Jaundice / पीलिया = कारण,लक्षण एवं उपचार/निदान


गर्मी तथा बरसात के दिनो में जो रोग सबसे अधिक होते है, उनमे से पीलिया प्रमुख है पीलिया ऐसा रोग है जो एक विशेष प्रकार के वायरस और किसी कारणवश शरीर में पित्त की मात्रा बढ़ जाने से होता है इसमें रोगी को पीला पेशाब आता है उसके नाखून, त्वचा एवं आखों सा सफ़ेद भाग पीला पड़ जाता है बेहद कमजोरी कब्जियत, जी मिचलाना, सिरदर्द, भूख न लगना आदि परेशानिया भी रहने लगती है 
  
प्रमुख कारण :- 
विषाणु जनित यकृतशोथ पीलिया या Viral Hepatitis यह एक प्रकार के वायरस से होने वाला रोग है जो इस रोग से पीडित रोगी के मल के संपर्क में आये हुए दूषित जल, कच्ची सब्जियों आदि से फैलता है कई लोग इससे ग्रस्त नहीं होते है उनके मल से इसके वायरस दूसरो तक पहुच जाते है पेट से यह लीवर में और वहां से सारे शरीर में फ़ैल जाता है रोगी को लगाईं गई सुई का अन्य स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में बिना उबले प्रयोग करने से व रोगी का खून अन्य स्वस्थ व्यक्ति में चड़ने से भी यह रोग फैलता है ।

इसके अतिरिक्त शरीर में अम्लता की वृद्धि, बहुत दिनों तक मलेरिया रहना, पित्त नली में पथरी अटकना, अधिक मेंहनत, जादा शराब पीना, अधिक नमक और तीखे पदार्थो का सेवन, दिन में ज्यादा सोना, खून में रक्तकणों की कमी होना आदि कारणों से भी इस रोग की उत्पत्ति होती है !
  
लक्षण :- 
   वायरस के शरीर में प्रवेश करने के लगभग एक मास बाद इस रोग के लक्षण नजर आने लगते है लक्षणों के प्रारम्भ होने से एक सप्ताह पहले ही रोगी के मल में वायरस निकलने लगते है आमतौर पर रोग की शुरुआत में रोगी को शक ही नहीं हो पाता है कि वह कामला का शिकार हो गया है यूं तो इसके वायरस सारे शरीर में फ़ैल जाते है पर लीवर पर इसका विशेष दुष्प्रभाव पड़ता है लिवर कोशिकाओ के रोगग्रस्त हो जाते व आमाशय में सुजन आ जाने से रोगी को भूख लगना बंद हो जाती है उसका जी मिचलाता है | और कभी कभी उसे उलटी भी हो जाती है कब्जियत रहती है भोजन की इच्छा बिलकुल न होना तथा भोजन के नाम से ही अरुचि होना इस रोग का प्रधान लक्षण है ,, लिवर में शोथ होने से आमाशय में या फिर दाहिनी पसलियों के नीचे भारीपन या हल्का सा दर्द का लक्षण भी महसूस होता है शरीर में विष संचार के कारण सिरदर्द  रहता है शरीर थका थका व असमर्थ लगने लगने लगता है !
 
शाम के समय तबियत गिरी गिरी रहती है शरीर में विष संचार के कारण 100 से 102 डिग्री तक बुखार भी तीन चार दिन रहता है पित्त के रक्त में जाने से मूत्र गहरे रंग, सरसों के तेल के सामान आता है तथा रोग के बढ़ने पर आंत में पित्त के कम आने से मल का रंग फीका हो जाता है मल मात्रा में अधिक व दुर्गंधित होता है | इस रोग में रक्त जमने का समय बढ़ जाता है जिससे रक्तपित्त का उपद्रव हो सकता है | त्वचा एवं आँखों का रंग पीला हो जाता है ।

पीलिया के रोगियों के जांच करने पर उनका लिवर कुछ कुछ बड़ा हुआ तथा पसलियों से एक तो अंगुल या अधिक नीचे स्पर्श होता है परन्तु कठोर नहीं होता , दबाने पर दर्द होता है मूत्र परिक्षण करने पर वह सरसों के तेल के समान पीला होता है क्यूंकि उसमें बिलीरूबीन होता है ,, यानि कि विस्तार से कहें तो रक्त में पित्तरंजक (Billirubin)  नामक एक रंग होता है, जिसके आधिक्य से त्वचा और श्लेष्मिक कला में पीला रंग आ जाता है।
इस दशा को ही कामला या पीलिया(Jaundice) कहते हैं।

सामान्यत: रक्तरस में पित्तरंजक का स्तर 1.0 प्रतिशत या इससे कम होता है, किंतु जब इसकी मात्रा 2.5 प्रतिशत से ऊपर हो जाती है तब कामला/पीलिया के लक्षण प्रकट होते हैं। कामला/ पीलिया स्वयं कोई रोगविशेष नहीं है, बल्कि कई रोगों में पाया जानेवाला एक लक्षण है। यह लक्षण नन्हें-नन्हें बच्चों से लेकर 80 साल तक के बूढ़ों में उत्पन्न हो सकता है। यदि पित्तरंजक की विभिन्न उपापचयिक प्रक्रियाओं में से किसी में भी कोई दोष उत्पन्न हो जाता है तो पित्तरंजक की अधिकता हो जाती है, जो कामला के कारण होती है।

रक्त में लाल कणों का अधिक नष्ट होना तथा उसके परिणामस्वरूप अप्रत्यक्ष पित्तरंजक का अधिक बनना बच्चों में कामला, नवजात शिशु में रक्त-कोशिका-नाश तथा अन्य जन्मजात, अथवा अर्जित, रक्त-कोशिका-नाश-जनित रक्ताल्पता इत्यादि रोगों का कारण होता है। जब यकृत की कोशिकाएँ अस्वस्थ होती हैं तब भी कामला हो सकता है, क्योंकि वे अपना पित्तरंजक मिश्रण का स्वाभाविक कार्य नहीं कर पातीं और यह विकृति संक्रामक यकृतप्रदाह, रक्तरसीय यकृतप्रदाह और यकृत का पथरा जाना (कड़ा हो जाना, Cirrhosis) इत्यादि प्रसिद्ध रोगों का कारण होती है। अंतत: यदि पित्तमार्ग में अवरोध होता है तो पित्तप्रणाली में अधिक प्रत्यक्ष पित्तरंजक का संग्रह होता है और यह प्रत्यक्ष पित्तरंजक पुन: रक्त में शोषित होकर कामला की उत्पत्ति करता है। अग्नाशय, सिर, पित्तमार्ग तथा पित्तप्रणाली के कैंसरों में, पित्ताश्मरी की उपस्थिति में, जन्मजात पैत्तिक संकोच और पित्तमार्ग के विकृत संकोच इत्यादि शल्य रोगों में मार्गाविरोध यकृत बाहर होता है। यकृत के आंतरिक रोगों में यकृत के भीतर की वाहिनियों में संकोच होता है, अत: प्रत्यक्ष पित्तरंजक के अतिरिक्त रक्त में प्रत्यक्ष पित्तरंजक का आधिक्य हो जाता है।

वास्तविक रोग का निदान कर सकने के लिए पित्तरंजक का उपापचय (Metabolism) समझना आवश्यक है। रक्तसंचरण में रक्त के लाल कण नष्ट होते रहते हैं और इस प्रकार मुक्त हुआ हीमोग्लोबिन रेटिकुलो-एंडोथीलियल (Reticulo-endothelial) प्रणाली में विभिन्न मिश्रित प्रक्रियाओं के उपरांत पित्तरंजक के रूप में परिणत हो जाता है, जो विस्तृत रूप से शरीर में फैल जाता है, किंतु इसका अधिक परिमाण प्लीहा में इकट्ठा होता है। यह पित्तरंजक एक प्रोटीन के साथ मिश्रित होकर रक्तरस में संचरित होता रहता है। इसको अप्रत्यक्ष पित्तरंजक कहते हैं। यकृत के सामान्यत: स्वस्थ अणु इस अप्रत्यक्ष पित्तरंजक को ग्रहण कर लेते हैं और उसमें ग्लूकोरॉनिक अम्ल मिला देते हैं यकृत की कोशिकाओं में से गुजरता हुआ पित्तमार्ग द्वारा प्रत्यक्ष पित्तरंजक के रूप में छोटी आँतों की ओर जाता है। आँतों में यह पित्तरंजक यूरोबिलिनोजन में परिवर्तित होता है जिसका कुछ अंश शोषित होकर रक्तरस के साथ जाता है और कुछ भाग, जो विष्ठा को अपना भूरा रंग प्रदान करता है, विष्ठा के साथ शरीर से निकल जाता है।

प्रत्येक दशा में रोगी की आँख (सफेदवाला भाग Sclera) की त्वचा पीली हो जाती है, साथ ही साथ रोगविशेष काभी लक्षण मिलता है। वैसे सामान्यत: रोगी की तिल्ली बढ़ जाती है, पाखाना भूरा या मिट्टी के रंग का, ज्यादा तथा चिकना होता है। भूख कम लगती है। मुँह में धातु का स्वाद बना रहता है। नाड़ी के गति कम हो जाती है। विटामिन ‘के’ का शोषण ठीक से न हो पाने के कारण तथा रक्तसंचार को अवरुद्ध (haemorrhage) होने लगता है। पित्तमार्ग में काफी समय तक अवरोध रहने से यकृत की कोशिकाएँ नष्ट होने लगती हैं। उस समय रोगी शिथिल, अर्धविक्षिप्त और कभी-कभी पूर्ण विक्षिप्त हो जाता है तथा मर भी जाता है।

कामला के उपचार के पूर्व रोग के कारण का पता लगाया जाता है। इसके लिए रक्त की जाँच, पाखाने की जाँच तथा यकृत-की कार्यशक्ति की जाँच करते हैं। इससे यह पता लगता है कि यह रक्त में लाल कणों के अधिक नष्ट होने से है या यकृत की कोशिकाएँ अस्वस्थ हैं अथवा पित्तमार्ग में अवरोध होने से है।

पीलिया की चिकित्सा में इसे उत्पन्न करने वाले कारणों का निर्मूलन किया जाता है जिसके लिए रोगी को अस्पताल में भर्ती कराना आवश्यक हो जाता है। कुछ मिर्च, मसाला, तेल, घी, प्रोटीन पूर्णरूपेण बंद कर देते हैं, कुछ लोगों के अनुसार किसी भी खाद्यसामग्री को पूर्णरूपेण न बंद कर, रोगी के ऊपर ही छोड़ दिया जाता है कि वह जो पसंद करे, खा सकता है। औषधि साधारणत: टेट्रासाइक्लीन तथा नियोमाइसिन दी जाती है। कभी-कभी कार्टिकोसिटरायड (Corticosteriod) का भी प्रयोग किया जाता है जो यकृत में फ़ाइब्रोसिस और अवरोध उत्पन्न नहीं होने देता। यकृत अपना कार्य ठीक से संपादित करे, इसके लिए दवाएँ दी जाती हैं जैसे लिव-52, हिपालिव, लिवोमिन इत्यादि। कामला के पित्तरंजक को रक्त से निकालने के लिए काइनेटोमिन (Kinetomin) का प्रयोग किया जाता है। कामला के उपचार में लापरवाही करने से जब रोग पुराना हो जाता है तब एक से एक बढ़कर नई परेशानियाँ उत्पन्न होती जाती हैं और रोगी विभिन्न स्थितियों से गुजरता हुआ कालकवलित हो जाता है।

पीलिया रोग-

वायरल हैपेटाइटिस या जोन्डिस को साधारणत: लोग पीलिया के नाम से जानते हैं। यह रोग बहुत ही सूक्ष्‍म विषाणु(वाइरस) से होता है। शुरू में जब रोग धीमी गति से व मामूली होता है तब इसके लक्षण दिखाई नहीं पडते हैं, परन्‍तु जब यह उग्र रूप धारण कर लेता है तो रोगी की आंखे व नाखून पीले दिखाई देने लगते हैं, लोग इसे पीलिया कहते हैं।

जिन वाइरस से यह होता है उसके आधार पर मुख्‍यतः पीलिया तीन प्रकार का होता है वायरल हैपेटाइटिस ए, वायरल हैपेटाइटिस बी तथा वायरल हैपेटाइटिस नान ए व नान बी।

रोग का प्रसार कैसे?

यह रोग ज्‍यादातर ऐसे स्‍थानो पर होता है जहां के लोग व्‍यक्तिगत व वातावरणीय सफाई पर कम ध्‍यान देते हैं अथवा बिल्‍कुल ध्‍यान नहीं देते। भीड-भाड वाले इलाकों में भी यह ज्‍यादा होता है। वायरल हैपटाइटिस बी किसी भी मौसम में हो सकता है। वायरल हैपटाइटिस ए तथा नाए व नान बी एक व्‍यक्ति से दूसरे व्‍यक्ति के नजदीकी सम्‍पर्क से होता है। ये वायरस रोगी के मल में होतें है पीलिया रोग से पीडित व्‍यक्ति के मल से, दूषित जल, दूध अथवा भोजन द्वारा इसका प्रसार होता है।

ऐसा हो सकता है कि कुछ रोगियों की आंख, नाखून या शरीर आदि पीले नही दिख रहे हों परन्‍तु यदि वे इस रोग से ग्रस्‍त हो तो अन्‍य रोगियो की तरह ही रोग को फैला सकते हैं।

वायरल हैपटाइटिस बी खून व खून व खून से निर्मित प्रदार्थो के आदान प्रदान एवं यौन क्रिया द्वारा फैलता है। इसमें वह व्‍यक्ति हो देता है उसे भी रोगी बना देता है। यहां खून देने वाला रोगी व्‍यक्ति रोग वाहक बन जाता है। बिना उबाली सुई और सिरेंज से इन्‍जेक्‍शन लगाने पर भी यह रोग फैल सकता है।

पीलिया रोग से ग्रस्‍त व्‍यक्ति वायरस, निरोग मनुष्‍य के शरीर में प्रत्‍यक्ष रूप से अंगुलियों से और अप्रत्‍यक्ष रूप से रोगी के मल से या मक्खियों द्वारा पहूंच जाते हैं। इससे स्‍वस्‍थ्‍य मनुष्‍य भी रोग ग्रस्‍त हो जाता है।

पीलिया रोग कहां और कब?

ए प्रकार का पीलिया तथा नान ए व नान बी पीलिया सारे संसार में पाया जाता है। भारत में भी इस रोग की महामारी के रूप में फैलने की घटनायें प्रकाश में आई हैं। हालांकि यह रोग वर्ष में कभी भी हो सकता है परन्‍तु अगस्‍त, सितम्‍बर व अक्‍टूबर महिनों में लोग इस रोग के अधिक शिकार होते हैं। सर्दी शुरू होने पर इसके प्रसार में कमी आ जाती है।

रोग के लक्षण:-

ए प्रकार के पीलिया और नान ए व नान बी तरह के पीलिया रोग की छूत लगने के तीन से छः सप्‍ताह के बाद ही रोग के लक्षण प्रकट होते हैं। बी प्रकार के पीलिया (वायरल हैपेटाइटिस) के रोग की छूत के छः सप्‍ताह बाद ही रोग के लक्षण प्रकट होते हैं।

रोग किसे हो सकता है?

यह रोग किसी भी अवस्‍था के व्‍यक्ति को हो सकता है। हां, रोग की उग्रता रोगी की अवस्‍था पर जरूर निर्भर करती है। गर्भवती महिला पर इस रोग के लक्षण बहुत ही उग्र होते हैं और उन्‍हे यह ज्‍यादा समय तक कष्‍ट देता है। इसी प्रकार नवजात शिशुओं में भी यह बहुत उग्र होता है तथा जानलेवा भी हो सकता है।

बी प्रकार का वायरल हैपेटाइटिस व्‍यावसायिक खून देने वाले व्‍यक्तियों से खून प्राप्‍त करने वाले व्‍यक्तियों को और मादक दवाओं का सेवन करने वाले एवं अनजान व्‍यक्ति से यौन सम्‍बन्‍धों द्वारा लोगों को ज्‍यादा होता है।

रोग की जटिलताऐं :-

ज्‍यादातार लोगों पर इस रोग का आक्रमण साधारण ही होता है। परन्‍तु कभी-कभी रोग की भीषणता के कारण कठिन लीवर (यकृत) दोष उत्‍पन्‍न हो जाता है।

बी प्रकार का पीलिया (वायरल हैपेटाइटिस) ज्‍यादा गम्‍भीर होता है इसमें जटिलताएं अधिक होती है। इसकी मृत्‍यु दर भी अधिक होती है।

उपचार:-

रोगी को शीघ्र ही डॉक्‍टर के पास जाकर परामर्श लेना चाहिये। बिस्‍तर पर आराम करना चाहिये घूमना, फिरना नहीं चाहिये। लगातार जांच कराते रहना चाहिए। डॉक्‍टर की सलाह से भोजन में प्रोटिन और कार्बोज वाले प्रदार्थो का सेवन करना चाहिये। नीबू, संतरे तथा अन्‍य फलों का रस भी इस रोग में गुणकारी होता है। वसा युक्‍त गरिष्‍ठ भोजन का सेवन इसमें हानिकारक है। चावल, दलिया, खिचडी, थूल्ली, उबले आलू, शकरकंदी, चीनी, ग्‍लूकोज, गुड, चीकू, पपीता, छाछ, मूली आदि कार्बोहाडेट वाले प्रदार्थ हैं इनका सेवन करना चाहिये

रोग की रोकथाम एवं बचाव

पीलिया रोग के प्रकोप से बचने के लिये कुछ साधारण बातों का ध्‍यान रखना जरूरी हैः-

खाना बनाने, परोसने, खाने से पहले व बाद में और शौच जाने के बाद में हाथ साबुन से अच्‍छी तरह धोना चाहिए। भोजन जालीदार अलमारी या ढक्‍कन से ढक कर रखना चाहिये, ताकि मक्खियों व धूल से बचाया जा सकें। ताजा व शुद्व गर्म भोजन करें दूध व पानी उबाल कर काम में लें। पीने के लिये पानी नल, हैण्‍डपम्‍प या आदर्श कुओं को ही काम में लें तथा मल, मूत्र, कूडा करकट सही स्‍थान पर गढ्ढा खोदकर दबाना या जला देना चाहिये। गंदे, सडे, गले व कटे हुये फल नहीं खायें धूल पडी या मक्खियां बैठी मिठाईयों का सेवन नहीं करें। स्‍वच्‍छ शौचालय का प्रयोग करें यदि शौचालय में शौच नहीं जाकर बाहर ही जाना पडे तो आवासीय बस्‍ती से दूर ही जायें तथा शौच के बाद मिट्टी डाल दें। रोगी बच्‍चों को डॉक्‍टर जब तक यह न बता दें कि ये रोग मुक्‍त हो चूके है स्‍कूल या बाहरी नहीं जाने दे। इन्‍जेक्‍शन लगाते समय सिरेन्‍ज व सूई को 20 मिनट तक उबाल कर ही काम में लें अन्‍यथा ये रोग फैलाने में सहायक हो सकती है। रक्‍त देने वाले व्‍यक्तियों की पूरी तरह जांच करने से बी प्रकार के पीलिया रोग के रोगवाहक का पता लग सकता है। अनजान व्‍यक्ति से यौन सम्‍पर्क से भी बी प्रकार का पीलिया हो सकता है।

पीलिया के अन्य व प्रमुख चिकित्सकीय कारण :-

जब कोई रोगात्मक प्रक्रिया चयापचय के सामान्य कार्य में हस्तक्षेप करती है और बिलीरूबिन के उत्सर्जन की सूचना सही ढंग से दी जाती है, तो इसके परिणामस्वरूप पीलिया हो सकता है. रोगात्मक क्रिया द्वारा प्रभावित होने वाले शारीरिक तंत्र के अंगों के आधार पर पीलिया को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है. तीन श्रेणियां हैं:

यकृत में पहले से होने वालीरोग संबंधी क्रिया (पैथॉलॉजी) जो यकृत में पहले से हो रही है.यकृत में होने वालीरोग संबंधी क्रिया जो यकृत (जिगर) के भीतर पायी जाती है.यकृत के बाहर होने वालीरोग संबंधी क्रिया जो यकृत में बिलीरूबिन के संयोग के बाद देखी जाती है.

यकृत में पहले से होने वाला

यकृत में पहले होने वाला पीलिया किसी भी ऐसे कारण से होता है जो रक्त-अपघटन (लाल रक्त कोशिकाओं के अपघटन) के दर में वृद्धि करता है. उष्णकटिबंधीय देशों में मलेरिया इस तरीके से पीलिया उत्पन्न कर सकता है. कुछ आनुवंशिक बीमारियां जैसे कि हंसिया के आकार की रक्त कोशिका में होने वाली रक्तहीनता, गोलककोशिकता और ग्लूकोज 6-फॉस्फेट डिहाइड्रोजनेज की कमी कोशिका अपघटन में वृद्धि उत्पन्न कर सकती है और इसलिए रुधिरलायी (रक्तलायी) पीलिया यानि हीमोलाईटिक पीलिया / Hemolytic Jaundice हो सकता है. आमतौर पर, गुर्दे की बीमारियां, जैसे कि रुधिरलायी (रक्तलायी) यूरीमिया / Hemolytic Uremia जनित संलक्षण से वर्णता भी हो सकती है. बिलीरूबिन के चयापचय में विकार होने से भी पीलिया हो सकता है…!
पीलिया में आम तौर पर उच्च तापमान के साथ बुखार आता है. चूहे के काटने से होने वाले बुखार (संक्रामी कामला) यानि Rat Bite Fever से भी पीलिया हो सकता है.

प्रयोगशाला के निष्कर्षों में शामिल हैं:

मूत्र: बिलीरूबिन उपस्थित नहीं, यूरोबिलीरूबिन > 2 इकाइयां (शिशुओं को छोड़कर जिनमें आंत वनस्पतिविकसित नहीं हुई है.सीरम: बढ़ा हुआ असंयुग्मितबिलीरूबिन.प्रमस्तिष्कीनवजातकामला (Kernicterus) बढ़े हुये बिलीरूबिन से संबंधित नहीं है।

यकृत में होने वाला

यकृत में होने वाला पीलिया गंभीर यकृतशोथ (हैपेटाइटिस), यकृत की विषाक्तता और अल्कोहल संबंधी यकृत रोग का कारण बनता है, जिसके द्वारा कोशिका परिगलन यकृत के चयापचय करने की क्षमता और रक्त का निर्माण करने के लिये बिलीरूबिन उत्सर्जित करने की क्षमता कम करता है..!
कम आम कारणों में शामिल हैं प्राथमिक पित्त सूत्रणरोग, (primary biliary cirrhosis), गिल्बर्ट संलक्षण (बिलीरूबिन के चयापचय से संबंधित एक आनुवांशिक बीमारी जिससे हल्का पीलिया हो सकता है, जो लगभग 5% आबादी में पायी जाती है), क्रिग्लर-नज्जर संलक्षण ( संलक्षण का मतलब Syndrome है मित्रों ), विक्षेपी कर्कटरोग (कार्सिनोमा) और नाइमैन-पिक रोग, वर्ग (टाइप) सी, नवजात शिशु में पाया जाने वाला पीलिया, जिसे नवजात पीलिया कहा जाता है, आमतौर पर प्राय: प्रत्येक नवजात शिशु में होता है क्योंकि संयोग और बिलीरूबिन के उत्सर्जन के लिये यकृत संबंधी रचनातंत्र लगभग दो सप्ताह तक की आयु के पहले पूर्ण रूप से परिपक्व नहीं होता है…!!

प्रयोगशाला के निष्कर्षों में शामिल हैं:

मूत्र: संयुग्मितबिलीरूबिन उपस्थित,यूरोबिलिरूबिन > 2 इकाइयां लेकिन परिवर्तनीय (सिवाय बच्चों में). प्रमस्तिष्की नवजात कामला/पीलिया (Kernicterus) बढ़े हुये बिलीरूबिन से संबंधित नहीं है…!!

यकृत के बाहर होने वाला

यकृत के बाहर होने वाला पीलिया, जिसे प्रतिरोधात्मक पीलिया भी कहा जाता है, पित्त प्रणाली में पित्त की निकासी में होने वाले अवरोधों के कारण होता है. सबसे आम कारण हैं आम पित्त नली में पित्त पथरी (Gall Bladder Stone) का होना और अग्न्याशय के शीर्ष पर अग्नाशयी कैंसर ( Pancreatic Cancer) होना,, इसके अलावा परजीवियों (Parasites) का एक समूह, जिन्हें “यकृत परजीवी” / Liver Cysts / Liver Cystic Parasites कहा जाता है आम पित्त नली में रह सकते हैं, जो प्रतिरोधात्मक पीलिया उत्पन्न कर सकते हैं,,अन्य कारणों में आम पित्त नली के स्रोत में अवरोध, पित्त अविवरता, नलिका संबंधी कार्सिनोमा, अग्न्याशयशोथ और अग्नाशयी कूटकोशिका (pancreatic pseudocysts) शामिल हैं. प्रतिरोधात्मक पीलिया का एक असाधारण कारण मिरिज़्ज़ि संलक्षण (Mirizzi’s syndrome) है.

पीले मलों और काले मूत्र की उपस्थिति एक प्रतिरोधात्मक या यकृत के बाहर होने वाले कारण को सूचित करता है क्योंकि सामान्य मल को पित्त वर्णक से रंग प्राप्त होता है.

रोगियों में कभी-कभी अत्यधिक सीरम कोलेस्ट्रॉल उपस्थित रह सकता है, और वे अक्सर गंभीर खुजली या “खाज” की शिकायत करते हैं.

कोई भी एक जांच पीलिया के विभिन्न वर्गीकरणों के बीच अंतर स्पष्ट नहीं कर सकता है. यकृत के कार्य परीक्षणों का मिश्रण एक निदान पर पहुंचने के लिए आवश्यक है.

नवजात (शिशु) संबंधी पीलिया यानि Neonatal Jaundice

नवजात (शिशु) संबंधी पीलिया आमतौर पर हानिरहित होता है: यह अवस्था अक्सर नवजात शिशुओं में जन्म के बाद लगभग दूसरे ही दिन देखी जाती है. यह अवस्था सामान्य प्रसवों में 8वें दिन तक रहती है, या समय से पहले जन्म होने पर 14वें दिन तक रहती है. सीरम बिलीरूबिन बिना किसी आवश्यक हस्तक्षेप के निम्न स्तर तक चला जाता है: पीलिया संभवतः जन्म के बाद एक चयापचय और शारीरिक अनुकूलन का परिणाम है. चरम स्थितियों में, मस्तिष्क को नुकसान पहुंचाने वाली स्थिति मस्तिष्कीनवजातकामला (Kernicterus) उत्पन्न हो सकती है, जिससे महत्वपूर्ण आजीवन अपंगता हो सकती है. इस बात की चिंता की जा रही है कि अपर्याप्त खोज और नवजात बिलीरूबिन की अधिकता के अपर्याप्त उपचार के कारण हाल के वर्षों में यह स्थिति बढ़ती जा रही है. आरंभिक उपचार में अक्सर शिशु को गहन प्रकाशचिकित्सा (Photo Therapy) के संसर्ग में लाया जाता है…!

आशावान हूँ कि पीलिया / Jaundice से संबंधित यह संकलित सामग्री व जानकारी आप मित्रों हेतु ज्ञानवर्धक साबित हो सकेगी …स्वस्थ रहें,  निरोगी हों प्रसन्नचित्त रहें ..!
Always Precautions are better than cure…!

वन्दे मातरम्

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2 Comments Add yours

  1. VINAY THANVI says:

    SADAR CHARAN SPARSH
    JAI SHREE KRISHNA
    AAPKE MARG DARSAN SE MERA PILIYA ROG JALDI HI THEEK HO GYA

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    1. sudhirvyas says:

      सदैव शुभैच्छु
      मंगलकामनाऐं विनय जी

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