Anaemia / एनीमिया = रक्त अल्पाक्तता / खून की कमी


शरीर में फोलिक एसिड, आयरन व विटामिन-बी12 की कमी से एनीमिया रोग होता है , इस रोग में शरीर में रेड ब्‍लड सेल्‍स का स्तर सामान्‍य से कम हो जाता है।

एनीमिया का सबसे बड़ा कारण है, शरीर में खून की कमी होना, एनीमिया के कारण रोगी हमेशा थका हुआ महसूस करता है जिससे कार्यक्षमता प्रभावित होती है, एनीमिया में रोगी को ज्यादा से ज्यादा आयरन युक्त आहार लेने  की सलाह दी जाती है। इससे खून की कमी को जल्दी पूरा किया जा सकता है।
बढ़ते बच्चों, स्तनपान कराने वाली महिलाओं व बीमार व्यक्तियों में एनीमिया का खतरा ज्यादा होता है।
एनीमिया के लक्षण

शुरुआत में शरीर में खून की कमी होने पर कोई खास लक्षण दिखाई नहीं देते, लेकिन जैसे जैसे यह कमी बढ़ती जाती है इसके लक्षण भी बढ़ने लगते हैं।

★ कमजोरी और थकावट महसूस होना,
★ चक्कर आना,
★ लेट के उठने पर आँखों के सामने अन्धेरा छा जाना,
★ सिर दर्द रहना,
★ हृदय की धड़कन तेज या असामान्य होना,
★ त्वचा व नाखूनों का पीला होना ,
★ हाथों और पैरों का ठंडा होना,
★ आंखें पीली हो जाना,
★ सांस फूलना,
★ छाती में दर्द होना,
★महिलाओं में मासिक धर्म कम होना

दरअसल एनीमिया ऐसी स्थिति है जिसमें रक्त में हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है. हीमोग्लोबिन का स्तर पुरुष और महिलाओं में अलग-अलग होता है. महिलाओं और पुरुषों में हीमोग्लोबिन का आदर्श स्तर 12 ग्राम प्रति डेसीलीटर (डीएल या 0.1 लीटर) से 18 ग्राम प्रति डीएल होता है. लेकिन यदि पुरुषों में हीमोग्लोबिन की मात्रा 12 ग्राम प्रति डेसीलीटर हो तो एनीमिया होने की आशंका ज़्यादा होती है जबकि औरतों में इतना ही हीमोग्लोबिन सामान्य होता है. ख़ून में हीमोग्लोबिन की सही मात्रा बहुत ज़रूरी होती है और हीमोग्लोबिन में रेड-ब्लड सेल्स का निर्माण और कार्यशैली भी प्रभावित होने से एनीमिया की स्थिति पैदा हो जाती है..!!

एनीमिया की स्थिति

1. व्यक्ति के शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर 10-12 ग्राम प्रति डीएल हो तो ऐसी स्थिति माइल्ड एनीमिया कहलाती है !

2. यदि हीमोग्लोबिन की मात्रा 6 से 10 ग्राम प्रति डीएल हो तो व्यक्ति को मॉडरेट एनीमिया होता है !

3. और यदि हीमोग्लोबिन की मात्रा 6 ग्राम प्रति डीएल से कम हुई, तो सीवीयर यानी ख़तरनाक एनीमिया की स्थिति पैदा होती है जो अकस्मात् मृत्यु का गंभीरतम कारक होता है !

एनीमिया का वर्गीकरण

1. यदि शरीर में रेड-ब्लड सेल्स की संख्या 80 प्रति फेम्टोलीटर (एफएल या 0.00001 लीटर)  से कम हो, तो वह माइक्रोसीटिक एनीमिया यानी निम्न कोशिका मात्रा कहलाता है!

2. यदि संख्या 80 से 100 प्रति एफएल के बीच हो, तो यह स्थिति सामान्य कोशिका मात्रा एनीमिया कहलाता है!

3. अगर इससे भी ज्यादा हो तो यह स्थिति मैक्रोसीटीक एनीमिया यानी अति-वृहत एनीमिया कहलाती है. शरीर में इसी कमी को जांच कर डॉक्टर बताते हैं कि एनीमिया किस स्तर पर है और इसके होने की वजह क्या है? 
अचानक तीव्र रक्तस्राव से शरीर में ख़ून की कमी एनीमिया का रोगी बना देती है, आंतरिक रक्तस्राव जैसे स्रावी नासूर या बाहरी स्राव जैसे चोट या सदमे से भी एनीमिया हो सकता है, इस तरह अचानक हुए रक्त की कमी के काफी नुक़सानदेह परिणाम हो सकते हैं , इसका सही व़क्त पर इलाज नहीं कराने से यह जानलेवा भी हो सकता है, वैसे ख़ून की कमी के अलावा भी कई दूसरे कारण भी हैं जिनसे एनीमिया होने का ख़तरा बढ़ जाता है!

4. परनीसीयस एनीमिया : शरीर में विटामीन बी-12 की कमी से परनीसीयस एनीमिया होने की आशंका प्रबल होती है, इस तरह का एनीमिया उन लोगों में सामान्य तौर पर देखा जाता है जो विटामिन बी-12 पचाने में असमर्थ होते हैं, यह परेशानी ज़्यादातर शुद्ध शाकाहारी व्यक्तियों को और लंबे व़क्त से शराब का सेवन करने वालों को होती है, भारी मात्रा में शराब का सेवन अस्थिमज्जा (बोन मैरो) के लिए हानिकारक होता है, शराब अस्थिमज्जा को ज़हरीला बनाकर रेड-ब्लड सेल्स के निर्माण में बाधा उत्पन्न करती है, जिससे एनीमिया का ख़तरा बढ़ जाता है. ऐसे लोगों को ज़्यादातर माइक्रोटिक एनीमिया होता है, हरी सब्ज़ियों की कमी, फलों की कमी से विटामिन बी-12 की मात्रा शरीर में कम हो जाती है, जिससे हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है!

5. थॉयमीन की कमी से : शराब की वजह से शरीर में थायमीन की कमी हो जाती है ,इससे “वरनीक एनकैफिलोपैथी सिंड्रोम” हो जाता है और इससे व्यक्ति को दौरे पड़ने लगते हैं, ऐसा एनीमिया भारी मात्रा में शराब के सेवन की वजह से हो जाता है!

6. रक्तस्राव से होने वाला एनीमिया : माहवारी के दिनों में अत्यधिक स्राव, किसी चोट या घाव से स्राव, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल अल्सर, कोलन कैंसर इत्यादि में धीरे-धीरे ख़ून लगातार रिसने से एनीमिया हो सकता है!

7. आयरन की कमी/ Iron Deficiency Anaemia : रेड ब्लड सेल्स का निर्माण करने के लिए अस्थिमज्जा को आयरन की ज़रूरत पड़ती है. यह पौष्टिक आहार के ज़रिए शरीर को मिल पाता है. आयरन की कमी से शरीर में एनीमिया हो जाता है!

8. लंबे समय से बीमार होने पर : किसी भी प्रकार की दीर्घकालिक बीमारी से एनीमिया हो सकता है, यहां तक कि किसी प्रकार का इंफेक्शन का यदि लंबे तक ठीक उपचार न कराया जाए तो उससे भी एनीमिया होने की आशंकाएं प्रबल होती हैं, इसके अलावा ब्लड कैंसर जैसे ल्यूकेमिया या लींफोमा रेड-ब्लड सेल्स के निर्माण में बाधा उत्पन्न करती है जिससे भी एनीमिया होने की आशंकाएं बढ़ जाती हैं!

9. किडनी कैंसर : किडनी से इरायथ्रोपोयॅटीन नाम का हारमोन निकलता है जो अस्थिमज्जा को रेड-ब्लड सेल के निर्माण में मदद करता है, जिन लोगों को किडनी का कैंसर होता है उनमें इस हारमोन का निर्माण नहीं होता है और इसकी वजह से रेड-ब्लड सेल्स का बनना भी कम हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को एनीमिया हो जाता है!

10. गर्भधारण में : कुपोषण महिलाओं में आम समस्या है ऐसे में गर्भधारण करने पर भी इस कुपोषण की समस्या का निवारण न हो, तो एनीमिया की परेशानी हो सकती है, गर्भवती महिला में गर्भ सबसे पहले अपने आप को सुरक्षित करता है ऐसे में वह नाभि के ज़रिए होने वाले ख़ून के संचार से पोषित होता है, ऐसे में महिला के शरीर में ख़ून की कमी हो जाती है और शरीर में पानी की मात्रा बढ़ जाती है जो ख़ून में घुल कर महिला के रक्त-संचार को प्रभावित करता है!

11. अल्पाहार या कुपोषण : रेड-ब्लड सेल्स के निर्माण के लिए कई प्रकार के विटामिन व मिनरल्स की ज़रूरत होती है, इनकी कमी से रेड- ब्लड सेल्स का निर्माण ज़रूरत के हिसाब से नहीं हो पाता है फिर हीमोग्लोबिन बनने में परेशानियां आती हैं ऐसे में व्यक्ति एनीमिया का शिकार बन सकता है!

12. सीकल सेल एनीमिया / Sickle Cell Anaemia : हीमोग्लोबिन के जीन में बदलाव से यह परेशानी होती है , असामान्य हीमोग्लोबिन के कारण रेड ब्लड सेल्स सीकल यानी हंसिये के आकार के हो जाते हैं, सीकल सेल एनीमिया के कई प्रकार होते हैं जिनका असर अलग-अलग स्तर पर अलग-अलग तरीक़े से होता है!

13. थैलैसीमीया: थैलैसीमीया आनुवांशिक भी हो सकती है, यह हीमोग्लोबिन के निर्माण की मात्रा को प्रभावित करती है यानी इसमें हीमोग्लोबिन अपनी असल अपेक्षित मात्रा में बनने के बजाय कम या ज़्यादा बनने लगता है!

14. अप्लास्टिक एनीमिया/ Aplastic Anaemia : कभी-कभी वायरल इंफेक्शन होने से भी अस्थिमज्जा को बुरी तरह से प्रभावित होती है इससे ब्लड सेल्स का निर्माण बिल्कुल कम हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप एनीमिया होने की संभानाएं ज़्यादा होती हैं,, इसके अलावा कैंसर के इलाज जैसे केमोथेरपी या अन्य दवाएं लेने से भी ऐसी ही परेशानियां उत्पन्न हो जाती हैं, एनीमिया होने के ऐसे कारणों को अप्लास्टिक एनीमिया कहते हैं!

15. हीमोलायटिक एनीमिया / Hemolytic Anaemia : सामान्य रेड-ब्लड सेल्स का आकार इसके ठीक से काम करने के लिए काफी अहम होता है , कई कारणों से रेड-ब्लड सेल नष्ट हो जाते हैं जिस अवस्था को हीमोलायटिीस कहते हैं, ऐसी स्थिति में रेड-ब्लड सेल्स ठीक तरीक़े से काम नहीं कर पाते हैं, हीमोलायटिस की स्थिति कई कारणों से पैदा हो सकती हैं, कारण आनुवांशिक और रेड-ब्लड सेल्स का अति निर्माण हो सकता है इसके अलावा कई अवस्था में सामान्य रेड-ब्लड सेल्स में भी हीमोलायटिक एनीमिया हो सकता है जैसे यदि व्यक्ति का अनियमित हृदय वाल्व ब्लड सेल्स को नष्ट करे तो परिणामस्वरूप हीमोलायटिक एनिमिया हो जाता है!

16. अन्य प्रमुख कारण : एनीमिया के अन्य कारणों में दवाओं का दुष्प्रभाव, थायरॉयड की समस्या, कैंसर, लीवर की बीमारियां, वंशानुगत समस्याएं, एड्‌स , टीबी (Tuberculosis) , किडनी / गुर्दे की अनियमितता की समस्या अथवा किडनी/ गुर्दे फेल हो जाने के कारण ( Acute Renal Failure Or Chronic Renal Failure) या नियमित रक्तस्राव व अन्य दूसरे कई कारण भी एनीमिया के कारणों में उभर कर सामने आ सकते हैं..!!

एनीमिया का पता लगना मुश्किल होता है इसलिए किसी भी प्रकार की तेज़ चोट लगने, छिलने या किसी भी तरह से रक्तस्राव होने पर डॉक्टर को ज़रूर दिखाएं. आम तौर पर इस तरह के रक्तस्राव से एक्यूट एनीमिया होने का ख़तरा बढ़ जाता है. चूंकि रेड-ब्लड सेल्स की संख्या कम हो जाने से शरीर के हर अंग के तंतु में ऑक्सीजन का वितरण कम हो जाता है,,इसके अलावा किसी भी प्रकार की दवा का सेवन करने के परिणाम हानिकारक हो सकते हैं..!!
माइल्ड यानी हल्के एनीमिया में लक्षण कम नज़र आते हैं, लंबे समय से हुए एनीमिया के कई लक्षण आसानी से देखे जा सकते हैं, फिर भी कम समय से हुए एनीमिया से अक्सर मोटापा/स्थूलता, कमज़ोरी, सांसें कमज़ोर पड़ना, हृदय गति के धीरे या तेज़ होने, सिर भारी होने, पीला पड़ जाने की शिकायत होती है. लंबे समय तक होने वाले गंभीर एनीमिया से सीने में दर्द, कंठ-शूल, हार्ट अटैक, चक्कर, बेहोशी और हृदय गति का बढ़ जाना इत्यादि परेशानियां सताने लगती हैं..!
ख़ून की कमी से होने वाले एनीमिया में लो-ब्लड प्रेशर, सांस फूलना, ठंडी या पीली त्वचा, मल का रंग काला हो जाना, बड़बड़ाहट, उदासी, क्रोध या अत्यधिक तनाव परेशान कर सकते हैं..!!

बचाव / एनीमिया से कैसे निजात पाएं :

बचाव के कुछ सरल उपायों के जरिऐ इससे पूरी तरीके से निजात पाया जा सकता है, बस जरूरत है अपने खान पान पर ध्यान देने की, अपने खाने में हरी पत्तेदार सब्जियों को जरूर शामिल करें।
खाने में आयरन के साथ साथ विटामिन सी को भी तरजीह दें क्योंकि यह शरीर में आयरन सोखने में मदद करता है इसलिए आंवले-पुदीने की चटनी या नियमित ताजे आंवले-पुदीने , चुकंदर का सेवन जरूर करें।
साग या सलाद पर नींबू का रस डालना न भूलें। नियमित रुप से संतरे का जूस पीऐं।
नाश्ते में अंडे और टोस्ट को शामिल करें।
स्नेक्स में भुने चने और गुड़ खाइए यह शरीर में हीमोग्लोबिन बनाते हैं।
गन्ने व गुड़ का इस्तेमाल जरूर करें।

ड्राई फूट्स / सूखे मेवे आयरन से भरपूर एक हेल्दी स्नैक्स है तो इसे भी खा सकते हैं।

“चाय, कॉफी व कोल्ड ड्रिंक्स से दूर रहें, क्योंकि इनको खाने से शरीर में आयरन की कमी होती है, इनमें टैनीन नामक पदार्थ पाए जाते हैं जो शरीर को आयरन सोखने में रोकते हैंअत: यथासंभव इन से दूर ही रहें ।”

शरीर को नई रक्त कोशिकाओं को बनाने के लिए फोलेट की जरूरत पड़ती है, यह फोलेट हमें हरी सब्जियां, बिना पॉलिश किये हुऐ चावल, साबुत अनाज, नट्स और अंगूर से मिलता है ,लोहे के बर्तन में बनाई गई हरी सब्जियों में ज्यादा आयरन होता है जो हमारे शरीर के लिए बेहद फायदेमंद है।

अधिकाँशतया केसेज में एनीमिया ज़्यादातर पौष्टिक आहार लेने से ठीक हो जाता है, लेकिन कुछ प्रकार के एनीमिया में अलग-अलग तरह से उपचार कराने पड़ते हैं. ऐसे में सबसे ज़्यादा ज़रूरी है डॉक्टरी परामर्श,, साधारण तौर पर युवाओं में एनीमिया का उपचार बहुत आसानी से हो जाता है, जबकि वयस्कों में एनीमिया की शिकायत जल्द दूर नहीं हो पाती है, चूंकि लंबी बीमारी से भी एनीमिया होने की आशंकाएं होती हैं, इसलिए उम्रदराज व्यक्तियों को समय-समय पर जांच के लिए जाना चाहिए…!!

मित्रों,पाठकों आशावान हूँ कि यथासंभव सरल शब्दों में आप सब से साझा की गई यह जानकारी आपके लिये ज्ञानवर्धक साबित होगी तथा रोग से बचाव का साधन भी बन पायेगी..स्वस्थ रहें, निरोगी रहें, प्रसन्नचित्त रहे..मंगलकामनाऐं ..!!

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