द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान फ्रांस में फ्रांसिसियों द्वारा भारतीय सैनिकों और आजाद हिंद फौज के इंडियन लीजन की तीनों कंपनियों का नरसंहार


जयदीप शेखर की पुस्तक नाज ऐ हिन्द के अनुसार अब यह ऐतिहासिक तथ्य भी हम सब के समक्ष है कि नेताजी के जर्मनी छोड़ने के बाद ‘इण्डियन लीज़न’ का क्या हुआ?

नेताजी के जाने के दो महीने बाद इण्डियन लीजन को हॉलैण्ड के समुद्र तट पर समुद्री लड़ाई के प्रशिक्षण के लिए भेजा जाता है। कुछ सैनिक विरोध करते हैं कि उन्हें पूर्व में लड़ने जाना है तो पश्चिम में क्यों भेजा जा रहा है। वे इस बात पर भी नाराज हैं कि नेताजी उन्हें छोड़ गये। उन्हें समझाया जाता है कि नेताजी की इच्छानुसार उन्हें ‘समुद्री लड़ाई’ के प्रशिक्षण के लिए हॉलैण्ड भेजा जा रहा है, और नेताजी उन्हें छोड़ नहीं गये हैं, बल्कि एक खास मिशन पर हैं। अनुशासन के लिए खुला विरोध करनेवाले सैनिकों के रिंगलीडर पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाती है।

पाँच महीनों के बाद उन्हें हथियारों के खास प्रशिक्षण के लिए फ्राँस भेजा जाता है, जहाँ वे दस महीनों तक रहते हैं। फील्ड मार्शल रोमेल (Rommel) यहाँ एक बार लीज़न को देखकर उनकी क्षमताओं की प्रशंसा करते हैं।

’44 के बसन्त में लीज़न की (तीन में से) एक कम्पनी को इटली भी भेजा जाता है।

जून’ 44 में मित्र राष्ट्र द्वारा फ्राँस के नॉर्मण्डी के तट पर ‘डी-डे’ की कार्रवाई के बाद लीजन को वापस जर्मनी लौटने के लिए कहा जाता है। रास्ते में फ्राँसीसी भूमिगत गुरिल्ले जर्मन सैनिकों के साथ इन्हें भी निशाना बनाते हैं। ब्रिटिश और फ्रेंच सेनाओं के साथ बहादूरी पूर्वक कई लड़ाईयाँ भी ये लड़ते हैं।

इसी दौरान इन भारतीय सैनिकों को ब्रिटिश सेना में आने का लालच दिया जाता है- कुछ छोड़कर जाते भी हैं, मगर उन्हें फ्राँसीसी सैनिकों द्वारा भरे बाजार में (जर्मन युद्धबन्दियों के साथ) गोली मार दी जाती है।

’44-‘45 की सर्दियों में लीज़न को पहले दक्षिणी जर्मनी के एक शान्त गाँव में और फिर ह्यूबर्ग के किले में रखा जाता है।

फरवरी’ 45 में जर्मनी का पतन आरम्भ हो जाता है- पश्चिम से मित्र राष्ट्र की, और पूर्व से रूसी सेनाएँ जर्मनी में प्रवेश करती हैं।

मार्च में दुर्ग छोड़कर लीज़न अल्पाईन दर्रे से होकर स्वीजरलैण्ड जाने की कोशिश करता है। बर्लिन मुख्यालय से उनका सम्पर्क टूट जाता है।

7 मई 45 को जर्मनी के आत्म समर्पण के बाद इन भारतीय सैनिकों को अमेरिकी तथा फ्राँसीसी सेनाओं द्वारा बन्दी बना लिया जाता है। अमेरिका अपने बन्दियों को तो ब्रिटेन को सौंप देता है, जो भारत के युद्धबन्दी शिविरों में पहुँच जाते हैं, मगर फ्राँसीसी सेना लीजन के ज्यादातर सैनिकों को गोली मार देती है।

जो बचते हैं, वे फ्राँस की जेलों में कष्टदायक मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार, ‘इण्डियन लीजन’, (अर्थात् जर्मन सेना की 950वीं भारतीय वाहिनी / 950th  Indian  Regiment) की गाथा समाप्त होती है। 

Dr. Sudhir Vyas

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