुए सिलसिलेवार धमाकों की जिम्मेदारी इंडियन मुजाहिदीन ने ली इन हमलों में 70 से अधिक लोग मारे गए थे।

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अब इत्तू सी बित्ते भर की जानकारी के आधार पर और “स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी)” का हिंदी में अर्थ निकाला जाये तो उसका मतलब ” भारत के इस्लामी आंदोलन के छात्र” के रूप में निकलता है और उर्दू ,फारसी के ‘तालिबान’ शब्द का हिंदी में तर्जुमा किया जाये तो उसका मतलब भी ‘छात्रों का गिरोह या संगठन’ ही निकलता है …!!
तो मित्रों कुल मिला कर मेरे कहने का कुल मतलब ही यही है कि ‘SIMI ही भारत में तालिबान है ..!!’
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हिंदू हिंदुत्व हिंदुस्तान
वन्दे मातरम्

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