अकबर था ‘महान’ या असल “शैतान” …??


जवाहर लाल नेहरु द्वारा लिखित, बहुत प्रशंसित, ऐतिहासिक मिथ्या कथा, ”डिस्कवरी ऑफ इण्डिया” में जिस इस्लामी धूर्त व क्रूर को अकबर ‘महान’ कहकर स्वागत व प्रशांसित किया गया वह वास्तविकता में एक धुरीय, व्यक्तित्व है, जो मार्क्सिटस्ट ब्राण्ड के सैक्यूलरिस्टों के लिए, आनन्द व उल्लास का स्रोत हैं इन मैकौलेवादी व मार्क्सिस्टों की जाति के, इतिहासकारों, द्वारा इस (अकबर) को एक सर्वाधिक परोपकारी उदार, दयालु, सैक्यूलर और ना जाने किन-किन गुणों से सम्पन्न शहंशाह के रूप में चित्रित किया गया है,,किंतु अकबर को उसी के जीवनीकारों और उसी के लिखवाये गये इतिहास से ज्यादा अच्छे से समझा जा सकता है…

हमने अपना बहुमूल्य समय अपनी शक्ति से, सर्वोत्तम ढंग से जिहाद, (घिज़ा) युद्ध में ही लगा दिया है और अमर अल्लाह के सहयोग से, जो हमारे सदैव बढ़ते जाने वाले साम्राज्य का सहायक है, अविश्वासियों के अधीन बस्तियों निवासियों, दुर्गों, शहरों को विजय कर अपने अधीनकरने में लिप्त हैं, कृपालु अल्लाह उन्हें त्याग दे और तलवार के प्रयोग द्वारा इस्लाम के स्तर को सर्वत्र बढ़ाते हुए, और बहुत्ववाद के अन्धकार और हिंसक पापों को समाप्त करते हुए, उन सभी का विनाश कर दे। हमने पूजा स्थलों को उन स्थानों में मूर्तियों को और भारत के अन्य भागों को विध्वंस कर दिया है,, अल्लाह की ख्याति बढ़े जिसने, हमें इस उद्देश्य के लिए, मार्ग दिखाया और यदि अल्लाह ने मार्ग न दिखाया होता तो हमें इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए मार्ग ही न मिला होता!”

(फतहनामा-ई-चित्तौड़ : अकबर ॥नई दिल्ली, 1972 इतिहास कांग्रेस की कार्य विधि॥ अनु. टिप्पणी : इश्तिआक अहमद जिज्ली पृष्ठ 350-61)

अपने हरम को सम्पन्न व समृद्ध करने के लिए अकबर ने अनेकों हिन्दू राजकुमारियों के साथ बलात शादियाँ की; और वज्रमूर्ख, कुटिल एवम् धूर्त सैक्यूलरिस्टों ने इसे, अकबर की हिन्दुओं के प्रति स्नेह, आत्मीयता और सहिष्णुता के रूप में चित्रित किया हैं किन्तु इस प्रकार के प्रदर्शन सदैव एक मार्गीय ही थे। अकबर ने कभी भी, किसी भी मुगल महिला को,किसी भी हिन्दू को शादी में नहीं दिया।
”रणथम्भौर की सन्धि के अन्तर्गत शाही हरम में दुल्हिन- भेजने की, राजपूतों के स्तर को गिराने वाली, रीति से बूंदी के सरदार को मुक्ति दे दी गई थी।”

उपरोक्त सन्धि से स्पष्ट हो जाता है कि अकबर ने, युद्ध में हारे हुए हिन्दू सरदारों को अपने परिवार की सर्वाधिक सुन्दर महिला को मांगने व प्राप्त कर लेने की एक परिपाटी बना रखी थीं और बूंदी ही इस क्रूर परिपाटी का एक मात्र, सौभाग्यशाली, अपवाद था।

”अकबर ने अपनी काम वासना की शांति के लिए गौंडवाना की विधवा रानी दुर्गावती पर आक्रमण कर दिया किन्तु एक अति वीरतापूर्ण संघर्ष के उपरान्त यह देख कर कि हार निश्चित है, रानी ने आत्म हत्या कर ली। किन्तु उसकी बहिन को बन्दी बना लिया गया। और उसे अकबर के हरम में भेज दिया गया।”
(आर. सी. मजूमदार, दी मुगल ऐम्पायर, खण्ड VII, पृष्ठ बी.वी. बी.)

राणाप्रताप के विरुद्ध अकबर के अभियानों के लिए सबसे बड़ा, सबसे अधिक, सशक्त प्रेरक तत्व था इस्लामी जिहाद की भावना, जिसकी व्याखया व स्पष्टीकरण कुरान की अनेकों आयतों ओर अन्य इस्लामी धर्म ग्रंथों में किया गया है। ”उनसे युद्ध करो, जो अल्लाह और कयामत के दिन (अन्तिम दिन) में विश्वास नहीं रखते, जो कुछ अल्लाह और उसके पैगम्बर ने निषेध कर रखा है उसका निषेध नहीं करते; जो उस पन्थ पर नहीं चलते हैं यानी कि उस पन्थ को स्वीकार नहीं करते हैं जो सच का पन्थ है, और जो उन लोगों को है जिन्हें किताब (कुरान) दी गई है; (और तब तक युद्ध करो) जब तक वे उपहार न दे दें और दीन हीन न बना दिये जाएँ, पूर्णतः झुका न दिये जाएँ।”
(कुरान सूरा 9 आयत 25)

अतः तर्कपूर्वक निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि राजपूत सरदारों और भील आदिवासियों द्वारा संगठित रूप में हल्दी घाटी में मुगलों के विरुद्ध लड़ा गया युद्ध मात्र एक शक्ति संघर्ष नहीं था बल्कि जेहादी इस्लामिक आतंकवाद व आतताईपन के विरुद्ध सशक्त हिन्दू प्रतिरोध ही था।

अकबर के एक दरबारी इमाम अब्दुल कादिर बदाउनी ने अपने इतिहास अभिलेख, ‘मुन्तखाव-उत-तवारीख’ में लिखा था कि 1573 में जब शाही फौंजे राणाप्रताप के विरुद्ध युद्ध के लिए अग्रसर हो रहीं थीं तो उसने (बदाउनीने) ”युद्ध अभियान में सम्मिलित होकर हिन्दू रक्त से अपनी इस्लामी दाड़ी को भिगों लेने के विशिष्ट अधिकार के प्रयोग के लिए इस अवसर पर उपस्थित होने में अपने लिए आदेश प्राप्त करने के लिए शाहन्शाह से भेंट की अनुमति के लिए प्रार्थना की।”

अपने व्यक्तित्व के प्रति इतने सम्मन और निष्ठा, और जिहाद सम्बन्धी इस्लामी भावना के प्रति निष्ठा से अकबर इतना प्रसन्न हुआ कि अपनी प्रसन्नता के प्रतीक स्वरूप मुठ्ठी भर सोने की मुहरें उसने बदाउनी को दे डालीं।
(मुन्तखाब-उत-तवारीख : अब्दुल कादिर बदाउनी, खण्ड II, पृष्ठ 383, वी. स्मिथ, अकबर दी ग्रेट मुगल, पृष्ठ 108)

हल्दी घाटी के युद्ध में एक मनोरंजक घटना हुई। वह विशेषकर अपने सैक्यूलरिस्ट बन्धुओं के निमित्त ही यहाँ उद्धत है – बदांउनी ने लिखा था-
”हल्दी घाटी में जब युद्ध चल रहा था और अकबर से संलग्न राजपूत, और राणा प्रताप के निमित्त राजपूत परस्पर युद्ध रत थे और उनमें कौन किस ओर है, भेद कर पाना असम्भव हो रहा था, तब अकबर की ओर से युद्ध कर रहे बदांउनी ने, अपने सेना नायक से पूछा कि वह किस पर गोली चलाये ताकि शत्रु को ही आघात हो, और वह ही मरे , कमाण्डर आसफ खाँ ने उत्तर दिया था कि यह बहुत अधिक महत्व की बात नहीं कि गोली किस को लगती है क्योंकि सभी (दोनों ओर से) युद्ध करने वाले काफ़िर हैं, गोली जिसे भी लगेगी काफिर ही मरेगा, जिससे लाभ इसलाम को ही होगा।”
(मुन्तखान-उत-तवारीख : अब्दुल कादिर बदाउनी, खण्ड II,अकबर दी ग्रेट मुगल : वी. स्मिथ पुनः मुद्रित 1962,हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ दी इण्डियन पीपुल, दी मुगल ऐम्पायर : सं. आर. सी. मजूमदार, खण्ड VII, पृष्ठ 132 तृतीयसंस्करण, बी. वी. बी.)

अब चलते हैं अकबर की ही ओर और जानते हैं उसकी तथाकथित “महानताओं” को कुछ उसके बेटे सलीम उर्फ शेखू उर्फ जहाँगीर की कलम से तो कुछ बेहतरीन तरीकों से जान पायेंगे उसके जीवनीकार, नवरत्नों में से एक सेनापति व दरबारी मनसबदार अबुल फज़ल से और अकबर की जीवनी “अकबरनामा” तथा ‘आईन ऐ अकबरी’ के संदर्भों से

अबुल फजल ने अकबरनामा में लिखा है- “जब भी कभी कोई रानी, दरबारियों की पत्नियाँ, या नयी लडकियां शहंशाह की सेवा (यह साधारण सेवा नहीं है) में जाना चाहती थी तो पहले उसे अपना आवेदन पत्र हरम प्रबंधक के पास भेजना पड़ता था. फिर यह पत्र महल के अधिकारियों तक पहुँचता था और फिर जाकर उन्हें हरम के अंदर जाने दिया जाता जहां वे एक महीने तक रखी जाती थीं.”

अब यहाँ देखना चाहिए कि चाटुकार अबुल फजल भी इस बात को छुपा नहीं सका कि अकबर अपने हरम में दरबारियों, राजाओं और लड़कियों तक को भी महीने के लिए रख लेता था. पूरी प्रक्रिया को संवैधानिक बनाने के लिए इस धूर्त चाटुकार ने चाल चली है कि स्त्रियाँ खुद अकबर की सेवा में पत्र भेज कर जाती थीं! इस मूर्ख को इतनी बुद्धि भी नहीं थी कि ऐसी कौन सी स्त्री होगी जो पति के सामने ही खुल्लम खुल्ला किसी और पुरुष की सेवा में जाने का आवेदन पत्र दे दे? 

मतलब यह है कि वास्तव में अकबर महान खुद ही आदेश देकर जबरदस्ती किसी को भी अपने हरम में रख लेता था और उनका सतीत्व नष्ट करता था !

यहाँ बकौल अकबरनामा भी यह गौर करना बहुत महत्वपूर्ण है कि – रणथंभौर की संधि में अकबर “महान?” की पहली शर्त यह थी कि राजपूत अपनी स्त्रियों की डोलियों को अकबर के शाही हरम के लिए रवाना कर दें यदि वे अपने सिपाही वापस चाहते हैं !

बैरम खान जो अकबर के पिता तुल्य और संरक्षक था, उसकी हत्या करके इसने उसकी पत्नी अर्थात अपनी माता के तुल्य स्त्री से शादी की..

ग्रीमन के अनुसार अकबर अपनी रखैलों को अपने दरबारियों में बाँट देता था. औरतों को एक वस्तु की तरह बांटना और खरीदना अकबर महान बखूबी करता था…

मीना बाजार जो हर नए साल की पहली शाम को लगता था, इसमें सब स्त्रियों को सज धज कर आने के आदेश दिए जाते थे और फिर अकबर महान उनमें से किसी को चुन लेते थे..!!

नेक दिल’ अकबर “महान” या जीताजागता मुसलमान शैतान ….??

6 नवम्बर 1556 को 14 साल की आयु में ही अकबर ‘महान’ पानीपत की लड़ाई में भाग ले रहा था, हिंदू राजा हेमू की सेना मुग़ल सेना को खदेड़ रही थी कि अचानक हेमू को आँख में तीर लगा और वह बेहोश हो गया, उसे मरा सोचकर उसकी सेना में भगदड़ मच गयी तब हेमू को बेहोशी की हालत में अकबर महान के सामने लाया गया और इसने ‘बहादुरी से’ राजा हेमू का सिर काट लिया और तब इसे गाजी के खिताब से नवाजा गया. (गाजी की पदवी इस्लाम में उसे मिलती है जिसने किसी काफिर को कतल किया हो ऐसे गाजी को जन्नत नसीब होती है और वहाँ सबसे सुन्दर हूरें इनके लिए आरक्षित होती हैं) हेमू के सिर को काबुल भिजा दिया गया एवं उसके धड को दिल्ली के दरवाजे से लटका दिया गया ताकि नए आतंकवादी बादशाह की रहमदिली सब को पता चल सके…इतिहास हत्याकार उसे आजाद भारत में भी महान बता सके..!!

इसके तुरंत बाद जब अकबर महान की सेना दिल्ली आई तो कटे हुए काफिरों के सिरों से मीनार बनायी गयी जो जीत के जश्न का प्रतीक है और यह तरीका अकबर महान के पूर्वजों से ही चला आ रहा है.

हेमू के बूढ़े पिता को भी अकबर महान ने कटवा डाला और औरतों को उनकी सही जगह अर्थात शाही हरम में भिजवा दिया गया…

अबुल फजल अकबरनामा में लिखता है कि खान जमन के विद्रोह को दबाने के लिए उसके साथी मोहम्मद मिराक को हथकडियां लगा कर हाथी के सामने छोड़ दिया गया हाथी ने उसे सूंड से उठाकर फैंक दिया ऐसा पांच दिनों तक चला और उसके बाद उसको मार डाला गया…

चित्तौड़ पर कब्ज़ा करने के बाद अकबर महान ने तीस हजार नागरिकों का क़त्ल करवाया. सब हिंदू थे।

अकबर ने मुजफ्फर शाह को हाथी से कुचलवाया. हमजबान की जबान ही कटवा डाली. मसूद हुसैन मिर्ज़ा की आँखें सीकर बंद कर दी गयीं. उसके 300 साथी उसके सामने लाये गए और उनके चेहरे पर गधों, भेड़ों और कुत्तों की खालें डाल कर काट डाला गया. विन्सेंट स्मिथ ने यह लिखा है कि अकबर महान फांसी देना, सिर कटवाना, शरीर के अंग कटवाना, आदि सजाएं भी देते थे.

2 सितम्बर 1573 के दिन अहमदाबाद में उसने 2000 दुश्मनों के सिर काटकर अब तक की सबसे ऊंची सिरों की मीनार बनायी. वैसे इसके पहले सबसे ऊंची मीनार बनाने का सौभाग्य भी अकबर महान के दादा बाबर का ही था अर्थात कीर्तिमान घर का घर में ही रहा!

अकबरनामा के अनुसार जब बंगाल का दाउद खान हारा, तो कटे सिरों के आठ मीनार बनाए गए थे. यह फिर से एक नया कीर्तिमान था. जब दाउद खान ने मरते समय पानी माँगा तो उसे जूतों में पानी पीने को दिया गया…!!

थानेश्वर में दो संप्रदायों कुरु और पुरी के बीच पूजा की जगह को लेकर विवाद चल रहा था. अकबर ने आदेश दिया कि दोनों आपस में लड़ें और जीतने वाला जगह पर कब्ज़ा कर ले. उन मूर्ख आत्मघाती लोगों ने आपस में ही अस्त्र शस्त्रों से लड़ाई शुरू कर दी. जब पुरी पक्ष जीतने लगा तो अकबर ने अपने सैनकों को कुरु पक्ष की तरफ से लड़ने का आदेश दिया और अंत में इसने दोनों तरफ के लोगों को ही अपने सैनिकों से मरवा डाला और फिर अकबर महान जोर से हंसा.

हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर की नीति यही थी कि राजपूत ही राजपूतों के विरोध में लड़ें. बादायुनी ने अकबर के सेनापति से बीच युद्ध में पूछा कि प्रताप के राजपूतों को हमारी तरफ से लड़ रहे राजपूतों से कैसे अलग पहचानेंगे?
तब उसने कहा कि इसकी जरूरत नहीं है क्योंकि किसी भी हालत में मरेंगे तो राजपूत ही और फायदा इस्लाम का होगा कर्नल टोड लिखते हैं कि अकबर ने एकलिंग की मूर्ति तोड़ी और उस स्थान पर नमाज पढ़ी…!!

एक बार अकबर शाम के समय जल्दी सोकर उठ गया तो उसने देखा कि एक नौकर उसके बिस्तर के पास सो रहा है. इससे उसको इतना गुस्सा आया कि नौकर को इस बात के लिए एक मीनार से नीचे फिंकवा दिया.

अगस्त 1600 में अकबर की सेना ने असीरगढ़ का किला घेर लिया पर मामला बराबरी का था न तो वह किला तोड़ पाया और न ही किले की सेना अकबर को हरा सकी… विन्सेंट स्मिथ ने लिखा है कि अकबर ने एक अद्भुत तरीका सोचा. उसने किले के राजा मीरा बहादुर को आमंत्रित किया और अपने सिर की कसम खाई कि उसे सुरक्षित वापस जाने देगा. तब मीरा बहादुर शान्ति के नाम पर बाहर आया और अकबर के सामने सम्मान दिखाने के लिए तीन बार झुका पर अचानक उसे जमीन पर धक्का दिया गया ताकि वह पूरा लेटकर (दण्डवत होकर ही ) सजदा कर सके क्योंकि अकबर महान को यही पसंद था…उसको अब पकड़ लिया गया और आज्ञा दी गयी कि अपने सेनापति को कहकर आत्मसमर्पण करवा दे ,सेनापति ने मानने से मना कर दिया और अपने लड़के को अकबर के पास यह पूछने भेजा कि उसने अपनी प्रतिज्ञा क्यों तोड़ी.?

तब ऐतिहासिक अकबर ‘महान’ ने बच्चे से पूछा कि क्या तेरा पिता आत्मसमर्पण के लिए तैयार है?
तब बालक ने कहा कि उसका पिता समर्पण नहीं करेगा चाहे राजा को मार ही क्यों न डाला जाए यह सुनकर अकबर महान ने उस बालक को मार डालने का आदेश दिया इस तरह झूठ के बल पर अकबर महान ने यह किला जीता..

यहाँ ध्यान देना चाहिए कि यह घटना अकबर की मृत्यु से पांच साल पहले की ही है. अतः कई लोगों का यह कहना कि अकबर बाद में बदल गया था, एक झूठ बात है.

इसी तरह अपने ताकत के नशे में चूर अकबर ने बुंदेलखंड की प्रतिष्ठित रानी दुर्गावती से लड़ाई की और लोगों का क़त्ल किया…!!

ऐसे इतिहासकार जिनका अकबर दुलारा और चहेता है, एक बात नहीं बताते कि कैसे एक ही समय पर राणा प्रताप और अकबर महान हो सकते थे जबकि दोनों एक दूसरे के घोर विरोधी थे…?

यहाँ तक कि विन्सेंट स्मिथ जैसे अकबर प्रेमी को भी यह बात माननी पड़ी कि चित्तौड़ पर हमले के पीछे केवल उसकी सब कुछ जीतने की हवस ही काम कर रही थी वहीँ दूसरी तरफ महाराणा प्रताप अपने देश के लिए लड़ रहे थे और कोशिश की कि राजपूतों की इज्जत उनकी स्त्रियां मुगलों के हरम में न जा सकें. शायद इसी लिए अकबर प्रेमी जलील भारतीय ‘इतिहासकारों’ ने राणा को लड़ाकू और अकबर को देश निर्माता ‘महान’ के खिताब से नवाजा है..!!

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अकबर महान अगर, राणा शैतान तो
शूकर है राजा, नहीं शेर वनराज है
अकबर आबाद और राणा बर्बाद है तो
हिजड़ों की झोली पुत्र, पौरुष बेकार है
अकबर महाबली और राणा बलहीन तो
कुत्ता चढ़ा है जैसे मस्तक गजराज है
अकबर सम्राट, राणा छिपता भयभीत तो
हिरण सोचे, सिंह दल उसका शिकार है
अकबर निर्माता, देश भारत है उसकी देन
कहना यह जिनका शत बार धिक्कार है
अकबर है प्यारा जिसे राणा स्वीकार नहीं
रगों में पिता का जैसे खून अस्वीकार है…!!

हिन्दुस्तानी मुसलमानों को यह कह कर बेवकूफ बनाया जाता है कि अकबर ने इस्लाम की अच्छाइयों को पेश किया. असलियत यह है कि कुरआन के खिलाफ जाकर 36 शादियाँ करना, शराब पीना, नशा करना, दूसरों से अपने आगे सजदा करवाना आदि करके भी इस्लाम को अपने दामन से बाँधे रखा ताकि राजनैतिक फायदा मिल सके. और सबसे मजेदार बात यह है कि वंदे मातरम में शिर्क दिखाने वाले मुल्ला मौलवी अकबर की शराब, अफीम, 36 बीवियों, और अपने लिए करवाए सजदों में भी इस्लाम को महफूज़ पाते हैं,, किसी मौलवी ने आज तक यह फतवा नहीं दिया कि अकबर या बाबर जैसे शराबी और समलैंगिक मुशरिक मुसलमान नहीं हैं और इनके नाम की मस्जिद हराम है…!!

अकबर ने खुद को दिव्य आदमी के रूप में पेश किया. उसने लोगों को आदेश दिए कि आपस में “अल्लाह ओ अकबर” कह कर अभिवादन किया जाए. भोले भाले मुसलमान सोचते हैं कि वे यह कह कर अल्लाह को बड़ा बता रहे हैं पर अकबर ने अल्लाह के साथ अपना नाम जोड़कर अपनी दिव्यता फैलानी चाही. अबुल फज़ल के अनुसार अकबर खुद को सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) की तरह पेश करता था. ऐसा ही इसके लड़के जहांगीर ने लिखा है.

अकबर ने अपना नया पंथ दीन ए इलाही चलाया जिसका केवल एक मकसद खुद की बडाई करवाना था. उसके चाटुकारों ने इस धूर्तता को भी उसकी उदारता की तरह पेश किया!

अकबर को इतना महान बताए जाने का एक कारण ईसाई इतिहासकारों का यह था कि क्योंकि इसने हिंदू धर्म और इस्लाम दोनों का ही जम कर अपमान किया और इस तरह भारत में अंग्रेजों के इसाईयत फैलाने के उद्देश्य में बड़ा कारण बना विन्सेंट स्मिथ ने भी इस विषय पर अपनी राय दी है.

जलालुद्दीन नसीरूद्दीन अकबर ‘महान’ भाषा बोलने में बड़ा चतुर था. विन्सेंट स्मिथ लिखता है कि मीठी भाषा के अलावा उसकी सबसे बड़ी खूबी अपने जीवन में दिखाई बर्बरता है!

अकबर ने अपने को रूहानी ताकतों से भरपूर साबित करने के लिए कितने ही झूठ बोले. जैसे कि उसके पैरों की धुलाई करने से निकले गंदे पानी में अद्भुत ताकत है जो रोगों का इलाज कर सकता है. ये वैसे ही दावे हैं जैसे मुहम्मद साहब के बारे में हदीसों में किये गए है अकबर के पैरों का पानी लेने के लिए लोगों की भीड़ लगवाई जाती थी. उसके दरबारियों को तो यह अकबर के नापाक पैर का चरणामृत पीना पड़ता था ताकि वह नाराज न हो जाए…!!

अकबर ‘महान’ के नवरत्नों में से एक बुद्धिमान बीरबल शर्मनाक तरीके से एक लड़ाई में मारा गया. बीरबल अकबर के किस्से असल में मन बहलाव की बातें हैं जिनका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं. ध्यान रहे कि ऐसी कहानियाँ दक्षिण भारत में तेनालीराम के नाम से भी प्रचलित हैं…!!

नवरत्नों में से एक और मान सिंह जो देश में पैदा हुआ सबसे नीच गद्दार था, ने अपनी बहन जहांगीर को दी. और बाद में इसी जहांगीर ने मान सिंह की पोती को भी अपने हरम में खींच लिया. यही मानसिंह अकबर के आदेश पर जहर देकर मार डाला गया और इसके पिता भगवान दास ने आत्महत्या कर ली… इन नवरत्नों को अपनी बीवियां, लडकियां, बहनें तो अकबर की खिदमत में भेजनी पड़ती ही थीं ताकि बादशाह सलामत उनको भी सलामत रखें. और साथ ही अकबर महान के पैरों पर डाला गया पानी भी इनको पीना पड़ता था जैसा कि ऊपर बताया गया है.

एक और नवरत्नी रत्न राजा टोडरमल अकबर का वफादार खजांची और धनसंग्राहक अकाऊंटेंट था तो भी उसकी पूजा की मूर्तियां अकबर ने तुडवा दीं. इससे टोडरमल को दुःख हुआ और इसने इस्तीफ़ा दे दिया और वाराणसी चला गया.

अगले रत्न शाह मंसूर दूसरे रत्न अबुल फजल के हाथों सबसे बड़े रत्न अकबर के आदेश पर मार डाले गए ..!

अकबर ने एक ईसाई पुजारी को एक रूसी गुलाम का पूरा परिवार भेंट में दिया. इससे पता चलता है कि अकबर गुलाम रखता था और उन्हें वस्तु की तरह भेंट में दिया और लिया करता था… !!
अकबर ने प्रयागराज (जिसे बाद में इसी धर्म निरपेक्ष महात्मा ने इलाहबाद नाम दिया था) में गंगा के तटों पर रहने वाली सारी आबादी का क़त्ल करवा दिया और सब इमारतें गिरा दीं क्योंकि जब उसने इस शहर को जीता तो लोग उसके इस्तकबाल करने की जगह घरों में छिप गए. यही कारण है कि प्रयागराज के तटों पर कोई पुरानी इमारत नहीं है..

एक बहुत बड़ा झूठ यह है कि फतेहपुर सीकरी अकबर ने बनवाया था. इसका कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है. बाकी दरिंदे लुटेरों की तरह इसने भी पहले सीकरी पर आक्रमण किया और फिर प्रचारित कर दिया कि यह मेरा है. इसी तरह इसके पोते और इसी की तरह दरिंदे शाहजहाँ ने यह ढोल पिटवाया था कि ताज महल इसने बनवाया है वह भी अपनी चौथी पत्नी की याद में जो इसके और अपने सत्रहवें बच्चे को पैदा करने के समय चल बसी थी!

तो ये कुछ उदाहरण थे अकबर “महान” के जीवन से ताकि आपको पता चले कि हमारे नपुंसक इतिहासकारों की नजरों में महान बनना क्यों हर किसी के बस की बात नहीं. क्या इतिहासकार और क्या फिल्मकार और क्या कलाकार, सब एक से एक मक्कार, देशद्रोही, कुल कलंक, नपुंसक हैं जिन्हें फिल्म बनाते हुए अकबर तो दीखता है पर महाराणा प्रताप कहीं नहीं दिखता….!!

जहाँगीर ने, अपनी जीवनी, ”तारीख-ई-सलीमशाही” में लिखा था कि ”अकबर और जहाँगीर के आधिपत्य में पाँच से छः लाख की संखया में हिन्दुओं का वध हुआ था।” (तारीख-ई-सलीम शाही, अनु. प्राइस, पृष्ठ 225-26) ,,  गणना करने की चिंता किये बिना, मानवों के वध एवम्र क्तपात सम्बन्धी अकबर की मानसिक अभिलाषा के उदय का कारण, इस्लाम के जिहाद सम्बन्धीसिद्धांत, व्यवहार और भावना में थीं, जिनका पोषण इस्लामी धर्म ग्रन्थ और प्रशासकीय विधि विज्ञान के नियमों द्वारा होता है। इसी सन्दर्भ में एक और ऐसी ही समान स्वभाव्की घटना वर्णन योग्य है। प्रथम विश्व व्यापी महायुद्ध में जब ब्रिटिश भारत की सेनायें क्रीमियाँ में नियुक्त थीं तब ब्रिटिश भारत की सेना के मुस्लिम सैनिकों के पीछे स्थित थे, हिन्दू सैनिकों पर पीदे से गोलियाँ चला दीं, फलस्वरूप बहुत से हिन्दू सैनिक मारे गये,मुस्लिम सैनिकों की शिकायत थी कि जर्मनी के पक्षधर, और जो क्रीमियाँ पर अधिकार किये हुए थे, उन तुर्कों के विरुद्ध वे युद्ध नहीं करना चाहते थे। इस घटना के बाद ब्रिटिशों ने ब्रिटिश भारत की सेना के हिन्दू और मुसलमान सैनिकों को युद्ध स्थल पर कभी भी एक ही पक्ष में, एक साथ, नियुक्त नहीं किया। इस घटना का वर्णन उस ब्रिटिश अफसर ने स्वयं ही लिखा था जो इस अति अद्युत, और विशिष्ट, तथा इस्लामी, घटना का स्वंय प्रत्यक्षदर्शी था (दी इण्डिया ऑफिस लाइब्रेरी, लण्डन, एम. एस. एस. 2397) किन्तु हिन्दुओं ने अपने इतिहास से कुछ भी नहीं सीखा है, अतः ऐसी घटना की पुनरावृत्ति अत्याज्य है। घटना तुलनात्मक रूप में निकट भूत की ही है जिसमें साम्य वादियों की बहुत अधिक कटु भागीदारी है,, एक भली भांति सिद्धान्त विशारद साम्यवादी, विखयात नेता, स्वर्गीय प्रो. कल्यान दत्त (सी. पी. आई) ने अपनी जीवनी ”आमार कम्युनिष्ट जीवन” में लिखा था। मुस्लमानों ने अपनी पाकिस्तान की मांग को सम्पन्न कराने के लिए 16 अगस्त 1946 को ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही’ / Direct Action Plan पर कार्यवाही प्रारम्भ कर दी इसे बाद में ”कलकत्ता का महान नरसंहार, महान कत्लेआम, कहा गया।”
(दी ग्रेट कैलकट्टा किलिंगस)।

‘जिहाद’ जिसे प्रत्यक्ष कार्यवाही (डायरेक्ट एक्शन) नाम दिया गया, खिदर पुर डौकयार्ड के मुस्लिम मजदूरों ने हिन्दू मजदूरों पर आक्रमण कर दिया। आश्चर्यचकित हिन्दुओं ने वामपंथी टे्रड यूनियन्स की सदस्यता के, जिनके हिन्दू मुसलमान दोनों ही मजदूर थे कार्ड दिखाकर प्राणरक्षा की भीख मांगी, और कहा कि ”अरे कौमरैडो (साथियों) तुम हमारा वध क्यों कर रहे हो? हम सभी एक यूनियन में हैं। ”किन्तु चूँकि इन मुजाहिदों को इस्लाम का राज्य (दारूल इस्लाम) मजदूरों के राज्य से कहीं अधिक प्रिय है, ”सभी हिन्दुओं का वध कर दिया गया।”
(कल्यान दत्त, ‘आमार कम्यूनिष्ट जीवन’ (बंगाली) पर्ल पब्लिशर्स, पृष्ठ 10 प्रथम आवृत्ति कलकत्ता 1999) ,इस विशेष घटना के यहाँ वर्णन करने का मेरा उद्देश्य और आशा है, कि वामपंथी सेना, ”जो व्यावहारिक ज्ञान की अपेक्षा सिद्धान्त बनाने में अधिक सिद्ध हस्त हैं, ”उनके मस्तिष्कों में वास्तविकता, सच्चाई और सामान्य ज्ञान का कुछ उदय हो जाए।

अकबर के प्रमुख सेनापति और नवरत्नों में से एक आमेर के राजा मानसिंह के बारे में दो शर्मनाक तथ्य…

1.) कहते हैं कि एक दिन एक सैयद एक ब्राह्मण से तर्क करने लगा कि हिन्दू धर्म से इस्लाम बढ़कर है। इन दोनों ने राजा को पंच माना। राजा ने कहा कि ‘यदि इस्लाम को बड़ा कहता हूँ तो कहोगे कि बादशाह की चापलूसी है; और यदि इसके ऐसा कहता हूँ तो पक्षपात कहलाएगा।’ जब उन लोगों ने हठ किया तब राजा ने कहा कि मुझे ज्ञान नहीं है, पर हिन्दू धर्म (जो बहुत दिनों से चला जाता है) के महात्मा के मरने पर जला देते हैं और हवा में उड़ा देते हैं; और रात्रि में यदि कोई वहाँ जाता है तो भूत का डर होता है, परन्तु हर एक गाँव और नगर के पास मुसलमान पीरों की कबें हैं, जहाँ पर मनौती होती हैं और जमघट लगता है।

यहीं से वर्तमान में कांग्रेसी व सेक्यूलरी चरित्र की मूल बुनियाद रखी गई थी, दोगला और नजरे चुराता मतलबी सेक्यूलरिज्म यहीं से निकला। 

2.) जब अकबर के सेनापति मानसिंह शोलापुर महाराष्ट्र विजय करके लौट रहे थे, तो मानसिंह ने प्रताप से मिलने का विचार किया। प्रताप उस वक़्त कुम्भलगढ़ में थे। अपनी राज्यसीमा मेवाड़ के भीतर से गुजरने पर (किंचित अनिच्छापूर्वक) महाराणा प्रताप को उनके स्वागत का प्रबंध उदयपुर के उदयसागर की पाल पर करना पड़ा. स्वागत-सत्कार एवं परस्पर बातचीत के बाद भोजन का समय भी आया। महाराजा मानसिंह भोजन के लिए आये किन्तु महाराणा को न देख कर आश्चर्य में पड़ गये| उन्होंने महाराणा के पुत्र अमरसिंह से इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि ‘महाराणा साहब के सिर में दर्द है, अतः वे भोजन पर आपका साथ देने में में असमर्थ हैं।’ कर्नल टॉड के अनुसार असल में महाराणा प्रताप, आमेर महाराजा मानसिंह की बहन/ बुआ (?) जोधा बाई ‘अकबर जैसे विदेशी आक्रान्ता’ से ब्याही थी के साथ बैठ कर भोजन करना अपना निजी और समस्त राजपूत जाति का अपमान समझते थे। मानसिंह इस बात को ताड़ गए और उन्होंने वहीं अपने इस अपमान का बदला लेने का निश्चय कर डाला। बिना भोजन किए ही वह चले गए। जिसकी परिणति ही मेवाड़ पर आक्रमण और हल्दीघाटी के युद्ध के रूप में सामने आई। राजस्थान का इतिहास आगे कुछ और भी भयंकर सचाइयां बताता है। …प्रताप के आदेश पर जो स्थान महाराजा मानसिंह के भोजन के लिए नियत किया गया था, वह खोद डाला गया, उस पर गंगाजल छिड़का गया, मानसिंह को जिन बर्तनों में भोजन परोसा गया था वे बर्तन अपवित्र हो जाने से नष्ट कर दिए गए, जिन-जिन राजपूतों ने उस दिन आमेर नरेश राजा मानसिंह को अपनी आँखों से देखा था, उन्होंने दुबारा हजामत बनवाई, पानी में गंगाजल डाल कर स्नान किया और नए वस्त्र धारण किये….” महाराजा मानसिंह ने ये घटना जा कर अकबर को बतलाई और कुछ इतिहासकारों के अनुसार यही घटना हल्दी घाटी के युद्ध का कारण भी बनी। अकबर को राणा प्रताप के इस व्यवहार के कारण मेवाड़ पर आक्रमण करने का एक और मौका मिल गया। सन 1576 ई. में अकबर की आज्ञा पर मानसिंह ‘महाराणा प्रतापसिंह को दण्ड देने’ के अभियान पर नियत हुए। मुगलों की विशाल सेना टिड्डी दल की तरह मेवाड़ की ओर उमड पड़ी। उसमें मुगल, राजपूत और पठान योद्धाओं के साथ अकबर का जबरदस्त तोपखाना भी था। अकबर के प्रसिद्ध सेनापति महावत खाँ, आसफ खाँ और महाराजा मानसिंह के साथ अकबर का शाहजादा सलीम उस मुगल सेना का संचालन कर रहे थे, जिसकी संख्या इतिहासकार 80 हजार से 1 लाख तक बताते हैं।

अकबर के नवरतनों में से एक राजा बीरबल (1528-1586) (असली नाम:महेश दास या महेश दास भट्ट) मुगल बादशाह अकबर के प्रशासन में मुगल दरबार का प्रमुख वज़ीर (वज़ीर-ए-आजम) था और अकबर के परिषद के नौ सलाहकारो में से एक सबसे विश्वस्त सदस्य था जो अकबर के नवरत्न थे यह संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ नौ रत्न है अकबर के अलावा यह दूसरा व्यक्ति था, जिसने अकबर की दूषित मानसिकता से उत्पन्न दीन- ए -इलाही धर्म माना था क्योंकि जलालुद्दीन मौहम्मद अकबर खुद पैगम्बर सरीखा ही बनना चाहता था। अकबर के दरबार में बीरबल का ज्यादातर कार्य सैन्य और प्रशासनिक थे तथा वह सम्राट का एक बहुत ही करीबी दोस्त भी था, सम्राट अक्सर बुद्धि और ज्ञान के लिए बीरबल की सराहना करते थे। ये कई अन्य कहानियो, लोककथाओं और कथाओ की एक समृद्ध परंपरा का हिस्सा बन गए हैं। यह भी कहा जा सकता है कि अकबर ने बीरबल को अपने मनोरंजन के लिये अपने पास रखा था। यह बात शायद बीरबल जीवन भर न जान सके। अकबर अपने राज्य के सभी धर्म के लोगो को सन्तुष्ट रखने के लिये नवरतन की एक चटनी बनाई थी।

बाबर ने अपनी जीवनी मातृभाषा चुगताई (तुर्की भाषा का पुराना स्वरुप) में लिखी थी। बाद में बाबर के पोते अकबर ने तुजुक-ए-बाबरी का फारसी भाषा में अब्दुर्रहीम खान-ए-खानां द्वारा हिजरी 998 (1589-90 ई) में अनुवाद कराकर किताब को चित्रों से सजाया , अकबर ने ईरान के दो मशहूर कलाकारों मीर सच्चीद अली और अब्द-अस-समद को हिंदुस्तान आने का निमंत्रण भेजा। इन दोनों कलाकारों ने स्थानीय चित्रकारों की मदद से बाबरनामा के अद्भुत चित्र बनवाए।
145 चित्रों वाला बाबरनामा 1598 ई में बना। बाबरनामा के चित्रों से मुगलकालीन कला की शुरुआती झलक मिलती है। कहा जाता है कि दौलत, भवानी, मंसूर, सूरदास, मिस्कीन, फारुख़ चोला और शंकर जैसे 47 कलाकारों की मदद से पांच सचित्र बाबरनामा तैयार किए गए इनमें से एक प्रति नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में मौजूद है जबकि बाकी चार प्रति ब्रिटिश म्यूजियम लंदन, स्टेट म्यूजियम ऑफ ईस्टर्न कल्चर, मास्को और लंदन के ही विक्टोरियल और अल्बर्ट म्यूजियम में रखे हुए हैं।
नई दिल्ली में राष्ट्रीय संग्रहालय में रखी गई बाबरनामा की सचित्र पोथी में कुल 378 पन्ने है और इनमें से 122 पन्नों पर 144 चित्र हैं। बाबर के प्रति भारतीय मुसलमानों का रोष बाबर के जीवन में ही समाप्त न हुआ बल्कि उसकी मृत्यु के बाद भी चलता रहा। दौलत खां लोदी के देशद्रोही पुत्र दिलावर खां, जिसने बाबर के भारत आने में सहायता की थी, को भारतीय मुसलमानों ने कभी नहीं बख्शा।

शेरशाह के काल में जब 1540 ई. में बंगाल का युद्ध विजित करने के लिए प्रयत्न हुए तो दिलावर खां को मुंगेर के किले में घेर लिया गया। सम्भवत: शेरशाह ने दिलावर खां को कुछ शर्तों पर समर्पण करने को कहा। पर शेरशाह को सलाह दी गई कि उसे निश्चित रूप से मार दिया जाए, और यह अच्छा न होगा कि उसकी कोई मदद की जाए। (देखें- डा. कानूनगो, “शेरशाह एण्ड हिज टाइम्स, पृ. 219) अत: उसे मार दिया गया। यानी इस देशद्रोही को बाबर का साथ देने की सजा दी गई।

शेरशाह ने मरते समय अपनी इच्छाओं में से एक यह इच्छा भी प्रकट की थी कि पानीपत में जहां इब्रााहिम खां लोदी ने बाबर से भयंकर संघर्ष किया था, वहां इब्रााहिम खां लोदी का मकबरा बनाया जाए।
(पृष्ठ 424)

उल्लेखनीय है कि बाबर की मृत्यु 26 दिसम्बर, 1530 को हो गई थी। सम्भवत: उसे उसके लड़के कामरान ने ही जहर दिया था। उसके बाद तत्काल किसी को भी सम्राट घोषित नहीं किया गया। तीन दिन तक इसके लिए राजमहल में कुचक्र तथा षड्यंत्र चलते रहे। बाबर की लाश तीन दिन तक सड़ती रही। बाद में उसे भारत में न दफना कर काबुल में दफनाया गया। जिससे अकबर अच्छी तरह वाकिफ था ।
यदि हम तटस्थ इतिहास में जाएं तो पाएंगे कि मध्ययुग में चीजें अलग थीं। तब, जिन्होंने हुकूमत की, वे स्पष्टत: विदेशी थे। उन्होंने इस्लाम अपनाने वाले हिन्दुओं और भारत में बस गए व्यापारियों को ‘हिन्दुस्तानी’ कहा। शासकों ने खुद की पहचान तुर्क और पठान के रूप में ही स्थापित की और वे विदेशी धरती यानी हिन्दुस्तान पर हुकूमत करने में घमंड भी महसूस करते थे। यह सच उन हुक्मरानों के ज्यादा निकट है, जिन्होंने दिल्ली से हुकूमत की। हालांकि वे मजहब से मुसलमान जरूर थे, लेकिन नस्ल से तुर्क, पठान या अफगान थे। इसी वजह से आम बोलचाल में मुसलमानों का एक नाम-‘तुर्क’ भी प्रचलित हो गया । कन्नड़, तेलुगु और उर्दू भाषाओं में मुसलमानों को ‘तुर्क’ ही कहा गया है। मध्यकाल में हिन्दी भाषा में मुसलमानों को ‘तुर्क’ ही कहा जाता था। उदाहरण के लिए-‘तुम तो निरे तुर्क भये’। इस तरह अस्वच्छ या आवारागर्दों को तुर्क का संबोधन देते हुए हिकारत से देखा जाता था।

इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के 1977 संस्करण में लिखा है: ‘1556 से 1605 तक हुकूमत करने वाले अकबर की फौज में मुगल, ईरानी, तुर्क, उजबेक और अफगान थे।’ उसमें देशी मुसलमानों को जगह कहां थी? कुछ और उदाहरण देखिए। एक ईरानी गयास बेग अकबर के आखिरी दिनों में भारत आया था। उसकी बेटी मेहरुन्निसा यानी नूरजहां की शादी जहांगीर से हुई थी। गयास बेग का बेटा यानी नूरजहां का भाई आसफ खान जहांगीर का वजीरेआजम था। शाहजहां की हुकूमत में भी वह वजीरेआजम बना रहा। उसका दूसरा बेटा इतिकाद खान 1633 में दिल्ली का सूबेदार था। आसफ खान का बेटा ही वह शाइस्ता खान था, जिसकी उंगलियां 1663 में शिवाजी के हमले में कट गई थीं। वह शाहजहां और औरंगजेब की हुकूमतों में अहम ओहदों पर रहा। शाइस्ता खान का बेटा बुज़ुर्ग उम्मेद खान 1683 से 1692 तक बिहार का सूबेदार रहा। नूरजहां की भतीजी यानी आसफखान की बेटी मुमताज उल जमानी शाहजहां की बेगम थी। दूसरी भतीजी एक अन्य वजीरे आजम मुहम्मद जफर को ब्याही थी। तीसरी भतीजी औरंगजेब के वजीरेआजम असदखां की बेगम बनी थी। एक दौर ऐसा भी आया जब नूरजहां के रिश्तेदारों के नियंत्रण में मुगलिया हुकूमत का आधा हिस्सा था।

इसी तरह, औरंगजेब का एक खास सिपहसालार मीर शिहाबुद्दीन अक्तूबर, 1669 में समरकंद से अपनी किस्मत आजमाने दिल्ली दरबार में आया था। मिर्जा मिउज़ा ईरान के मशहद से आया था। उसकी शादी औरंगजेब की एक साली से हुई थी। उसका बेटा मुसई खान 1688 में सरकारी खजाने का दीवान बना और 1689 में उसे दक्खन का दीवान बनाया गया। इसी तरह, मुहम्मद अमू खान 1687 में बुखारा से भारत आया था। उसे 1698 में सद्र, 1706 में चिन बहादुर और 1707 में 4000 घुड़सवारों का सालार बनाया गया। ऐसा ही एक लड़ाकू मीर जुमला था, जो गोलकुण्डा का वजीरेआजम बनने में कामयाब हुआ। बाद में उसने गोलकुण्डा के सुल्तान से गद्दारी की और शाहजहां के आखिरी दिनों में मुगलों से आ मिला। उसके बेटे मुहम्मद अमीन खान हाफिज को औरंगजेब ने मीर बख्शी यानी घुड़सवारों की सेना का प्रमुख बनाया। बाद में उसे सूबेदार बनाकर गुजरात भेज दिया गया। वह इस पद पर 1672 से 1682 तक रहा।

तथाकथित महान किंतु दरअसल शैतान जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर की जलालत का एक विशेष प्रसंग

‘जहांपनाह रूपवती स्‍त्रियां तो हर प्रांत, हर नगर में मिल जाएंगी, मधुर गायिकाएं भी मिल जाएंगी, लावण्यवती नर्तकियां भी मिल जाएंगी, लेकिन औरत जो गजब की खूबसूरत हो, लाजवाब गायिका भी हो और बेमिसाल नाचने वाली भी हो ऐसी औरत पूरे हिन्दुस्तान में केवल एक है और वह है मालवा की बेगम रानी रूपमती, बाज बहादुर की पत्नी।’
अकबर के खुशामदी दरबारी कह रहे थे।

अब तो जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर को तो मनचाही मुराद मिल गई थी वह तो ढूंढता फिरता था सुंदर औरतों को,वो औरत मुसलमानों में हो या काफिरों में, सल्तनत में हो या पड़ोसी राज्यों में, उसे बस सुंदर औरत का पता भर चाहिए,फिर उसे कैसे प्राप्त करना है, इस जुगाड़ में अकबर जुट जाता था।

चूंकि मालवा एक कमजोर राज्य था, हुमायूं के समय वह मुगलों के अधीन था, शेरशाह के समय वह विदेशी दासता से मुक्त हुआ और सूर वंश के एक भारतीय मुसलमान शुजात खां को वहां का शासक बना दिया गया इसी शुजात खां का पुत्र था बाज बहादुर, जो अकबर के राज्यारोहण के वर्ष ही अपने पिता के मरने के बाद मालवा की गद्दी पर बैठा।

बाज बहादुर एक अच्छा गायक था और गायकों की कद्र करता था। इसी गायकी पर रीझ उसने रूपमती को अपनी बेगम बनाया था। सैन्य शक्ति के मान से अपने चारों ओर के राज्यों गुजरात, खानदेश, मेवाड़, कालिंजर, गोंडवाना और दिल्ली से वह कमजोर था। गोंडवाना की रानी दुर्गावती उसे कई बार युद्ध में हरा चुकी थी अत: राज्य विस्तार की आशा छोड़कर वह नाच-गानों में मस्त रहता था , उसका हरम सुंदर नाचने-गाने वालियों से भरा पड़ा था , देश उपजाऊ था अत: धन-दौलत की कमी नहीं थी !

अकबर यदि एक संदेशा भिजवा देता तो बाज बहादुर तुरंत दासता स्वीकार कर लेता, लेकिन ऐसी अधीनता में खिराज मांगा जा सकता था, हाथी-घोड़े मांगे जा सकते थे लेकिन हरम की सुंदर औरतें तो मांगी नहीं जा सकती थीं।

★ अकबर, मुगलों के इस्लामिक आक्रमणकारी काल में प्रचलित कट्टर इस्लामिक नियमानुसार –
काफिरों की औरतें तो किसी भी रूप में हलाल होती हैं, लेकिन एक मुसलमान की औरत बिना उसे मारे हलाल नहीं होती।

अत: अकबर ने मुगल साम्राज्य का विस्तार करने के बहाने बिना किसी पूर्व सूचना के मालवा पर चढ़ाई कर दी , सेना की कमान अपनी धाय मां माहम अनगा के बेटे आदम खां को सौंपी और अपने गुरु बैरम खां की हत्या में जिसने सहयोग दिया, उस मुल्ला पीर मोहम्मद शिरवानी को आदम खां का सहयोगी बनाकर रवाना कर दिया, यह पीर मोहम्मद को गुरु हत्या का इनाम था। धड़धड़ाती मुगल फौजें जब सारंगपुर के उत्तर में पचोर तक आ गईं, तब बाज बहादुर की आंखें खुलीं। जल्दी-जल्दी में उसने सैनिक एकत्र दिए और मुगलों की विशाल सेना से जूझने चल पड़ा।

बाज बहादुर युद्ध का परिणाम जानता था। विजय तो होनी नहीं है। यदि सम्मानजनक संधि का अवसर मिल जाए तो अच्छा है। यदि युद्ध हुआ तो पराजय की स्थिति में भारतीय परंपरा के अनुसार उसने अपने हरम की औरतों को समाप्त करने की व्यवस्था की और रवाना हो गया।

इस्लाम में जलकर मृत्यु होना नर्क के समान माना जाता है अत: जौहर की अपेक्षा बेगमों को कत्ल कर देने के लिए सैनिक नियुक्त कर दिए गए।

29 मार्च 1561 को सारंगपुर के उत्तर में पड़ाना मऊ ग्राम में दोनों फौजों का आमना-सामना हुआ। शेर-बकरी की लड़ाई थी। विशाल मुगल सेना के सैनिक प्रतिमाह कहीं न कहीं युद्धरत रहने के अभ्यस्त थे। इधर मालवा की फौजों को वर्षों से कहीं लड़ने का मौका नहीं मिला था। गोंडवाना से पराजय के बाद मालवा की फौजें नाच-रंग में व्यस्त रहती थीं। एक घंटे में युद्ध का फैसला हो गया पराजित बाज बहादुर निमाड़ भाग गया मालवा के सैनिक कुछ मारे गए, कुछ भाग गए और कुछ पकड़े गए , दनदनाती मुगल फौजें सारंगपुर पहुंचीं हरम रक्षकों में भी भगदड़ मच गई उन्हें बेगमों का कत्ल करने का मौका ही नहीं मिला केवल रक्षकों के सरदार ने रानी रूपमती पर तलवार का एक वार किया और भाग गया घायल रूपमती और हरम की बेगमें आदम खां के कब्जे में आ गई , सारंगपुर में भगदड़ मची थी,सभी लोग अपनी धन-दौलत, स्त्री-बच्चों को छोड़ प्राण बचाने भाग रहे थे जो भाग सके, भाग गए बाकी के पुरुष जिनमें हिन्दू-मुसलमान दोनों थे, पकड़कर पड़ाना ग्राम ले जाए गए।

झुंड के झुंड कैदी मुल्ला पीर मोहम्मद के सामने लाए जाते और भेड़-बकरियों की तरह काट दिए जाते,प्रसिद्ध इस्लामिक इतिहासकार बदायूंनी इस हत्याकांड का प्रत्यक्ष दर्शक था उसने लिखा है- ‘एक ही स्थान पर इतने अधिक लोगों का कत्ल किया गया कि खून की नदी बह निकली।

Importantसैयद (पैगम्बर के वंशज) और विद्वान शेख (?) जिन पर हाथ उठाना पाप समझा जाता है, मुल्ला पीर मोहम्मद के आदेश से मार दिए गए क्योंकि ‘यदि इन्हें मारा नहीं जाता, तो इनकी औरतें हराम हो जातीं’ कुछ मुगल ‍अधिकारियों ने प्रतिवाद किया, तो मुल्ला पीर मोहम्मद ने कहा, ‘एक ही रात में इतने कैदी बनाए गए हैं, मैं इनका और क्या कर सकता हूं?’
(स्मिथ पृष्ठ 46)

उधर मुल्ला पीर मोहम्मद सारंगपुर, पड़ाना और आसपास के ग्रामों से हिन्दू-मुसलमान नागरिकों को पकड़-पकड़कर कत्ल करवा रहा था। इधर आदम खां सारंगपुर के घर-घर से सुंदर औरतें इकट्ठी कर रहा था। वणिक, महाजन, संभ्रांत-कुलों की ललनाएं, घसीट-घसीटकर महल में इकट्ठा की जा रही थीं , घायल रूपमती का इलाज करवाया गया, लेकिन जैसे ही उसे हरम की दासियों और अन्य औरतों से पता लगा कि ठीक होते ही उसे आदम खां या अकबर की रखैल बनना पड़ेगा, उसने अपनी हीरे की अंगूठी खा कर प्राणांत कर लिया।

अकबर द्वारा हत्यारों को पुरस्कार : अब सारंगपुर में आदम खां और पड़ाना में पीर मोहम्मद के पड़ाव पड़ गए थे। आदम खां ने लूट का माल हाथी, घोड़े अकबर के पास आगरा रवाना कर दिए किंतु बाज बहादुर के हरम की व नगर की चुनिंदा सुंदर औरतें स्वयं के लिए रख लीं।

मुल्ला पीर मोहम्मद ने यह बात एक घुड़सवार द्वारा आगरा में अकबर के पास पहुंचा दी खबर मिलते ही सुंदर स्‍त्रियों का भूखा अकबर 28 अप्रैल 1561 को आगरा से रवाना हुआ और 23 मई को सारंगपुर जा पहुंचा , आदम खां की माँ माहम अनगा को अकबर के मालवा रवाना होने की खबर लगी उसे अपने पुत्र के ‍अनिष्ट की चिंता हुई अत: वह भी अकबर के पीछे-पीछे लगी मालवा आ गई„ आदम खां को विश्वास ही नहीं हुआ कि बादशाह इतनी जल्दी बिना सूचना दिए सारंगपुर आ सकता है। वह नगर से बाहर निकला। उसने घुड़सवारों के एक दस्ते के साथ अकबर के पैर चूमे, लेकिन क्रोध से तमतमाया अकबर शांत नहीं हुआ। अकबर ने लूट में मिली औरतों के बारे में पूछा। आदम खां ने रानी रूपमती के आत्महत्या करने व अन्य औरतों को आगरा भेज देने की बात बताई। अकबर संतुष्ट नहीं हुआ, उसने स्वयं सारंगपुर में तलाशी लेने की बात कही।

जब अकबर सारंगपुर में आदम खां द्वारा छिपाई गई औरतें तलाश रहा था, माहम अनगा ने जनानखाने की औरतों को इकट्ठा किया। इनमें से दो रूपसी महिलाएं जो रूपमती के साथ बाजबहादुर की खास बेगमें थीं, को छांटकर अलग कर लिया। बाज बहादुर की ये बेगमें आदम खां द्वारा उन्हें भोगे जाने की बात अकबर को बता सकती थीं। इस आशंका से माहम अनगा ने दोनों के सिर कटवा दिए। बाकी की औरतों को कहा कि किसी ने जुबान खोलने की जुर्रत की तो उनका भी यही हाल होगा।

भयभीत औरतों के मुंह बंद हो गए, औरतों को एक कतार में खड़ा कर अकबर को बुलाया गया व औरतें उसे भेंट कर दी गईं,, माहम अनगा की प्रार्थना पर आदम खां को क्षमा मिल गई, निर्दोषों के खून से हाथ रंगने वाले पीर मोहम्मद को अकबर ने घोड़े और खिलअत देकर सम्मानित किया फिर अकबर 4 जून 1561 को आगरा लौट गया।

अकबर ने चुनिंदा औरतें अपने हरम में शामिल कर लीं तथा बाकी गुलाम बना ली गईं यहां आदम खां की बात छिपी न रह सकी, मालवा की औरतों से प्रथम मिलन की रात ही अकबर को आदम खां की करतूतों का पता चल गया, किंतु यह कोई बड़ा अपराध नहीं था विजित देश में प्रत्येक मुसलमान सैनिक पराजित की महिलाओं से बलात्कार करते ही थे।

अत: अकबर किसी बड़े अपराध के इंतजार में चुप बैठ गया मालवा में शासन के सारे अधिकार पीर मोहम्मद को देकर आदम खां को आगरा बुला लिया गया पीर मोहम्मद को बाकी मालवा तथा निमाड़ विजय के आदेश भेज दिए गए।

आदेश पाते ही पीर मोहम्मद नर्मदा के दक्षिणी तट पर जहां, बाज बहादुर भाग गया था, टूट पड़ा। असीरगढ़, बुरहानपुर, बीजागढ़ और निमाड़ के नगर, कस्बों, ग्रामों से औरतों को छोड़ सारे नागरिक कत्ल कर दिए गए। सारा निमाड़ बुहारकर साफ कर दिया गया।
(स्मिथ पृष्ठ 52)

उपरोक्त प्रसंग सुप्रसिद्ध लेखक व इतिहासकार रामसिंह शेखावत जी की पुस्तक हत्यारा महान बना दिया गया से लिया गया है जो वेबदुनिया नामक न्यूज साईट पर भी विस्तृत रूप से प्रकाशित हुआ है जिसका लिंक नीचे दे रहा हूँ।

http://hindi.webdunia.com/national-hindi-news/akbar-queen-roopmati-malwa-nimar-baz-bahadur-indian-history-116040400111_1.html

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अब पुन: मूल मुद्दे पर आते हुऐ सचाई स्वीकारते हुऐ मान लेते ही हैं कि भारतीय इतिहास के साथ इस खिलवाड़ के मुख्य दोषी वे वामपंथी इतिहासकार हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद नेहरू की सहमति से प्राचीन हिन्दू गौरव को उजागिर करने वाले इतिहास को या तो काला कर दिया या धुँधला कर दिया और इस गौरव को कम करने वाले इतिहास-खंडों को प्रमुखता से प्रचारित किया, जो उनकी तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के खाँचे में फिट बैठते थे।

ये तथाकथित इतिहासकार अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की उपज थे, जिन्होंने नूरुल हसन और इरफान हबीब की अगुआई में इस प्रकार इतिहास को विकृत किया।भारतीय इतिहास कांग्रेस पर लम्बे समय तक इनका कब्जा रहा, जिसके कारण इनके द्वारा लिखा या गढ़ा गया अधूरा और भ्रामक इतिहास ही आधिकारिक तौर पर भारत की नयी पीढ़ी को पढ़ाया जाता रहा।वे देश के नौनिहालों को यह झूठा ज्ञान दिलाने में सफल रहे कि भारत का सारा इतिहास केवल पराजयों और गुलामी का इतिहास है और यह कि भारत का सबसे अच्छा समय केवल तब था जब देश पर मुगल बादशाहों का शासन था। तथ्यों को तोड़-मरोड़कर ही नहीं नये ‘तथ्यों’ को गढ़कर भी वे यह सिद्ध करना चाहते थे कि भारत में जो भी गौरवशाली है वह मुगल बादशाहों द्वारा दिया गया है और उनके विरुद्ध संघर्ष करने वाले महाराणा प्रताप, शिवाजी आदि पथभ्रष्ट थे।

इनकी एकांगी इतिहास दृष्टि इतनी अधिक मूर्खतापूर्ण थी कि वे आज तक महावीर, बुद्ध, अशोक, चन्द्रगुप्त, चाणक्य आदि के काल का सही-सही निर्धारण नहीं कर सके हैं। इसी कारण लगभग 1500 वर्षों का लम्बा कालखंड अंधकारपूर्ण काल कहा जाता है, क्योंकि इस अवधि में वास्तव में क्या हुआ और देश का इतिहास क्या था, उसका कोई पुष्ट प्रमाण कम से कम सरकारी इतिहासकारों के पास उपलब्ध नहीं है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि अलाउद्दीन खिलजी और बख्तियार खिलजी ने अपनी धर्मांधता के कारण दोनों प्रमुख पुस्तकालय जला डाले थे।

लेकिन बिडम्बना तो यह है कि भारत के इतिहास के बारे में जो अन्य देशीय संदर्भ एकत्र हो सकते थे, उनको भी एकत्र करने का ईमानदार प्रयास नहीं किया गया इस कारण आमजन की पहुंच में, स्कूल कॉलेजों में शोध तक को या पढने, पढाये जाने मात्र तक को सही व सच्चा मध्यकालीन भारत का पूरा इतिहास अभी भी उपलब्ध नहीं है।

ध्यान रहे कि इतिहासकारों के लाडले और सबसे उदारवादी राजा अकबर ने ही सबसे पहले “प्रयागराज” जैसे काफिर शब्द को बदल कर इलाहबाद कर दिया था।

अकबर महान ने न केवल कम भरोसेमंद लोगों का कतल कराया बल्कि उनका भी कराया जो उसके भरोसे के आदमी थे जैसे- बैरम खान (अकबर का गुरु जिसे मारकर अकबर ने उसकी बीवी से निकाह कर लिया), जमन, असफ खान (इसका वित्त मंत्री), शाह मंसूर, मानसिंह, कामरान का बेटा, शेख अब्दुरनबी, मुइजुल मुल्क, हाजी इब्राहिम और बाकी सब मुल्ला जो इसे नापसंद थे. पूरी सूची स्मिथ की किताब में दी हुई है. और फिर जयमल जिसे मारने के बाद उसकी पत्नी को अपने हरम के लिए खींच लाया और लोगों से कहा कि उसने इसे सती होने से बचा लिया, “समाज सेवक अकबर महान” ,,, अकबर के शासन में मरने वाले की संपत्ति बादशाह के नाम पर जब्त कर ली जाती थी और मृतक के घर वालों का उस पर कोई अधिकार नहीं होता था, अकबर “महान” ने अपनी माँ के मरने पर उसकी भी संपत्ति अपने कब्जे में ले ली जबकि उसकी माँ उसे सब परिवार में बांटना चाहती थी ,, अकबर के चाटुकारों ने राजा विक्रमादित्य के दरबार की कहानियों के आधार पर उसके दरबार और नौ रत्नों की कहानी घड़ी है. असलियत यह है कि अकबर अपने सब दरबारियों को मूर्ख समझता था. उसने कहा था कि वह अल्लाह का शुक्रगुजार है कि इसको योग्य दरबारी नहीं मिले वरना लोग सोचते कि अकबर का राज उसके दरबारी चलाते हैं वह खुद नहीं.

प्रसिद्ध नवरत्न टोडरमल अकबर की लूट का हिसाब करता था. इसका काम था जजिया न देने वालों की औरतों को हरम का रास्ता दिखाना.

एक और नवरत्न अबुल फजल अकबर का अव्वल दर्जे का चाटुकार था. बाद में जहाँगीर ने इसे मार डाला.

फैजी नामक रत्न असल में एक साधारण सा कवि था जिसकी कलम अपने शहंशाह को प्रसन्न करने के लिए ही चलती थी. कुछ इतिहासकार कहते हैं कि वह अपने समय का भारत का सबसे बड़ा कवि था. आश्चर्य इस बात का है कि यह सर्वश्रेष्ठ कवि एक अनपढ़ और जाहिल शहंशाह की प्रशंसा का पात्र था! यह ऐसी ही बात है जैसे कोई अरब का मनुष्य किसी संस्कृत के कवि के भाषा सौंदर्य का गुणगान करता हो!

अकबर महान की सुंदरता और अच्छी आदतें –
बाबर शराब का शौक़ीन था, इतना कि अधिकतर समय धुत रहता था [बाबरनामा]

हुमायूं अफीम का शौक़ीन था और इस वजह से बहुत लाचार भी हो गया. अकबर ने ये दोनों आदतें अपने पिता और दादा से विरासत में लीं. अकबर के दो बच्चे नशाखोरी की आदत के चलते अल्लाह को प्यारे हुए. पर इतने पर भी इस बात पर तो किसी मुसलमान भाई को शक ही नहीं कि ये सब सच्चे मुसलमान थे.

कई इतिहासकार अकबर को सबसे सुन्दर आदमी घोषित करते हैं. विन्सेंट स्मिथ इस सुंदरता का वर्णन यूँ करते हैं-

“अकबर एक औसत दर्जे की लम्बाई का था. उसके बाएं पैर में लंगड़ापन था. उसका सिर अपने दायें कंधे की तरफ झुका रहता था. उसकी नाक छोटी थी जिसकी हड्डी बाहर को निकली हुई थी. उसके नाक के नथुने ऐसे दीखते थे जैसे वो गुस्से में हो. आधे मटर के दाने के बराबर एक मस्सा उसके होंठ और नथुनों को मिलाता था. वह गहरे रंग का था”

जहाँगीर ने लिखा है कि अकबर उसे सदा शेख ही बुलाता था भले ही वह नशे की हालत में हो या चुस्ती की हालत में. इसका मतलब यह है कि अकबर काफी बार नशे की हालत में रहता था.

अकबर का दरबारी लिखता है कि अकबर ने इतनी ज्यादा पीनी शुरू कर दी थी कि वह मेहमानों से बात करता करता भी नींद में गिर पड़ता था. वह अक्सर ताड़ी पीता था. वह जब ज्यादा पी लेता था तो आपे से बाहर हो जाता था और पागलो के जैसे हरकत करने लगता..!!

अकबर महान और जजिया कर
इस्लामिक शरीयत के अनुसार किसी भी इस्लामी राज्य में रहने वाले गैर मुस्लिमों को अगर अपनी संपत्ति और स्त्रियों को छिनने से सुरक्षित रखना होता था तो उनको इसकी कीमत देनी पड़ती थी जिसे जजिया कहते थे. यानी इसे देकर फिर कोई अल्लाह व रसूल का गाजी आपकी संपत्ति, बेटी, बहन, पत्नी आदि को नहीं उठाएगा. कुछ अकबर प्रेमी कहते हैं कि अकबर ने जजिया खत्म कर दिया था लेकिन इस बात का इतिहास में एक जगह भी उल्लेख नहीं! केवल इतना है कि यह जजिया रणथम्भौर के लिए माफ करने की शर्त राखी गयी थी जिसके बदले वहाँ के हिंदुओं को अपनी स्त्रियों को अकबर के हरम में भिजवाना था! यही कारण बना की इन मुस्लिम सुल्तानों के काल में हिन्दू स्त्रियाँ जौहर में जलना अधिक पसंद करती थी.

यह एक सफ़ेद झूठ है कि उसने जजिया खत्म कर दिया आखिरकार अकबर जैसा सच्चा मुसलमान जजिया जैसे कुरआन के आदेश को कैसे हटा सकता था?
इतिहास में कोई प्रमाण नहीं की उसने अपने राज्य में कभी जजिया बंद करवाया हो,,,
अब देखिये कि अकबर पर बनी फिल्मों में इस शराबी, नशाखोर, बलात्कारी, और लाखों हिंदुओं के हत्यारे अकबर के बारे में क्या दिखाया गया है और क्या छुपाया. बैरम खान की पत्नी, जो इसकी माता के सामान थी, से इसकी शादी का जिक्र किसी ने नहीं किया. इस जानवर को इस तरह पेश किया गया है कि जैसे फरिश्ता! जोधाबाई से इसकी शादी की कहानी दिखा दी पर यह नहीं बताया कि जोधा असल में जहांगीर की पत्नी थी और शायद दोनों उसका उपभोग कर रहे थे. दिखाया यह गया कि इसने हिंदू लड़की से शादी करके उसका धर्म नहीं बदला, यहाँ तक कि उसके लिए उसके महल में मंदिर बनवाया! असलियत यह है कि बरसों पुराने वफादार टोडरमल की पूजा की मूर्ति भी जिस अकबर से सहन न हो सकी और उसे झट तोड़ दिया, ऐसे अकबर ने लाचार लड़की के लिए मंदिर बनवाया, यह दिखाना धूर्तता की पराकाष्ठा है. पूरी की पूरी कहानियाँ जैसे मुगलों ने हिन्दुस्तान को अपना घर समझा और इसे प्यार दिया, हेमू का सिर काटने से अकबर का इनकार, देश की शान्ति और सलामती के लिए जोधा से शादी, उसका धर्म परिवर्तन न करना, हिंदू रीति से शादी में आग के चारों तरफ फेरे लेना, राज महल में जोधा का कृष्ण मंदिर और अकबर का उसके साथ पूजा में खड़े होकर तिलक लगवाना, अकबर को हिंदुओं को जबरन इस्लाम क़ुबूल करवाने का विरोधी बताना, हिंदुओं पर से कर हटाना, उसके राज्य में हिंदुओं को भी उसका प्रशंसक बताना, आदि ऐसी हैं जो असलियत से कोसों दूर हैं जैसा कि अब आपको पता चल गयी होंगी. “हिन्दुस्तान मेरी जान तू जान ए हिन्दोस्तां” जैसे गाने अकबर जैसे बलात्कारी, और हत्यारे के लिए लिखने वालों और उन्हें दिखाने वालों को उसी के सामान झूठा और दरिंदा समझा जाना चाहिए… चित्तौड़ में तीस हजार लोगों का कत्लेआम करने वाला, हिंदू स्त्रियों को एक के बाद एक अपनी पत्नी या रखैल बनने पर विवश करने वाला, नगरों और गाँवों में जाकर नरसंहार कराकर लोगों के कटे सिरों से मीनार बनाने वाला, जिस देश के इतिहास में महान, सम्राट, “शान ए हिन्दोस्तां” लिखा जाए और उसे देश का निर्माता कहा जाए कि भारत को एक छत्र के नीचे उसने खड़ा कर दिया, उस देश का विनाश ही होना चाहिए. वहीं दूसरी तरफ जो ऐसे दरिंदे, नपुंसक के विरुद्ध धर्म और देश की रक्षा करता हुआ अपने से कई गुना अधिक सेनाओं से लड़ा, जंगल जंगल मारा मारा फिरता रहा, अपना राज्य छोड़ा, सब साथियों को छोड़ा, पत्तल पर घास की रोटी खाकर भी जिसने वैदिक धर्म की अग्नि को तुर्की आंधी से कभी बुझने नहीं दिया, वह महाराणा प्रताप इन इतिहासकारों और फिल्मकारों की दृष्टि में “जान ए हिन्दुस्तान” तो दूर “जान ए राजस्थान” भी नहीं था! उसे सदा अपने राज्य मेवाड़ की सत्ता के लिए लड़ने वाला एक लड़ाका ही बताया गया जिसके लिए इतिहास की किताबों में चार पंक्तियाँ ही पर्याप्त हैं. ऐसी मानसिकता और विचारधारा, जिसने हमें अपने असली गौरवशाली इतिहास को आज तक नहीं पढ़ने दिया, हमारे कातिलों और लुटेरों को महापुरुष बताया और शिवाजी और राणा प्रताप जैसे धर्म रक्षकों को लुटेरा और स्वार्थी बताया, को आज अपने पैरों तले रौंदना है. संकल्प कीजिये कि अब आपके घर में अकबर की जगह राणा प्रताप की चर्चा होगी. क्योंकि इतना सब पता होने पर यदि अब भी कोई अकबर के गीत गाना चाहता है तो उस देशद्रोही और धर्मद्रोही को कम से कम इस देश में रहने का अधिकार नहीं होना चाहिए.

अब तो न अकबर न बाबर से वहशी
दरिन्दे कभी पुज न पायें धरा पर
जो नाम इनका ले कोई अपनी जबाँ से
बता देना राणा की तलवार का बल

इस धूर्त दरिन्दे के पर्दाफाश के बाद, भारत के सच्चे सपूत को अग्निवीर का शत शत नमन :

कोई पूछे कितना था राणा का भाला
तो कहना कि अकबर के जितना था भाला
जो पूछे कोई कैसे उठता था भाला
बता देना हाथों में ज्यों नाचे माला
चलाता था राणा जब रण में ये भाला
उठा देता पांवों को मुग़लों के भाला
जो पूछे कभी क्यों न अकबर लड़ा तो
बता देना कारण था राणा का भाला..!!

‘महान’ अकबर जब मरा था तो उसके पास दो करोड़ से ज्यादा अशर्फियाँ केवल आगरे के किले में थीं , इसी तरह के और खजाने छह और जगह पर भी थे, इसके बावजूद भी उसने 1595 -1599 की भयानक भुखमरी के समय एक सिक्का भी देश की सहायता में खर्च नहीं किया..!!

एक बहुत बड़ा झूठ यह है कि फतेहपुर सीकरी अकबर ने बनवाया था. इसका कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है. बाकी दरिंदे लुटेरों की तरह इसने भी पहले सीकरी पर आक्रमण किया और फिर प्रचारित कर दिया कि यह मेरा है. इसी तरह इसके पोते और इसी की तरह दरिंदे शाहजहाँ ने यह ढोल पिटवाया था कि ताज महल इसने बनवाया है वह भी अपनी चौथी पत्नी की याद में जो इसके और अपने सत्रहवें बच्चे को पैदा करने के समय चल बसी थी!

इसी तरह के प्रयास के तहत भारत में गौरी की जीत और पृथ्वीराज चौहान की हार को वर्तमान प्रचलित इतिहास में एक अलग अध्याय के नाम से निरूपित किया जाता है। जिसका नाम दिया जाता है-राजपूतों की पराजय के कारण। राजपूतों की पराजय के लिए मौहम्मद गौरी के चरित्र में चार चांद लग गये हैं, और जो व्यक्ति नितांत एक लुटेरा और हत्यारा था उसे बहुत बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया है।
डा. शाहिद अहमद ने गोरी के चरित्र और उसके कार्यों का मूल्यांकन करते हुए उसके भीतर कौटुम्बिक प्रेम की प्रबलता, व्यक्तियों के चयन में उसके चरित्र की प्रवीणता अर्थात मानव चरित्र का पारखी होना, गुलामों का आश्रयदाता, स्थिति का परिज्ञान तथा लक्ष्य की प्रधानता, अदम्य उत्साह तथा धैर्य, उच्च कोटि की महत्वाकांक्षा, वीर योद्घा तथा दूरदर्शी राजनीतिज्ञ, भारत में मुस्लिम साम्राज्य का संस्थापक, लुटेरा न होकर एक साम्राज्य का निर्माता, अदभुत प्रशासकीय प्रतिभा से संपन्न साहित्य तथा कला का प्रेमी, धर्मपरायण आदि गुणों को प्रमुखता देकर गोरी को प्रशंसित किया है। न्यूनाधिक अन्य इतिहास कारों ने भी लगभग इन्हीं गुणों को गोरी के भीतर स्थान देकर उसका महिमामण्डन किया है। यदि ये गुण ही किसी व्यक्ति की महानता के या किसी देश के किसी विशेष भूभाग पर उसकी जीत के निश्चायक प्रमाण हैं तो ये गुण तो हमारे चरितनायक पृथ्वीराज चौहान में उससे कहीं अधिक गहराई से व्याप्त थे। अब तनिक पृथ्वीराज चौहान के भीतर देखें कि जो गुण गोरी को महानता दिलाने वाले बताये गये हैं, वो पृथ्वीराज चौहान में कितने थे?

Note : यहां सभी तथ्य अबुल फजल लिखित आईन ऐ अकबरी (अकबरनामा) तथा हिंदू महासभा की साईट व अन्य जगहों से सीधे संकलित व संपादित कर प्रस्तुत किये गये है और यह कतई मेरा पूरा लेखन नहीं हैॆ, बस मैनें संकलन संपादन मात्र कर अपने 3 हजार से ज्यादा मित्रों की मित्र सूची को जरिया बना कर सही इतिहास और भारत के असली रणनायकों व हिंदू नायकों की बहादुरी भरी वास्तविकता तथा मुसलोईड अकबर शैतान की असलियत को एक विस्तृत, वृहदतम मंच प्रदान करने की कोशिश मात्र की है ..!! 

उपरोक्त लिखित सब ऐतिहासिक तथ्य हैं और किसी मुसलोईड नौकर सरीखे सेक्यूलर या ऐतिहासिक जीव को किसी भी तरह का शक शुबहा हो ,बहस करनी हो तो जरिया ऐ पोस्ट सीधे “जिल्लेइल़ाही” से बात ऐ बहस कर ही ले..!!

वन्दे मातरम्

 इतिश्री इतिहास पुराणम् जय हिन्द

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Dr. Sudhir Vyas

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One Comment Add yours

  1. Jatin Dhanawat says:

    मित्र message clipped है और पूरा नहीं पढ़ा जा सका परन्तु जितना पढ़ा जा सका,
    वो श्रेष्ठ लेखन है| साधुवाद! आशा है की सत्य इतिहास अवश्य हमारे बच्चे पढ़
    पायेंगे| जय श्री राम!!

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