गौतम बुद्ध और थेरवादी नवबौद्ध ⇄ हिंदुत्व का अभिशाप या थेरवाद (हीनयान) वहाबियत के नये जिहादी ..? जिज्ञासाऐं {भाग 1}


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बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध को हिंदू धर्म के विष्णु भगवान का अवतार या भगवान ही किस महामूर्ख ने घोषित कर कहना लिखना शुरू किया..??

विष्णु जी के किस अवतार ने अलग धर्म या पंथ चलाया था भई जो बुद्ध को विष्णु अवतार कहा जा रहा है , बौद्ध लोग गौतम बुद्ध को कोई अवतार या देवता नहीं मानते , क्यों जबरदस्ती सनातन / वैदिक / हिंदू धर्म में मनचाहे को ठूंस कर अवतार घोषित कर रहे हो..??

★ क्या बौद्ध धर्म में संस्कार, रीति रिवाज और जातिप्रथा है …??
★ यदि नहीं तो बौद्धों, नवबौद्धों को जातिगत आरक्षण देने वाला ‘वज्रमूर्ख बैरिस्टर’ कौन…??

★ किस ग्रंथ में या पुस्तक में लिखा है कि बुद्ध ,विष्णु अवतरण थे, किसने लिखा ये महा झूठ..?

★★ मैं यह पोस्ट अच्छे से समझने में सहायताओं हेतु पोस्ट के साथ दो तस्वीरें / फोटो भी संलग्न कर रहा हूँ , ध्यान से देखियेगा मित्रों। ★★

★★★ जातिगत आरक्षण को हमारे सनातन/वैदिक/हिंदू धर्म की जाति प्रथा / जाति व्यवस्था के तहत ब्राह्मणों, आर्यों/ सवर्णों को, हिंदू धर्म और देवी देवताओं को मुसलोईड्स की तरह गाली दे दे कर भी जातिगत आरक्षण भकोसते बौद्ध, नवबौद्धों की कुत्सित नीच मानसिकता और लेखनी का उदाहरण नीचे दे रहा हूँ और मुझे आश्चर्यजनक लगता है कि सवर्णों के तथाकथित वकीलों में इतनी अकल , इतना ज्ञान नहीं कि वो सुप्रीम कोर्ट में कह सकें कि बुद्ध कोई विष्णु अवतार नहीं और ना ही बौद्धों और नवबौद्धों को (धर्मपरिवर्तन के बाद) पूर्व धर्म या पूर्वजों का धर्म हिंदू लिखे शपथपत्र से आरक्षण भकोसने लायक किस तरह , किस प्रमाणिक आधार पर माना जा सकता है..??

नवबौद्ध लेखन और लेखनी की बानगी –

बुद्ध अवतार
इस अवतार के बारे तो सारी दुनिया जानती है। बुद्ध काल तक सारे भगवान् और अवतार बलि के नाम पर मांस और खून के प्यासे थे, वो बुद्ध जैसे महान कैसे हो सकते है? बुद्ध शाक्य वंश में पैदा हुआ एक महान मानव था,(शाक्य वंश के बारे विस्तृत जानकारी आप को हमारे आने वाले लेखों में मिलेगी) जिसने ब्राह्मणों के विरुद्ध मूल निवासियों का एक धर्म बनाया और सभी मूल निवासियों को इकठ्ठा किया। मूल निवासियों का यह धर्म बौद्ध धर्म के नाम से प्रसिद्ध हुआ। सिद्धार्थ बुद्ध के समय इस धर्म में कोई जाति व्यवस्था नहीं थी। सभी लोग एक सम्मान थे। कोई उंच-नीच नहीं थी। यहाँ तक सिद्धार्थ बुद्ध खुद भी जमीन पर बैठ कर प्रवचन दिया करते थे। यह धर्म कितना महान था इस बात का पता यही से लग जाता है कि 500 ईसवी से 700 ईसवी के बीच बौद्ध धर्म भारत का सर्व श्रेष्ट धर्म बन चूका था। ब्राह्मणों का वर्चस्व समाप्त सा हो गया था। भारत में सभी लोग उंच-नीच, जाति-पाति भूलाकर सिर्फ इंसान बनकर रहने लगे थे। कोई भी मूल निवासी ब्राह्मणों को महत्व नहीं देता था और सारे मूल निवासी फिर से रूद्र काल के गौरव को प्राप्त करने के गौरव की और बढ़ रहे थे। इस बात से यूरेशियन आर्यों अर्थात ब्राह्मणों को सबसे ज्यादा परेशानी हुई। बौद्ध धर्म को समाप्त करने के लिए फिर से सारे ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य एक हुए और उन्होंने एक चाल चली। बहुत से ब्राह्मण बौद्ध भिक्षु बन गए। बौद्ध धर्म के मत्वपूर्ण टिकानों पर ब्राह्मण बौद्ध भिक्षुयों ने कब्ज़ा कर लिया और राजपूतों ने बौद्ध भिक्षुयों के मठों पर आक्रमण कर दिया। लाखों बौद्ध भिक्षु मारे गए, बौद्ध भिक्षुयों के लिखे ग्रंथ और किताबें जला दी गई। बौद्ध धर्म को पूरी तरह ख़त्म कर दिया गया। जो बौद्ध भिक्षु बचे वो अपने प्राणों की रक्षा के लिए भाग गए और जंगलों और पहाड़ों में चुप गए। आज फिर से बौद्ध धर्म लोगों के बीच प्रचलित हो रहा है परन्तु आज बौद्ध धर्म में भी उंच-नीच आ गई है। हीनयान ऊँचे माने जाते है और बाकि दोनों संप्रदाय नीच माने जाते है।
अब पाठकगण खुद ही समझ सकते है कि महात्मा बुद्ध विष्णु का अवतार कैसे हो सकते है? जिन ब्राह्मणों, राजपूतों और वैश्यों ने बुद्ध धर्म का नाश कर दिया, आज उन्ही यूरेशियन आर्यों को शर्म तक नहीं आती। ”

बस आखिर में नवबौद्ध मूढ़मते यह ऐतिहासिक दस्तावेजी उल्लेख करना शायद भूल गया कि –
80 वर्ष की उम्र में गौतम बुद्ध ने अपना आखिरी भोजन, जिसे उन्होंने कुन्डा नामक एक लोहार से एक भेंट के रूप में प्राप्त किया था, ग्रहण लिया जिसके कारण वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गये।

★★ यानि मूलनिवासी लुहार कुन्डा ने व्यक्तिगत षडयंत्र द्वारा “विदेशी सवर्ण राजा की संतान” गौतम बुद्ध की हत्या की थी..??

 वराह अवतार
वराह अवतार की कथा भी हिन्दू पुराणों में बहुत ही गलत ढंग से बताई गई है, जिसमें बताया गया कि हिरणायक्ष ने धरती को चुरा लिया था। धरती को चुरा कर हिरणायक्ष ने पानी में छुपा दिया। विष्णु सूअर बना और हिरणायक्ष को मार कर विष्णु ने धरती को पानी से बाहर अपने दांतों पर निकला।
अब यह कितना सत्य है यह तो पाठकगण पढ़ कर ही समझ गए होंगे। बिना बात को घुमाये आप लोगों को सची घटना के बारे बता देते है। असल में हुआ यूँ था की हिरणायक्ष दक्षिण भारत के प्रायद्वीपों का एक महान मूल निवासी राजा था। जिसने सभी यूरेशियन आर्यों को दक्षिण भारत में मार और डरा कर सभी द्वीपों भगा दिया था। देवताओं ने बहुत सी युक्तियाँ लगा ली थी परन्तु हिरणायक्ष एक अपराजेय योद्धा था, जिसे कोई भी आर्य प्रत्यक्ष युद्ध में हरा नहीं सकता था। हिरणायक्ष ने सारी दक्षिण भारत के सभी द्वीपों पर अपना अधिपत्य स्थापित कर दिया था। दक्षिण भारत में और उसके आस पास के द्वीप पानी में स्थित थे और आर्यों का उन द्वीपों पर से राज्य समाप्त हो गया था। तो इस घटना को पृथ्वी को पानी के अन्दर ले जा कर छुपाना प्रचारित किया गया। हिरणायक्ष को हराने के लिए एक बार फिर विष्णु ने छल कपट का सहारा लिया और हिरणायक्ष को युद्ध करने समुद्र में ललकारा। पानी में युद्ध करते समय विष्णु ने धोखे से हिरणायक्ष के सर के पीछे वार किया और हिरणायक्ष को मार दिया। हिरणायक्ष को मारने के बाद आर्यों का कुछ द्वीपों पर फिर से राज्य स्थापित हो गया। मूल निवासी कभी इस घटना की सच्चाई ना जन ले इस लिए आर्यों ने विष्णु को भगवान् और हिरणायक्ष को राक्षस या असुर बना कर आम समाज के सामने प्रस्तुत किया। अब अगर विज्ञान की ओर से भी इस घटना का विश्लेषण किया जाये तो पता चलता है कि यह घटना एक दम काल्पनिक है। क्योकि समुद्र धरती पर है ना की धरती समुद्र में। तो यहाँ प्रश्न उठता है अगर हिरणायक्ष ने धरती को समुद्र में छुपाया तो कैसे? इतना बड़ा समुद्र कहा है जिस मैं पृथ्वी समा सके? ना तो कोई विष्णु अवतार हुआ और ना ही पृथ्वी को पानी के अन्दर छुपाया गया। यह सिर्फ मूल निवासियों को मुर्ख बनाने की चाल मात्र थी।

 नृसिंह अवतार अथवा नरसिंह अवतार
नर सिंह अवतार भी मात्र एक कोरी कल्पना है। इस कहानी में बताया गया है की हिरण्यकश्यपु को मारने के लिए विष्णु नाम के आर्य ने नर सिंह अवतार लिया था। इस कहानी में विष्णु नाम के आर्य ने आधे मानव और आधे सिंह के रूप में अवतार लिया था। लेकिन असल में हुआ यह था कि हिरणायक्ष को मौत के बाद भी उसके भाई हिरण्यकश्यपु का राज्य बहुत से दक्षिण भारत के द्वीपों पर बाकि था, हिरण्यकश्यपु को भी प्रत्यक्ष युद्ध में हराना आर्यों के बस की बात नहीं थी। हिरण्यकश्यपु को देख कर ही आर्य भाग खड़े होते थे। हिरण्यकश्यपु बहुत शक्तिशाली राजा था। जिसे युद्ध क्षेत्र में तो क्या कोई भी मूल निवासी या आर्य नहीं हरा सकता था। इस लिए आर्यों ने हिरण्यकश्यपु को मरने के लिए भी छल और कपट का सहारा लिया। आर्यों ने हिरण्यकश्यपु के बेटे प्रहलाद को अपनी चाल का मोहरा बनाया। जिस आश्रम में प्रहलाद शिक्षा ग्रहण करने जाता था। उस आश्रम का अध्यापक एक आर्य था। सभी आर्यों ने उस अध्यापक को अपनी और मिला कर और नारद मुनि नाम के अध्यापक को खास तौर पर भेज कर प्रहलाद के मन में वही भगवान् श्रीहरि का डर बिठा दिया। जो आज हर मूल निवासी के मन में बैठा हुआ है। विष्णु को महान बता कर उसको भगवान् बता कर प्रहलाद को आर्यों ने अपनी तरफ कर लिया। प्रहलाद ने अपने पिता हिरण्यकश्यपु के साथ गद्दारी की और विष्णु को भेष बदलवाकर अपने साथ राज महल में ले गया। विष्णु प्रत्यक्ष युद्ध में तो हिरण्यकश्यपु को हरा नहीं सकता था तो विष्णु नाम के आर्य ने एक योजना के तहत शाम के समय हिरण्यकश्यपु के घर के अन्दर प्रवेश करते समय दरवाजे के पीछे से प्रहार कर दिया। जिस से हिरण्यकश्यपु का पूरा पेट फट गया और हिरण्यकश्यपु की मृत्यु हो गई। बाद में मूल निवासियों को बहुत सी काल्पनिक कहानियां बना कर सुनाई गई। बहुत से झूठे वरदानों की काल्पनिक कहानियां बनाई गई। जैसे की हिरण्यकश्यपु को वरदान था कि उसे अन्दर-बाहर, ऊपर नीचे, घर में-घर से बाहर और पता नहीं कौन कौन सी जगहों पर मारा नहीं जा सकता था। विष्णु को भगवान् बताया गया। मूल निवासियों को कही सच्चाई का पता ना चल जाये इसलिए विष्णु को नरसिंह अवतार घोषित किया गया। अगर विज्ञान की ओर से भी इस घटना का विश्लेषण किया जाये तो पता चलता है कि ऐसा मनुष्य होना असंभव है जो आधा आदमी और आधा सिंह हो। यह सब कथाएं आर्यों ने सिर्फ अपने कुकर्मों को छुपाने के लिए बनाई है।

परशुराम अवतार
परशुराम का विवरण महाभारत और रामायण दोनों काल्पनिक ग्रंथों में आता है। लेकिन सचाई क्या है कोई नहीं जानता और ना ही जानना चाहता है क्योकि ब्राह्मण समाज लोगों को सच्चाई जानने नहीं देना चाहता। हर ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य परशुराम को अजेय और भगवान् बनाने पर तुला हुआ है। परशुराम कोई भगवान् नहीं है और ना ही जिन्दा है, ये शाश्वत सत्य है। महाराज बलि की मृत्यु के बाद ब्राह्मणों और राजपूतों में बंटे हुए यूरेशियनों में लड़ाई हो गई कि ब्राह्मणों और राजपूतों में कौन श्रेष्ठ है। ब्राह्मणों ने छल से राज्य हासिल किया था और राजपूत बल में विश्वास करते थे। इसी विरोध के चलते ब्राह्मणों ने राजपूतों को मारने और अपने से नीच साबित करने के लिए एक और चाल चली। ब्राह्मणों ने अपने एक योद्धा को लड़ाई के लिए तैयार किया, जिसका नाम परशुराम था। परशुराम कुल्हाड़ा चलने में पारंगत था। परशुराम एक आर्य था तो उसको कोई मूल निवासी “रूद्र” कोई परसा अर्थात कुल्हाड़ा कैसे दे सकता था?
ब्राह्मणों ने राजपूतों में अफवाह फैला दी कि परशुराम को “सम्राट” शिव / रूद्र का संरक्षण प्राप्त है कि परशुराम राजपूतों का विनाश करे। इसी संरक्षण को बाद में आर्यों ने वरदान नाम से प्रचारित किया। अगर वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखा जाये तो परशुराम के समय शिव नाम के रूद्र अर्थात मूल निवासी राजा को मरे हुए कई साल हो गए थे। लेकिन ब्राह्मणों को पता था कि अगर ऐसी अफवाह फैलाई जाये कि परशुराम को मूल निवासी राजा रुद्र का संरक्षण प्राप्त है तो कोई भी राजपूत परशुराम का विरोध नहीं करेगा और हजारों राजपूत बिना किसी खास मेहनत के मार जायेंगे। क्योकि महा शक्तिशाली और पराक्रमी रूद्र सम्राटों से पुरे भारत के लोग डरते थे। ब्राह्मणों की अफवाह का यही परिणाम भी निकला, हजारों राजपूत डर कर खुद ही मरने के लिए तैयार हो गए। परशुराम की कथा को पढ़ा जाये तो ये बात सपष्ट हो जाती है कि हजारों राजपूतों ने खुद ही अपने परिवार के साथ आत्मदाह कर लिया था। जब देश से राजपूतों की संख्या काफी कम हो गई तब परशुराम नाम के ब्राह्मण को शांति प्राप्त हुई। अगर हम परशुराम का जीवन चरित्र भी देखे तो बहुत सी बातों का पता चलता है कि परशुराम एक नीच गिरा हुआ और क्रूर प्रकृति आदमी था। परशुराम ने अपने पिता के दुसरे विवाह करने में मदद की थी। परशुराम ने अपनी माता को सिर कट कर सिर्फ इस लिए मार दिया था ताकि ऋषि जमदग्नि दूसरी शादी कर सके। जिसे बाद में ब्राह्मणों ने माँ को फिर से जिन्दा करना प्रचारित किया। परशुराम ने सिर्फ ब्राह्मणों की सर्व श्रेष्टता को साबित करने के लिए हजारों राजपूतों को मौत के घाट उतरा था परन्तु ब्राह्मणों के झूठे प्रचार के कारण आज भी राजपूत ब्राह्मणों की गुलामी कर रहे है। अब तो ये मानसिकता राजपूतों में ऐसे घर कर गई है कि कोई भी राजपूत ब्राह्मणों के खिलाफ आवाज उठाना ही नहीं चाहता।

श्री राम अवतार
पूरा रामायण एक काल्पनिक कहानी से ज्यादा कुछ भी नहीं है। ना तो राम मर्यादा पुरषोंतम था और ना ही रावण की लंका समुद्र पार थी। राम का जन्म एक यज्ञ के माध्यम से हुआ था। यज्ञ की सचाई आप हमारी दूसरी पोस्ट पर भी पढ़ सकते हो। उस समय दशरथ की उम्र 60 साल की हो चुकी थी और दशरथ बच्चे पैदा करने में असमर्थ था। तो दशरथ ने अपनी पत्नियाँ ब्राह्मणों को दे कर बच्चे पैदा करने की योजना बनाई। तो पुरे देश से ब्राह्मण बुलाये गए, अभी ब्राह्मणों में से तीन ब्राह्मण चुने गए। और उनको दशरथ ने अपनी तीनों रानियाँ सम्भोग करने को दी। इस विधि को उस समय “नियोग विधि” कहा जाता था। तीनों ब्राह्मणों ने दशरथ की तीनों रानियों के साथ कई दिनों तक शारीरिक सम्बन्ध बनाये और उसके परिणाम स्वरूप राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न नाम के चार पुत्र दशरथ को प्राप्त हुए। पाठकगण खुद सोच सकते है ऐसे घटिया कृत्य से प्राप्त राम भगवान् कैसे हो सकता है। राम बहुत गिरा हुआ और नीच आदमी था। यह बात आपको विस्तार से “सची रामायण” से पता चल सकती है। “सची रामायण” सभी पाठकगण ऊपर दिए गए लिंक से डाउनलोड कर सकते है और पढ़ सकते है। सची रामायण सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया द्वारा प्रमाणित किताब है। बाद में ब्राह्मणों ने अपनी श्रेष्टता साबित करने के लिए राम को भी भगवान् बना दिया। और इतना ज्यादा प्रचारित किया कि देश का हर आदमी आज राम को भगवान् की तरह पूजता है।

श्री कृष्ण अवतार
 कृष्णा अवतार के तो कहने ही क्या। दुनिया का सबसे बड़ा ढोंग कृष्ण को भगवान् प्रचारित करने को बोला जा सकता है। उस कृष्ण को भगवान् बना दिया, जो गाँव की लड़कियों और औरतों को नंगे नहाते हुए देखता था। जिस के नन्द गाँव की हर औरत के साथ शारीरिक सम्बन्ध थे। कृष्ण के शारीरिक सम्बन्ध कुवारी और विवाहित दोनों स्त्रियों के साथ थे। इस विषय पर लगभग सारा साहित्य एक मत है। कुछ उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है:
‘ ता: वार्यमाणा: पतिभि: पितृभि्भ्रातृभिस्तथा,
कृष्ण गोपांगना रात्रौं रमयंती रतिप्रिया :’
विष्णुपुराण, 5, 13/59.

अर्थात – वे रतिप्रिय गोपियाँ अपने पतियों, पिताओं और भाइयो के रोकने पर भी रात में कृष्ण के साथ रमण करती थी . कृष्ण और गोपियों का अनुचित सम्बन्ध था यह बात भागवत में स्पष्ट रूप से मोजूद हैं, ईश्वर अथवा उस के अवतार माने जाने वाले कृष्ण का जन सामान्य के समक्ष अपने ही गाँव की बहु बेटियों के साथ सम्बन्ध रखना क्या आदर्श था?

कृष्ण ने गोपियों के साथ साथ ठंडी बालू वाले नदी पुलिन पर प्रवेश कर के रमण किया. वह स्थान कुमुद की चंचल और सुगन्धित वायु आनंददायक बन रहा था. बाहे फैलाना, आलिंगन करना, गोपियों के हाथ दबाना, बाल (चोटी) खींचना, जंघाओं पर हाथ फेरना, नीवी एवं स्तनों को चुन, गोपियों के नर्म अंगो नाखुनो से नोचना, तिरछी निगाह से देखना, हंसीमजाक करना आदि क्रियाओं से गोपियों में कामवासना बढ़ाते हुए कृष्ण ने रमण किया.
– श्रीमदभागवत महापुराण 10/29/45 

कृष्ण ने रात रात भर जाग कर अपने साथियो सहित अपने से अधिक अवस्था वाली और माता जैसे दिखने वाली गोपियों को भोगा.
– आनंद रामायण, राज्य सर्ग 3/47 

कृष्ण के विषय में जो कुछ आगे पुरानो में लिखा हैं उसे लिखते हुए भी शर्म महसूस होती हैं की गोपियों के साथ उसने क्या-क्या किया इसलिए में निचे अब सिर्फ हवाले लिख रहा हूँ जहा कृष्ण ने गोपियों के यौन क्रियाये की हैं
– ब्रह्मावैवर्त पुराण, कृष्णजन्म खंड 4, अध्याय
28-6/18, 74, 75, 77, 85, 86, 105, 109,110,
134, 70. 

कृष्ण का सम्बन्ध अनेक नारियों से रहा हैं कृष्ण की विवाहिता पत्नियों की संख्या सोलह हज़ार एक सो आठ बताई जाती हैं. धार्मिक क्षेत्र में कृष्ण के साथ राधा का नाम ही अधिक प्रचलित हैं. कृष्ण की मूर्ति के साथ प्राय: सभी मंदिरों में राधा की मूर्ति हैं. लेकिन आखिर ये राधा थी कौन? ब्रह्मावैवर्त पुराण राधा कृष्ण की मामी बताई गयी हैं. इसी पुराण में राधा की उत्पत्ति कृष्ण के बाए अंग से बताई गयी हैं ‘कृष्ण के बायें भाग से एक कन्या उत्पन्न हुई. गुडवानो ने उसका नाम राधा रखा.’
– ब्रह्मावैवर्त पुराण, 5/25-26

‘उस राधा का विवाह रायाण नामक वैश्य के साथ कर दिया गया कृष्ण की जो माता यशोदा थी रायाण उनका सगा भाई था.
– ब्रह्मावैवर्त पुराण, 49/39,41,49

यदि राधा को कृष्ण के अंग से उत्पन्न माने तो वह उसकी पुत्री हुई . यदि यशोदा के नाते विचार करें तो वह कृष्ण की मामी हुई. दोनों ही दृष्टियो से राधा का कृष्ण के साथ प्रेम अनुचित था और कृष्ण ने अनेको बार राधा के साथ सम्भोग किया था .
( ब्रह्मावैवर्त पुराण, कृष्णजन्म खंड 4, अध्याय 15) और यहाँ तक विवाह भी कर लिया था (ब्रह्मावैवर्त पुराण, कृष्णजन्म खंड 4, 115/86-88).

इन सभी बातों पर अगर गौर किया जाये तो आप पाठकगण खुद ही समझ सकते है कि कृष्ण भगवान् कहलाने का कितना अधिकारी है?

भागवत गीता के बारे जो कथा प्रचलित है वो भी मात्र झूठ ही है। भागवत गीता भी मूल निवासियों को धर्म की गुलामी में फंसाए रखने का एक षड्यंत्र मात्र है। जो एक आर्य ऋषि व्यास ने लिखा था जिस में अच्छी बातें सिर्फ इस लिए लिखी गई ताकि मूल निवासी शक ना करे और ब्राह्मणों के धर्म जाल में फंसे रहे।
महाभारत के नाम पर भी मूल निवासियों को सिर्फ झूठ ही बताया गया है। ना कभी महाभारत का युद्ध हुआ और ना ही गीता युद्ध में कृष्ण ने बोली। यह तो कृष्ण को भगवान् को साबित करने का एक षड्यंत्र मात्र है।

तो मित्रों आपने देखा,  पढा इनकी कुत्सित मानसिकता की गंदगी की एक ज्वलंत झलको को..?
विष्णु अवतारों पर गंदगी भरे असत्य लेखन की सत्यता प्रमाणित करने हेतु मैं संबंधता रखता लिंक नीचे दे रहा हूँ ..!

https://bheemsangh.wordpress.com/2014/01/22/avtaro-ka-sach/

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वैसे अब यह एक दीगर बात है कि आज भी लगभग हर जगह दलितों / शोषितों पर तथाकथित अत्याचार जय भीम वाले मूलनिवासी पिछडों / ओबीसी द्वारा ही किया जाता है, इतिहास गवाह है इस सचाई का लेकिन हर जगह बहुत चालाकी से मीडिया और दलित चिंतक / विचार / प्रचारक / प्रशंसक इस सचाई को छुपा कर कहते हैं दलितों पर “दबंगो” के अत्याचार या दबंगों की दलितों पर दबंगई…आदि!

★ देश भर में दलित अत्याचार / शोषण की हर घटना का यदि जातिगत विश्लेषण किया जाये तो वो तथाकथित दबंग प्राथमिकता से सिर्फ और सिर्फ ओबीसी / तथाकथित पिछडा वर्ग से ही संबंधता रखते निकलेगा या फिर एसटी / वनवासी / आदिवासी वर्ग से संबंधित निकलेगा, हाँ किसी इक्का दुक्का घटना में सवर्ण वर्ग को घसीटा जा सकता है वो भी विशेषकर राजपूत वर्ग… लेकिन दलित शोषण और तथाकथित अत्याचारी घटनाओं में ब्राह्मण या वैश्य समुदाय की प्रत्यक्ष / अप्रत्यक्ष “भागीदारी” तो सवर्था, सदैव नगण्य ही दिख रही है।

★★ यह सीधा सीधा दलित प्रचारकों / विचारकों + मीडिया + मिशनरी + जमात का ही नैक्सस है – संयुक्त गठबंधन है जो वर्तमानचीन समय व ऐतिहासिक संदर्भ में भी तथाकथित दलित से भेदभाव / शोषण / अत्याचार की घटनाओं में अपराधी पक्ष ओबीसी/पिछडा वर्ग की 99% हिस्सेदारी को बहुत आसानी से, बहुत ही चालाकी से “दबंगों ने” / दबंगों की दबंगई सरीखी लफ्फाज़ी करके ऐसा रंग देता है मानो यह सब मनु महाराज के आदेश से ब्राह्मण की शह पा कर ब्राह्मण या राजपूत अथवा वैश्य कर रहे हों…??

‪‎Important Note‬ : आखिरकार इस जातिवादी संविधान, कानून और समाज को जानने का कानूनी हक है कि ये तथाकथित दबंगई वाले लोगों दबंग हैं किस जाति के …???

घटिया नैक्सस, घटिया चाल, घटिया झूठ के प्रचार… !!

बुद्धि बेच कर आजीविका कमाते बुद्धिजीवी, दलित प्रचारक / विचारक / चिंतक और तथाकथित मूलनिवासी जन जवाब दो कि –
” ये हर मामलों में आज भी शामिल तथाकथित अत्याचारी, भेदभाव करने वाले “दबंग” हैं ही किस जाति या वर्ग से , ये तथाकथित दबंग है ही कौन जाति के ,, असलियत में …??” 

रोटी ली है अब बेटी लेंगे के पीछे pact of umar यानि उमर के संधिपत्र का ही लंबे समय से चल रहा पूरा राजनैतिक खेल है और AIMIM के जय भीम जय मीम के नये नारे, फैलते पंखों से समझ जाना चाहिये था हिंदुओं को, तथाकथित हिंदू सवर्ण और दलित विचारकों के हिंदुत्ववादी समर्थकों को … मदीना के बनी कुरैजा कबीले का उदाहरण ही रोटी के बाद साम दाम दंड भेद से नहीं अपितु जोर जबर / शक्ति – प्रशासन से बेटी लेने का मूल नारे का सटीकतम उदाहरण है।

थेरवादी नवबौद्धों को , दलित हीनयानी नवबौद्धों / बौद्धों के हिंदू नामों पर कानूनी प्रतिबंध इस आरक्षण प्रधान देश में हद से ज्यादा जरूरी है क्योंकि हिंदू नाम और उपनाम/ surname सिर्फ हिंदुओं का आरक्षण है ईसाईयत व नवबौद्धों का कतई नहीं,, सो एस. राजशेखर रेड्डी ( सैमुअल राजशेखर रेड्डी) और आनंद कुमार ( भंते आनंद के.) की आड़ में हिंदू धर्म त्यागे हुऐ कन्वर्टेड भगौडे हिंदू नामों का उपयोग बंद करें हम हिंदुओं के मानसिक ब्लैकमेल में सहायक बना कर वरना अब बंद करवाना पडेगा कानूनन… आरक्षण और कानून मुफतखोरी में अत्यंत सहायक हैं तो डंडे पडवाने हेतु कानूनी डंडा भी ।

असादुद्दीन औवेसी की पार्टी AIMIM के नये नकोर नारे “जय मीम जय भीम” को यदि 1906 में स्थापित  मुस्लिम लीग के दर्ज मूल नारे व बयानों से जोडें जो आजादी आंदोलन के समय से ही चालू हो गये थे और इन नारों – बयानों को एक बार सिलसिलेवार ” उमर के संधिपत्र / Covenant of Umar ” , बनू कुरैजा कबीले से , अब्दुल वहाब नज्दी यानी वहाबी पंथ का संस्थापक के विचारों से , बानू तमीम कबीले से , देवबंद के “जिद बिन’ नफ्स” यानि ‘अंतरआत्मा से जिहाद’ तथा “जिहाद बिन सैफ” यानि ‘तलवार – हथियार से जिहाद’ की अवधारणाओं के साथ साथ दारुल उलूम- देवबंद मदरसे – तब्लीगी जमात के विचारों से मिलाकर कडी दर कडी जोडते हुऐ पूरी तरह इतिहास, सत्य व तथ्य के सानिध्य में ही इस नये खेल “थेरवादी वहाबियत” और ‘जय भीम जय मीम’ के नारे का सच्चा कुत्सित पहलू सामने लाने का दुरूह प्रयत्न जरूर करूंगा, क्योंकि इसकी जड पूरी तरह अलगाववादी धार्मिक विभाजन से जुडी है!
दूसरे भाग में इस पोस्ट की बुनियाद समेत जय भीम जय मीम समेत पसमांदा मुसलमान नामक झूठे दलित-मुसलमान- पिछडे आंदोलन का भी उल्लेख करूंगा …बहुत लंबी पोस्ट होगी सो अपने इसी ब्लॉग पर ही लिखूंगा निकट भविष्य में।

Important Note : उमर के संधिपत्र / Pact of Umar का पूरा प्रमाणिक वर्णन नीचे लिंक में है… साथ ही pact of umar को गूगल पर टाईप करके भी और अधिक पठनीय, प्रमाणिक जानकारी ली जा सकती है।

” Pact of Umar (also known as: Covenant of Umar, Treaty of Umar or The laws of Umar; In Arabic: Arabic: شروط عمر or عهد عمر or عقد عمر), is an apocryphal treaty between the Muslims and Christians of Syria that later gained a canonical status in Islamic jurisprudence.”

http://legacy.fordham.edu/halsall/source/pact-umar.asp

अब पुनः मूल प्रश्न नवबौद्ध की जिहादी मानसिकता पर आते हुऐ संक्षिप्तता से जानने की कोशिश करते हैं कि ये वास्तविकता में जातिप्रथा और जाति व्यवस्था से तंग आये हुऐ नवबौद्ध थेरवादी हैं या उसकी आड़ में मूलनिवासी जिहादी…??

बौद्ध धर्म की दो प्रधान शाखाएँ हैं—हीनयान (या उत्तरीय) और महायान (या दक्षिणी)। इनमें से हीनयान शाखा के सब ग्रंथ पाली भाषा में हैं और बौद्ध धर्म के मूल रूप का प्रतिपादन करते हैं। महायान शाखा कुछ पीछे की है और उसके सब ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए हैं। महायान शाखा में ही अनेक आचार्यों द्वारा बौद्ध सिद्धांतों का निरूपण गूढ़ तर्कप्रणाली द्वारा दार्शनिक दृष्टि से हुआ है। प्राचीन काल में वैदिक आचार्यों का जिन बौद्ध आचार्यों से शास्त्रार्थ होता था वे प्रायः महायान शाखा के थे।
महायान वर्तमान काल में बौद्ध धर्म की दो प्रमुख शाखाओं में से एक है। दूसरी शाखा का नाम थेरवाद है। महायान बुद्ध धर्म भारत से आरम्भ होकर उत्तर की ओर बहुत से अन्य एशियाई देशों में फैल गया, जैसे कि चीन, जापान, कोरिया, ताइवान, तिब्बत, भूटान, मंगोलिया और सिंगापुर। महायान सम्प्रदाय कि आगे और उपशाखाएँ हैं, मसलन ज़ेन/चान, पवित्र भूमि, तियानताई, निचिरेन, शिन्गोन, तेन्दाई और तिब्बती बौद्ध धर्म….

भगवान बुद्ध के निर्वाण के मात्र 100 वर्ष बाद ही बौद्धों में मतभेद उभरकर सामने आने लगे थे। वैशाली में सम्पन्न द्वितीय बौद्ध संगीति में थेर भिक्षुओं ने मतभेद रखने वाले भिक्षुओं को संघ से बाहर निकाल दिया। अलग हुए इन भिक्षुओं ने उसी समय अपना अलग संघ बनाकर स्वयं को ‘महासांघिक’ और जिन्होंने निकाला था उन्हें ‘हीनसांघिक’ नाम दिया जिसने कालांतर में महायान और हीनयान का रूप धारण कर किया।

सम्राट अशोक ने 249 ई.पू. में पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन कराया जिसमें भगवान बुद्ध के वचनों को संकलित किया ‍गया। इस बौद्ध संगीति में पालि तिपिटक (त्रिपिटक) का संकलन हुआ। श्रीलंका में प्रथम शती ई.पू. में पालि तिपिटक को सर्वप्रथम लिपिबद्ध किया गया था। यही पालि तिपिटक अब सर्वाधिक प्राचीन तिपिटक के रूप में उपलब्ध है।

महायान के भिक्षु मानते थे हीनयान के दोषों और अंतर्विरोधों को दूर करने के लिए बुद्ध द्वारा उपदेशित अद्वैतवाद की पुन: स्थापना की जानी चाहिए। अद्वैतवाद का संबंध वेद और उपनिषदों से है। महायान के सर्वाधिक प्रचीन उपलब्ध ग्रंथ ‘महायान वैपुल्य सूत्र’ है जिसमें प्रज्ञापारमिताएँ और सद्धर्मपुण्डरीक आदि अत्यंत प्राचीन हैं। इसमें ‘शून्यवाद’ का विस्तृत प्रतिपादन है।

हीनयान को थेरवाद, स्थिरवाद भी कहते हैं। तृतीय संगीति के बाद से ही भारत में इस सम्प्रदाय का लोप होने लगा था। थेरवाद की जगह सर्वास्तित्ववाद या वैभाषिक सम्प्रदाय ने जोर पकड़ा जिसके ग्रंथ मूल संस्कृत में थे लेकिन वे अब लुप्त हो चुके हैं फिर भी चीनी भाषा में उक्त दर्शन के ग्रंथ सुरक्षित हैं। वैभाषिकों में कुछ मतभेद चले तो एक नई शाखा फूट पड़ी जिसे सौत्रान्तिक मत कहा जाने लगा।

हीनयान का आधार मार्ग आष्टांगिक है। वे जीवन को कष्टमय और क्षणभंगूर मानते हैं। इन कष्टों से छुटकारा पाने के लिए व्यक्ति को स्वयं ही प्रयास करना होगा क्योंकि आपकी सहायता करने के लिए न कोई ईश्वर है, न देवी और न ही कोई देवता। बुद्ध की उपासना करना भी हीनयान विरुद्ध कर्म है।

हीनयान कई मतों में विभाजित था। माना जाता है कि इसके कुल अट्ठारह मत थे जिनमें से प्रमुख तीन हैं- थेरवाद (‍स्थविरवाद), सर्वास्तित्ववाद (वैभाषिक) और सौतांत्रिक।

‘थेरवाद’ शब्द का अर्थ है “बड़े-बुज़ुर्गों का कहना” और इस्लामिक वहाबियों के मूल संस्थापक मुहम्मद इब्न अब्दुल वहाब की विचारधारा को कई नामों से जाना जाता है, उसके नाम के मुताबिक उसकी कट्टर विचारधारा को वहाबियत यानी वहाबी विचारधारा कहा जाता है और खुद इब्न अब्दुल वहाब ने अपनी विचारधारा को “सलफिया” यानी ‘बुजुर्गों के आधार पर’ कहा था,, जो थेरवाद या हीनयान भी कहता है..!!

इसीलिये थेरवाद में भी धार्मिक कट्टरता से बौद्ध धर्म की इस शाखा में पालि भाषा में लिखे हुए प्राचीन त्रिपिटक धार्मिक ग्रंथों का पालन करने पर ज़ोर दिया जाता है। थेरवाद अनुयायियों का कहना है कि इस से वे बौद्ध धर्म को उसके मूल रूप में मानते हैं। इनके लिए महात्मा बुद्ध एक महापुरुष ज़रूर हैं लेकिन कोई देवता नहीं वे उन्हें पूजते नहीं और न ही उनके धार्मिक समारोहों में बुद्ध-पूजा होती है, बिलकुल असहिष्णु कट्टरपंथी सलाफियों – वहाबियों की ही विचारधारा की तरह।

जहाँ महायान बौद्ध परम्पराओं में देवी-देवताओं जैसे बहुत से दिव्य जीवों को माना जाता है वहाँ थेरवाद बौद्ध परम्पराओं में ऐसी किसी हस्ती को नहीं पूजा जाता। थेरवादियों का मानना है कि हर मनुष्य को स्वयं ही निर्वाण का मार्ग ढूंढना होता है। इन समुदायों में युवकों के भिक्षुक बनने को बहुत शुभ माना जाता है और यहाँ यह रिवायत भी है कि युवक कुछ दिनों के लिए भिक्षु बनकर फिर गृहस्थ में लौट जाता है। थेरवाद शाखा दक्षिणी एशियाई क्षेत्रों में प्रचलित है, जैसे की श्रीलंका, बर्मा, कम्बोडिया, वियतनाम, थाईलैंड और लाओस।पहले ज़माने में ‘थेरवाद’ को ‘हीनयान शाखा’ कहा जाता था, लेकिन अब बहुत विद्वान कहते हैं कि यह दोनों अलग हैं।

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☞ अंतत: मेरी चिंतनीय व्याख्या और प्रस्तुत प्रमाणों एवं वर्तमानचीन नवबौद्ध मानसिकता, कथन वक्तव्यों के सानिध्य वाले प्रमाणिक सबूतों के आधार पर थेरवाद (संभवत: हीनयान  ) को आप बहुत आसानी से बौद्ध धर्म का सलाफी / वहाबी वाद या सलाफी / वहाबी शाखा कह सकते हैं और नवबौद्धों का वहाबीवाद सरीखा धम्म भी यहीं से निकला है जिसमें संस्कृत की जगह पालि भाषा मूलनिवासी भाषा मानी जा रही है साथ ही थेरवाद या हीनयान यह भी कहता है कि खुद मरे बगैर स्वर्ग नहीं मिलेगा इसीलिए जंगल में तपस्या करो। जीवन के हर मोर्चे पर पराक्रम करो। पूजा, पाठ, ज्योतिष और प्रार्थना सब व्यर्थ है, यह सिर्फ सुख का भ्रम पैदा करते हैं और दिमाग को दुविधा में डालते हैं। शाश्वत सुख की प्राप्ति के लिए स्वयं को ही प्रयास करना होगा ,, आश्चर्यजनक रूप से बिलकुल सलाफी – वहाबी मुसलमानों की मूल जिहादी विचारधारा के ही अनुरूप ..!

यह अक्षरक्ष: बिलकुल इस्लामिक जिहाद की अवधारणा से ही मिलता है और देवी देवताओं सहित अवतारों को अपमानित करना दुष्प्रचार करते हुऐ अपशब्दों का ही उपयोग करना यही नवबौद्धों की थेरवादी हीनयानी नवबौद्ध + सलाफी/वहाबी जिहाद का मूलमंत्र और प्रमुखतम हथियार है।

सो मैं तो इन्हें थेरवाद / हीनयान के नवबौद्ध नहीं अपितु नवबौद्धता की आड़ में आरक्षित मूलनिवासी रूपी थेरवाद के वहाबी+सहाबी जिहादी ही कहूँगा और आप अपनी कहें …. !!

अंतत: मैं भी एक घनघोर जातिवादी ब्राह्मण बन कर नीचे इम्पोर्टेन्ट नोट लिख कर वज्रमूर्ख ब्राह्मण समुदाय को चेताना जरूर चाहूँगा ।

‪Another ‎Important Note‬ : अरे मेरे वज्रमूर्ख ब्राह्मण समुदाय समय रहते हिंदुत्व और समाज की जबरदस्ती ठेकेदारी छोड़ दो वरना यूंही धिम्मा/धिक्कार योग्य बन कर अपने मंदिर, शिक्षा, धर्म, ग्रंथ, तकनीकी ज्ञान, नौकरी, इज्जत और रोटी गंवाने के बाद अब “अपनी बेटी” भी गंवानी – छोडनी पडेगी।

★★ वज्रमूर्ख ब्राह्मणों , समाज और हिंदुत्व को एकीकृत करने की ठेकेदारी, पट्टाधारी होने की थोथी बातें करना छोड़ ही दो, यह जबरदस्ती के समाज सुधारत की पट्टाधारी ठेकेदारी का पट्टा मत पहनो वरना बची खुची इज्जत, स्वीकार्यता भी जाती रहेगी।

★★ समय रहते चेत जाओ वज्र मूर्ख ब्राह्मणों , ये कतई तथाकथित त्रेता, द्वापर नहीं है..
बल्कि 2015 और भविष्य की जमीनी सचाई है , समाज सुधार, व्यवस्था सुधार की पट्टेवाली ठेकेदारी करने की वज्र मूर्खतापूर्ण मानसिकता सुधार लो और कम से कम अपने बच्चों के भविष्य और असलियत पर नजर भर देखना शुरू कर दो, बेशर्मों …!!

कर सकोगे …??

इस लेख श्रृंखला का दूसरा भाग जल्दी ही जारी करूंगा। जय जय मित्रों,  मंगलकामनाऐं

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हर ख़ुशी दिल को ग़मगीन किये जाती है,
इक तेरे ग़म से ज़िंदगी शादाब हुई जाती है.!!

Dr. Sudhir Vyas Posted from WordPress for Android

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