सिख धर्म या समुदाय ↩ अबूझ पहेली


मैनें आज 31 मार्च 2015 को फेसबुक पर अपनी पोस्ट जो निम्न लिखित शब्द समूह सरीखी पंक्तियों से शुरू की थी उसे विस्तृत लेख का रूप यहाँ दे रहा हूँ ।

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सिख पंथ को धर्म कब मान लिया गया ..??
और
सिख धर्म को मान्यता दे कर अल्पसंख्यक कब माना गया..?
साथ ही
खालिस्तान नामक विचार का जन्म ही कब हुआ..?

मित्रों, कई वर्ष पहले तक सिखों और असिख हिन्दुओं में विवाह-सम्बन्ध भी होते थे। तीसरी शक्ति की उपस्थित से ही इस प्रकार के झगड़े खड़े हुए हैं। वास्तव में आज भी इनका सम्प्रदाय-जीवन उन्हीं विचारों एवं अनुभूतियों से परिव्याप्त है, जिनसे कि शेष हिन्दुओं का। अभी वर्तमान काल में ही शताब्दी पूर्व प्रत्येक हिन्दू परिवार से एक पुत्र ‘सिख’ नाम धारण करने वाला हुआ करता था। हमारे परस्पर रक्त-सम्बन्ध आज तक चले आ रहे हैं….फिर ऐसा क्या हुआ कि सबकुछ बिखरने लगा, हर घर के पहले पुत्र के केश,कंघा कच्छा, कडा और कृपाण धारी सिख बनाने वाले हिंदू पराये हो गये और सिख अलग ‘धर्म’ की पहचान वाले बन गये…??

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चलें हम शनै: शनै: निहित इतिहास, महत्वकांक्षाओं और राजनीति की जडें खोदना शुरू करते हैं…

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वर्तमान पंजाब और सिख राजनीति के एक बडे चेहरे होते थे मास्टर तारासिंह – मास्टर तारासिंह ने प्रथम महायुद्ध के समय राजनीति में प्रवेश किया। उन्होंने सरकार की सहायता से सिक्खपंथ को बृहत हिन्दू समाज से पृथक करने के सरदार उज्जवलसिंह मजीठिया के प्रयास में हर संभव योग दिया। सरकार को प्रसन्न करने के लिए सेना में अधिकाधिक सिक्खों को भर्ती होने के लिए प्रेरित किया। सिक्खों को इस राजभक्ति का पुरस्कार मिला। सब रेलवे स्टेशनों का नाम गुरुमुखी में लिखा जाना स्वीकार किया गया और सिक्खों को भी मुसलमानों की भाँति इंडिया ऐक्ट 1919 में पृथक् सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया। महायुद्ध के बाद मास्टर जी ने सिक्ख राजनीति को कांग्रेस के साथ संबद्ध किया और सिक्ख गुरुद्वारों और धार्मिक स्थलों का प्रबंध हिंदू मठाधीशों और हिंदू पुजारियों के हाथ से छीनकर उनपर अधिकार कर लिया। इससे अकाली दल की शक्ति में अप्रत्याशित वृद्धि हुई। मास्टर तारासिंह शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी के प्रथम महामंत्री चुने गए। ग्रंथियों की नियुक्ति उनके हाथ में आ गई। इनकी सहायता से अकालियों का आंतकपूर्ण प्रभाव संपूर्ण पंजाब में छा गया। मास्टर तारासिंह बाद में कई बार शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष चुने गए।

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मास्टर तारासिंह ने सन् 1921 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया, पर सन् 1928 की भारतीय सुधारों संबंधी नेह डिग्री कमेटी की रिपोर्ट का इस आधार पर विरोध किया कि उसमें पंजाब विधानसभा में सिक्खों को 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया था। अकाली दल ने कांग्रेस से अपना संबंध विच्छेद कर लिया। 1930 में पूर्ण स्वराज्य का संग्राम प्रारंभ होने पर मास्टर तारासिंह तटस्थ रहे और द्वितीय महायुद्ध में अंग्रेजों की सहायता की। सन् 1946 के महानिर्वाचन में मास्टर तारासिंह द्वारा संगठित “पथिक” दल अखंड पंजाब की विधानसभा में सिक्खों को निर्धारित 33 स्थानों में से 20 स्थानों पर विजयी हुआ। मास्टर जी ने सिखिस्तान की स्थापना के अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए श्री जिन्ना से समझौता किया। पंजाब में लीग का मंत्रिमंडल बनाने तथा पाकिस्तान के निर्माण का आधार ढूँढ़ने में उनकी सहायता की लेकिन राजनीति के चतुर खिलाड़ी जिन्ना से भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। भारत विभाजन की घोषणा के बाद अवसर से लाभ उठाने की मास्टर तारासिंह की योजना के अंतर्गत ही देश में दंगों की शुरुआत अमृतसर से हुई, पर मास्टर जी का यह प्रयास भी विफल रहा। लेकिन उन्होंने हार न मानी; सतत संघर्ष उनके जीवन का मूलमंत्र था। मास्टर जी ने संविधान परिषद में सिक्खों के सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व को कायम रखने, भाषासूची में गुरुमुखी लिपि में पंजाब को स्थान देने तथा सिक्खों को हरिजनों की भाँति विशेष सुविधाएँ देने पर बल दिया और सरदार पटेल से आश्वासन प्राप्त करने में सफल हुए। इस प्रकार संविधानपरिषद् द्वारा भी सिक्ख संप्रदाय के पृथक् अस्तित्व पर मुहर लगवा दी तथा सिक्खों को विशेष सुविधाओं की व्यवस्था कराकर निर्धन तथा दलित हिंदुओं के धर्मपरिवर्तन द्वारा सिक्ख संप्रदाय के त्वरित प्रसार का मार्ग उन्मुक्त कर दिया। तारासिंह इसे सिक्ख राज्य की स्थापना का आधार मानते थे। सन् 1952 के महानिर्वाचन में कांग्रेस से चुनाव समझौते के समय वे कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा पृथक् पंजाबी भाषी प्रदेश के निर्माण तथा पंजाबी विश्वविद्यालय की स्थापना का निर्णय कराने में सफल हुए।इन्ही मास्टर तारासिंह पर Encyclopedia Britannica कहता है –

” Sikhs played so important a role in the British Indian Army that many of their leaders hoped that the British would reward them at the war’s end with special assistance in carving out their own nation from the rich heart of Punjab’s fertile canal-colony lands, where, in the “kingdom” once ruled by Ranjit Singh (1780-1839), most Sikhs lived. Since World War I, Sikhs had been equally fierce in opposing the British raj, and, though never more than 2 percent of India’s population, they had as highly disproportionate a number of nationalist “martyrs” as of army officers. A Sikh Akali Dal (“Party of Immortals”), which was started in 1920, led militant marches to liberate gurdwaras (“doorways to the Guru”; the Sikh places of worship) from corrupt Hindu managers. Tara Singh (1885-1967), the most important leader of this vigorous Sikh political movement, first raised the demand for a separate Azad (“Free”) Punjab in 1942. By March 1946, Singh demanded a Sikh nation-state, alternately called “Sikhistan” or “Khalistan” (“Land of the Sikhs” or “Land of the Pure”).”

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दस्तावेजी सत्य व तथ्य हैं कि भारत विभाजन की प्रक्रिया के समय अकाली दल का मास्टर तारा सिंह जो कि जिन्ना का मित्र भी था उसने क्रिस्प कमीशन से जाकर सिक्खों के लिए एक अलग देश की मांग की जिसका नाम था खालिस्तान, क्रिस्प को खालिस्तान विषय पर कुछ ज्ञान नही था अधिक तो उसने मास्टर तारा सिंह को कहा कि वो एक सर्वे करे पूरे पंजाब का, और यदि मास्टर तारा सिंह पूरे पंजाब (भारत-पाकिस्तान ) में से एक भी सिख बहुसंख्यक जिला सिद्ध कर देगा तो वो खालिस्तान की मांग पर भी विचार करेगा ..

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क्रिस्प को समय भी मिल गया, अंतत: मास्टर तारा सिंह उस समय एक भी सिख Majority जिला पूरे पंजाब सूबे में नही दिखा पाया और उसका खालिस्तान का सपना अधूरा रह गया उसके बाद भी खालिस्तान की मांग को लेकर अकाली दल और मास्टर तारा सिंह नेहरु के चक्कर लगाते रहे परन्तु नेहरु ने इस मांग को अस्वीकार कर दिया उस समय PEPSU नामक एक राज्य होता था भारत में जिसका नाम है (Eastern Punjab & Patiala State Union), इस PEPSU राज्य का बोर्डर पहले दिल्ली के पास होता था मास्टर तारा सिंह और अकाली दल ने पहले भाषा के आधार पर PEPSU राज्य का विभाजन करवाया पटियाले से उस तरफ गुरुमुखी लिपि को राज्य में लागू कर दिया गया और अम्बाला से इस तरफ देवनागरी लिपि ही रही उसके बाद नवम्बर 1966 को मास्टर तारा सिंह और अकाली दल ने मिलकर PEPSU राज्य को तीन राज्यों में बाँट दिया (Trifurcation) गया और पंजाब, हरियाणा, तथा हिमाचल प्रदेश का निर्माण हुआ कालचक्र कहिये या कुछ भी बाद में मास्टर तारा सिंह की पुत्री की हत्या भी खालिस्तान आतंकवादियों द्वारा ही की गई !

मूलतः अकाल शब्द का शब्दार्थ है – ‘कालरहित’।

भूत, भविष्य तथा वर्तमान से परे, पूर्ण अमरज्योति ईश्वर, जो जन्ममरण के बंधन से मुक्त है और सदा सच्चिदानंद स्वरूप रहता है, उसी का अकाल शब्द द्वारा बोध कराया गया है। उसी परमेश्वर में सदा रमण करने वाला अकाली कहलाया। कुछ लोग इसका अर्थ काल से भी न डरने वाला लेते हैं। परंतु तत्वतः दोनों भावों में कोई भेद नहीं है। सिख धर्म में इस शब्द का विशेष महत्व है। सिख धर्म के प्रवर्तक गुरू नानक देव ने परमपुरुष परमात्मा की आराधना इसी अकालपुरुष की उपासना के रूप में प्रसारित की। उन्होंने उपदेश दिया कि हमें संकीर्ण जातिगत, धर्मगत तथा देशगत भावों से ऊपर उठकर विश्व के समस्त धर्मों के मानने वालों से प्रेम करना चाहिए। उनसे विरोध न करके मैत्रीभाव का आचरण करना चाहिए, क्योंकि हम सब उसी अकालपुरुष की संतान हैं। सिख गुरुओं की वाणियों से यह स्पष्ट है कि सभी सिक्ख संतों ने अकालपुरुष की महत्ता को और दृढ़ किया और उसी के प्रति पूर्ण उत्सर्ग की भावना जागृत की। प्रत्येक अकाली के लिए जीवन निर्वाह का एक बलिदानपूर्ण दर्शन बना जिसके कारण वे अन्य सिक्खों में पृथक दिखाई देने लगे।

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इसी परंपरा में सिक्खों के छठे गुरू गोविंदसिंह ने अकाल बुंगे की स्थापना की। बुंगे का अर्थ है एक बड़ा भवन जिसके ऊपर गुंबज हो। इसके भीतर अकाल तख्त (अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के सम्मुख) की रचना की गई और इसी भवन में अकालियों की गुप्त मंत्रणाएँ और गोष्ठियाँ होने लगीं। इनमें जो निर्णय होते थे उन्हें गुरुमताँ अर्थात् गुरु का आदेश नाम दिया गया। धार्मिक समारोह के रूप में ये सम्मेलन होते थे। मुगलों के अत्याचारों से पीड़ित जनता की रक्षा ही इस धार्मिक संगठन का गुप्त उद्देश्य था। यही कारण था कि अकाली आंदोलन को राजनीतिक गतिविधि मिली। बुंगे से ही गुरुमताँ को आदेश रूप से सब ओर प्रसारित किया जाता था और वे आदर्श कार्य रूप में परिणत किए जाते थे। अकाल बुंगे का अकाली वही हो सकता था जो नामवाणी का प्रेमी हो और पूर्ण त्याग और विराग का परिचय दे। ये लोग बड़े शूर वीर, निर्भय, पवित्र और स्वतंत्र होते थे। निर्बलों, बूढ़ों, बच्चों और अबलाओं की रक्षा करना ये अपना धर्म समझते थे। सबके प्रति इनका मैत्रीभाव रहता था। मनुष्य मात्र की सेवा करना इनका कर्तव्य था। अपने सिर को हमेशा ये हथेली पर लिए रहते थे।

30 मार्च सन् 1699 को गुरू गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की। इस पंथ के अनुयायी अकाली ही थे। औरंगजेब के अत्याचारों का मुकाबला करने के लिए अकाली खालसा सेना के रूप में सामने आए। गुरु ने उन्हें नीले वस्त्र पहनने का आदेश दिया और पाँच ककार (कच्छ, कड़ा, कृपाण, केश तथा कंघा) धारण करना भी उनके लिए अनिवार्य हुआ। अकाली सेना की एक शाखा सरदार मानसिंह के नेतृत्व में निहंग सिंही के नाम से प्रसिद्ध हुई। फारसी भाषा में निहंग का अर्थ मगरमच्छ है जिसका तात्पर्य उस निर्भय व्यक्ति से है जो किसी अत्याचार के समक्ष नहीं झुकता। इसका संस्कृत अर्थ निसर्ग है अर्थात् पूर्ण रूप से अपरिग्रही, पुत्र, कलत्र और संसार से विरक्त पूरा-पूरा अनिकेतन। निहंग लोग विवाह नहीं करते थे और साधुओं की वृत्ति धारण करते थे। इनके जत्थे होते थे और उनका एक अगुआ जत्थेदार होता था। पीड़ितों, आर्तों और निर्बलों की रक्षा के साथ-साथ सिक्ख धर्म का प्रचार करना इनका पुनीत कर्तव्य था। जहाँ भी ये ठहरते थे, जनता इनका आदर करती थी। जिस घर में ये प्रवेश पाते थे वह अपने को परम सौभाग्यशाली समझता था। ये केवल अपने खाने भर को ही लिया करते थे और आदि न मिला तो उपवास करते थे। ये एक स्थान पर नहीं ठहरते थे। कुछ लोग इनकी पक्षीवृत्ति देखकर इन्हें विहंगम भी कहते थे। सचमुच ही इनका जीवन त्याग और तपस्या का जीवन था। वीर ये इतने थे कि प्रत्येक अकाली अपने को सवा लाख के बराबर समझता था। किसी की मृत्यु की सूचना भी यह कहकर दिया करते थे कि वह चढ़ाई कर गया, जैसे मृत्यु लोक में भी मृत प्राणी कहीं युद्ध के लिए गया हो। सूखे चने को ये लोग बदाम कहते थे और रुपए और सोने को ठीकरा कहकर अपनी असंग भावना का परिचय देते थे।

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महाराजा रणजीत सिंह के समय अकाली सेना अपने चरम उत्कर्ष पर थी। इसमें देश भर के चुने सिपाही होते थे। मुसलमान गाजियों का ये डटकर सामना करते थे। मुल्तान, कश्मीर, अटक, नौशेरा, जमशेद, अफगानिस्तान आदि तक इन्हीं के सहारे रणजीत सिंह ने अपना साम्राज्य बढ़ाया। अकाल सेना के पतन का कारण कायरों और पापियों का छद्मवेश में सेना के निहंगों में प्रवेश पाना था इससे इस पंथ को बहुत धक्का लगा।

अंग्रेजों ने भी अकालियों की वीरता से भयभीत होकर हमेशा उन्हें दबाने का प्रयास किया। इधर अकाली इतिहास में एक नया अध्याय आरंभ हुआ। जो गुरुद्वारे और धर्मशालाएँ दसों सिक्ख गुरुओं ने धर्मप्रचार और जनता की सेवा के लिए स्थापित की थीं और जिन्हें सदृढ़ रखने के लिए महाराज रणजीत सिंह ने बड़ी-बड़ी जागीरें लगवा दी थीं वे अंग्रेजी राज्य के समय अनेक नीच आचरण वाले महंतों और पुजारियों के अधिकार में पहुँच गई थीं। उनमें सब प्रकार के दुराचरण होने लगे थे। उनके विरोध में कुछ सिक्ख तरुणों ने गुरुद्वारों के उद्धार के लिए अक्टूबर, सन् 1920 में अकालियों की एक नई सेना एकत्रित की। इसका उद्देश्य अकालियों की पूर्व परंपरा के अनुसार त्याग और पवित्रता का व्रत लेना था। इन्होंने कई नगरों में अत्याचारी महंतों को हटाकर मठों पर अधिकार कर लिया। इस समय गुरुनानक की जन्मभूमि ननकाना साहब (जिला शेखपुरा, वर्तमान पाकिस्तान में) के गुरुद्वारे पर महंत नारायण दास का अधिकार था। उससे मुक्त करने के लिए भी गुरुमता (प्रस्ताव) पास किया गया। सरदार लक्ष्मण सिंह ने 200 अकालियों के साथ चढ़ाई की; परंतु उनका तथा उनके साथियों का बड़ी निर्दयता के साथ वध कर दिया गया और उन्हें नाना प्रकार की क्रूर यातनाएँ दी गईं। और भी बहुत से मठों को छीनने में अकालियों को अनेक बलिदान करने पड़े।

ब्रिटिश सरकार ने पहले महंतों की भरपूर सहायता की परंतु अंत में अकालियों की जीत हुई। सन् 1925 तक समस्त गुरुद्वारे, शिरोमणि गुरुद्वारा कमेटी के अंतर्गत धारा 195 के अनुसार आ गए। अकालियों की सहायता में महात्मा गांधी ने बड़ा योग दिया और भारतीय कांग्रेस ने अकाली आंदोलन को पूरा-पूरा सहयोग दिया।सन् 1925 से गुरुद्वारा ऐक्ट बनने के पश्चात् इसी के अनुसार गुरूद्वारा प्रबंधक समिति / GPC का पहला निर्वाचन 2 अक्टूबर 1926 को हुआ। अब SGPC यानि शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक समिति का निर्वाचन प्रति पाँचवें वर्ष होता है इस समिति का प्रमुख कार्य गुरुद्वारों की देखभाल, धर्म प्रचार, विद्या का प्रसार इत्यादि है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के अतिरिक्त एक केंद्रीय शिरोमणि अकाली दल भी अमृतसर में स्थापित है। इसके जत्थे हर जिले में यथाशक्ति गुरुद्वारों का प्रबंध और जनता की सेवा करते हैं।

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असल सशस्त्र पंजाब की खालिस्तान समस्या की शुरुआत 1970 के दशक से अकाली राजनीति में खींचतान और अकालियों की पंजाब संबंधित माँगों के रूप में हुई थी। 1973 और 1978 ई. में अकाली दल ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित किया। मूल प्रस्ताव में सुझाया गया था कि भारत की तत्कालीन केंद्र सरकार का केवल रक्षा, विदेश नीति, संचार और मुद्रा पर अधिकार हो जबकि अन्य विषयों पर राज्यों को पूर्ण अधिकार हों यानि बिलकुल कश्मीर की तरह ,सरासर पंजाब को भी धारा 370 सरीखी लगा कर स्वायत्तता देने सरीखी मांगे,, वे भारत के उत्तरी क्षेत्र में स्वायत्तता चाहते थे उनकी माँग थी कि- चंडीगढ़ केवल पंजाब की ही राजधानी हो, पंजाबी भाषी क्षेत्र पंजाब में शामिल किए जाएँ, नदियों के पानी के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय की ही राय ली जाए, ‘नहरों के हेडवर्क्स’ और पन-बिजली बनाने के मूलभूत ढाँचे का प्रबंधन पंजाब के पास हो, फ़ौज में भर्ती काबिलियत के आधार पर हो और इसमें सिखों की भर्ती पर लगी कथित सीमा हटाई जाए, तथा अखिल भारतीय गुरुद्वारा क़ानून बनाया जाए. अकालियों का समर्थन और प्रभाव बढ़ने लगा। इसी बीच अमृतसर में 13 अप्रैल 1978 को अकाली कार्यकर्ताओं और निरंकारियों के बीच हिंसक झड़प हुई। इसमें 13 अकाली कार्यकर्ता मारे गए। रोष दिवस में सिख धर्म प्रचार की संस्था के प्रमुख जरनैल सिंह भिंडरांवाले ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। अनेक पर्यवेक्षक इस घटना को पंजाब में चरमपंथ की शुरुआत के रूप में देखते हैं। भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी पर सिख समुदाय में अकाली दल के जनाधार को घटाने के लिए जरनैल सिंह भिंडरांवाले को परोक्ष रूप से प्रोत्साहन देने का आरोप लगाया जाता है।

1980 में ही मूल अकाली दल का बादल गुट और तलवंडी गुट में विभाजन हो गया था तत्पश्चात अकाली दल – बादल का नाम शिरोमणि अकाली दल हो गया जो अभी पंजाब का सत्ताधारी दल है,, तलवंडी हुट का प्रभुत्व शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी / SGPC पर और संपूर्ण सिख समाज पर है।

पर हाँ नवंबर 2014 में पंजाब में सिख संस्थाओं को शिरोमणि अकाली दल “बादल” के चुंगल से छुड़ाने के लिए पुराने संयुक्त अकाली दल “यूनाईटेड अकाली दल” का पुनर्गठन किया गया था दमदमी टकसाल के प्रवक्ता भाई मोहकम सिंह को इसका संयोजक बनाया गया , गुरदीप सिंह बठिंडा एसएडी के महासचिव बनाया गया, इसके साथ ही 26 सदस्यीय एक तदर्थ समिति भी गठिन की गई , अमृतसर के गुरूनानक भवन में आयोजित बैठक में एसएडी के पुनगर्ठन की घोषणा करते हुए गुरदीप सिंह ने कहा कि शिरोमणी अकाली दल का इतिहास कुर्बानियों वाला रहा है लेकिन बादल ने इसकी पहचान को नुकसान पहुंचाया है , आज के अकाली दल बादल में रेत, बजरी तथा नशा माफिया शामिल हो गए हैं इसलिए सिख इतिहास की पहचान कायम रखने के लिए एसएडी के रूप में नए अकाली दल का गठन जरूरी हो गया था।

यहाँ सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि “यूनाईटेड अकाली दल” का गठन जरनैल सिंह भिंडरावाले के पिता बाबा जोगिन्दर सिंह ने किया था।

कुछ पृथकतावाद के ही स्पष्ट होते इतिहास से ही समझे मित्रों….?

नहीं…??

क्योंकि जब बात किसी स्पष्ट बिंदु पर हो रही हो तो हम क्यों जबरदस्ती का विचार थोपें ही जब “आधिकारिक, दस्तावेजी और संवैधानिक रूप से सिख धर्म है, अल्पसंख्यक श्रैणी है और हिंदू धर्म से अलग है।” तो हम और पुराने इतिहास की ओर चलते हैं और प्रमाण ले आते हैं,, आओ ….

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“गुरू गोविंदसिंह जी ने ही सिख समुदाय को सिख पंथ घोषित कर दिया था… 1699 में, गुरु जी ने अपने अनुयायियों के लिए हुकमनामा (प्राधिकारी पत्र) भेजा जिसमे उन्होंने उनसे 13 अप्रैल 1699 वैसाखी (वार्षिक किसानी का त्यौहार ) के दिन में आनंदपुर मे एकत्र होने अनुरोध किया । आनंदपुर (जिसे अब केशगढ़ साहिब कहा जाता है ) में उन्होंने एक छोटी सी पहाड़ी पर एक छोटे तम्बू को खड़ा किया और उसके द्वार से एकत्र हुई मण्डली को संबोधित किया। सम्बोधित करते हुए उन्होंने उन्होंने उन सभी से पूछा की ‘वे कोन है” तो सभी ने जवाब दिया की – “आप हमारे गुरु हैं।” फिर उन्होंने प्रश्न किया की “वे सभी कोन है” तो सभी ने जवाब दिया की -“हम आपके सिक्ख (शिष्य) है। इस रिश्ते को याद दिलाने के बाद उन्होंने कहा की “आज आपके गुरु को अपने सिखों से कुछ जरूरत है।” तब सभी ने कहा “हुकुम करो, सच्चे पातशाह “। फिर उन्होंने अपनी तलवार की तरफ इशारा करते हुए कहा की ” मुझे एक ऐसे सेवक की जरुरत है जो अपने सिर का बलिदान करने के लिए तैयार हो ” । जब पहली बार कहने पर कोई जवाब न आया तो उन्होंने दुबारा कहा पर फिर भी कोई जवाब न मिला लेकिन तीसरी आमंत्रण पर, दया राम (जो बाद में भाई दया सिंह के रूप में जाने गए) आगे आए और गुरु के लिए अपने सिर की पेशकश की। तब गुरु गोबिंद राय उन्हें लेकर तम्बू के अंदर गए और जब वापस आये तो उनकी तलवार से खून टपकता था । उसके बाद उन्होंने एक और सिर की मांग की। एक और स्वयंसेवक आगे आए, और उसके साथ उन्होंने तम्बू में प्रवेश किया। गुरु फिर से अपनी रक्त भरी तलवार के साथ बाहर आये । ऐसा और तीन बार हुआ । पांच बार ऐसा होने के बाद वो तम्बू से पांचो सेवकों को नए कपड़ों में तम्बू से बाहर लाये उन पांचो को कुछ भी नुकसान नहीं पंहुचा था।

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गुरु जी ने फिर एक लोहे की कटोरी में साफ पानी डाला और उसमें पतासे (पंजाबी मिठास), डाले और खंडा (दोधारी तलवार) से उसे घोलने लगे। ऐसा करते समय वह आदि ग्रंथ की पंक्तियों का पाठ भी कर रहे थे । उन्होंने मीठे पानी के इस मिश्रण को अमृत (“अमृत”) नाम दिया और उसे इन पांच पुरुषों को पिलाया । स्वेच्छा से अपने गुरु के लिए अपने जीवन का बलिदान करने को तैयार इन पांचो को गुरु जी द्वारा “पंज प्यारे” का खिताब दिया गया । वे खालसा पंथ की दीक्षा (baptized) लेने वाले पहले के सिख थे : दया राम ( भाई दया सिंह ), धरम दास ( भाई धरम सिंह ), हिम्मत राय ( भाई हिम्मत सिंह ), मोहकम चंद ( भाई मोहकम सिंह ), और साहिब चंद ( भाई साहिब सिंह )। उन्होंने उन सब को नाम दिया ” सिंह “(शेर), और सामूहिक रूप से “खालसा” कहा । इसके बाद उन्होंने जयकारा (नारा ) लगाया “वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतह” अर्थात ‘खालसा सच (इश्वर) का है, और जीत सच की है’ । गुरु जी ने फिर उन पांचो के सामने नतमस्तक हो कर उन से अमृत पिया और इस तरह दीक्षा प्राप्त वाले वह खालसा पंथ के छठे सदस्य बने । इस प्रकार उनका नाम “गुरु गोबिंद राय” से “गुरु गोबिंद सिंह” हुआ  उन्होंने महिलाओं को भी खालसा पंथ में सामान स्थान दिया और उन्हें भी अमृत पी कर दीक्षा लेने को कहा। दीक्षा लेने वाली महिलाये अपने नाम के आगे “कौर” (राजकुमारी) लगाने को कहा खालसा पंथ के सदस्य आज गुरु गोबिंद को पिता के रूप और साहिब कौर को माता के रूप में देखते है इसके बाद गुरु गोबिंद सिंह ने उन्हें संबोधित किया –

” अब से आप जातिविहीन बन गए हैं। अब से आप किसी भी प्रकार के कर्मकांड चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान नहीं करेंगे न ही आप किसी भी तरह के अंधविश्वास में विश्वास करेंगे बल्कि सिर्फ एक भगवान को मानेगे जो की सभी का रक्षक, है और वो ही निर्माता और विध्वंसक है । इस नए रूप मै अब कोई भी उच – निच का भेद नहीं होगा और अब सबसे निम्नं भी सबसे उच्चतम के साथ रहेगा और एक दूसरे को भाई की तरह मानेगा । अब आप के लिए कोई तीर्थ नहीं, और न ही कोई तपस्या बल्कि गृहस्थ का शुद्ध जीवन होगा जिसे भी आप जरुरत पड़ने पर धर्म के पर बलिदान करने के लिए तैयार रहोगे । महिलाओं को हर तरह से पुरुषों के बराबर का हक़ होगा। अब उनके लिए कोई परदा (घूंघट) प्रथा नहीं होगी और न ही सती प्रथा (पति की चिता पर एक विधवा को जिंदा जलाने की प्रथा ) होगी । जो भी अपनी बेटी को मारता है, उसे खालसा पंथ से सदा के लिए बहिष्कार कर दिया जायेगा उसके साथ कोई भी व्यवहार नहीं किया जाएगा।”
बस यहीं से सिख आम हिंदुओं से अलग नियम निर्देश सहित, पवित्र किताब गुरूग्रंथ साहिब समेत पूर्णतया पंथ / धर्म बन गये।

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गुरू गोविंदसिंह जी के पिता गुरु तेग बहादुर जी का असली नाम त्याग मल सोढ़ी था , इन्हें हिमाचल प्रदेश के बिलास पुर के राजा ने अपने यहाँ आश्रय दिया था क्यूंकि उस समय सिख पन्थ इन्हें अपना गुरु मानने को र्तैयार नही थे, अकाल तख़्त ने भी अमृतसर आने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था, ऐसा sikhiwiki.net पर ही पढ़ सकते हैं  , बिलास पुर के राजा ने जो गाँव रहने को दिया था उस का नाम रखा गया चक-नानके, जिसको कि बाद में आनंदपुर साहिब का नाम दिया गया , यह बात भी इतिहास में दर्ज है कि इसी बिलासपुर के राजा की मृत्यु के बाद जो अगले राजा बने उनके पुत्र राजा भीमचंद, उन्ही के विरुद्ध गुरु गोविन्द सिंह ने तलवार उठाई थी जो कि आप Battle of Bhangani के नाम से सर्च करके पढ़ सकते हैं ,राजा भीमचाँद जी के पास कुछ हिन्दू गए थे शिकायत करने कि गुरु गोविन्द सिंह हिन्दुओं को धर्मान्तरित कर रहे हैं, हिन्दू देवी देवताओं के विरुद्ध अमर्यादित टिप्पणियाँ करते हैं , राजा भीमचंद जी ने गुरु गोविन्द सिंह जी को बिलासपुर में आमंत्रित किया और उनसे निवेदन किया था कि कृपया आप ऐसा कार्य न करें जिससे हिन्दू भावनाओं को ठेस पहुंचे, उस समय गुरु गोविन्द सिंह जी ने आश्वासन दे दिया था परन्तु बाद में न जाने ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने राजा भीमचंद जी के विरुद्ध युद्ध का आह्वान किया ,80000 की भीमचंद की सेना के सामने 8000 सिख सेना थी, और फिर भी सिख इतिहास में यह लिखा जाता है कि राजा भीमचंद जी ने भयाक्रांत होकर गुरु गोविन्द सिंह जी के सामने संधि का प्रस्ताव रखा , Battle of Bhangani के बाद राजा भीमचंद जी ने गढवाल नरेश, मिथिला नरेश, नेपाल नरेश, दरभंगा नरेश आदि के साथ एक syndicate बनाई और औरंगजेब को tax देने से मना कर दिया गया , औरंगजेब ने अपनी सेना भेजी बिलासपुर की और परन्तु उस सेना ने पहले आनंदपुर के किले को ही घेर लिया , 8 महिनो तक आनंदपुर साहिब के किले के बाहर मुगल सेना डेरा डाल कर बैठी रही, कोई युद्ध नही हुआ इन 8 महीनों में ,  8 महीनों बाद गुरु गोविन्द सिंह जी ने पंज प्यारों को पानी में बताशे घोल कर अमृत बना कर पिलाया और खालसा पन्थ का निर्माण किया जिसके तुरंत बाद ही पंज प्यारों ने गुरु गोविन्द सिंह जी से यह निवेदन किया कि आप यहाँ से चले जाइए समय रहते, बाकी जो होगा वो हम देख लेंगे ,गुरु गोविन्द जी अपने कुछ साथियों के साथ किले के गुप्त दरवाजे से अपने संघर्ष हेतु निकल पड़े , उसके बाद चमकौर गढ़ी के युद्ध का उल्लेख प्राप्त होता है, वहां पर भी मुगल सेना डेरा डाल कर बैठी हुई थी वहां पर गुरु गोविन्द जी पर खतरा था तो एक योजना बनाई गई जिसके अंतर्गत गनी खान और नबी खान नामक दो मुसलमानों ने गुरु गोविन्द सिंह जी को सूफियों की भांति नीले वस्त्र पहनने का अनुरोध किया गुरु गोविन्द सिंह जी बहुत चतुर थे वो गनी खान और नबी खान की योजना समझ गये अत: टर्न एक रंगाई वाला बुलाया गया और एक वस्त्र कू नीले रंग में रंगवाया गया फिर एक दो मंजिला पालकी बनवाई गई (A double-storeyed cell) जिसमे बिठा कर गुरु गोविन्द सिंह जी को एक महान सूफी संत बता कर मुगल सेना के बीच में से निकाल कर ले गये और गुरु गोविन्द जी के प्राणों की रक्षा हुई परन्तु कोई युद्ध नही हुआ फिर भी इस महान युद्ध की महान विजय गाथा को “उच्च दा पीर” नामक गुरुद्वारा बना कर अतुलनीय सम्मान दिया जाता है ..

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उसके कुछ दिनों बाद गुरु गोविन्द सिंह जी ने औरंगजेब की मनसबदारी स्रीकार की और दक्षिण की और प्रस्थान किया कुछ समय बाद औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात उसके बेटों की सत्ता प्राप्त ह्रेतु आपसी संघर्ष में गुरु गोविन्द सिंह जी ने औरंगजेब के बड़े बेटे को गद्दी पर बिठाने में सहायता भी की अन्यथा मुगल सत्ता समय समय के लिए लुप्तप्राय भी हो सकती थी कुछ इतिहासकार मानते हैं कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि मुगल कमजोर न हों, मराठे शक्तिशाली न हों और सिख पन्थ को मराठों द्वारा या हिन्दू साम्राज्य द्वारा कोई हानि न पहुंचे, दक्षिण की और प्रस्थान के बाद गुरु गोविन्द सिंह जी की भेंट एक मराठी ब्राह्मण लक्ष्मण दास भारद्वाज उर्फ़ संत माधव दास उर्फ़ बन्दा बैरागी उर्फ़ बन्दा सिंह बहादुर जी से हुई लक्ष्मण दास भारद्वाज को अपनी युवावस्था में वैराग्य प्राप्त हुआ और वो साधना में लीन होकर एक महान संत हुए जिनसे उनका नाम हुआ संत माधव दास, कहते हैं कि उनके पास अनेक शक्तियाँ थीं उन्होंने गुरु गोविन्द सिंह जी को अपने आश्रम में आश्रय दिया और अनेकानेक औषधि आदि से उनका उपचार एवं चिकित्सा का कार्य किया बाद में गुरु गोविन्द सिंह जी पर हुए अत्याचार का बदला लेने हेतु संत माधव दास उर्फ़ बन्दा बैरागी उर्फ़ बना सिंह बहादुर उत्तर भारत कि और प्रस्थान कर गये ,लक्ष्मण दास भारद्वाज को कुछ इतिहासकार हिमाचल या जम्मू का डोगरा राजपूत भी बताते हैं ,,

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उत्तर भारत में पहुँचने के बाद बन्दा सिंह बहादुर उर्फ़ बन्दा बैरागी ने सभी हिन्दुओं और सिखों को लेकर एक सेना बनाई और सबको प्रशिक्षित किया, उन्हें तीरंदाजी, तलवार बाजी, सामरिक कला आदि सब सिखा कर युद्ध में पारंगत किया आज सिखों के महोत्सवों में जो हैरत अंगेज़ कारनामे किये जाते हैं वो सब बन्दा बैरागी जी की ही देन है बन्दा बैरागी ने अपने युद्ध कौशल से करनाल, जीन्द, सहारन पूत, महेंद्र गढ़, पटियाला, आदि सब क्षेत्र जीत लिए और सभी भूमि उन्होंने ग़रीबों में बाँट दी जब बन्दा बैरागी ने लाहौर की और आक्रमण किया तो औरंगजेब के दुसरे बेटे फर्रुखसियर जो कि अपने भाई से गद्दी हथिया चूका था उसने गुरु गोविन्द सिंह जी की पत्नी माता सुन्दरी देवी तथा दूसरी पत्नी जिन्हें गुरु गोविन्द सिंह जी की अध्यात्मिक पत्नी कहा जाता है, दोनों फर्रुखसियर की नजरबंदी में दिल्ली में रह रही थीं, मुगल बादशाह फर्रुखसियर ने दोनों गुरु माताओं से यह आग्रह किया कि बन्दा बैरागी को रोकें लाहौर पर आक्रमण करने से,, बदले में सबको जागीर तथा धन आदि देने का आश्वासन दिया तब गुरु माताओं ने पहला पत्र लिखा बन्दा बैरागी को , जिसके उत्तर में बन्दा बैरागी ने लिखा कि मैं नही रुक सकता, मैं गुरु के साथ हुए अत्याचार का बदला लेने आया हूँ  दूूसरे पत्र में भी गुरु माताओं ने ऐसा ही निवेदन किया परन्तु बन्दा बैरागी ने पुन: साफ़ मना कर दिया तीसरा पत्र गुरु माताओं ने बन्दा बैरागी की सेना के सिख जनरल विनोद सिंह को लिखा और आदेश दिया कि “बन्दा बैरागी का साथ न दें” , अगले दिन लाहौर के किले पर जब आक्रमण किया गया तो चलती लड़ाई से बन्दा बैरागी की सेना के सभी सिख मुगलों के साथ जाकर खड़े हो गये और बन्दा बैरागी को पीछे हटना पड़ा !

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अगले दिन पुन: जब बन्दा बैरागी लाहौर पर आक्रमण हेतु अपने किले से बाहर निकले तो मुगलों ने चालाकी की और सभी सिखों को मुगल सेना के सबसे आगे खड़ा कर दिया गया बन्दा बैरागी असमंजस में पड़ गये कि इन बच्चों को तो मैंने अपने हाथों से प्रशिक्षित किया है इन पर मैं शस्त्र कैसे चलाऊं ?

बन्दा बैरागी और कई सैनिकों को किले के अंदर रहना पड़ा कई महीनों तक , कई महीनों बाद बन्दा बैरागी के किले में जब राशन पानी आदि समाप्त हो गया था तो लोगों को मरता देख कर बन्दा बैरागी ने आत्म समर्पण किया, बन्दा बैरागी और उनके सैकड़ों साथियों को गिरफ्तार करके दिल्ली लाया गया , बन्दा बैरागी तथा सभी साथियों को दिल्ली के चांदनी चौक समेत कई इलाकों में रेहड़ी पर एक पिंजरा बना कर उसमे बिठा कर नुमाइश के लिए बिठाया जाता था , लोग उन पर तरह तरह की फब्तियां कसते और मल मूत्र आदि फेंकते रहते थे , दिल्ली के महरौली के पास स्थित क़ुतुब मीनार के पास सन 1716 में बन्दा बैरागी को इस्लाम स्वीकार करने को कहा गया परन्तु बन्दा बैरागी ने नही किया , उनके 4 वर्ष के छोटे पुत्र को भी इस्लाम स्वीकार करने को कहा गया परन्तु वो न माना और मुगलों ने 4 वर्षीय पुत्र का दिल निकाल कर बन्दा बैरागी के मुंह में डालने का प्रयास किया गया अगली सुबह ब्रह्म-मुहूर्त में बन्दा बैरागी ने अपने 8 वर्षीय बड़े पुत्र के साथ समाधी के माध्यम से ब्रह्मलीन हुए l

अब ये तो हुई मुगल समय की ही आधिकारिक व दस्तावेजी अकाट्य तथ्यात्मक कहानी जिसमें महत्वाकांक्षा, महानता और राजनीति का बहुत ही समझदारी से किया गया घालमेल था… अब थोडा आगे चलते हैं … 1716 से 1780 के आसपास तक सिख पन्थ छोटी छोटी मिसिलों में अपने कार्य करता रहा फिर महाराजा रणजीत सिंह का उदय हुआ,  मराठा नेता रघुनाथ राव ने लाहौर का किला जीतकर महराजा रणजीत सिंह जी को उपहार में दिया ..
परन्तु इतिहास पुन: दोहराया गया –

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जब मराठा नेता होलकर अंग्रेजों के विरुद्ध अपने विजय अभियान की सफलता के निर्णायक दौर में था तब अंग्रेजों को सिखों ने पुन: सहायता दी l  लाहौर के राजा रणजीत सिंह, पटियाले के रणधीर सिंह और कपूरथला के जस्सा सिंह ने अंग्रेजों से एक संधि की और अंग्रेजों को बहुत सा धन और बहुत बड़ी सेना की सहायता दी !

इस ऐतिहासिक विश्वासघात के कारण मराठा नेता होलकर की हार हुई, इतिहासकार मानते हैं कि यदि सिखों ने यह विश्वासघात न किया होता और अंग्रेजों को कोई सहायता न प्राप्त होती तो शायद अंग्रेजों को 1857 से 40-50 वर्ष पहले ही खदेड़ दिया गया होता l 1857 के युध्द में भी सिखों ने अंग्रेजों का ही साथ दिया और स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों को विजयी बनाया ,उसके बाद भारत विभाजन की प्रक्रिया के समय अकाली दल का मास्टर तारा सिंह जो कि जिन्ना का मित्र भी था उसने क्रिस्प कमीशन से जाकर सिक्खों के लिए एक अलग देश की मांग की जिसका नाम था खालिस्तान , क्रिस्प को खालिस्तान विषय पर कुछ ज्ञान नही था अधिक तो उसने मास्टर तारा सिंह को कहा कि वो एक सर्वे करे पूरे पंजाब का, और यदि मास्टर तारा सिंह पूरे पंजाब (भारत-पाकिस्तान ) में से एक भी सिख बहुसंख्यक जिला सिद्ध कर देगा तो वो खालिस्तान की मांग पर भी विचार करेगा क्रिस्प को समय भी मिल गया, अंतत: मास्टर तारा सिंह उस समय एक भी सिख Majority जिला पूरे पंजाब सूबे में नही दिखा पाया और उसका खालिस्तान का सपना अधूरा रह गया उसके बाद भी खालिस्तान की मांग को लेकर अकाली दल और मास्टर तारा सिंह नेहरु के चक्कर लगाते रहे परन्तु नेहरु ने इस मांग को अस्वीकार कर दिया उस समय PEPSU नामक एक राज्य होता था भारत में जिसका नाम है (Eastern Punjab & Patiala State Union), इस PEPSU राज्य का बॉॉर्डर पहले दिल्ली के पास होता था मास्टर तारा सिंह और अकाली दल ने पहले भाषा के आधार पर PEPSU राज्य का विभाजन करवाया पटियाले से उस तरफ गुरुमुखी लिपि को राज्य में लागू कर दिया गया और अम्बाला से इस तरफ देवनागरी लिपि ही रही उसके बाद नवम्बर 1966 को मास्टर तारा सिंह और अकाली दल ने मिलकर PEPSU राज्य को तीन राज्यों में बाँट दिया (Trifurcation) गया और पंजाब, हरियाणा, तथा हिमाचल प्रदेश का निर्माण हुआ ..!!

अब इसी मानसिकता की जड खोदते हुऐ पुन: मुगल समय में चलते हैं अब बात करूँगा कश्मीरी पंडितों और अब्दाली को लेकर मिलने वाले तानो से  गुरु के पास कुछ मुट्ठी भर कश्मीरी पंडित गए जरुर थे , उसका कारण था की तेग बहादुर अपना राज्य बचाने के लिए वैसे ही मुगलों से लड़ रहा था , इसलिए वो उनके पास गए की कश्मीरी और पहाड़ी राजाओं के साथ मिल कर लडो  पर इस चीज़ को हिंदुओं को डरपोक दिखाने के लिए और ही रूप दे दिया गया , अब्दाली की बात करने वाले यह नहीं बताएंगे की दुनिया के दस देशों में हिंदू उस समय सबसे बड़ा धर्म था , भारत तिब्बत से लेकर काबुल तक फैला था , बर्मा पाकिस्तान हमारे भूभाग थे , एक अदने से राज्य में लड़कर क्या इतनी बड़ी दुनिया जहाँ नेपाल, इंडोनेसिया, बाली जैसे हिंदू देश भी शामिल थे , क्या इतनी छोटे से भूभाग पर लड़ लेने से ही हिंदू धर्म बच गया ???

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शिवाजी , राणाप्रताप , पेशवा क्या घास छिलते हुए जीवन व्यतीत कर गए खुद गोबिंद सिंह की रक्षा की थी शिवाजी ने उन्हें नांदेड में छिपा कर  ,,,,यह महत्वपूर्ण बात क्यूँ भूल जाते हैं सिख कि मुगलों के पाँव मराठों और पेशवा ने उखाड़े थे ?
सिख एक भी जंग नहीं जीत पाए थे कभी  तो कैसे हिंदुत्व की रक्षा की उन्होने?
कोई समझा दे …
ऐसे ही सिखों के लिए शहीदी देने वाले मति दास , सती दास,,,ये दोनो हिंदूजन जिन्हें मुगलों ने जिंदा जला दिया क्योंकि वो सिख धर्म की रक्षा के लिए तत्पर थे दोनो ही ब्राह्मण थे..!!


अजय शर्मा एक ब्राह्मण , जिन्होंने सिख गुरु की रक्षा करते हुए मैदान – ए – जंग में मात्र पन्द्रह साल की उम्र में शहीदी ली  ऐसे ही गुरु के पांच प्यारों में एक नाम ब्राह्मण का भी था  रंजीत सिंह की फ़ौज में लाहोर के ब्राह्मणों की एक अलग टुकड़ी थी , रणजीत सिंह के साथ जब झंडा सिंह और गंडा सिंह ने गद्दारी की और अंग्रेजों से हाथ मिला लिया तब इन्ही ब्राहमणों ने उसकी मदद की और उसका राज्य बचा कर दिया !!

अरे काहे के शेर महाराजा रंजीत सिंह ??
सच तो यह है की रंजीत सिंह ने हमेशा अंग्रेजों से अपनी बेटियों की शादी करवा कर अपने राज्य की रक्षा की और एक गुलाम राजा की तरह रहता रहा ,उसका बेटा कहाँ रहा..कहाँ जा कर किन हालात में मरा दिलीप सिंह जगविदित दस्तावेजी सत्य है।

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हिंदुओं को गालियाँ देने वाले सिख याद रखें की महाराणा प्रताप , दाहिर सेन जैसे शूरवीरों ने मौत को गले लगा लिया पर अपनी बहने नहीं सौंपी !

ऐसी ही एक कथा सिख इतिहास और दस्तावेजी सत्य के साथ और है –

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पंजाब के सिख ब्राह्मणों के बारे में बहुत कुछ अपमानजनक कहते सुनते पाए जाते हैं , फिल्मों में ब्राह्मणों को या तो कॉमेडी पात्र दिखाया जाता या चुटकुले बनाये जाते हैं , फेसबुक पर कई पेज ग्रुप हैं जिनके नाम का अगर हिंदी में मतलब निकाला जाए तो कुछ ऐसे है “बामणी लगाये ट्राई , जट ने भी बहुत फसाई”, “रंगीन जट , शोकीन बामणी”, और ऐसे ही कई पेज आपको मिल जायेंगे जहाँ पंडितों का मजाक बनाया जाता है ,,ऐसे ही अक्सर बड़े सिख नेता ब्राह्मण विरोधी ब्यान देते सुने जाते हैं जिनमे इनके सबसे बड़े ग्रंथि अवतार सिंह मक्कड का भी नाम है ,,इसका कारण यह कहा जाता है की गंगू नाम के ब्राह्मण ने गुरु के बेटे का पता मुगलों को बताया था पर ब्राह्मणों से नफरत और इस साज़िश का कारण जानने के लिए थोडा इतिहास में जाना होगा अक्सर कहा जाता है की सिख गुरु के आगे कश्मीरी पंडितों ने हाथ फैलाये तो गुरु साहिब ने हिंदू धर्म की रक्षा की हिंदुओं की माँ बहने मुग़ल उठा कर ले जाते थे और हिंदू उन्हें बचा नहीं पाते थे  ऐसे ताने हमें सुनने को मिलते हैं की तुम अब्दाली के आगे छक्के बन जाते थे,,  इसीलिये पहले तो में शुरू करूँगा गंगू ब्राह्मण से , गंगू ब्राह्मण ने कभी गुरु को धोखा नहीं दिया था बल्कि उसने गोबिंद सिंह के बच्चों को अपने घर में शरण दी थी , उनको मुगलों से बचाने के लिए | एक दिन जब गंगू राशन लेने गया तो दुकानदार ने पूछा की गंगू तू अकेला रहता है , इतना राशन क्या करेगा , तो भोले भाले गंगू ने कह दिया की किसी को बताना मत, गुरु के बच्चे मेरे यहाँ छिपे हुए हैं और ऐसे वो बात बाहर फ़ैल गयी ,, गंगू ब्राह्मण एक 21 ब्राहमणों की टोली के साथ आया था जिसका नेतृत्व एक कृपा शंकर नाम का ब्राह्मण कर रहा था और सब के सब वीरगति को प्राप्त हुए थे गंगू ब्राह्मण उनके खाने पीने का ध्यान रखता था, उसे गुरु साहिबान के शहजादों की देखरेख का दायित्व दिया गया था उसकी चूक केवल इतनी ही थी कि उसके मूंह से एक छिपी रहने वाली बात निकल गई और केवल सिंह नाम सिख ने इसकी मुखबिरी मलेर-कोटला के कोतवाल को दे दी और शहजादे तथा माता गूज्जरी जी को गिरफ्तार कर लिया गया जिस काल कोठरी में माता गूजरी जी और शहजादों को रखा गया था वो पीछे की और से खुली हुई थी जिसके पीछे एक नदी बहती थी दिसम्बर का महीना था और कडाके की ठंड थी, फिर भी मोती राम मेहरा नामक एक हिन्दू खत्री (क्षत्रिय) अपनी जान पर खेलकर नदी के मुंहाने से होता हुआ वहां जाकर उन्हें गर्म गर्म दूध पिला कर आता था बाद में जब इसका भेद खुला तो मोती राम मेहरा को आटा पीसने वाली चक्की के बीच पीसकर मार डाला गया !

 यह सब दस्तावेजी इतिहास है, कोई मनघडंत नहीं….खालिस्तान आतंकवाद के समय हिंदू ही मारे जाते थे यह जगविदित अकाट्य सत्य है, कभी कोई मुसलमान नहीं मारा खालिस्तानियों ने….!!

चलें वर्तमानचीन समय में लौट कर आते हैं –

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मास्टर तारा सिंह द्वारा स्थापित “संत सिपाही’ नामक पत्रिका के संपादक और जाने-माने सिख विद्वान गुरुचरनजीत सिंह लांबा ने एक लम्बे लेख (ट्रिब्यून 14 अप्रैल) में स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया कि कनाडा में बनाई गई नानकशाही जन्त्री (सिख कलैंडर) का मुख्य उद्देश्य सिख पंथ के स्वतंत्र अस्तित्व की घोषणा करना है। वे लिखते हैं कि सिखी हिन्दू धर्म और इस्लाम से पृथक पूर्ण और सार्वभौम धर्म है। सामाजिक दृष्टि से वह भले ही हिन्दू समाज के निकट हो, क्योंकि पूरा सिख समुदाय हिन्दू समाज से ही निकला है, किन्तु दर्शन के धरातल पर हम इस्लाम के अधिक निकट हैं। किन्तु लाम्बा साहब को पछतावा है कि अपनी अलग पहचान के लोभ में हमने ईसाई तिथिपत्रक को ही अपना लिया। यह जन्त्री ज्योतिर्विदों और कालगणना विशेषज्ञों की रचना नहीं अपितु ग्रिगोरियन, विक्रमी सम्वतों का घोलमेल है और अनेक संत बाबाओं, साध मण्डलियों, इतिहासकारों तथा राजनीतिज्ञों द्वारा पकायी गयी खिचड़ी है। पर चाहे जो हो, इससे सिख पंथ की पहचान अलग बनती है, क्योंकि विक्रमी संवत् का प्रवर्तक राज्य विक्रमादित्य तो हिन्दू था। यह पृथकतावादी भावना इतनी प्रबल है कि इंग्लैंड स्थित एक पृथकतावादी संगठन दल खालसा के मनमोहन सिंह खालसा ने वैशाखी के पर्व पर पाकिस्तान के हसन अब्बाल गुरुद्वारे में आनन्द विभोर होकर कहा कि इस जन्त्री की घोषणा से हम खालिस्तान की प्राप्ति के अपने लक्ष्य के नजदीक पहुंच गये हैं। अनजाने में ही क्यों न हो नानकशाही तिथिपत्रक में पवित्र तिथियों का चयन करते समय खालिस्तान के लक्ष्य से प्रेरित हिंसा और आतंकवाद के इतिहास को महिमामंडित किया गया है।

तिथिपत्रक तैयार करने वाले पालसिंह पुरेवाल ने स्व. इंंदिरा गांधी के हत्यारों सतवंत सिंह और बेअंत सिंह तथा भारत के प्रधान सेनापति जनरल वैद्य के हत्यारों हरजिंदरसिंह जिंदा और सुखदेव सिंह सुक्खा के शहीदी दिवस मनाने की सिफारिश की थी किन्तु रणनीति के तहत उन्हें हटा दिया गया। तिथिपत्रक में चार जून (ज्येष्ठ 21) को आपरेशन ब्लू स्टार और छह जून (ज्येष्ठ 23) को जरनैल सिंह भिंडरावाले के शहादत दिवस के रूप में मान्यता दी गयी है। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और काँग्रेस नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह को आपत्ति है कि यदि इस प्रकार प्रत्येक राज्य और पंथ ने अपने अलग-अलग संवत चलाये तो राष्ट्रीय और वैश्विक एकता के बजाय अराजकता का दृश्य उत्पन्न हो जायेगा। चिन्ता की बात यह है कि जिन गुरु नानक देव जी ने भारत की हजारों साल की आध्यात्मिक चेतना को स्वर दिया, दशमेश ने पूरे भारत की आध्यात्मिक वाणी को अपने भीतर संग्रहीत किया, जिन गुरु दशमेश ने अपने दशम ग्रंथ में भारत की समूची ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परम्परा को समाहित किया, उन्हीं महान गुरुओं के अनुयायियों के काल बोध को संकुचित करने का प्रयास किया जा रहा है। और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति फिर से वही इतिहास दोहराने जा रही है जो उसने 1909 के विवादस्पद आनन्द कारज एक्ट 1928 में सिख मर्यादा के रूप में मान्यता देकर की थी। तब भी व्यापक सिख समाज आनन्द कारज एक्ट के बारे में दुविधाग्रस्त है, इधर पंजाब में आतंकवाद और पृथक्तावाद पर एक नजर दौरने से मामला और अधिक स्पष्ट होगा। सन् 1857 की लडाई में अंग्रजों को भारतीय जमींदारों के अलावा गोरखा और सिखों ने सहयोग दिया। इसके बाद से अंग्रेजों ने सिखों पर भरोसा करना प्ररंभ कर दिया। इधर सिखों के मन में यह भाव जागृथ था कि अंग्रेज जाने के बाद वे अपने सिद्धांतों का मुल्क ले लेंगे, लेकिन जाते जाते अंग्रेज किसी कारण से ऐसा नहीं कर सके। इस मामले को लेकर मास्टर तारा सिंह ने एक विवाद को बनाये रखने के लिए सिखों को लामबंद किया और सिखों के अंदर यह प्रचारित किया कि दिल्ले उसके हकों के लिए उचित नहीं है। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि तारा सिंह पाकिस्तान के साथ रहने की याजना बनई थी लेकिन पाकिस्तान के निर्माता मुहम्मद अली जिन्ना के साथ तालमेल नहीं बैठने के कारण वे भारत के साथ आ गये लेकिन मास्टर तारा सिंह और उनके सहयोगियों के मन में यह भाव रह ही गया कि जिस प्रकार महराजा रंजीत सिंह ने सिख राष्ट्रवाद के सिद्धांत पर एक राष्ट्र की नीव रखी थी उसी प्रकार सिखों का अपना एक देश होना चाहिए। उस विषबेल को पुष्पित करने का काम कालांतर में कई सिख नेताओं ने किया लेकिन सबसे ज्यादा उसे मजबूत किया सरदार ज्ञानी जैल सिंह ने।

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ज्ञानी जैल सिंह ने सिखों के लिए अलग से एक दल बनाया और उस दल का नाम रखा दल खालसा जिसका अध्यक्ष सरदसरा जरनैल सिंह भिंडरावाले को बनाया गया। इस देश में सबसे पहले न्यायालय को चुनौती देने का श्रेय सिख चरमपंथियों को जाता है। एक आपराधिक मामले में चरमपंथी दबाव के कारण गुरूद्वारा में न्यायालय लगाया गया और अपने ढंग से न्याय करवाया गया। इसका समर्थन कांग्रेस पार्टी ने भी किया और ज्ञानी जैल सिंह ने भी किया। सिख चरमपंथों को उस ममय और बल मिला जब केन्द्र सरकार के द्वारा कई स्तरों पर सिखों को रियायद दिया जाने लगा। फिर देश के बाहर की शक्ति चरमपंथियों को सहयोग करने लगी। उस समय संयुक्त राज्य अमेरिका पाकिस्तान के साथ था और पाकिस्तान सिखों पृथक्तावादियों को सहयोग करने लगा। खुली सीमा का लाभ लेकर सिखों को हथियार और पैसे पहुंचाये जाने लगे। साथ ही मादक पदर्थों की खेप भी सिख युवाओं को दिया जाने लगा। सीमावर्ती क्षेत्र के आर्थिक दृष्टि से कमजोर सिखों ने नशे के कारोबार में अपनी ताकत झोक दी और उसके संरक्षण के लिए हथियार भी उठा लिया। इधर सिख पंथ के जत्थेदारों में यह भावना भी घर करने लगी थी कि लगातार सिख युवक बाल कटवा रहे हैं और हिन्दू देवी देवताओं एवं पंडित पुजारियों की शरण में जा रहे हैं, जिससे सिख कौम को घाटा होगा। इन तमाम बिन्दुओं को ध्यान में रखकर सिख चिंताकों ने भी पृथक्तावाद को हवा देना प्ररंभ कर दिया। ये तमाम एसे कारण है जिससे पंजाब में आतंकवाद का उदय हुआ।

हालांकि ये तमाम संभवनाएं पूर्ण रूपेण निर्मूल नहीं हुई है लेकिन पंजाबी बुद्धिजीवियों को इस बात का भडोसा हो गया है कि सिख राष्ट्र का निर्माण अगर हो भी जायेगा तो उसको स्थिर करने में बडी कुर्बानी देनी पडेगी। जहां तक विकास और सिखों के संरक्षण की बात है तो यह भारतीय संघ में रहकर भी हो सकता है, लेकिन पेंच यहां राजनीतिक है। जहां एक ओर प्रदेश की राजसत्ता पर कांग्रेस अपनी पकड मजबूत करना चाहती है वही अपने को सिखों की हिमायती मानने वाली पार्टी अकाली दल प्रदेश की सत्ता पर अपनी पकड बनाये रखना चाहती है। इस लडाई में पुन: सिख पृथक्तावाद को हवा दिया जा रहा है। 

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ऐसे ही चमौली के निकट पहले एक मंदिर था जिसका निर्माण भगवान राम के अनुज लक्ष्मण ने करवाया था। सिखों के दसवें गुरु गोबिन्द सिंह ने यहाँ पूजा अर्चना की थी। बाद में इसे गुरूद्वारा घोषित कर दिया गया। इस दर्शनीय तीर्थ में चारों ओर से बर्फ़ की ऊँची चोटियों का प्रतिबिम्ब विशालकाय झील में अत्यन्त मनोरम एवं रोमांच से परिपूर्ण लगता है। इसी झील में हाथी पर्वत और सप्त ऋषि पर्वत श्रृंखलाओं से पानी आता है। एक छोटी जलधारा इस झील से निकलती है जिसे हिमगंगा कहते हैं। झील के किनारे स्थित लक्ष्मण मंदिर भी अत्यन्त दर्शनीय है।


अत्यधिक ऊँचाई पर होने के कारण वर्ष में लगभग 7 महीने यहाँ झील बर्फ में जम जाती है। फूलों की घाटी यहाँ का निकटतम पर्यटन स्थल है.. इसके अलावा जोशी मठ से 40 किमी दूर सिख समाज का प्रसिद्ध तीर्थ हेमकुंड साहिब है, जहां गुरुगोविंद सिंह ने तपस्या की थी। यहां हिमालय की चोटियों के बीच चारों ओर बर्फ के पहाड़ हैं। बीच में विशाल सरोवर (बर्फीली झील) है। वहीं हेमकुंड गुरुद्वारा बनाया गया है। यह गुरुद्वारा चार महीनों तक खुला रहेगा। अक्टूबर में बर्फ गिरने के साथ ही इसके कपाट बंद कर दिए जाते हैं।

गुरुद्वारा के अंदर, भक्तों चाय और खिचड़ी के साथ कराह प्रशाद दिया जाता है, जो चीनी, गेहूं के आटे और घी के बराबर भागों का उपयोग कर तैयार किया जाता है।

कराह प्रशाद सभा के बाद भक्तों को दिया जाता है। सभा के दौरान, सिख प्रार्थना करते हैं और गुरु ग्रंथ साहिब के पृष्ठ के शीर्ष बाएं हाथ की ओर हुकाम्नमा पढ़ते हैं। गुरुद्वारा वर्ष 1960 में बनाया गया था, जब मेजर जनरल हरकीरत सिंह, भारतीय सेना के मुख्य अभियंता ने इस जगह का दौरा किया था। बाद में, वास्तुकार सैली ने गुरुद्वारा के निर्माण का प्रभार लिया था।

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हेमकुंड का शाब्दिक अर्थ है, बर्फ (हेम) का कटोरा (कुंड). दशम ग्रंथ के मुताबिक हेमकुंड साहिब जिस स्थान पर स्थापित हैं, वहां त्रेता युग में भगवान राम के अनुज लक्ष्मण ने एक मंदिर का निर्माण करवाया था. तत्पश्चात द्वापर युग में पांडवों ने हिमालय प्रवास के दौरान यहां तप साधना की थी…..!!
Another Example of Occupation of Hinduism and Hindu Religious Temple for minority appeasement.

एक बहुत ही नया उदाहरण जो सिर्फ 2014 में सामने आ पाया था- कि क्या इन्हे सिर्फ अंग्रेज़ ने ही मारा था….???

1857 की आजादी की पहली जंग में अंग्रेजी फौज में तैनात भारतीय सैनिकों ने विद्रोह का बिगुल फूंका। कहा गया कि अंग्रेजी फौजों ने सीमावर्ती इलाके अजनाला में 282 सिपाहियों को कुंए में दफन कर दिया था। 157 साल बाद सिपाहियों की अस्थियां पंजाब के अजनाला से बरामद हुई हैं। अब इतिहास के उन सबूतों के तलाश में हुई खुदाई में शहीदों की हड्डियां, सिक्के और गोलियां मिलनी शुरू हो गई हैं।

अजनाला में हो रही इस खुदाई में लोगों को उन शहीदों की अस्थियां मिलीं, साथ ही मिले ब्रिटिश काल के 70 सिक्के, गोलियां और शहीद सिपाहियों की दूसरी निशानियां भी। 157 साल बाद इन शहीदों के 80 फीसदी अवशेष निकाले जा चुके हैं।

गुरुद्वारा कमेटी के अध्यक्ष अमरजीत सिंह सरकारिया ने बताया कि 30 जुलाई, 1857 को मेरठ छावनी से भड़की विद्रोह की चिंगारी लाहौर की मियांमीर छावनी तक जा पहुंची थी। ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ लाहौर में 26 रेजीमेंट के 500 सैनिकों ने भी विद्रोह कर दिया था। जवाबी कार्रवाई में अंग्रेजों ने 218 सैनिकों को मार दिया और 282 सिपाहियों को गिरफ्तार तक अजनाला ले आया गया था। यहां 237 सैनिकों को मारकर और बाकियों को जिंदा ही कुएं में दफन कर दिया गया।

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इतिहासकार सुरिंदर कोछड़ ने इस कुंए को तलाशा और 28 फरवरी को इसकी खुदाई शुरू करवाई है। सुरिंदर कोछड़ का कहना है कि खुदाई में मिली अस्थियों का डीएनए टेस्ट करवाया जाएगा। साथ ही ब्रिटेन की सरकार से सैनिकों की जानकारी भी मांगी जाएगी। जिससे शहीदों के परिवार वालों का पता लगवाया जा सके। शहीद सैनिकों की हड्डियों को हरिद्वार और गोइंदवाल साहिब में प्रवाहित किया जाएगा।

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जिन विकसित देशों के साथ सैन्यगठबंधन के जरिये विदेशी पूंजी के हितों में भारत सरकार ने अपनी ही जनता के खिलाफ युद्ध जारी रखा है सलवाजुड़ुम आफसा संस्कृति के तहत, उन्ही राष्ट्रों में बेखौफ भारत विरोधी हरकतें जारी रखे हुये हैं।

आतंक के खिलाफ ग्लोबल अमेरिकी युद्ध के सर्वोच्च सिपाहसालार अमेरिकी अश्वेत राष्ट्रपति बाराक हुसैन ओबामा की नाक के नीचे और शायद उन्हीं के संरक्षण में जारी हैं भारत विरोधी कातिलाना गतिविधियां और सारी साजिशें वाशिंगटन में ही रची जा सकती हैं और वहीं से उन्हें अंजाम दिया जाता है। लेकिन उसके खिलाफ सब-कुछ जानबूझकर गुलाम सरकारें खामोश रही हैं और आस-पड़ोस में युद्ध छायायुद्ध के खेल में अमेरिका और इजराइल के साथ रक्षा सौदों का कमीशन खाती रही हैं। खा भी रही हैं। खाती रहेंगी अनंतकाल। यही राष्ट्रीय सुरक्षा का स्थाई बंदोबस्त है मस्त धर्मोन्मादी। बरोबर। बरोबर।

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विदेशों में सिख अब भी मास्टर तारा सिंह की आवाज बुलंद कर रहे हैं कि बंटवारे में हिंदुओं को हिंदुस्तान मिला, मुसलमान को पाकिस्तान मिला, सिखों को क्या मिला।

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वे सिखों को अलग कौम मानते हैं और मानते हैं कि भारत में सिखों का दमन हो रहा है और यह भी मानते हैं कि मनुस्मृति शासन और हिंदू राष्ट्र के धारक वाहकों के साथ मिलकर सिखों की मौजूदा राजनीति सिखों की शहादत की विरासत के साथ गद्दारी कर रही है। वे खालिस्तान का ख्वाब पूरा करने के लिए रोज नई स्कीमें बना रहे हैं और भारत सरकार और उसकी खुफिया एजेंसियों को इसकी जानकारी होनी ही चाहिए।

बदबूदार गू भरे पोतड़े कालीन या पलंग के नीचे डालकर छुपाने से उनकी बदबू नहीं छुपती,,,, अब तक विदेश संबंध, राष्ट्रीय हित, राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे शब्दों की आड़ लेकर कुकर्म करती व अपने कुत्सित कुकर्म छुपाती हर सरकार (चाहे काँग्रेस की, चाहे भाजपानीत चाहे तीजें पाँचवे मोर्चों की) को देरसबेर ‘एक राष्ट्रहित’ में सबकुछ सामने ला कर सार्वजनिक करना ही होगा और विदेशी जमीन से भारत विरोधी काम करने वालों पर सवाल उठा कर सख्ती से कार्यवाही करनी ही होगी चाहे वो विदेशी जमीन ब्रिटिश हो, कनाडाई हो, अमेरिकी हो, ऑस्ट्रेलियाई हो या यूरोपीय …. जवाब तो माँगना ही पडेगा, कब तक लुंज पुंज नपुंसकता सरकार के रूप में सहन की जाये…???

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एक सामान्य सी बात आप सोच सकते हैं की हिन्दुस्तान किसी सिक्ख को प्रधानमन्त्री बना सकता है पर पंजाब किसी हिन्दू को या नॉन-सिक्ख को मुख्यमंत्री नही हम आर्य अपनी रक्षा खुद करते आये हैं , जब सिख नहीं थे  तब भी हम लड़ते थे , हम चार हज़ार सालों से शत्रुओं से लड़ रहे हैं और डटे हुए हैं | वैसे भी सिख उपर से नहीं टपके , कुछ ऐसे लोग जिनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी थी , अपने माँ बाप के धर्म को त्याग आकर सिर्फ ब्राह्मणों से नफरत के आधार पर इस विचारधारा में कूद पड़े आज भी अमृतसर केप्टन कालिया जैसे शूरवीर ब्राह्मण पैदा कर रहे है और करता रहेगा , आज बंदा बहादुर , सती दास, मतिदास जैसे ब्राह्मणों के कारण ही सिख धर्म है , सिर्फ गानों में किराए के हथियार दिखा लेने से , फुकरी मारने से शेर नहीं बनते बेटा , याद रखना हिंदुओं की तलवार बड़ी भारी होती है , शिवाजी की तलवार तुम जैसे आठ लोग मिलकर उठाते थे ..!!
जय श्रीराम , जय मंडलेश्वर महादेव

वन्दे मातरम्

 Note  –  इस पोस्ट में वर्णित व संकलित बहुत से उदाहरण व लिंक कई अन्य लेखकों के लिखे हैं जिन्हे ज्यों का त्यों मात्रा / स्पैलिन्ग की अशुद्धियाँ सुधार कर शामिल किया गया है और एक वृहद लेख मय तथ्यात्मक सबूतों व चित्रों सहित संकलित कर लिखा गया है ! 

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Dr. Sudhir Vyas

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