मांसाहार – प्रभावी या दुष्प्रभावी ( भारतीय परिप्रेक्ष्य में)


भारतवर्ष योग और आयुर्वेद विज्ञान की जन्मभूमि है. योग का उद्देश्य सात्विक गुणों की व्रदधि करना है जिससे हम मुक्त हो सकें. ऐसा भारतीय संस्कृति में सैकड़ों वर्षं से माना जा रहा है. भारतीय परम्परा में ऐसी मान्यता है कि हम जो खाते हैं वैसे ही हम बन जाते हैं. (जैसा खावे अन्न; वैसा होवे मन).आहार के घटकों में सात्विक, राजसिक और तामसिक भोजन होते हैं. शरीर की साम्यावस्था और अलर्ट रहने का ही नाम सत्व गुण है. मीट से शरीर में राजसिक और तामसिक गुण बढता है अर्थात ताजगी और साम्यावस्था नहीं आती है.चूँकि मांस भक्षण बहुत से अन्य भोजन तामसिक गुणों को बढ़ावा देते हैं और सात्विक गुणों की कमी कर देते है; जो कि भारतीय परम्परा के लिए अनुपयुक्त है इसीलिए भारत के अधिकाँश लोग शाकाहारी हैं !! 

चरक के अनुसार मांसाहार शरीर को पोषण देता है. ऋषि चरक ने कभी कभी मांस खाने का उल्लेख किया है. लेकिन वो मांस खाने के लिए कुछ विशेष अवस्थाओं में ही करते हैं. जैसे शारीरिक क्षय, अति क्षीण या कमजोरी के कारण मांसपेशियां कार्य करने में समर्थ हो जाएँ. परन्तु केवल और केवल मांसाहार मूल आयुर्वेदिक सिद्धांतों शामिल नहीं है.
ये मांस भक्षण ऐसा नहीं है जैसा आजकल हो रहा है. ये रोग की गम्भीरता पर निर्भर था कि किसी रोगी को मांस दिया जाना चाहिए या नहीं. चरक के समय के जानवर फ़ार्म हाउस में नहीं रखे जाते थे और न ही उन्हें कृत्रिम रूप से सिर्फ मांस भक्षण के लिए पाला जाता था. उस समय जानवर जंगल में विचरते थे और उन्हें खाने के लिए शिकार करके ही मारा जाता था.
लेकिन आज के माहौल से हम तुलना करें तो आज मांस खाने के लिए अधिकाँश जानवरों को उनके मूल स्थान जंगल से उठा कर फार्म हाउस में पाला जा रहा है. साथ ही साथ मांस बढ़ाने के लिए उन्हें केमिकल रुपी जहर की खुराक खाने और इंजेक्शन के द्वारा दी जा रही है.
तो आज के परिपेक्ष्य में मांस खाना चरक के तर्क से वैसे भी अनुचित साबित हो जाता है. मेरे विचार से मांस का भक्षण उसी रोगी के लिए उचित है जहाँ शाकाहारी / हर्बल उपाय उसके जीवन को बचाने के लिए सीमित संख्या में उपलब्ध हों.
आयुर्वेद के अनुसार जो प्राक्रतिक तत्व जिस क्षेत्र में अधिक पाए जाते हैं उन प्राकृतिक तत्वों का बाहुल्य भी उस क्षेत्र में पाए जाने वाले जीवों में होता है. उदाहरण के लिए जलीय वातावरण में रहने वाले जीवों का मांस शुष्क क्षेत्र में रहने वाले जीवों के मांस से ज्यादा नम और भारी होगा. चरक के अनुसार अगर कोई जानवर अपने प्राकृतिक वातावरण में नहीं रह रहा है या उस भोगौलिक क्षेत्र का मूल निवासी नहीं है या किसी किसी ऐसे वातावरण में शिकार किया गया है जहाँ का माहौल उस के अनुरूप नहीं है या पशु विषाक्त है तो ऐसे मांस को नहीं खाना चाहिये.

 आयुर्वेद में तीन तरह की शारीरिक प्रकृतियाँ पायी जाती हैं – वात, पित्त और कफ. वातिक प्रकार के लोग शारीरिक दृष्टिकोण से पतले होते हैं और अल्प बल वाले होते हैं. पित्त प्रकृति वाले लोग ऊष्ण प्रकृति और अम्लता युक्त होते हैं. कफ प्रकृति के लोग स्थूल शारीरिक संघनन के होते है तो फिर अगर जीभ की लोलुपता के कारण लोग मांस खाना नहीं छोड़ पा रहे हैं तो वात प्रकृति के लोगों को ही यह अधिक सूट कर सकता है. पित्त प्रकृति वाले लोग अधिकांश शाकाहारी डाइट पर रहें और कफ प्रकृति वाले लोग भी कभी कभी ही मांस खाए.
आयुर्वेद के अनुसार रोगों की उत्पत्ति का मूल कारण आमाशय से उत्पन्न आम यानी बिना पचा खाना होता है .भारी भोजन को हलके भोजन से पचने में अधिक समय लगता है .हमारा उद्देश्य भोजन के सभी अवयवों को पूरी तरह पचा कर उनको ऊर्जा में परिवर्तित करना होता है. भारी या गरिष्ठ भोजन पचने में अधिक समय लेते हैं और उनसे शरीर और मन में आलस्य और सुस्ती आती है जिसे तामसिक गुण भी कहा जाता है .
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में भी कहा गया है –

When digestion is weak there tends to be a development and proliferation of anaerobic bacteria. The presence of the bacteria promotes the conversion of meat proteins into harmful substances, such as phenol and “pseudo monoamines”

इन pseudo monoamines के कारण तंत्रिका तंत्र के सिग्नल धीमे हो जाते हैं और मांसाहारी लोगों को आलस्य, ज्यादा सुस्ती और मानसिक थकान अधिक महसूस होती है
अंडा और मीट से मनुष्य में आवेग और क्रोध लाने की प्रवृत्ति होती है जिसे हम तामसिक गुण कहते हैं. मेरे विचार से ये गुण इसमें उपस्थित आर्कीडोनिक एसिड जो कि एक उद्दीपक रसायन है इसकी वजह से आते हैं. कुछ जानवरों में स्टीरोइड के इंजेक्शन भी लगाए जाते हैं, इस वजह से मनुष्य में भी ज्यादा आवेश और राजसिक गुणों का अधिक होना देखने को मिलता है .
भोजन श्रंखला में जानवर अंतिम स्थान पर आते हैं . इनके शरीर में कीटनाशक और अनेक तरह के केमिकल का संचय पहले से ही रहता है. जानवरों को मारते समय उनके शरीर में स्ट्रेस हर्मोने का अत्याधिक रिसाव होता है जिससे हमारे शरीर पर भी अनुचित प्रभाव हो सकता है.
आयुर्वेद का अर्थ है आयु का विज्ञान ; चाहे वो मानव कि आयु हो या फिर पशु की. तो फिर अपने जीवन के लिए जब खाने के और भी साधन उपलब्ध है तो फिर सिर्फ जीभ के स्वाद के लिए किसी और जीव की ह्त्या करने की कोई आवश्यकता नहीं है.
एक बार एक शराबी के सामने एक ग्लास में पानी और एक गिलास में शराब रखी गयी फिर दोनों में एक एक कीड़ा डाला गया. शराब के ग्लास वाला कीड़ा मर गया और पानी के ग्लास वाला कीड़ा ज़िंदा रहा .उससे यह पूछा गया कि बताओ इससे आपने क्या सीखा ;

तो उसने कहा कि इससे हमें यह सीख मिलती है कि हमें रोज़ शराब पीनी चाहिए क्योंकि इससे पेट के कीड़े मर जाते हैं.

यदि लोग आयुर्वेद में मांस खाने की बात के मर्म को नहीं समझ कर इस तथ्य के पीछे पड़के मांसाहार को जस्टिफाई करते है तो इसे मांस खाने की आपकी इच्छा को ऊपर बताई गयी कहानी जैसे ही जस्टिफाई करना समझा जाएगा !!!

मित्रों एक बार सोचिये कि यदि उस निरीह जानवर की जगह आप होते और आपकी गर्दन पकड के कोई काट रहा होता (जैसे कि तालिबान जैसे राक्षस अपने पागलपन को पूरा करने के लिए करते है ) तो आप पर क्या बीतती ?

 गाय-भैंस के मांस की मांग दुनिया के बाजारों में इसलिए भी बढ़ रही है,क्योंकि खाद्य और कृषि संगठन इस मांस को पौष्टिक एवं स्वादिष्ट बताकर इसका प्रचार करने में लगा है। इसे चर्बीरहित तथा सुअर की तुलना में इसमें कम फैट होने का प्रचार किया जा रहा है। जाहिर है, इसकी मांग और बिक्री बढ़ रही है। नतीजतन पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बंगाल और केरल में इस मांस के निर्यात का कारोबार खूब फल-फूल रहा है। इन प्रदेशों में वैध और अवैध दोनों ही तरह के बूचड़खानों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ढाई सौ से तीन सौ रूपए के किलो के भाव पर गाय-भैंसें तौल कर थोक में बेची जा रही हैं। इस बजह से पशुधन के चोरी के मामले भी पूरे देश में तेजी से बढ़ रहे हैं। यही नहीं एक समय 30 रूपए किलो बिकने वाला यह मांस अब 300 रूपए किलो तक बेचा जा रहा है। नतीजतन मांस खाने शौकीन गरीब की हैसियत इसे खरीदकर खाने की रह ही नहीं गई है।

इस मांस के बढ़ते कारोबार के चलते पशुधन के घटने का सिलसिला तेज हुआ है। गोया, दुग्ध उत्पादन में कमी अनुभव की जाने लगी है, जिसकी भरपाई नकली दूध से की जा रही है। जो नई-नई बीमारियां परोसने का काम कर रहा है। दूध की दुनिया में सबसे ज्यादा खपत भारत में है। देश के प्रत्येक नागरिक को औसतन 290 ग्रा. दूध रोजाना मिलता है। इस हिसाब से कुल खपत प्रतिदिन 45 करोड़ लीटर दूध की हो रही है। जबकि शुद्ध दूध का उत्पादन करीब 15 करोड़ लीटर ही है। मसलन दूध की कमी की पूर्ति सिंथेटिक दूध बनाकर और पानी मिलाकर की जा रही है। यूरिया से भी दूध बनाया जा रही है। दूध की लगातार बढ़ रही मांग के करण मिलावटी इस दूध का कारोबार गांव-गांव फैलता जा रहा है। बहरहाल, मिलावटी दूध के दुष्परिणाम जो भी हों, इस असली-नकली दूध का देश की अर्थव्यवस्था में योगदान एक लाख 15 हजार 970 करोड़ रूपए का है। दाल और चावल की खपत से कहीं ज्यादा दूध और उसके सह उत्पादों की मांग व खपत बढ़ी है।

दूध की इस खपत के चलते दुनिया के देशों की निगाहें भी इस व्यापार को हड़पने में लगी है। दुनिया की सबसे बड़ी दूध का कारोबार करने वाली फांस की कंपनी लैक्टेल है। इसने भारत की सबसे बड़ी हैदराबाद की दूध डेयरी ‘तिरूमाला डेयरी‘को 1750 करोड़ रूपए में खरीद लिया है। इसे चार किसानों ने मिलकर बनाया था। भारत की तेल कंपनी ऑइल इंडिया भी इसमें प्रवेश कर रही है, क्योंकि दूध का यह कारोबार 16 फीसदी की दर से हर साल बढ़ रहा है।

अमेरिका भी अपने देश में बने सह उत्पाद भारत में खपाने की तिकड़म में है। हालांकि फिलहाल उसे सफलता नहीं मिली है। अमेरिका चीज;पनीर भारत में बेचना चाहता है। इस चीज को बनाने की प्रक्रिया में बछड़े की आंत से बने एक पदार्थ का इस्तेमाल होता है। इसलिए भारत के शाकाहरियों के लिए यह पनीर वर्जित है। गो-सेवक व गउ को मां मानने वाला भारतीय समाज भी इसे स्वीकार नहीं करता। अमेरिका में गायों को मांसयुक्त चारा खिलाया जाता है,जिससे वे ज्यादा दूध दें। हमारे यहां गाय-भैंसें भले ही कूड़े-कचरे में मुंह मारती फिरती हों, लेकिन दुधारू पशुओं को मांस खिलाने की बात कोई सपने में भी नहीं सोच सकता। लिहाजा अमेरिका को चीज बेचने की इजाजत नहीं मिल पा रही है। लेकिन इससे इतना तो तय होता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों की निगाहें हमारे दूध के कारोबार को हड़पने में लग गई हैं।

बिना किसी सरकारी मदद के बूते देष में दूध का 70 फीसदी कारोबार असंगठित ढांचा संभाल रहा है। इस कारोबार में ज्यादातर लोग अशिक्षित हैं। लेकिन पारंपरिक ज्ञान से न केवल वे बड़ी मात्रा में दुग्ध उत्पादन में कामयाब हैं, बल्कि इसके सह उत्पाद दही, घी, मख्खन, पनीर, मावा आदि बनाने में भी मर्मज्ञ हैं। दूध का 30 फीसदी कारोबार संगठित ढांचा,मसलन डेयरियों के माध्यम से होता है। देश में दूध उत्पादन में 96 हजार सहकारी संस्थाएं जुड़ी है। 14 राज्यों की अपनी दूध सहकारी संस्थाएं हैं। देष में कुल कृशि खाद्य उत्पादों व दूध से जुड़ी प्रसंस्करण सुविधाएं महज दो फीसदी है, किंतु वह दूध ही है,जिसका सबसे ज्यादा प्रसंस्करण करके दही, घी, मक्खन, पनीर आदि बनाए जाते हैं। इस कारोबार की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इससे सात करोड़ से भी ज्यादा लोगों की अजीविका जुड़ी है। लिहाजा मांस के कारोबार को प्रोत्साहित करके दुधारू पशुओं को बूचड़खाने में काटने का सिलसिला यथावत बना रहता है तो यह वाकई चिंतनीय पहलू है ? इस पर अंकुश लगाने की जरूरत है। बूचड़खानों में काटने के लिए केवल वही मवेशी ले जाए  जाएं जो बूढ़े हो चुके हैं, जिन्होंने दूध देना बंद कर दिया है।

चंद पूर्वग्रही, दुधारू मवेशियों की सुरक्षा को अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक दृष्टि से देखते हुए मुस्लिम हित प्रभावित होने की बात को तूल दे रहे हैं। दुधारू पशुओं को पालने और दूध के व्यापार से ग्रामीण मुसलमान भी जुड़ा है। बकरियों के कारोबार में तो मुस्लिमों की बहुतायत है। इसके विपरीत हिंदुओं में खटीक समाज के लोग भी मांस का व्यापार करते हैं। निर्यात के कारोबार से भी ये लोग जुड़े हैं। ज्यादातर बूचड़खानों के मालिक भी हिंदू हैं। लिहाजा इस मुद्दे को भाजपा के नरेद्र मोदी ने उठाया है, महज इसलिए इसे सांप्रदायिक चश्मे से देखना नाइंसाफी है। जो पशुधन आजीविका के मजबूत संसाधन से जुड़ा है, उसे मांस के लिए मारने के नतीजे भविष्य में घातक साबित होंगे। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान गाय मारकर चमड़ा बनाने की शुरूआत अंग्रेजों ने की थी,जिसका व्यापक विरोध हुआ था। वैसे भी गाय समेत अन्य पशुधन पर ही हमारी कृषि व्यवस्था निर्भर है, लिहाजा गुलाबी क्रांति पर लगाम कसना समय की मांग है।

यदि आदमी पशु – पक्षियों को भेजन और संरक्षण देता है, तो वे इस बदले में दूध देते हैं, खेती करते हैं, भार ढ़ोते हैं, खाद देते हैं, ऊन देते हैं, पौधों का फलीकरण करते हें, अनेकविध मनोरंजन करते हैं और मरे बाद भी हड्डी और 

चमड़ा प्रदान करते हैं। “गौ हमारी माता है, बैल हमारा बाप है” यह उक्ति भी यही बताती है कि परिवार का आधार भी पशु है और व्यापार का आधार भी पशु ही है।

फिर जब हमें जीने का हक है, तो उनको क्यों नहीं ?
मनुज प्रकृति से शाकाहारी, मांस उसे अनुकूल नहीं है।
पशु भी मानव – जैसा प्राणी, वह मेवा – फल – फूल नहीं है।

सब छोड़ के जाना है, क्यों पाप कमाते हो!
पानी पीते हो ? हाँ, पूर्णतः बैक्टीरिया-रहित, मिनरल वाटर !
और मांस खाते हो ? हाँ ।
कितना घिनौना। प्रदूषित। रोगों का हवाई अड्डा ।
जी हाँ, मांस ऐसे ही तैयार होता है।
कत्लखानों का वातावरण बड़ा गन्दा और डरावना होता है।
जिधर देखो, उधर ही खून और मल-मूत्र की दलदल तथा 
मांस, हड्डी, खुर, सींग, आँतें, कटे सिर व खून में लथपथ बालों के ढेर।

आंकड़े बोलते हैं
भारतवर्ष में प्रतिदिन कटने वाले पशु – 4 लाख
भारतवर्ष में प्रतिदिन कटने वाले पक्षी  – 40 लाख
अर्थात्‌ हर मिनट में – 275 पशु और 6250 पक्षी
आजादी से पूर्व भारत में कत्लखाने – 360
आजादी के बाद आधुनिक भारत में कत्लखाने – 40000 से ऊपर
 

वाह री तरक्की। छीः छीः ॥
आज अहिंसा की धरा पर, हिंसा का तांडव छा गया।
प्रभु ऋषभ के बैल को, शिव जी के नन्दी को, कृष्ण की गायों को कत्लखाना खा गया।

क्या आप जानते हैं कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) ने कत्लखानों में मारे जाने वाले पशुओं में कफ, न्यूमोनिया, कैंसर, अल्सर, टी.बी., पेचिश, जोड़ दर्द, दमा, हृदय की क्लोटिंग आदि 160 रोगों का पता लगाया है ?

शरीर विज्ञान की दृष्टि से मांसाहारी और शाकाहारी जीवों की संरचना में मूलभूत अन्तर होता है
 
मनुष्य शाकाहारी वर्ग का सदस्य है, मांस उसका प्राकृतिक भोजन नहीं है। मांस स्वयं में जैव पदार्थ है और अन्य करोड़ों जैव पदार्थों-जीवाणु, विषाणु और परजीवी का घर है। साल्मोनैला, कैम्पिलोबैक्टर, क्लोस्ट्रिडियम – बोटुलिनियम (भोजन को विषाक्त बनाने वाला), यरसीनिया- एन्ट्रो कोलोटिका (पेट में सूजन कर्त्ता), इ.कोलाइ (मूत्रमार्ग में सन्दूषण – कर्त्ता) लिस्टीरिया (फोड़े फुंसी करने वाला) जीवाणु मांस के प्रमुख मेहमान हैं। प्रयोगों से सिद्ध हुआ है कि पाँच – पाँच घण्टे तक पानी में उबालने पर भी ये नष्ट नहीं होते, क्योंकि मांस जलावरोधी ओर तापावरोधी होता है।
ब्रिटिश मैडिकल एसोसिएशन ने मांसाहार से उच्च रक्तचाप, हृदय – रोग, मोटापा, बड़ी आंत के रोग, मधुमेह, कैंसर, अस्थिक्षय, एन्जाइना, गठियाबाय, गुर्दे की पत्थरी, अपैण्डिसाइटिस, पौष्टिक अल्सर, एथरोक्‌लैरोरिस, भोजन विषाक्तता, एसिडिटी, कब्ज, मनोरोग जैसी बीमारियों का होना सिद्ध किया है। सीधा – सपाट निष्कर्ष है :

अधिक मांसाहार : संक्षिप्त जीवन = Heavy Flesh-eating : Shorter Life-expectancy

सण्डे हो या मण्डे, कभी न खाओ अण्डे!

सम्पूर्ण अण्डा  उद्योग बेजुबान मुर्गियों पर अन्तहीन क्रूरता और अत्याचार के आधार पर टिका है। एक दिन के चूजों को निरन्तर उच्च प्रोटिन – युक्त आहार (Meat, meal, bone meal, fish meal, सोयाबीन, मक्का आदि) खिलाकर शीघ्र जवान बनाया जाता है। फिर उन्हें भीड़ – भरे, बदबूदार, जालीदार फर्श वाले मुर्गीखानों में, मालगोदाम की तरह ठूंस – ठूंस कर रखा जाता हैं (20×20 इंच लम्बे-चौड़े पिंजरों में चार या पांच मुर्गी)। ऐसी दर्दनाक स्थिति में दिन रात रहने से मुर्गियाँ पागल होकर चीखती हैं, चिल्लाती हैं, पंख नोचती हैं और एक दूसरे को मार डालने व कच्चा ही खा डालने की कोशिश करती हैं। इस परिस्थिति में निबटने के लिए फैक्ट्री वाले लोहे के गर्म ब्लेड से उनकी चोंच काट देते हैं। घोर हताशा में जब वे पंजों से लड़ती हैं तो उनके पंजे भी काट दिए जाते हैं।
वजन बढ़ाने व अधिक अण्डे देने के लिए मुर्गीदाने में शुरू से आखिर तक सल्फा दवाओं, आर्सैनिक कम्पाउण्ड, हार्मोनवर्धक व न्यूट्रोफुरान दवाओं तथा एण्टीबाइटिक दवाओं का भरपूर प्रयोग किया जाता है। एक मुर्गी की पूर्ण आयु 10 से 12 वर्ष तक होती है। पर 6 मास के होते-होते वह अण्डा देने लगती है, डेढ़ साल तक वह अण्डे देती है, फिर दो वर्ष की होने पर उसे कटने के लिए होटलों और कत्लखानों में सप्लाई कर दिया जाता है।
कई भोले-भाले लोग अण्डे को शाकाहारी, मशीनी, निर्जिव या ‘राम लड्डू’ कहते हैं, पर तथ्य ये नहीं है। शाकाहार वह है, जो पेड़-पौधों के ऊपर लगे। पर अण्डा तो मुर्गी के योनिमार्ग से पैदा होता है। वह उसका तरल गर्भ है, गर्भ-रस है और अपरिपक्व भ्रूण है। मुर्गी अण्डाश्य से निकली जीवित कोशिका बढ़कर अण्डा बनती है। इसके खोल में 25 से 30 हजार तक सूक्ष्म छिद्र होते हैं, जिनसे यह ऑक्सीजन लेता है और कार्बनडाइआक्साइड छोड़ता है। 30° ऊपर तापमान में रखे जाने पर यह सड़ने लगता है। प्रत्येक सौ ग्राम अण्डा खाने से खून में 450 से 500 mg.तक कोलैस्ट्रोल की वृद्धि होती है, जिससे हृदय-रोग, उच्च रक्तचाप एग्जिमा, एलर्जी, कब्ज, पेचिश, आँतों की सड़न, एसिडिटी जैसी बीमारियाँ जन्म लेती हैं। क्या अण्डा खाने से पहले आपने कभी इन बातों के बारे में सोचा हैं ?

विश्व में शकाहार के बढ़ते चरण
हांलाकि विश्व के काफी बड़े भूभाग में अब भी मांसहार का प्रचलन है, फिर भी शाकाहार की गुणवत्ता और मांसहार के दुष्परिणामों को समझने से दुनिया भर में शाकाहार का प्रचार-प्रसार एक जन आन्दोलन का रूप लेता जा रहा है। अमेरिका, यूरोप, आस्ट्रेलिया और अधिकांश एशियाई देशों में वैजीटेरियन सोसाइटियाँ स्थापित हो रही हैं, जिनकी विस्तृत जानकारीwww.worldanimalnet.com पर उपलब्ध है। PETA, SPCA, PCRM, VRG, SPEAK, CIWF, HFA, BWC, PFA, Earth save foundation, Fund for Animals, American Vegan Societyआदि कई हजारों संस्थाएँ पर्यावरण-सुरक्षा, शाकाहार-प्रोत्साहन और पशु-क्रूरता-निवारण-हेतु काफी सार्थक प्रयास कर रही है।

शाकाहार अब कोई दलितों और पिछड़ों का भोजन नहीं रहा, विश्व के बड़े-बड़े लोग शकाहार अपनाने में गर्व महसूस करने लगे हैं। कुछ प्रमुख ये हैं:- भारत के राष्ट्रपति अब्दुल कलाम, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अलगोर, सर पाल मैकार्टन, पामेला एंडरसन, माइकल जैक्सन, अमिताभ बच्चन, जान अब्राहम, हेमा मालिनी, गायिका मैडोना, लंबी दौड़ में 20 विश्व रिकार्डधारी नुर्मी, इंगलिश चैनल पार करने में रिकार्डधारी मुर्रे-रोज, ट्रायथलोन में विश्व रिकार्डधारी सिक्स्टो लिनेयर्स, 400 मीटर बाधा-दौड़ में ओलम्पिक स्वर्णविजेता एडविन मोसेस, नौ बार की बिम्बल्डन विजेता मार्टिना नवरातिलोवा, नौ बार के ओलम्पिक स्वर्ण-विजेता विख्यात धावक कार्ल लुइस, स्पिन गेंदबाज अनिल कुम्बले पूर्णतः शाकाहारी हैं। पर्यावरण की सुरक्षा-हेतु मांसाहार त्यागिए और शुद्ध सात्विक शाकाहार अपनाइए। प्रसिद्ध अमेरिका अभिनेता Aleac Baldwin के शब्दों में:- Every time we sit down to eat, we make a choice. Please choose vegetarianism. Do it for animals. Do it for environment and do it for your health.
 मक्का और सोयाबीन की खेती के तीव्र प्रसार में आधुनिक पशुपालन की मुख्य भूमिका रही है। आज दुनिया में पैदा होने वाला एक-तिहाई अनाज जानवरों को खिलाया जा रहा है, जबकि भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। अमेरिका में दो-तिहाई अनाज व सोयाबीन पशुओं को खिला दिया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार दुनिया की मांस खपत में मात्र 10 प्रतिशत की कटौती प्रतिदिन भुखमरी से मरने वाले 18 हजार बच्चों व 6 हजार वयस्कों का जीवन बचा सकती है।

मांस उत्पादन में खाद्य पदार्थों की बड़े पैमाने पर बर्बादी भी होती है। एक किलो मांस पैदा करने में 7 किलो अनाज या सोयाबीन की जरूरत पड़ती है। अनाज के मांस में बदलने की प्रक्रिया में 90 प्रतिशत प्रोटीन, 99 प्रतिशत कार्बोहाईड्रेट और 100 प्रतिशत रेशा नष्ट हो जाता है। एक किलो आलू पैदा करने में जहां मात्र 500 लीटर पानी की खपत होती है, वहीं इतने ही मांस के लिए 10,000 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। स्पष्ट है कि आधुनिक औद्योगिक पशुपालन के तरीके से भोजन तैयार करने के लिए काफी जमीन और संसाधनों की जरूरत होती है। इस समय दुनिया की दो-तिहाई भूमि चरागाह व पशु आहार तैयार करने में लगा दी गई है। जैसे-जैसे मांस की मांग बढ़ेगी, वैसे-वैसे पशु आहार की खेती बढ़ती जाएगी, और इससे ग्रीनहाउस गैसों में भी तेजी से बढ़ोतरी होगी।
जब हम जीव हत्या बिना सोचे समझे अपना व्यापार समझकर करेंगे और कुछ सिक्कों के लाभ को ही लक्ष्य मानेंगे तो हमारी मानसिकता से अहिंसा, दया करूणा, क्षमा का तत्व कैसे प्रवेश पायेगा। इन स्थितियों में तो हिंसा की मानसिकता वैसे ही फलेगी फूलेगी जैसे वर्षा से दादूर या घास फैलती है। इस हिंसा का परिणाम भी हमें ही भुगतना पड़ेगा। आज जो बात -बात में हत्या, बलात्कार, अपहरण, दहेज हत्याएं, तन्दूरकाण्ड, हथियार काण्ड हो रहे हैं। वह तामसी प्रवृत्ति के मांस भक्षण का परिणम भी है जिस पर हमारा ध्यान नहीं जा रहा है। दूरदर्शन व फिल्मों में जो हिंसा का बोलबाला, कामुकता का प्रभाव दिखाई दे रहा है वह भी इस तामसी भोजन का प्रभाव माना जा सकता है। हिंसा के लिए गरीबी, बेकारी, भुखमरी को कारण मानना उचित नहीं है। जब देश इन परिस्थितियों में रहा तब भी अपनत्व, प्रेम, भाईचारा रहा। अब विकास के कारण सारे देश की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है अत: हिंसा का मूल कारण न धार्मिक है और न आर्थिक।
हिंसा के व्यापक विस्तार का कारण जीव हिंसा, मांस भक्षण की तामसी प्रवृत्ति व उसका मानसिक प्रभाव है। जब तक हम सात्विक भोजन की ओर नहीं बढ़ेंगे अपनत्व भरा वातावरण नहीं बन पावेगा। हम चाहे जितने सभा-सम्मेलन कर लें, जड़ है मांस भक्षण की तामसी प्रवृत्ति।

इसलिए आइये हम सब भारत की परम्पराओं के अनुरूप जब तक संभव हो शाकाहार अपनाएँ और सिर्फ जीभ के स्वाद के लिए किसी की ह्त्या करके उसका जीवन नष्ट न करें.

“सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः । 

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ॥“

Dr. Sudhir Vyas

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