ब्राह्मण – इंडिया दैट इज भारत में अघोषित रूप से सबसे बडा अत्याचारी, अपराधी


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इंडिया दैट इज भारत का सबसे बडा अपराधी – “ब्राह्मण” 

यस्क मुनि की निरुक्त के अनुसार –

” ब्रह्म जानाति ब्राह्मण: ”

यानि ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म (अंतिम सत्य, ईश्वर या परम ज्ञान) को जानता है अतः ब्राह्मण का अर्थ है – “ईश्वर ज्ञाता”

किन्तु हिन्दू समाज में एेतिहासिक स्थिति यह रही है कि पारंपरिक पुजारी तथा पंडित ही अब ब्राह्मण होते हैं।

ब्राह्मण या ब्राह्मणत्व का निर्धारण माता-पिता की जाती के आधार पर ही होने लगा है, स्कन्दपुराण में षोडशोपचार पूजन के अंतर्गत अष्टम उपचार में ब्रह्मा द्वारा नारद को यज्ञोपवीत के आध्यात्मिक अर्थ में बताया गया है,

जन्मना जायते शूद्रः
संस्कारात् द्विज उच्यते।
शापानुग्रहसामर्थ्यं
तथा क्रोधः प्रसन्नता।

अतः आध्यात्मिक दृष्टि से यज्ञोपवीत के बिना जन्म से ब्राह्मण भी शुद्र के समान ही होता है।

ब्राह्मण अपने जीवनकाल में सोलह प्रमुख संस्कार करते हैं। जन्म से पूर्व गर्भधारण, पुन्सवन (गर्भ में नर बालक को ईश्वर को समर्पित करना), सिमन्तोणणयन (गर्भिणी स्त्री का केश-मुण्डन)। बाल्यकाल में जातकर्म (जन्मानुष्ठान), नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्रासन, चूडकर्ण, कर्णवेध। बालक के शिक्षण-काल में विद्यारम्भ, उपनयन अर्थात यज्ञोपवीत्, वेदारम्भ, केशान्त अथवा गोदान, तथा समवर्तनम् या स्नान (शिक्षा-काल का अन्त)। वयस्क होने पर विवाह तथा मृत्यु पश्चात अन्त्येष्टि प्रमुख संस्कार हैं।

इंडिया दैट इज भारत में ब्राह्मण अब वर्ण नहीं अपितु तथाकथित हिन्दू समाज की एक ‘जाति’ भी है, ब्राह्मण को ‘विप्र’, ‘द्विज’, ‘द्विजोत्तम’ या ‘भूसुर’ भी कहा जाता है।

न जटाहि न गोत्तेहि न जच्चा होति ब्राह्मणो।
यम्हि सच्चं च धम्मो च सो सुची सो च ब्राह्मणो॥

अर्थात भगवान बुद्ध कहते हैं कि “ब्राह्मण न तो जटा से होता है, न गोत्र से और न जन्म से। जिसमें सत्य है, धर्म है और जो पवित्र है, वही ब्राह्मण है। कमल के पत्ते पर जल और आरे की नोक पर सरसों की तरह जो विषय-भोगों में लिप्त नहीं होता, मैं उसे ही ब्राह्मण कहता हूं।”

तसपाणे वियाणेत्ता संगहेण य थावरे।
जो न हिंसइ तिविहेण तं वयं बूम माहणं।।

अर्थात महावीर स्वामी कहते हैं कि “जो इस बात को जानता है कि कौन प्राणी त्रस है, कौन स्थावर है। और मन, वचन और काया से किसी भी जीव की हिंसा नहीं करता, उसी को हम ब्राह्मण कहते हैं।”

न वि मुंडिएण समणो न ओंकारेण बंभणो।
न मुणी रण्णवासेणं कुसचीरेण न तावसो॥

अर्थात महावीर स्वामी कहते हैं कि “सिर मुंडा लेने से ही कोई श्रमण नहीं बन जाता। ‘ओंकार’ का जप कर लेने से ही कोई ब्राह्मण नहीं बन जाता। केवल जंगल में जाकर बस जाने से ही कोई मुनि नहीं बन जाता। वल्कल वस्त्र पहन लेने से ही कोई तपस्वी नहीं बन जाता।”

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शतपथ ब्राह्मण में ब्राह्मण के कर्तव्यों की चर्चा करते हुए उसके अधिकार इस प्रकार कहे गये हैं-
अर्चा
दान
अजेयता
अवध्यता
ब्राह्मण के कर्तव्य इस प्रकार हैं-
‘ब्राह्मण्य’ (वंश की पवित्रता)
‘प्रतिरूपचर्या’ (कर्तव्यपालन)
‘लोकपक्ति’ (लोक को प्रबुद्ध करना)
ब्राह्मण स्वयं को ही संस्कृत करके विश्राम नहीं लेता था, अपितु दूसरों को भी अपने गुणों का दान आचार्य अथवा पुरोहित के रूप में करता था।
आचार्यपद से ब्राह्मण का अपने पुत्र को अध्याय तथा याज्ञिक क्रियाओं में निपुण करना एक विशेष कार्य था।

स्मृति ग्रन्थों में ब्राह्मणों के मुख्य छ: कर्तव्य (षट्कर्म) बताये गये हैं-
पठन
पाठन
यजन
याजन
दान
प्रतिग्रह
इनमें पठन, यजन और दान सामान्य तथा पाठन, याजन तथा प्रतिग्रह विशेष कर्तव्य हैं। आपद्धर्म के रूप में अन्य व्यवसाय से भी ब्राह्मण निर्वाह कर सकता था, किन्तु स्मृतियों ने बहुत से प्रतिबन्ध लगाकर लोभ और हिंसावाले कार्य उसके लिए वर्जित कर रखे हैं। गौड़ अथवा लक्षणावती का राजा आदिसूर ने ब्राह्मण धर्म को पुनरुज्जीवित करने का प्रयास किया, जहाँ पर बौद्ध धर्म छाया हुआ था।

हिन्दू ब्राह्मण अपनी धारणाओं से अधिक धर्माचरण को महत्व देते हैं। यह धार्मिक पन्थों की विशेषता है। धर्माचरण में मुख्यतः है यज्ञ करना। दिनचर्या इस प्रकार है – स्नान, सन्ध्यावन्दनम्,जप, उपासना, तथा अग्निहोत्र। अन्तिम दो यज्ञ अब केवल कुछ ही परिवारों में होते हैं। ब्रह्मचारी अग्निहोत्र यज्ञ के स्थान पर अग्निकार्यम् करते हैं। अन्य रीतियां हैं अमावस्य तर्पण तथा श्राद्ध।

इस समय देश भेद के अनुसार ब्राह्मणों के दो बड़े विभाग हैं-
पंचगौड
पंचद्रविड़
पश्चिम में अफ़ग़ानिस्तान का गोर देश, पंजाब, जिसमें कुरुक्षेत्र सम्मिलित है, गोंडा-बस्ती जनपद, प्रयाग के दक्षिण व आसपास का प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ये पाँचों प्रदेश किसी न किसी समय पर गौड़ कहे जाते रहे। इन्हीं पाँचों प्रदेशों के नाम पर सम्भवत: सामूहिक नाम ‘पंच गौड़’ पड़ा। आदि गौड़ों का उद्गम कुरुक्षेत्र है। इस प्रदेश के ब्राह्मण विशेषत: गौड़ कहलाये। कश्मीर और पंजाब के ब्राह्मण सारस्वत, कन्नौज के आस-पास के ब्राह्मण कान्यकुब्ज, मिथिला के ब्राह्मण मैथिल तथा उत्कल के ब्राह्मण उत्कल कहलाये। नर्मदा के दक्षिणस्थ आन्ध्र, द्रविड़, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुर्जर, इन्हें ‘पंच द्रविड’ कहा गया है। वहाँ के ब्राह्मण इन्हीं पाँच नामों से प्रसिद्ध हैं।

उपर्युक्त दसों के अनेक अन्तर्विभाग हैं। ये सभी या तो स्थानों के नाम से प्रसिद्ध हुए, या वंश के किसी पूर्व पुरुष के नाम से प्रख्यात, अथवा किसी विशेष पदवी, विद्या या गुण के कारण नामधारी हुए। बड़नगरा, विशनगरा, भटनागर, नागर, माथुर, मूलगाँवकर इत्यादि स्थानवाचक नाम हैं। वंश के पूर्व पुरुष के नाम, जैसे- सान्याल (शाण्डिल्य), नारद, वशिष्ठ, कौशिक, भारद्वाज, कश्यप, गोभिल ये नाम वंश या गोत्र के सूचक हैं। पदवी के नाम, जैसे- ‘चक्रवर्त्ती वन्द्योपाध्याय’, ‘मुख्योपाध्याय’, ‘भट्ट’, ‘फडनवीस’, ‘कुलकर्णी’, ‘राजभट्ट’, ‘जोशी’ (ज्योतिषी), ‘देशपाण्डे’ इत्यादि। विद्या के नाम, जैसे- ‘चतुर्वेदी’, ‘त्रिवेदी’, ‘शास्त्री’, ‘पाण्डेय’, ‘व्यास’, ‘द्विवेदी’ इत्यादि। कर्म या गुण के नाम, जैसे- ‘दीक्षित’, ‘सनाढय’, ‘सुकुल’, ‘अधिकारी’, ‘वास्तव्य’, ‘याजक’, ‘याज्ञिक’, ‘नैगम’, ‘आचार्य’, ‘भट्टाचार्य’ इत्यादि।

दक्षिण भारत में ब्राह्मणों के तीन सम्प्रदाय हैं –
स्मर्त सम्प्रदाय, 
श्रीवैष्णव सम्प्रदाय 
तथा 
माधव सम्प्रदाय।

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ब्राह्मणों को सम्पूर्ण भारतवर्ष में विभिन्न उपनामों से जाना जाता है, जैसे- पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, दिल्ली, हरियाणा व राजस्थान के कुछ भागों में त्यागी, अवध (मध्य उत्तर प्रदेश) तथा मध्य प्रदेश में बाजपेयी, बिहार व बंगाल में भूमिहार, जम्मू कश्मीर, पंजाब व हरियाणा के कुछ भागों में महियाल, मध्य प्रदेश व राजस्थान में गालव, गुजरात में अनाविल, महाराष्ट्र में चितपावन एवं कार्वे, कर्नाटक में अयंगर एवं हेगडे, केरल में नम्बूदरीपाद, तमिलनाडु में अयंगर एवं अय्यर, आंध्र प्रदेश में नियोगी एवं राव तथा उड़ीसा में दास एवं मिश्र आदि बिहार में मैथिल ब्राह्मण आदि।

ब्राह्मण समुदाय के एक प्रमुख अंग “भूमिहार” के बारे में रोचक व ज्ञानप्रद जानकारी :-

हमारे देश आर्यावर्त में 7200 विक्रम सम्वत् पूर्व देश, धर्म व संस्कृति की रक्षा हेतु एक विराट युद्ध राजा सहस्रबाहु सहित समस्त आर्यावर्त के 21 राज्यों के क्षत्रिय राजाओ के विरूद्ध हुआ, जिसका नेतृत्व ऋषि जमदग्नि के पुत्र ब्रह्मऋषि भगवान परशुराम ने किया, इस युद्ध में आर्यावर्त के अधिकतर ब्राह्मणों ने भाग लिया और इस युद्ध में भगवान परशुराम की विजय हुई तथा इस युद्ध के उपरान्त अधिकतर ब्राह्मण अपना धर्मशास्त्र एवं ज्योतिषादि का कार्य त्यागकर समय-समय पर कृषि क्षेत्र में संलग्न होते गये, जिन्हे अयाचक ब्राह्मण व खांडवायन या भूमिहार कहा जाने लगा,,,

जोकि कालान्तर में त्यागी, भूमिहार, महियाल, गालव, चितपावन, नम्बूदरीपाद, नियोगी, अनाविल, कार्वे, राव, हेगडे, अयंगर एवं अय्यर आदि कई अन्य उपनामों से पहचाने जाने लगे।
त्यागी अर्थात भूमिहार आदि ब्रह्मऋषि वंशज यानि अयाचक ब्राह्मणों को सम्पूर्ण भारतवर्ष में विभिन्न उपनामों जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, दिल्ली, हरियाणा व राजस्थान के कुछ भागों में त्यागी, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार व बंगाल में भूमिहार, जम्मू कश्मीर, पंजाब व हरियाणा के कुछ भागों में महियाल, मध्य प्रदेश व राजस्थान में गालव, गुजरात में अनाविल, महाराष्ट्र में चितपावन एवं कार्वे, कर्नाटक में अयंगर एवं हेगडे, केरल में नम्बूदरीपाद, तमिलनाडु में अयंगर एवं अय्यर, आंध्र प्रदेश में नियोगी एवं राव तथा उड़ीसा में दास एवं मिश्र आदि उपनामों से जाना जाता है। अयाचक ब्राह्मण अपने विभिन्न नामों के साथ भिन्न भिन्न क्षेत्रों में अभी तक तो अधिकतर कृषि कार्य करते थे, लेकिन पिछले कुछ समय से विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।

भूमिहार या ब्राह्मण (अयाचक ब्राह्मण) एक ऐसी सवर्ण जाति है जो अपने शौर्य, पराक्रम एवं बुद्धिमत्ता के लिये जानी जाती है। बिहार, पश्चिचमी उत्तर प्रदेश एवं झारखण्ड में निवास करने वाले भूमिहार जाति अर्थात अयाचक ब्राह्मणों को त्यागी नाम की उप-जाति से जाना व पहचाना जाता हैं। मगध के महान पुष्य मित्र शुंग और कण्व वंश दोनों ही ब्राह्मण राजवंश भूमिहार ब्राह्मण (बाभन) के थे भूमिहार ब्राह्मण भगवन परशुराम को प्राचीन समय से अपना मूल पुरुष और कुल गुरु मानते है

भूमिहार ब्राह्मण समाज में मुख्यतया 10 उपाधियां है- 
1-पाण्डेय 
2-तिवारी/त्रिपाठी 
3- मिश्र 
4-शुक्ल 
5-यजी 
6-करजी 
7-उपाध्याय 
8-शर्मा 
9-ओझा 
10-दुबे\द्विवेदी 
इसके अलावा राजपाट और ज़मींदारी के कारण एक बड़ा भाग भूमिहार ब्राह्मण का राय ,शाही ,सिंह, उत्तर प्रदेश में और शाही , सिंह (सिन्हा) , चौधरी ,ठाकुर बिहार में लिखने लगा बहुत से भूमिहार या बाभन/बामन भी लिखते है..!!

भूमिहार ब्राह्मण जाति ब्राह्मणों के विभिन्न भेदों और शाखाओं के अयाचक लोगो का एक संगठन ही है. प्रारंभ में कान्यकुब्ज शाखा से निकले लोगो को भूमिहार ब्राह्मण कहा गया,उसके बाद सारस्वत , महियल , सरयूपारीण , मैथिल(झा) , चितपावन , कन्नड़ आदि शाखाओं के अयाचक ब्राह्मण लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में इन लोगो से सम्बन्ध स्थापित कर भूमिहार ब्राह्मणों में मिलते गए.मगध के ब्राह्मण और मिथिलांचल के पश्चिम तथा प्रयाग के जमींदार ब्राह्मण भी अयाचक होने से भूमिहार गाँव में ही सम्मिलित होते गए…!

भूमिहार ब्राह्मण के कुछ मूलों ( कूरी ) के लोगो का भूमिहार ब्राह्मण रूप में संगठित होने की एक सूची यहाँ दी जा रही है :

1. कान्यकुब्ज शाखा से :- दोनवार ,सकरवार,किन्वार, ततिहा , ननहुलिया, वंशवार के तिवारी, कुढ़ानिया, दसिकर, आदि.

2. सरयूपारी शाखा से : – गौतम, कोल्हा (कश्यप), नैनीजोर के तिवारी , पूसारोड (दरभंगा) खीरी से आये पराशर गोत्री पांडे, मुजफ्फरपुर में मथुरापुर के गर्ग गोत्री शुक्ल, गाजीपुर के भारद्वाजी, मचियाओं और खोर के पांडे, म्लाओं के सांकृत गोत्री पांडे, इलाहबाद के वत्स गोत्री गाना मिश्र ,आदि.

3. मैथिल शाखा से : – मैथिल शाखा से बिहार में बसने वाले कई मूल के भूमिहार ब्राह्मण आये हैं.इनमे सवर्ण गोत्री बेमुवार और शांडिल्य गोत्री दिघवय – दिघ्वैत और दिघ्वय संदलपुर प्रमुख है.

4. महियालो से : – महियालो की बाली शाखा के पराशर गोत्री ब्राह्मण पंडित जगनाथ दीक्षित छपरा (बिहार) में एकसार स्थान पर बस गए. एकसार में प्रथम वास करने से वैशाली, मुजफ्फरपुर, चैनपुर, समस्तीपुर, छपरा, परसगढ़, सुरसंड, गौरैया कोठी, गमिरार, बहलालपुर , आदि गाँव में बसे हुए पराशर गोत्री एक्सरिया मूल के भूमिहार ब्राह्मण हो गए.

5. चित्पावन से : – न्याय भट्ट नामक चितपावन ब्राह्मण सपरिवार श्राध हेतु गया कभी पूर्व काल में आये थे.अयाचक ब्राह्मण होने से इन्होने अपनी पोती का विवाह मगध के इक्किल परगने में वत्स गोत्री दोनवार के पुत्र उदय भान पांडे से कर दिया और भूमिहार ब्राह्मण हो गए.पटना डाल्टनगंज रोड पर धरहरा,भरतपुर आदि कई गाँव में तथा दुमका , भोजपुर , रोहतास के कई गाँव में ये चितपावन मूल के कौन्डिल्य गोत्री अथर्व भूमिहार ब्राह्मण रहते हैं!

6. पुष्करणा / पुष्टिकर से : सिंध, बलोचिस्तान, अविभाजित पंजाब, राजस्थान और गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र में बसने वाले अयाचक ब्राह्मण समूह पुष्करणा ब्राह्मण भी भूमिहार ब्राह्मण यानि अयाचक ब्राह्मण समुदाय ही हैं।
भारतीय इतिहास में सिंध – थार के साम्राज्य पर मोहम्मद बिन कासिम के अरब मुस्लिम आक्रमण से पहले का आखिरी ब्राह्मण सम्राट “राजा दाहिरसेन” पुष्करणा ब्राह्मण ही था, पुष्करणा ब्राह्मण शुरूआत से ही कृषि – व्यापार – अध्यापन – ज्योतिष विज्ञान – धर्म शास्त्र व ग्रंथ टीका रचनाओं – सैन्य कार्य – प्रशासन – जमींदारी – दीवानी आदि से जुडे कार्य करते हुऐ भूमिहार रहे हैं। पुष्करणा ब्राह्मण पुरोहिती – कर्मकांड / याचक द्वारा जीवन यापन नहीं करते रहे हैं।

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भूमिपति ब्राह्मणों के लिए पहले जमींदार ब्राह्मण शब्द का प्रयोग होता था..याचक ब्राह्मणों के एक दल ने ने विचार किया की जमींदार तो सभी जातियों को कह सकते हैं,फिर हममे और जमीन वाली जातियों में क्या फर्क रह जाएगा.काफी विचार विमर्श के बाद ” भूमिहार ब्राह्मण ” शब्द अस्तित्व में आया.”

भूमिहार ब्राह्मणों के इतिहास को पढने से पता चलता है की अधिकांश समाजशास्त्रियों ने भूमिहार ब्राह्मणों को कान्यकुब्ज की शाखा माना है.भूमिहार ब्राह्मण का मूलस्थान मदारपुर है जो कानपुर – फरूखाबाद की सीमा पर बिल्हौर स्टेशन के पास है….1528 में बाबर ने मदारपुर पर अचानक आक्रमण कर दिया.इस भीषण युद्ध में वहाँ के ब्राह्मणों सहित सबलोग मार डाले गए.इस हत्याकांड से किसी प्रकार अनंतराम ब्राह्मण की पत्नी बच निकली थी जो बाद में एक बालक को जन्म दे कर इस लोक से चली गई.इस बालक का नाम गर्भू तेवारी रखा गया.गर्भू तेवारी के खानदान के लोग कान्यकुब्ज प्रदेश के अनेक गाँव में बसते है.कालांतर में इनके वंशज उत्तर प्रदेश तथा बिहार के विभिन्न गाँव में बस गए.गर्भू तेवारी के वंशज भूमिहार ब्राह्मण कहलाये इनसे वैवाहिक संपर्क रखने वाले समस्त ब्राह्मण कालांतर में भूमिहार ब्राह्मण कहलाये ,,,

अंग्रेजो ने यहाँ के सामाजिक स्तर का गहन अध्ययन कर अपने गजेटियरों एवं अन्य पुस्तकों में भूमिहारो के उपवर्गों का उल्लेख किया है, गढ़वाल काल के बाद मुसलमानों से त्रस्त भूमिहार ब्राह्मणों ने जब कान्यकुब्ज क्षेत्र से पूर्व की ओर पलायन प्रारंभ किया और अपनी सुविधानुसार यत्र तत्र बस गए तो अनेक उपवर्गों के नाम से संबोधित होने लगे,यथा – ड्रोनवार , गौतम , कान्यकुब्ज , जेथारिया आदि अनेक कारणों,अनेक रीतियों से उपवर्गों का नामकरण किया गया.कुछ लोगो ने अपने आदि पुरुष से अपना नामकरण किया और कुछ लोगो ने गोत्र से.कुछ का नामकरण उनके स्थान से हुवा जैसे – सोनभद्र नदी के किनारे रहने वालो का नाम सोन भरिया, सरस्वती नदी के किनारे वाले सर्वारिया,,सरयू नदी के पार वाले सरयूपारी , आद् मूलडीह के नाम पर भी कुछ लोगो का नामकरण हुआ जैसे जेथारिया , हीरापुर पण्डे ,वेलौचे ,मचैया पाण्डे , कुसुमि तेवरी , ब्रह्मपुरिये , दीक्षित , जुझौतिया आदि.

भूमिहार ब्राह्मण और सरयुपारिन ब्राह्मण –

पिपरा के मिसिर ,सोहगौरा के तिवारी ,हिरापुरी पांडे, घोर्नर के तिवारी ,माम्खोर के शुक्ल,भरसी मिश्र,हस्त्गामे के पांडे,नैनीजोर के तिवारी ,गाना के मिश्र ,मचैया के पांडे,दुमतिकार तिवारी ,आदि.भूमिहार ब्राह्मन और सर्वरिया (सरयूपारिण ) दोनों में हैं.वरन भूमिहार ब्राह्मण में कुछ लोग अपने को “सर्वरिया” ही कहते है.सर एच.एलिअत का कथन है – ” वे ही ब्राह्मण भूमि का मालिक होने से भूमिहार कहलाने लगे और भूमिहारों को अपने में लेते हुए सर्वारिया लोग पूर्व में कनौजिया से मिल जाते हैं

भूमिहार ब्राह्मण पुरोहित –

भूमिहार ब्राह्मण कुछ जगह प्राचीन समय से पुरोहिती करते चले आ रहे है अनुसंधान करने पर पता लगा कि प्रयाग की त्रिवेणी के सभी पंडे भूमिहार ही तो हैं, हजारीबाग के इटखोरी और चतरा थाने के 8-10 कोस में बहुत से भूमिहार ब्राह्मण, राजपूत,बंदौत , कायस्थ और माहुरी आदि की पुरोहिती सैकड़ों वर्ष से करते चले आ रहे हैं और गजरौला, ताँसीपुर के त्यागी राजपूतों की यही इनका पेशा है। गया के देव के सूर्यमंदिर के पुजारी भूमिहार ब्राह्मण ही मिले। इसी प्रकार और जगह भी कुछ न कुछ यह बात किसी न किसी रूप में पाई गई। हलाकि गया देव के सूर्यमंदिर का बड़ा हिस्सा शाकद्विपियो को बेचा जा चूका है

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आत्मनों ज्ञाति वृत्तान्त, यो न जानाति ब्राहम्णः।
ज्ञातीनां समवायार्थ,पृष्टः सन्मूक तां व्रजेत्ं ।।

यदि कोई भी ब्राहम्ण अपनी ज्ञाति / जाति का वृतान्त न जानता हो, तो उससे जब कभी ज्ञाति / जाति सम्बन्घी कोई भी बात पूछी जावे तो उसको लज्जित होकर मूकवत (चुप) हो जाना पड़ता है अतः प्रत्येक को अपनी-अपनी ज्ञाति / जाति के प्राचीन ऐतिहासिक वृतान्तों से जानकार होना चाहिए।

मैं डॉ.सुधीर व्यास, पुष्करणा / पुष्टिकरणा / पुष्टिकर ब्राह्मण हूँ, जिसका गोत्र भारद्वाज है, और भारद्वाज गोत्रीय ,यर्जुर्वेेदी, कात्यायन सूत्री “टंकाशाली” व्यास हूं और व्यासों में भी मैं वीर “लाखा जी” का वंशज होने के कारण ‘लखावत’ व्यास हूँ ,, मेरा पुष्करणा ब्राह्मण समाज भी प्राचीनतम भारतीय हिंदू ब्राह्मण समुदाय है और पुष्करणा / पुष्टिकरणा ब्राह्मण समाज भी भूमिहार ब्राह्मण यानि अयाचक ब्राह्मण समाज है।

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पुष्करणा समाज: पुष्करणा ब्राहम्णों का इतिहास व जाति संगठन –

प्रारम्भ में ब्राह्मणों के दो वर्ग ‘गौड़’ और ‘द्रविड़’ नाम से प्रख्यात हुए। गौड़ देशी ब्राह्मण बौड़ और ‘द्रविड़’ क्षेत्रीय ‘द्राविड़’ कहलाने लगे। दोनों कुलों के पांच-पांच कुल और विकसित हुए जो ‘पंच-गौड’ और ‘पंच-द्राविड़’ कहलाए। पचं गौड़ के नाम है- सारस्वत,कान्यकुब्ज, गौड, उत्कल, और मैथिल। इसी प्रकार पंच द्राविड़ के कर्नाटक, तेलंग, महाराष्ट्र, द्राविड़ और गुर्जर विख्यात हुए। ऐसी मान्यता है कि इन दसों कुलों के कालान्तर में चौरासी भेद हुए। पंच द्राविड़ कुल की गुर्जर शाखा के भी चौरासी भेद इसी क्रम में माने जाते हैं आज भी ‘गुर्जर’ के चौरासी भेद गुजरात अंचल में ब्राह्मणों के सामूहिक भोजन को चौरासी नाम से संबोधित किया जाता है। पुष्करणा, गुर्जर ब्राह्मणों की शाखा है। उपलब्ध निष्कर्षों का सार-रूप से सिंहावलोकन किया जाय तो ऐसा लक्षित होता है कि-
1. श्रीयुत प. पण्डोवा गोपालजी रचित ‘जाति विषयक पुस्तक में स्पष्ट लिखते हैं कि पुष्करणे ब्राह्मण गुर्जर ब्राह्मणों के चौरासी भेदों में छठा भेद है।
2. श्रीयुत रेवरेन्ड शेरिंग एम.एल.एल.बी. ने ‘हिन्दू कास्टम्’ ग्रंथ में भी पुष्करणा ब्राह्मणों को पंच-द्राविड़ों की गुर्जरों शाखा का अंग लिखा है।
3. भारत की जनगणना की पच्चीसवीं जिल्द के अन्तर्गत राजपूताना क्षेत्र की रिपोर्ट में भी पुष्करणा ब्राह्मणों को गुर्जर ब्राह्मणों की ही शाखा माना है।
4. सर्वश्री पं. व्यास मोतीलालजी शर्मा और पं.पणिया श्री गोवर्द्धनजी भी इस तथ्य को पुष्करणा समाज की ऐतिहासिकता नाम के लेख में, जो पुष्करणा सज्जन चरित्र के पृष्ठ 231 से 270 पर मुद्रित है, स्वीकारते हैं कि पुष्करणे ब्राह्मण गुर्जर ब्राह्मणों के चौरासी भेदों में से एक भेद हैं। पुष्करणा नामकरण अगर ऐसा मान लिया जाए कि पुष्करणा ब्राह्मण पंच द्राविड़ गुर्जर ब्राह्मणों की एक शाखा है।

पुरात्व के आधार पुष्करणा समाज भारतवर्ष के अत्यंत प्राचीन समाजों में से एक है। एपीग्राकियां इंडिया और एक्सकवेसन पट राजघाट तथा विभिन्न शोध ग्रंथों के आधार पर इस समाज की प्राचीनता और मानव समाज को इसकी देन के प्रमाण उपलब्ध हैं पर कब से मंच गौड़ों की गुर्जर शाखा से अलग होकर देश देशान्तर में इन्होंने अपना अस्तित्व विस्तार किया यह अभी तक अनुसंन्धेय ही है। पौराणिक आख्यानों के आधार पर भृगु ऋषि के पुत्र गुर्जर के तृतीय पुत्र ऋचीक के पुत्र पुष्कर के वंशज ही पुष्करणा कहलाए।

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एक अन्य उपाख्यान के आधार पर सैंधवारण्य ब्राह्मणों की आगरिस ऋषियों के शाप से मुक्त करने के लिए लक्ष्मी ने उन्हें उदार, संतोषी और ब्राह्मण धर्म को पुष्ट करने वाले ऐसे पुष्टिकर होने का वरदान दिया और वे पुष्करणा कहलाए कई विद्वान पौकरणा स्थान के नाम पर तथा अन्याय दंत कथाओं तथा कतिपय अन्य ग्रंथों के आधार पर विभिन्न मत प्रदर्शित करते हैं पर अभी तक कोई सुस्पष्ट और सर्वमान्य आधार भविष्य की खोज पर ही निर्भर करता है। कई लोग इष्टदेवी उष्ट्रवाहिनी मातेश्वरी के सहयो से मां-लक्ष्मी के श्रीमुख से निकले इन शब्दों से हुआ :

वेदवेदांग तत्वज्ञा भविष्यथ द्विजर्षभा:।
उदार राज्य पूज्याश्च शुद्धा: संतोषिण: सदा।
ब्राह्मणानां पुष्किरा धम्र पुष्टिरा स्तथा।
ज्ञान पुष्टिकरास्तस्मात् पुष्करणाख्या भविष्यथा॥

अर्थात्-हे द्विजवर्य ! आप वेद और वेदाग के तत्व के ज्ञाता होवोगे, आपका व्यवहारोचित स्वभाव उदारमना होगा, आपकी राज्यवर्ग में प्रतिष्ठा बनी रहेगी-पूज्यनीय होवोगे-आपका मन शुद्ध और संतोषी सदासर्वदा बना रहेगा, समस्त ब्राह्मण समाज के ब्रह्मत्व को परिपुष्ट आप ही करोगे। धर्म की पुष्टि करने के और ज्ञान की पुष्टि करने के कारण आप इस देश में पुष्करणा नाम से विख्यात हो गये।

एक अन्य व्याख्या अनुसार पुष्करणा ब्राह्मणों का नामकरण निम्नानुसार संभव हुआ –

वेदवेदान्ग तत्त्वज्ञा भविष्यथ द्विजर्षभाः ।२१३ ।

उदारा राज्पुज्याश्च शुद्धा: संतोषिणा: सदा ।
ब्राह्मणानां पुष्टिकरा धर्मपुष्टिकरास्तथा । ।२१४ । ।

तस्मात्पुष्करणाविप्रा ज्ञानवन्तो भविष्यथ ।
विवाह कार्य समये सान्निध्यं ममसर्वदा । ।२१५ । ।

पुष्करणा ब्राह्मण समाज का उद्भव और विकास राष्ट्र की सेवा और मानव-धर्म सेवा के लिए सर्वस्व न्योछावर करने हेतु हुआ है। ‘श्री पुष्करणा ब्राह्मणोत्पति’ शास्त्र में स्पष्ट किया है कि सत्य के लिए संघर्ष करके वेदों की आस्था का पालन करवाने वाले सैन्धवारण्य निवासी ब्राह्मण समाज के लोग वेड और वेदांग के तत्त्व के ज्ञाता होंगे, सदा उदारमना व परोपकार में दत्तचित्त रहेंगे, राज्य का सम्मान पाने वाले, शुद्ध आचरण करने वाले, संतोष भावना वाले तथा ब्रह्मत्व की पुष्टि करके राष्ट्रीय भावना में विकास करने वाले, धर्मानुरागी, ज्ञान की ज्योति जगाने वाले होंगे। क्योंकि यह समाज धर्म (सद्व्यवहार) की पुष्टि करने वाला है, अतः यह पुष्करणा ब्राह्मण के नाम से सम्भोधित किया जायेगा। श्री (लक्ष्मी) विवाहादि हरेक शुभकार्य में पुष्करणा ब्राह्मणों के साथ रहेगी। –

पुष्करणोपाख्यानम्

महालक्ष्मी मुखाम्भोजा-निःसृन्त वर्मुक्ततं ।
ततः प्रभृति ते विप्रा:, ख्यात ‘पुषकरणा’ भुवि।।

श्री लक्ष्मीजी के मुखरुपी कमल से उक्त वर प्राप्त हुआ तब से सैन्धवारण्य के ब्राह्मण ‘पुष्करणे’ नाम से प्रसिद्ध हुऐ  ☞  मैं  “डॉ.सुधीर व्यास, पुष्करणा / पुष्टिकरणा / पुष्टिकर ब्राह्मण हूँ “,  जिसका गोत्र ‘भारद्वाज’ है, और भारद्वाज गोत्र के तहत मैं यर्जुर्वेेदी, कात्यायन सूत्री ,टंकाशाली ‘व्यास’ हूं और व्यासों में भी में लाखा जी का वंशज होने से सगर्व “लखावत व्यास” हूँ।

पुष्करणा भी प्राचीनतम भारतीय हिंदू ब्राह्मण समुदाय है।

पुष्करणा ब्राहम्णों के चौदह गोत्र और चौरासी जातियां (1)उतथ्य गोत्री, ऋगर्वेदी, आश्वलायनसूत्री 1.बाहेती 2.मेडतवाल 3.कॅपलिया 4.वाछड़ 5.पुछतोड़ा 6.पाण्डेय

(2) भारद्वाज गोत्री, यर्जुर्वेेदी, कात्यायन सूत्री 7.टंकाशाली (व्यास) 8. काकरेचाा 9.माथुर 10.कपटा (बोहरा) 11. चुल्लड़ 12. आचार्य

(3) शाण्डिल्य गोत्री, यर्जुर्वेदी, कात्यायन सूत्री 13. बोघा (पुरोहित) 14. मुच्चन(मज्जा) 15. हेडाऊ 16. कादा 17. किरता 18.नबला

(4) गौतम गोत्री, यर्जुर्वेदी, कात्यायन सूत्री 19. केवलिया 20.त्रिवाडी (जोशी) 21.माधू 22.गोदा 23.गोदाना 24.गौतमा

(5) उपमन्यु गोत्री, यर्जुर्वेदी, कात्यायन सूत्री 25.ठक्कुर(उषाघिया) 26.बहल 27.दोढ़ 28.बटृ 29.मातमा 30.बुज्झड़

(6) कपिल गोत्री, यर्जुर्वेदी, कात्यायन सूत्री 31.कापिस्थलिया(छंगाणी) 32.कोलाणी 33.झड़ 34.मोला 35.गण्ढडिया(जोशी) 36.ढाकी

(7) गविष्ठिर गोत्री, सामवेदी, कात्यायन सूत्री 37.दगड़ा 38.पैढ़ा 39.रामा 40.प्रमणेचा 41.जीवणेचा 42.लापसिया

(8) पारासर गोत्री, सामवेदी, लाट्यायन सूत्री 43.चोबटिया(जोशी) 44.हर्ष 45.पणिया 46.ओझा 47.विज्झ 48.झुण्ड

(9) काश्यप गोत्री, सामवेदी, लाट्यायन सूत्री 49.बोड़ा 50.लोढ़ा(नागूं) 51.मुमटिया 52.लुद्र(कल्ला) 53.काई 54. कर्मणा

(10) हारित गोत्री, सामवेदी, लाट्यायन सूत्री 55.रंगा 56.रामदेव थानवी मूता 57.उपाध्याय 58.अच्छु 59.शेषधार 60.ताक(मूता)

(11) शुनक गोत्री, सामवेदी, लाट्यायन सूत्री 61.विशा 62.विग्गाई 63.विड़ड् 64.टेंटर 65.रत्ता 66.बिल्ला

(12) वत्स गोत्री, सामवेदी, लाट्यायन सूत्री 67.मत्तड 68.मुडढर 69.पडिहार 70.मच्छर 71.टिहुसिया(जोशी) 72.सोमनाथा

(13) कुशिक गोत्री, सामवेदी, लाट्यायन सूत्री 73.कबडिया 74. किरायत 75.व्यासड़ा 76.चूरा 77.बास 78.किराडू

(14) मुद्गल गोत्री, अथर्ववेदी, शांखायन सूत्री 79.गोटा 80.सिह 81.गोदाणा 82. खाखड़ 83.खीशा 84.खूहार

यहाँ मैं फेसबुक की मूल पोस्ट पर मेरी आदरणीय मित्र सरिता शर्मा जी का कमेंट भी उल्लेखित करना चाहूँगा  –

“सरस्वती नदी सहित अन्य नदियां जो पश्चिमी सीमांत पंजाब सिंध गुजरात में बहती थी के क्षेत्र में सारस्वत एवं पुष्टिकर पुष्करणा जातियों के लोग रहते थे। सिंधु नदी के भेद से सैंधु मणेचा भेद की भी स्थिति रही थी। द्रव (पानी) द्रविड़ पुष्करिणी (नदी) तथा पुष्टिकर परंपरा के साथ जुड़े समूह नाम हैं। सारस्वत की यात्रा केरल तक हुई थी जबकि पुष्टिकर समुदाय महाराष्ट्र की आरंभिक सीमा से आगे नहीं निकला था। क्षेत्र दृष्टि से पंच द्रविड़ परंपरा के गुण अधिक हैं। विगत 1200 वर्ष के कालखंड में जब विदेशी आक्रमणकारियों का प्रभाव रहा है तो सिंध प्रांत के पुष्टिकर मुस्लिम भी बने तथा बगदाद में गणित ज्योतिष विज्ञान भी लेकर गए और राजस्थान की ओर भी पलायन हुआ। काशी की पुष्टि तथा वहां पीठ की बात भी परंपरा में है जो सरस्वती के लुप्त पोखर रूप में  होने पर बनी तथा प्रयाग की तीसरी नदी की परंपरा भी वहीं से बनी है। विद्यानुरागी व संतोषी वृत्ति की पहचान भी उचित है। उष्ट्रवाहिनी थार से बलूच या आगे तक की/से यात्रा व पलायन को दर्शाती है। तदुपरांत वैष्णव परंपरा को अपनाते हुए समुदाय की पहचान जय श्री कृष्ण से भी दर्शाती है।”

अंत में चलते चलते वर्तमानचीन समय के सबसे बडे संवैधानिक और सामाजिक रूप से (पता नहीं किन ‘ऐतिहासिक कारणों के प्रकाश में’) प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोनो ही रूप से घोषित अपराधी ब्राह्मणों की दुर्दशा का भी हाल चाल कहना चाहूँगा  –

तीर्थों के पण्डों, मन्दिरों के पुजारियों तथा गंगापुत्रों की दशा की अत्यन्त हृदय विद्रावक हो रही है। कहने को तो गंगापुत्र और पण्डे आदि भी ब्राह्मण ही माने जाते हैं। पर, केवल ब्राह्मण शब्द को कलंकित करने के ही लिए यह उनकी सर्वथा अनधिकार चेष्टा है। यह ठीक है कि बिना ब्राह्मण बने हिन्दू समाज में धार्मिक दृष्टि से पूजा सत्कार नहीं हो सकता। पर, केवल ब्राह्मण कह देने मात्र से तो काम नहीं चलता। अन्ततोगत्वा कुछ भी ब्राह्मचित कर्म होना ही चाहिए। सोलह आना नहीं तो कम से कम एक पैसा तो हो। पर, साधारण रीति से पण्डा-पुजारी का अर्थ यही है कि जो निरक्षर भट्टाचार्य हों। प्राय: आश्विन के पितृपक्ष में काशी जैसे स्थानों में गंगा के भीतर जाकर तर्पण करने वाले अधिकांश हिन्दुओं की ओर से पण्डे या गंगापुत्र ही मन्त्र बोला करते हैं। पर कैसे मन्त्र बोले जाते हैं, इस बात के साक्षी गंगा और ईश्वर ही हैं। वैदिक मन्त्रों की तो बात ही निराली है, पुराणों के श्लोकों तक की जो दुर्दशा और अंगभंग किया जाता है उसे श्लोकों की जान ही जानती होगी। वेद के मन्त्र तो प्राय: लोग न जानते और न बोलते ही हैं। अत: उस समय इस दुर्दशा से बचने में उन मन्त्रों को भाग्यवान ही समझना चाहिए। पर, साधारण श्लोकों का जिस बुरी तरह उच्चारण किया जाता है वह सहृदय मनुष्य के लिए असह्य है। ‘नानी स्वधा’ ‘परनानी स्वधा’ इत्यादि उन लोगों के मन्त्र बोलने का प्रकार है! कहिये, भला इस अध:पात का कहीं ठिकाना है! यदि इन्हीं मन्त्रों से पितरों की तृप्ति होती है और उन्हें पिण्ड-पानी मिल सकता है तो फिर बाइबिल और कुरान की आयतों से ही तर्पण कराने में क्यों न पहुँचेगा? गया में लोग जब पितरों के लिए स्वर्ग की सीढ़ी बनवाने जाते हैं, तो वहाँ के पण्डे भी स्वयं पिण्ड-पानी दिलाने नहीं जाते! किन्तु उनके नौकर-चाकर ही जाते हैं जो अधिकांश जाति के अहीर, कहार या कुर्मी आदि होते हैं। बस अब इतने ही से समझ सकते हैं कि वहाँ कैसा श्राध्द तर्पण होता है। पर, स्मरण रहे कि यद्यपि उस समय पण्डाजी को अपने टन-टन और ठन-ठन से फुर्सत नहीं रहती और यदि फुर्सत भी रहे तो वे लोग ही कौन से वेदपाठी होते हैं कि श्राध्द आदि विधिवत् करवा डालेंगे? यदि एक ने दुर्दशा न की तो दूसरे ने ही कर डाली! फिर भी यजमान का ‘सुफल’ कराने जरूर आवेंगे! क्योंकि उस समय कसाई की तरह यात्री लोगों-भोली भाली हिन्दू जनता-के पैसे निर्दयतापूर्वक निचोड़ने होते हैं और जब तक यजमान को कौपीन मात्र शेष न कर लें-बल्कि घर जाकर कुछ और भी मनीऑर्डर द्वारा अपने पास भेजने की प्रतिज्ञा न करवा लें-तब तक यात्री की पीठ ही नहीं ठोंकते! और जब तक उनकी पीठ न ठोंकी जाय तब तक उनका सब किया-कराया व्यर्थ ही रहता है!! पितरों के पास श्राध्द का फल भेजने का बीमा तो पण्डों का हाथ ही है! इसी से ठोंकने पर ही बीमा पक्का होता है!! भला इस अनर्थ का कुछ ठिकाना है! तीर्थयात्री भलेमानुसों और श्राध्द-तर्पण करने वालों की समझ की बलिहारी है! इस तर्पण-श्राध्द के ब्याज से पाप करने की अपेक्षा तो श्राध्द आदि न करना ही अच्छा है। लेकिन यदि सचमुच श्राध्द-तर्पण करना हो तो गया हो या अन्यत्र, अपने घर से विद्वान् पण्डित ले जाना चाहिए, या वहाँ पर ही ढूँढ़कर कराना चाहिए। व्यर्थ की कवायद-परेड से कोई लाभ नहीं है। हाँ यदि श्राध्द का ही श्राध्द करना हो तब तो कहने की कोई बात ही नहीं। उचित तो यही है कि श्राध्दादि करने वाले उसकी विधि और मन्त्रादि स्वयमेव सीख लें, तभी श्राध्दादि करें। और यदि पुजारी रखकर ही भगवान् की पूजा करानी हो तो ऐसी ठाकुरवाड़ियों की आवश्यकता नहीं। नौकर से अपनी सेवा करानी होती है। भगवान् के लिए नौकर की आवश्यकता नहीं। भगवान् की सेवा यदि अपने ही हाथों से कर सकें तो ठीक, नहीं तो केवल ढोंग ही है। क्या भगवान् को नौकरों की कमी है कि नौकरों द्वारा कराई गयी किसी पूजा वे स्वीकार करें?
‘भक्त्या तुष्यति केवलो न च गुणै: भक्तिप्रियो माधाव:।’
नौकर पुजारी को भक्ति कहाँ? उसे तो अपने भोजन और वेतन की ही चिन्ता रहती है। इसीलिए ठाकुरजी की पूजा के लिए जो घी मिलता है उसका कुछ अंश दीयाबत्ती में खर्च कर शेष अपने ही पेट में डाल देने या बेचने वाले पुजारी प्राय: मिलते हैं! क्या ही सुन्दर पूजा है! तीर्थयात्री में और तीर्थ के पण्डों को देने में बहुत सा पैसा व्यय होता है। पर, हमें किसी भी धर्मग्रन्थ में आजकल की यह तीर्थयात्रा नहीं मिली और न ऐसा तीर्थदान ही दीख पड़ा! खासी मौज के साथ खूब ठाट-बाट से रेल पर चढ़कर घूम आने को न तो तीर्थयात्रा कहते और न वहाँ जाकर मूर्खों तथा पेटपरायणों के पॉकेट भरने को तीर्थदान कहते हैं। हाँ, इस काम को विहार, मौज एवं अन्धाधुन्ध कह सकते हैं। तीर्थधवांक्षों को खिलाने और देने से लाभ के के स्थान पर हानि ही हानि है। सुपात्र को देना चाहिए और भक्ति हो तो नंगे पाँव व्रत-नियमपूर्वक तीर्थयात्रा करनी चाहिए।

ब्राह्मण समाज की जो बड़ी भारी दुर्दशा इस समय देखी जा रही है उसके कारण परस्पर की ईष्या, कलह और द्वेष हैं। सम्प्रति ब्राह्मण समाज शतश: छोटे-छोटे दलों में विभक्त है। साधारणत: आज लोगों की धारणा है कि दस ही प्रकार के ब्राह्मण हैं। कान्यकुब्ज, गौड़, उत्कल, मैथिल और सारस्वत यह पंचगौड़ कहाते हैं और महाराष्ट्र, द्राविड़, तैलंग, कर्णाटक और गुर्ज़र (गुजराती) यह पंच द्राविड़ कहे जाते हैं। यह भीलोग समझते हैं कि यह विभाग अनादिकाल का अथवा कम से कम कई सहस्र वर्षों का है। परन्तु, यह धारणा भ्रम से खाली नहीं है। यह पूर्वोक्त कान्यकुब्ज आदि नाम कान्यकुब्ज आदि देशों के अनुसार पड़े हैं। इन देशों के इन नामों का जो इतिहास पुराण, वाल्मीकि रामायण या महाभारत में मिलता है, उससे पता चलता है कि ये नाम सृष्टि के प्रारम्भ के न होकर बहुत पीछे के हैं। पर, इससे भी अधिक ध्यान देने योग्य बात यह है कि यद्यपि इन देशों में से किसी-किसी के नाम कहीं-कहीं प्राचीन ग्रन्थों में आये हैं, तथापि वहाँ पर सिर्फ कान्यकुब्ज आदि देश ही उन शब्दों से लिये गये हैं, न कि उन-उन देशों की ब्राह्मणादि जातियाँ भी कान्यकुब्ज आदि शब्दों से समझी गयी हैं। ब्राह्मणोत्पत्तिर्मात्ताण्ड में अवश्यमेव यह सिध्द करने का यत्न किया गया है कि यह भेद तथा अन्यान्य ब्राह्मण भेद बाबा आदम के समय से ही चला आता है और इसकी पुष्टि के लिए पुराणों के नाम पर बहुत से श्लोक भी लिखे गये हैं! पर, ये सब बातें अश्रध्देय हैं। उस ग्रन्थ के रचयिता ने पुराणों के नाम पर अपने ही मनगढ़न्त श्लोक लिख डाले हैं! वह कदापि माननीय नहीं है। श्रीवेंकटेश्वर प्रेस से ही वह प्रकाशित हुआ है और उसी प्रेस से जो भविष्यपुराण के नाम पर एक ग्रन्थ छपा है उसको छोड़ और कहीं भी इसकी चर्चा नहीं है। पर, याद रहे कि उस भविष्यपुराण का कोई ठिकाना नहीं है। प्राचीन भविष्य पुराण में, जो लिखित रूप में मिलेगा यह बात पायी नहीं जायेगी। यह भी तो स्मरण रखना चाहिए कि जब उस ग्रन्थ में मुसलमानी बादशाहों और आज तक के महात्मा कबीर आदि पुरुषों के भी नाम और हाल दिये हैं तो फिर उस ग्रन्थ के लेख से कैसे माना जाय कि ब्राह्मणों के गौड़ कान्यकुब्जादि दल अत्यन्त प्राचीन और त्रोता-द्वापर के हैं? ऐसा मानने वाले तो बाबर, अकबर और तुलसी, कबीर को भी उसी समय का मानने लगेंगे! यदि इन्हें नहीं, तो फिर गौड़, सारस्वत आदि को कैसे मानेंगे? अत: पाँच-सात सौ या अधिक हजार वर्ष के भीतर ही ये ब्राह्मणों के दल और उनके नाम अधिकांश या सभी यवन राज्य काल के हैं। इसी से प्राचीन ग्रन्थों में इनका पता नहीं है। इसका विचार ‘ब्रह्मवर्ष वंश विस्तर’ और ‘भास्कर भ्रमभंजन’ में किया गया है।

दस प्रकार के ही ब्राह्मण पाये जाते हैं, यह कथन तो ठीक नहीं है। उन्हीं दसों के भी अनेक छोटे-छोटे दल हो गये हैं जो सैकड़ों की संख्या में हैं और इनसे बाहर भी बहुत से हैं। जैसे मैथिलों में क्षत्रिय, योग्य, पंजीबध्द और जैवार ये चार दल प्रधान हैं। इसी तरह कान्यकुब्जों में भी सर्यूपारी, जुझौतिया कान्यकुब्ज, सनाढय और जगन्वंशी ये प्रधान हैं तथा मैथिल और कान्यकुब्ज दोनों में भूमिहार, पश्चिमा या जमींदार कहलाने वाले भी हैं। अथवा यों कहिये कि कान्यकुब्जों या सर्यूपारियों में जो अयाचक हैं वही अपने को जगन्वंशी, भूमिहार या जमींदार कहते हैं और मैथिलों में जो अयाचक हैं वे जमींदार या पश्चिमा कहे जाते हैं। सनाढय भी कभी गौड़ों के दल कहाते हैं तो कभी कान्यकुब्जों के। गोलापुरी ब्राह्मण भी, जो प्रधानतया जमींदार और कृषिपेशा हैं और आगरा, ग्वालियर, कोटा, टोंक, धौलपुर आदि राज्यों और मधयप्रान्त के नरसिंहपुर आदि जिलों में पाये जाते हैं, सनाढयों के ही अन्तर्गत हैं और कोटा तथा टोंक राज्यों के प्राय: 16-16 ग्रामों में उनका और सनाढयों का सहभोज एवं बाँदा जिले में परस्पर विवाह सम्बन्धा भी होता है। पूर्व देशों के डीह और मूल की तरह पश्चिम में शासन और निकास कहे जाने वाले दोनों के परस्पर ही एक हैं। किसी-किसी के विचार से ये गौड़ों के ही अन्तर्गत हैं। अतएव कोटा राज्य के हाड़ौती प्रान्त में गुर्जर गौड़ों के साथ इनका कच्चा खान-पान भी है। इनके मूल स्थान गोलापुर के कारण ही ये गोलापुरी कहाते हैं और इस शब्द को ही बिगाड़ कर कोई गोलापूर्व और गोलापूरब भी कहते हैं। कहते हैं, ग्वालियर नाम गालवपुर का अपभ्रंश है और कभी महर्षि गालव वहीं रहते थे। सम्भव है, उसी गालवपुर का अपभ्रंश पहले गोलापुर हुआ हो और पीछे और बिगड़ के ग्वालियर हो गया हो। अहिवासी ब्राह्मण भी गौड़ों के ही अन्तर्गत हैं। गौड़ों के भी आदि गौड़, गूजर गौड़, छन्नातिगौड़, तगे या त्यागी गौड़ आदि छोटे-छोटे विभाग हैं। कलकत्तो के दैनिक ‘विश्वमित्र’ के 26-1-1918 के अंक से यह भी विदित होता है कि जयपुर राज्यान्तर्गत शेखावाटी के मण्डेला स्थान में और अलवर राज्य में भी एक प्रकार के गौड़ रहते हैं जो भूमियाँ कहाते हैं। गोरखपुर के पड़रौना में पं. लक्ष्मीनारायण भूमियाँ एक अच्छे वैद्य हैं। उस लेख में उनके नाम भी लक्षमीनारायण भूमियाँ और सेडूराम भूमियाँ दिये गये हैं। जाँचने से पता चला है-पं. राधाकृष्णजी शर्मा ने, जो सम्भवत: शेखावाटी के ही निवासी गौड़ ब्राह्मण् हैं, यह बतलाया है-कि यह भूमियाँ नामधारी गौड़ प्रथम के अयाचक और बड़े-बड़े जमींदार हैं और प्रथम ब्याह-शादी के समय लोग इन्हें बड़ी-बड़ी नजरें दिया करते थे! वह रीति आज भी किसी न किसी रूप में पायी जाती है, यद्यपि आजकल उनकी प्राचीन दशा नहीं रह गयी है, अस्तु। सारस्वतों के भी ढाई घर, पंजाजाती और महियाल आदि बहुत से भेद हैं। इसी प्रकार गुर्जरों के नगर, औदीच्य, श्रीमाली आदि बहुत से दल हो गये हैं और महाराष्ट्रादि के भी चितपावन, महाराष्ट्र आदि। बंगाली ब्राह्मण भी अपने को कान्यकुब्ज ब्राह्मणों में से ही बताते हैं। इस प्रकार सैकड़ों दल तो यों ही हो गये हैं और फिर इन दलों में प्रत्येक के छोटे-छोटे अनेकानेक दल होकर सहस्रों की संख्या में ब्राह्मण समाज के छोटे-छोटे विभाग या दल पाये जाते हैं। इनके अलावा भी बहुत से ऐसे ब्राह्मण हैं जो इनमें से किसी में भी नहीं मिलते। वे न तो अपने को कान्यकुब्ज ही बताते और न दूसरे ही। किन्तु उनका एक निराला ही दल है। जैसे मैथिलों और गौड़ों का एक दल श्रोत्रिय कहाता है। पर, इन दोनों श्रोत्रियों से निराले ही एक प्रकार के श्रोत्रिय मगध में-अधिकांश मुंगेर, पटना, गया और हजारीबाग आदि जिलों में-पाये जाते हैं। इसी प्रकार हाथरस, मथुरा आदि के जिलों में एक प्रकार के ऐसे ही ब्राह्मण पाये जाते हैं जो अपने को और कुछ न कह केवल गौतम बताते हैं। मालवीय और यजुर्वेदी ये दो प्रकार के ब्राह्मण भी पाये जाते हैं जो और यजुर्वेदियों से निराले ही हैं। हाँ, यजुर्वेदी लोग अपने को मालवीयों के अन्तर्गत ही मानते हैं। परन्तु कान्यकुब्जादि से पृथक् ही अपना एक दल बताते हैं। इसके अतिरिक्त गया, आरा और छपरा आदि में मग या शाकद्वीपीय पाये जाते हैं और अपने को ब्राह्मण ही कहते हैं। लेकिन वे न तो पंचगौड़ों में और न पंचद्राविड़ों में ही और न वे अपने को ऐसा मानते ही हैं। किन्तु अपना एक निराला ही दल मानते हैं। वे भारतवर्ष के निवासी भी नहीं हैं।

एक बात यहाँ पर कह देना आवश्यक है। मगध में अयाचक ब्राह्मण प्राय: ‘बाभन’ नाम से पुकारे जाते हैं जो ‘ब्राह्मण’ शब्द का अपभ्रंश है। उसका कुछ और अर्थ या तात्पर्य नहीं है। यद्यपि इस विषय पर अधिक विचार ब्रह्मर्ष वंश विस्तर में किया जा चुका है और इससे अन्यथा कहने वालों का मुँहतोड़ उत्तर भी दिया जा चुका है। तथापि यहाँ पर थोड़ा और रीति से भी विचार करना इसलिए आवश्यक है कि इस विषय में महामहोपाध्याय पं. हरिप्रसाद शास्त्री एम.ए. जैसों को भी भ्रम हो गया है। मगध में मूर्खतावश ब्राह्मण और बाभन शब्दों के अर्थ में भेद बताया जाता है। याचक या पुरोहिती करने वाले को ब्राह्मण और अयाचक, जमींदार या भूमिहार को बाभन कहते हैं। बस, इसी से अनेक कुकल्पनाओं का अवसर लोगों को मिल गया है। पर, जब अन्यान्य देशों में बाभन और ब्राह्मण शब्द का एक ही अर्थ समझा जाता है और लोग ब्राह्मण शब्द का ही अपभ्रंश बाभन शब्द मानते हैं, तो फिर मगध में निराली गंगा बहाने और उन दोनों शब्दों के दो अर्थ मानने में कौन सी बुध्दिमानी है? वहाँ भी वास्तव में जो ही अर्थ ब्राह्मण का वही बाभन का समझना चाहिए। परन्तु यदि लोग ऐसा नहीं करते तो उनकी मूर्खता है। इस सम्बन्ध में दो दृष्टान्त ऐसे हैं जिनसे पूर्वोक्त सिध्दान्त और भी दृढ़ हो जाता है। एक तो पण्डित शब्द का; दूसरा आचार्य शब्द का। इस बात को प्राय: सभी जानते और मानते हैं कि पण्डित शब्द का अर्थ है विवेकी, विद्वान्, सत्-असत् का विचार करने वाला। यह अर्थ साधारणत: प्रसिध्द है और इससे बढ़कर तो पण्डित शब्द का जो अर्थ है वह केवल शस्त्रीय है और हमें यहाँ उससे प्रयोजन नहीं है। इसी प्रकार यद्यपि आचार्य शब्द का अर्थ मनु, याज्ञवल्क्य आदि के अनुसार समस्त वेद-वेदांगादि का पढ़ाने वाला है। तथापि साधारणत: जो विद्वान् हो और यज्ञ-यागादि क्रियाओं को विधिवत् करे-करावे उसी ब्राह्मण को-लोग आचार्य कहा करते हैं और आचार्य शब्द का यही अर्थ यथार्थ में है भी। परन्तु इधर आजकल एक दूसरी ही धारणा साधारणतया लोगों के दिल में समायी है और वह सरासर मिथ्या एवं अनुचित है। सम्प्रति साधारणतया लोग पण्डित का यह अर्थ समझने लगे हैं कि जिसकी जाति ब्राह्मण हो और जो दूसरे के द्वार पर टुकड़े तोड़ता हो; प्रतिग्रह से जीवननिर्वाह करे; पुरोहिती और कान फूकनाहीं जिसके जीवन का आलम्बन हो! सारांश, याचक या पुरोहित ब्राह्मण के कुल में जन्म हो जाना चाहिए, चाहे ‘काला अक्षर भैंस बराबर’ ही उसके लिए क्यों न हो, इसकी परवाह नहीं! वह अवश्यमेव पण्डित कहा जायगा! बस पुरोहित कुल में एकमात्र जन्म लेने से ही पण्डित शब्द सदा के लिए उसकी बपौती हो जाता है! फिर चाहे वह दुराचार में पण्डित, कुशल या प्रवीण भले ही हो, परन्तु शास्त्र में कुशल हो या न हो! शास्त्र के सम्पर्क की तो आवश्यकता ही नहीं है! बात यह है कि छपरा जिले से लेकर तिरहुत के मुजफ्फरपुर आदि जिलों में कुम्हारों के नाम के साथ पण्डित शब्द जुटा रहता। जैसे और-और देशों में फलां राम या फलां दास इत्यादि कहे जाते हैं वैसे ही वहाँ अमुक पण्डित यही व्यवहार होता। मैंने रास्ते में अचानक एक आदमी से मिलने पर पूछा तो उसने अपना नाम मल्लू पण्डित और कुम्हार जाति बतायी। उनकी स्त्रियाँ भी इसी प्रकार पण्डिताइन या पण्डितानी कहलाती हैं। उस जाति में पण्डित शब्द के इस तरह प्रचार का कारण जाँचने से मालूम हुआ कि कुछ समय पूर्व तिरहुत के किसी राजा के दरबार में पण्डित कहाने वाले ब्राह्मण और एक कुम्हार दोनों बैठे थे। राजा ने अकस्मात् ब्राह्मण देवता से पूछा कि कहिए पण्डितजी आजकल कौन सी ऋतु बीत रही है। यह सुनकर पण्डितजी आगा-पीछा करने और पंचांग ढूँढ़ने लगे। इतने में कुम्हार ने हाथ जोड़कर कहा कि धर्मावतार यदि आज्ञा हो तो मैं अपनी समझ के अनुसार बताऊँ। आज्ञा पाने पर उसने कहा कि अमुक दिन से ज्यों ही कच्चे बर्तन गढ़कर तैयार करता हूँ त्यों ही झटपट सूख जाते हैं। इसलिए उसी दिन से नियमानुसार अमुक ऋतु होनी चाहिए। अन्त में पंचांग की मिलान करने से उसकी बात सोलह आना ठीक निकली! इस पर राजा ने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा कि तुम और तुम्हारी जाति सचमुच पण्डित है। तुम लोगों को पण्डित ही कहना चाहिए। बस, उसी दिन से वहाँ कुम्हार पण्डित कहे जाने लगे और वही बात आज तक पायी जाती है। परन्तु यह किस्सा बहुत ही कम लोग जानते हैं। इसीलिए छपरे के एक कुम्हार से जब हमने पूछा कि तुम लोग तो पण्डित कहे जाते हो न? सो क्यों? इस पर उसने कहा कि नहीं महाराज, हम लोग पण्डित नहीं कहे जाते हैं, किन्तु ‘पँड़ित’। पण्डित तो ब्राह्मण लोग कहाते हैं। इससे अधिक वह कुछ न कह सका। पाठक, यह कैसी विचित्र बात है? देखिये, मूर्खतावश यह न समझ कर कि देहातों में गँवार लोग पण्डित शब्द को ही बिगाड़कर पँड़ित कहा करते हैं, उसने तथा उस प्रान्त के अन्यान्य लोगों ने भी पण्डित तथा पँड़ित शब्दों का अलग-अलग अर्थ समझ रखा है! उनकी समझ में पण्डित एक दूसरी जाति ही है और पँड़ित और ही जाति! वे कभी पँड़ित शब्द को पण्डित शब्द का अपभ्रंश (बिगड़ा रूप) नहीं मानते। पर, क्या इतने ही से सचमुच पण्डित तथा पँड़ित शब्दों के भिन्न-भिन्न अर्थ माने जा सकते हैं और क्या ऐसा मानना ठीक होगा?

दूसरी बात आचार्य शब्द की है। शास्त्रीय रीति के अनुसार सभी यज्ञ, होम, श्राध्द आदि कर्मों के जानने तथा करने-कराने वाले को ही आचार्य कहते हैं। फिर वह चाहे ब्राह्मण हो या अन्य जातिवाला। अधिकांश आचार्य ब्राह्मण् ही हुआ करते हैं। पर, सर्वथा यही नियम नहीं है। कभी-कभी अन्य जाति के लोग आचार्य हो जाते हैं, जैसे आपत्तिकाल में ब्राह्मण का आचार्य क्षत्रिय हो जाता है या योग्य ब्राह्मण के न मिलने पर अन्यान्य लोग भी श्राध्दादि कर्म करा लेते हैं। दक्षिणा की बात दूसरी है। चाहे उसे ब्राह्मण ही क्यों न ले। परन्तु आजकल जनता की यही धारणा है कि हर हालत में केवल ब्राह्मण ही आचार्य हो सकता है, सो भी याचक या पुरोहत दल का ही। इसी भ्रममूलक धारणा के अनुसार एक विचित्र बात देखी जाती है। युक्त प्रान्त के मेरठ आदि पश्चिमी जिलों में महापात्र या महाब्राह्मण को भी कभी आचार्य कहते थे। वह केवल इसलिए कि मरण समय में एकादशाह के दिन वही सम्पूर्ण श्राध्दादि कर्म कराता है। इसलिए उचित तो था कि केवल श्राध्दादि कराने के समय ही उसे आचार्य कहते। मगर, काल पाकर महापात्रों की जाति को ही लोग आचार्य कहने लगे। पर, इधार जब लोगों की यह मिथ्या धारण हो गयी कि आचार्य तो पुरोहित ब्राह्मण ही कहाता है। महापात्र तो पुरोहित नहीं। उसे आचार्य कैसे कह सकते हैं? तो फिर ठीक पण्डित शब्द की ही तरह आचार्य शब्द की भी दुर्दशा की जाने लगी। फल यह हुआ कि महाब्राह्मणों को लोग ‘अचारज’ कहते हैं और पुरोहित दल वालों को आचार्य। यद्यपि आचार्य शब्द का ही अपभ्रंश ‘आचारज’ या अचारज’ है। पर अब लोग वैसा न समझ उसे एक निराला ही शब्द समझने लगे हैं और तदनुसार ही अचारज जाति भी दूसरी समझी जाती है! आचार्य तथा अचारज को लोग एक नहीं समझते! पर, क्या यह विचार या व्यवहार, जो उन लोगों में हो रहा है, ठीक है? क्या सचमुच आचार्य और अचारज की दो जाति मानना उचित और यथार्थ है? फिर बाभन और ब्राह्मण शब्दों के सम्बन्ध में ही क्यों बड़े-बड़े पण्डित ‘बाल की खाल खींचते’ हैं? उसी में सारी पण्डिताई खर्च करने की क्या जरूरत है? यथार्थ में यह केवल पक्षपात, परस्पर द्वेष और अनभिज्ञता का ही फल है।
संस्कारों की तरफ यदि ध्यान दिया जाय तो ब्राह्मण समाज की दुर्दशा का पूरा पता लग जाता है। गर्भाधन आदि सोलह अथवा अड़तालीस संस्कारों की तो बात ही क्या कहें? उनका करना तो दूर रहे, अधिकांश लोग उनके नाम तक भी नहीं जानते। जब संस्कारों का ही अभाव हो रहा है तो फिर संस्काराधीन होने वाले कर्मों की क्या बात कहें? फल यह हो रहा है कि चाहे कहने और डींग मारने के लिए कोई भी कुछ बने और बोले। पर, विचार कर देखने से सभी लोग शूद्र हो रहे हैं। बल्कि शूद्र जाति अपने स्थान पर पड़ी रहने के कारण अच्छी है। लेकिन अपने स्थान से पतित हो जाने के कारण ब्राह्मण समाज तथा क्षत्रियादि भी उन शूद्रों से भी गये-गुजरे हैं-निस्त्तव और निस्तेज हो रहे हैं। मनु आदि का कहना है कि :

वैदिकै: कर्मभि: पुण्यैख्रनषेकादिख्रद्वजन्मनाम्।
    कार्य: शरीरसंस्कार: पावन: प्रेत्य चेह च॥26॥
    गार्भैर्होमैर्जातकर्मचौडमौ जीनिबन्धनै:।
    बैजिकं गाख्रभकं चैनो द्विजानामपमृज्यते॥27॥
    स्वाध्य्यायेन व्रतैर्होमैस्त्रौविद्येनेज्यया सुतै:।
    महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनु:॥28॥

”द्विज मात्र के गर्भाधन आदि शरीर संस्कार वैदिक मन्त्रों से करना कराना चाहिए। उसी से मनुष्य इस लोक तथा परलोक में पवित्र होता है। गर्भाधन आदि के होम प्रभृति और जातकर्म, मुण्डन तथा उपनयनादि संस्कारों के करने से बीज और गर्भ के सभी दोष दूर हो जाते हैं। वेद पढ़ने और उसके लिए ब्रह्मचर्यादि व्रत, अग्निहोत्रादि, वैश्वदेवादि, पंचमहायज्ञ और दर्शपूर्णमासादि कर्मों के करने से ही द्विजों का शरीर ब्रह्मप्राप्ति के योग्य होता है, अन्यथा नहीं,’ (मनु., 2/26-28)। गर्भाधन कर्म तो दूर रहा, सन्तानोत्पत्ति के सम्बन्ध में लोगों की प्रकृति आसुरी हो रही है! फल यह होता है कि कामबुध्दि से उत्पन्न होनेवाले बच्चे भी वैसे ही कामुक, मेधारहित तथा शरीरबल हीन और निस्तेज होते हैं, जिससे प्रतिदिन सन्तान की शक्ति क्षीण होती जा रही है। संस्कारों के नाम पर तीन संस्कार शेष रह गये हैं। यद्यपि उनकी भी दशा अच्छी नहीं है। विधिवत् होना तो दूर रहा, लोगों ने उन्हें लीला ही समझा है और उसी प्रकार से किये भी जाते हैं। फिर भी सभी लोग उनका नाम नहीं भूले हैं, यही गनीमत है। शेष संस्कारों का यद्यपि पता नहीं है, फिर भी उनके नाम पर कभी-कभी कुछ खिला-पिला देना अथवा ब्राह्मणों को कुछ देना अपना धर्म समझा जाता है। इसीलिए चाहे जातकर्म हो, न हो, पर मूल और धनिष्ठा की शान्ति पर पूरा ध्यान केवल इसीलिए रहता है कि उसमें पुरोहित दल को आमदनी होती है। इसीलिए कभी-कभी वह शान्ति धनिकों के मत्थे जबर्दस्ती भी मढ़ी जाती है! इस बात का मुझे स्वयं अनुभव है। तीन संस्कार जो अभी तक भूले नहीं है। उपनयन, विवाह और अन्त्येष्टि हैं। उनमें उपनयन की तो एक प्रकार से काशी के समीपवर्ती प्रान्तों में इतिश्री हो रही है। अधिकांश धनिकों के बच्चों के विवाहकाल में ही उससे दो-चार घण्टे पूर्व उनके गले में यज्ञोपवीत, थोड़ा सा नाटक करने के बाद, डाल दिया जाता है। यह क्रिया अधिक से अधिक एक घण्टे में सम्पन्न की जाती है। सो भी केवल ब्राह्मणों में ही। क्षत्रियों की तो दशा इस विषय में और भी गयी-गुजरी है। उनके यहाँ तो प्राय: यह भी नहीं होता। सिर्फ विवाहकाल में जनेऊ पहना दिया जाता है और यदि विवाह न हुआ तो प्राय: बिना यज्ञोपवीत ही रहते हैं! वैश्यों की दशा और भी शोचनीय है। बहुतों के संस्कार बिलकुल होते ही नहीं और यज्ञोपवीत उनके लिए एक अज्ञात पदार्थ है! हाँ, जिन ब्राह्मणों का विवाह गरीबी के कारण नहीं होता या देर से होता है उनका संस्कार कुछ नाममात्र के लिए अवस्था अधिक होने परहोता है। पुरोहित समाज के अधिकांश लोग किसी देवस्थान पर, या विन्धयाचल में भगवतीके पनाले में जनेऊ डुबोकर बच्चों के गले में डाल देते हैं! उनकी देखादेखीदूसरों में भी यह बात कहीं-कहीं पायी जाती है। उपनयनकाल में गायत्री आदि काउपदेश पुरोहित या व्यास ही करते हैं। यह ठीक नहीं। क्योंकि पारस्करगृह्यसूत्र के भाष्य के उपनयन प्रकरण में गदाधर ने गर्ग का वचन इस प्रकार उध्दृत किया है कि :

पिता पितामहो भ्राता ज्ञातयो गोत्रजाग्रजा:।
    उपायनेऽधिकारी स्यात् पूर्वाभावे पर: पर:॥
    पितैवोपनयेत्पूर्वं तदभावे पितु: पिता।
    तदभावे पितुर्भ्राता तदभावे तु सोदर:॥

”उपनयन काल में गायत्री आदि का उपदेश पिता ही करे, उसके न रहने पर पितामह, उसके भी न रहने पर भाई, दायाद, सगोत्र और ब्राह्मण करे। प्रथम पिता ही उपदेश करे, उसके अभाव में ही पितामह, उसके अभाव में चाचा और उसके अभाव में सहोदर भाई करे।” चाहे क्षत्रिय-वैश्य को भले ही ब्राह्मण ही उपदेश करें, क्योंकि उसके बाद अध्यापन का अधिकार उन्हीं को है, पर ब्राह्मण के बच्चों के लिए तो ऊपर लिखा नियम ही माननीय है। उपनयन की अवस्था भी साधारणतया ब्राह्मण के लिए जन्म या गर्भ से आठवाँ वर्ष है। परन्तु यदि किसी आपत्तिवश अत्यन्त विलम्ब हो जाय तो भी सोलहवें वर्ष से आगे नहीं जाने देना चाहिए, नहीं तो पतित हो जाते हैं। लेकिन यदि ब्रह्मतेज कामना हो तो पाँच वर्ष में ही उपनयन कराकर गायत्री का अनुष्ठान कराना चाहिए। जैसा कि मनुस्मृति के द्वितीय अध्याय के 36 से 40 तक के श्लोकों से स्पष्ट है। यह रीति अभी तक मिथिला आदि देशों में और पश्चिम में भी पायी जाती है। उन देशों में गायत्री के उपदेश करनेवाले (आचार्य) भी पिता आदि ही होते हैं। लेकिन यदि किसी प्रकार से संस्कार हो भी गया तो भी गायत्री का नाम तक भी अधिकांश ब्राह्मण मरणपर्यन्त जानते ही नहीं! फिर भी बड़ी-बड़ी डींगें मारते हैं। इस बात में भी मिथिला काशी के प्रान्तों से कहीं आगे है, यद्यपि अन्यान्य बातों में वह भी गिरी ही है।

दूसरे विवाह संस्कार की तो निपट दुर्दशा है। कहीं वर बिकते हैं तो कहीं कन्या और कहीं पर दोनों! काशी के आसपास तो प्राय: वरों के ही बेचने (तिलक दहेज) की रीति है। पर मिथिला में दोनों की ही। साधारण् श्रेणी के लोग कन्याविक्रय करते हैं तो धनी-मनी मैथिल ही तथा पश्चिमा वर का ही विक्रय करते देखे जा रहे हैं। यद्यपि दोनों ही बातें खराब हैं और मनु आदि ने निषेध भी किया ही है। पर मानता कौन है? वैवाहिक क्रिया की ओर ध्यान दें तो सोलहों आने सफाई है! प्राय: वर-कन्या दोनों पक्ष के मूर्ख पुरोहित ही यह कृत्य कराते हैं, जिनको कि अक्षर से भेंट ही नहीं! यदि है भी तो केवल शपथ खाने-भर के ही लिए। जहाँ देखिये, प्राय: सभी बिना पुस्तक के! पोथी खोलना तो पाप समझा जाता है और जो खोलता है उसकी हँसी मूर्ख पुरोहित और यजमान दोनों मिलकर करते हैं! वे कहते हैं कि अमुक पण्डित को तो विवाह कराना भी नहीं आता। नहीं तो भला पुस्तक देखने की क्या आवश्यकता थी? कहिये न, भला वैदिक कर्म विवाह वेदमन्त्रो से होगा और वे मन्त्र जबानी ही अनाप-सनाप बोले जायेंगे! इसी से तो फल भी बुरा हो रहा है। विधवाओं की संख्या अधिक बढ़ रही है! बालविवाह, वृध्दविवाह तथा बहुविवाह की भी प्रथा जोरों पर है, जिससे व्यभिचार बढ़ रहा है और विधावाओं की संख्या बढ़ाने में भी वह कम सहायक नहीं है। धनी लोग मरते समय तक 3-3, 4-4 विवाह करते जाते हैं। फल यह हो रहा है कि गरीब या साधारण श्रेणी के लोगों में इस समय 25 प्रति सैकड़े को बिना विवाहे रह जाना पड़ता है। इसका फल भविष्य में बड़ा बुरा होगा। जनसंख्या में बहुत कमी हो जायेगी। नाच-तमाशे की प्रथा दिनोंदिन जोरों पर है। सुधारकों की अलग दंग है। ”मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की’ वाली बात है। जिस विवाहकाल में विद्वानों की सभा करके गृहस्थाश्रम के धर्मों और कर्तव्यों पर विचार करना चाहिए कि इस विषय में शास्त्र क्या कहता है, उसी शास्त्र के अर्थ की मीमांसा करनी चाहिए-शास्त्रार्थ करना चाहिए। उसकी जगह ही वेश्या का नाच और पण्डितों का झगड़ा होता है! व्याकरण के किसी सूत्र की एक बात पर कुत्तो की तरह कुछ देर तक दो अपनी भौं-भौं करते और लड़ते है। बस आजकल का यह शास्त्रार्थ है! गोया, नाच देखते-देखते घबड़ाकर लोग दिल बहलाव के लिए विदूषक का-सा तमाशा कराते और ठट्ठा मारकर हँसते हैं!

अन्त्येष्टि संस्कार की बात ही निराली है। एकादशाह के दिन जो महाब्राह्मण या महापात्र श्राध्दादि कराते और शय्या आदि का दान लेते हैं वे तो और भी निरक्षर और दुराचारी हो रहे हैं। बहुत से देशों में उनकी दशा शूद्रों से अच्छी नहीं। और देशों की तो नहीं कह सकते, पर काशी के प्रान्तों में उन्हें लोग छूते तक नहीं और न वे किसी की खाट पर बैठ सकते हैं! फिर भी वही दान के अधिकारी समझे गये हैं और उनके पदार्पण बिना मृत पुरुष के लिए स्वर्ग की सीढ़ी बनती ही नहीं!! यदि स्कूल पाठशाला, या गोशाला के लिए कोई एक पैसा भी माँगे तो देना कठिन है। पर, उनके लिए तो जमीन-जायदाद बेचकर भी देने के लिए सामग्री तैयार की जाती है! इसके बाद ब्राह्मण भोजन के समय की बात और भी विलक्षण है। जैसा कि कह चुके हैं, लोग कर्ज लेकर भी अधिक से अधिक संख्या में नाम के लिए मूर्खों और पतितों को खिलाना ही एकमात्र अपना कर्तव्य समझते हैं!! हालाँकि श्राध्द के समय विशेषकर सुपात्र ब्राह्मण की जाँच करने की आज्ञा मनु आदि ने दी है। जैसा कि :

दूरादेव परीक्षेत ब्राह्मणं वेदपारगम्।
   तीर्थं तध्दव्यकव्यानां प्रदाने सोऽतिथि: स्मृत:॥
   सहस्रं हि सहस्राणामनृचां यत्र भुजते।
   एकस्तान्मंत्रवित्प्रीत: सर्वानर्हति धर्मत:॥

”वेद-वेदांग पारंगत ब्राह्मण की परीक्षा प्रथम से ही करना चाहिए, क्योंकि वही देव, पितर के लिए दिये गये पदार्थों के लिए योग्य अधिकारी और पात्र है। जहाँ लाखों मूर्खों के खिलाने से जितना धर्म होता है वहाँ एक ही वेद-वेदांग के ज्ञाता को भोजनादि से सन्तुष्ट करने से उतना ही पुण्य होता है” (मनु. 3/130, 131)। अत: इस अवसर पर अधिक मूर्खों को न खिला एक ही दो योग्य-विद्वान् और सदाचारियों को खिलाकर शेष अन्न, द्रव्य किसी गोशाला-पाठशाला आदि सार्वजनिक धर्म कार्य में दे देना ही उचित है। श्राध्दादि में देने और खिलाने के बारे में भी यहाँ सर्वोत्तम पक्ष है कि अपने ही सगे भाई-बिरादर, माता-पिता, बहन आदि को दे और खिलावे। जैसा कि व्यास संहिता के चौथे अध्याय में लिखा है कि :

मातापितृषु यद्दद्याद्भातृषु श्वशुरेषु च।
   जायापत्येषु यद्दद्यात्सोऽनन्त: स्वर्गसंक्रम:॥29॥
   पितु: शतगुणं दानं सहस्रं मातुरुच्यते।
   भगिन्यां शतसाहस्रं सोदरे दत्तामक्षयम्॥30॥
   पात्रणमुत्तामं पात्रां शूद्रान्नं यस्य नोदरे॥32॥

”जो दान माता, पिता, भाई, ससुर, स्त्री, पुत्र को दिया जाता है उससे अनन्त स्वर्ग मिलता है। पिता को दिया दान सौ गुना, माता को सहस्र गुना, बहन को लाख गुना और सगे भाई को दिया अक्षय होता है। सर्वोत्तम दानपात्र वही है जिसके पेट में शूद्र का अन्न न हो।” हाँ, यह जरूर है कि बदले में कोई उपकार कराने के लिए दान न दिया जाय। अस्तु! यह तो संक्षिप्त हाल अन्त्येष्टि का है। इसी तरह श्रावणी आदि जितने कर्म प्रतिवर्ष होते हैं उन्हें ब्राह्मणसमाज एक प्रकार से भूल-सा गया है और उनकी जगह पर कुछ और किया करता है। या यों भी कह सकते हैं, कि लोग कुछ भी करते-कराते ही नहीं।

इसलिए यदि ब्राह्मण समाज की इच्छा है कि हमारी सत्ता दुनिया में रहे। हम भी दुनिया में मान्य और पूज्य रहें, जैसा कि पूर्वकाल में वास्तविक रूप से थे और अब भी लोगों की मूर्खता से लाभ उठाकर अपना प्रभुत्व येन-केन-प्रकारेण् स्थिर कर रखा है, पर, कालचक्र वश वह प्रभुत्व अब रहनेवाला प्रतीत नहीं होता, तो ब्राह्मणमात्र को उचित है कि चाहे वह याचक दलवाला हो, या अयाचक दल वाला, अपने संस्कारों को, जो मृतप्राय अथवा मृत ही हो रहे हैं, सबसे प्रथम ठीक करे, उनको पुनर्जीवन दे और रूपान्तर में परिणत या नष्ट हो रहे हैं उन्हें यत्न करके अपने असली रूप में ला दे। सबसे बड़ी बात, जो इन संस्कारों के सम्बन्ध में अत्यन्त अपेक्षित है, यह है कि उनका रूप एक तो शास्त्रीय होना चाहिए और विधि भी शास्त्रीय ही। साथ ही, वे अपने-अपने उचित समय पर वैदिक मन्त्रों द्वारा करायें जावें। चाहे जैसे और जहाँ से हो उनकी पध्दतियाँ और उनके करने-कराने वाले पण्डित विद्वान् उत्पन्न किये अथवा ढूँढ़ निकाले जायँ। साथ ही, उनके करने-कराने में जो समय और धन का व्यय हो तथा शारीरिक परिश्रम की आवश्यकता पड़े उसके लिए तत्पर होना भी आवश्यक से भी आवश्यक है। ऐसा करने में जो बाधाएँ या कठिनाइयाँ आवें, जिनका आना अवश्यम्भावी है, उनका सामना दृढ़ता तथा सफलतापूर्वक किया जाय। इसके बाद गायत्री की उपासना-उसका अनुष्ठान-जितना हो सके बढ़ाया जाय। ऐसा होना चाहिए जिसमें उपनयन के बाद कोई बिना गायत्री की उपासना के न रह जाये। इसके साथ-साथ सभी प्रकार की विद्याओं के सम्पादन के लिए कटिबध्द भी अवश्य होना पड़ेगा। फिर वह विद्या चाहे लौकिक हो या पारलौकिक; चाहे शास्त्रीय हो या राजकीय; चाहे संस्कृत हो या हिन्दी, उर्दू-फारसी और अंग्रेजी। इन बातों के बिना अब सत्ता का रहना तो असम्भव ही है।

मुख्यत: तो  बात यह है कि सभी अयाचक ब्राह्मणों चाहे वे त्यागी कहलाते हों, या भूमिहार, पश्चिमा, जमींदार, बाभन या महियाल, गोलापुरी आदि को चाहिए कि जब उनके अपने को ब्राह्मण बताने पर यह प्रश्न किया जाय कि आप कौन ब्राह्मण हैं, तो वे अपने को गौड़, कान्यकुब्ज, सर्यूपारी, मैथिल, सारस्वत आदि उसी नाम से बतावें जिस दल के वे हों और उन-उन प्रान्तों में जिन-जिन दलों की प्रधानता हो। (कारण, गौड़, मैथिल, कान्यकुब्जादि से पृथक् कोई नहीं हैं।) हाँ, उसके बाद सभी अपने को यह कह सकते हैं कि ‘लेकिन हम जमींदार हैं, न कि साधारण गौड़ आदि’। इसी से ब्राह्मण समाज का कल्याण होगा।

   लोकख्रषनन्दचन्द्राख्ये वैक्रमेऽब्दे सिते दले।
   गुरौ भाद्रे चतर्थ्यां च सम्पूर्णो जान्हवीतटे॥1॥
   रचित: सहजानन्दसरस्वत्याख्यदण्डिना
  अमुना पार्वतीजानि: प्रीयतां पृथिवीपति:॥2

मित्रों उपरोक्त में वर्णित अंशों के मूल लेख का लिंक नीचे दे रहा हूँ जरूर पढें ।

http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=1089&pageno=2

image

मैं मूढमगज़ अंत में बस इतना ही कह पाऊंगा कि यदि बिना किसी साक्ष्य या दस्तावेजी इतिहास के तथाकथित पूर्वजों के तथाकथित अत्याचारों के बल पर सवर्णों, ब्राह्मणों को दोयम दर्जे का बना कर संवैधानिक रूप से समानता के नागरिक अधिकार का जबरदस्त हनन किया जाना यदि सही है..तो ऐतिहासिक व दस्तावेजी रूप से उपलब्ध अकाट्य इतिहास के परिप्रेक्ष्य में पूर्वजों के किये अत्याचारों की सजा अंग्रेजों, रजवाडों और मुसलमानो और अपराधी घरानो को क्यों नहीं दी जा रही , क्या इसमें भी राजनीति और तथाकथित वंचित वर्ग की हवा ढीली होती है….??

आखिरकार मुठ्ठी भर ब्राह्मणों ने असीमित संख्याबल वाले तथाकथित वंचितों और पिछडों पर तथाकथित अधिकार कैसे कायम रखे, और तो और हजारों साल अत्याचार और प्रताडनाऐं किस बल पर कायम रखी ब्राह्मणों ने…???

आज तक इस दुष्प्रचार का मूक विरोध तक ब्राह्मण नेतृत्व और सवर्णों द्वारा नहीं किया गया है यही मेरे और सबके दुख दर्द का मूल कारक है।

जय जय परशुराम
  

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3 Comments Add yours

  1. दक्षिण भारत में ब्राह्मणों में केरल के ब्राह्मणों याने नम्बूदरी ब्राह्मणों का जिक्र आपने नहीं किया.
    इन लोगों को श्री परशुराम जी ने बिहार-उत्तर प्रदेश से लाकर केरल में बसाया.
    ये लोग ज्यादातर शाक्त ब्राह्मण हैं.

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