भारत रत्न मौलाना अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन अहमद ‘आजाद’ ☞ गुलाम से आज़ाद कब हुऐ?


भारत रत्न मौलाना अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन उर्फ मौलाना अबुल कलाम  ‘आजाद’ ☞ गुलाम से आजाद कब हुऐ…??

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तत्कालीन तुर्क खलीफा के उस्मानिया साम्राज्य के ही अंतर्गत आते अरब के हिजाज प्रांत के मक्का शहर (आज का सऊदी अरब) में 11 नवंबर 1888 को पैदा हुऐ “मौलाना अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन” साहब जिनकी हिंदू विरोधी खिलाफत आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका रही और जिसके कारण 1923 में फिर 1940 और 1945 में वे भारतीय नेशनल काग्रेंस के प्रेसीडेंट / अध्यक्ष बने।

मौलाना अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन 1940-45 के बीच जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे और उस दौरान भारत छोड़ो आन्दोलन हुआ था तब पहली बार कांग्रेस के अन्य प्रमुख नेताओं की तरह “उन्हें भी तीन साल जेल में बिताने पड़े थे।”

मौलाना अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन अफग़ान उलेमाओं के ख़ानदान से ताल्लुक रखते थे जो बाबर के समय हेरात से भारत आए थे, उनकी माँ अरबी मूल की थीं और उनके पिता मोहम्मद खैरुद्दीन एक फारसी (ईरानी, नृजातीय / Ethnic रूप से) थे। 
मोहम्मद खैरुद्दीन और उनका पूरा परिवार भारतीय स्वतंत्रता के पहले आन्दोलन के समय 1857 में कलकत्ता छोड़ कर मक्का चला गया, वहाँ पर मोहम्मद खैरूद्दीन की मुलाकात अपनी होने वाली अरबी पत्नी से हुई फिर मोहम्मद खैरूद्दीन 1890 में भारत लौट गए,, जब अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन मात्र 11 साल के थे तब उनकी माता का देहांत हो गया। उनकी आरंभिक शिक्षा इस्लामी तौर तरीकों से हुई।

घर पर या मस्ज़िद में उन्हें उनके पिता तथा बाद में अन्य विद्वानों ने पढ़ाया। इस्लामी शिक्षा के अलावा उन्हें दर्शनशास्त्र, इतिहास तथा गणित की शिक्षा भी अन्य गुरुओं से मिली। आज़ाद ने उर्दू, फ़ारसी, हिन्दी, अरबी तथा अंग्रेजी़ भाषाओं में महारथ हासिल की। सोलह साल उन्हें वो सभी शिक्षा मिल गई थीं जो आमतौर पर 25 साल में मिला करती थी।
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तेरह साल की आयु में मौलाना अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन का विवाह ज़ुलैखा बेग़म से हो गया और मूलतः ” मौलाना अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन देवबन्दी विचारधारा के करीब थे ”

बाद में देवबन्दी विचारधारा से अहमदिया की ओर झुकाव के चलते मौलाना अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन ने अपना उपनाम “अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन अहमद ‘आजाद’ ” रख लिया था जबकि उनका असली नाम अबुल कलाम गुलाम मुहिउद्दीन था। अहमद और ‘आजाद’ नाम रखने का कारण लोगों को इस बात का संदेश देना था कि उनकी सुन्नी परंपरा में जो विश्वास, मान्यताएं तथा मूल्य मिले थे, वे अब उनसे बंधे हुए नहीं रहे हैं। यही कारण था कि उन्होंने अपने पिता की तरह पीरी-मुरीदी का सिलसिला जारी रखने से परहेज किया। वे यह ठीक नहीं समझते थे कि मुरीदों के मुरीद उनके हाथ चूमें या नजराने पेश करें। इस बात पर उनकी अपने पिता मौलाना खैरुद्दीन से कई बार बहस भी हो जाती थी। पिता बेटे के इस रवैये से दु:खी तो थे मगर कुछ कर नहीं सकते थे।

मौलाना अबुल कलाम ने अंग्रेज़ी समर्पित स्वाध्याय से सीखी और पाश्चात्य दर्शन को बहुत पढ़ा। उन्हें मुस्लिम पारम्परिक शिक्षा देवबन्दी विचारधारा के अनुरूप रास नहीं आई और वे आधुनिक शिक्षावादी सर सैय्यद अहमद खाँ के विचारों से भी सहमत थे जिसके अनुयायी अहमदिया संप्रदाय / इस्माईली संप्रदाय ने पाकिस्तान निर्माण और पंजाब के विभाजन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी !

मौलाना अबुल कलाम की शिक्षा उन्हे एक दफ़ातर (किरानी) बना सकती थी पर राजनीति के प्रति उनके झुकाव ने उन्हें पत्रकार बना दिया ,, उन्होने 1912 में एक उर्दू पत्रिका अल हिलाल का सूत्रपात किया उनका उद्देश्य मुसलमान युवकों को क्रांतिकारी आन्दोलनों के प्रति उत्साहित करना और उन्होने तत्कालीन नेताओँ को यह दिखाकर अचंभित कर दिया कि वे मुस्लिम होते हुए भी मुस्लिम लीग और खिलाफत कमेटी के इतर जा कर क्रांतिकारी गतिविधियों का समर्थन कर रह हैं जो उस समय आम बात नहीं थी उन्होने कांग्रेसी नेताओं का विश्वास बंगाल, बिहार तथा बंबई में क्रांतिकारी गतिविधियों के गुप्त आयोजन (मीटिंगे) करके जीता..जो कि खिलाफत आंदोलन का चरम समय था,, खिलाफ़त तुर्की के उस्मानी साम्राज्य की प्रथम विश्वयुद्ध में हारने पर उनपर लगाए हर्जाने का विरोध करता था। उस समय ऑटोमन (उस्मानी तुर्क) मक्का पर काबिज़ थे और इस्लाम के खलीफ़ा वही थे। इसके कारण विश्वभर के मुस्लिमों में रोष था और भारत में यह खिलाफ़त आंन्दोलन के रूप में उभरा जिसमें उस्मानों को हराने वाले मित्र राष्ट्रों (ब्रिटेन, फ्रांस, इटली) के साम्राज्य का विरोध हुआ था।
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  मौलाना अबुलकलाम आज़ाद ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “इण्डिया विन फ्रीडम” में लिखा है कि 1908 में वे मिस्त्र, इराक और तुर्की के आध्यात्मिक दौरे पर रवाना हुए। मिस्त्र में उनका संपर्क मुस्तफा कमाल पाशा के समर्थकों से हुआ जो वहां से एक साप्ताहिक निकाल रहे थे। मौलाना ने तुर्की में तुर्क नवयुवकों (यंग तुर्क्स) के आन्दोलन के नेताआें से मुलाक़ात की जिससे मौलाना के संबंध इन नेताआें से इतने गहरे हुए कि भारत वापसी के कई वर्ष बाद भी दोनों के दरमियान ख़तों का सिलसिला जारी रहा इराक़ में मौलाना ने ईरानी क्रान्तिकारियों से मुलाकात़ की इन मुलाक़ातों ने मौलाना के इस विश्वास को बढ़ावा दिया कि भारतीय मुसलमानों को अंग्रेज़ सरकार के विरूद्ध राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में बढ़कर भाग लेना चाहिये कुछ समय सोच – विचार करने के बाद 1912 में मौलाना ने “अल – हिलाल” जारी किया ताकि उसके माध्यम से मुसलमानों में क्रान्ति की विचारधारा प्रचलित हो, मौलाना की पत्रकारिता इतनी लोकप्रिय थी कि तीन महीनों के अन्दर ही “अल हिलाल” के सभी पिछले एडीशनों को दोबारा छापना पड़ा क्योंकि इस समाचारपत्र का हर नया खरीददार, हर एडीशन को रखने का इच्छुक था।
“अलहिलाल” की लोकप्रियता अंग्रेज सरकार को बुरी लगी उसने प्रेस एक्ट के तहत दो हज़ार स्र्पए की ज़मानत मांगी मौलाना ने ज़मानत तो दे दी पर अपने समाचारपत्र की सरकार – विरोधी भाषा नहीं बदली इस पर सरकार ने दस हज़ार रूपए की ताज़ा जमानत मांगी, मौलाना ने ताज़ा ज़मानत तो दे दी पर अपनी क्रान्तिकारी भाषा को नहीं दबने दिया अंतत: 1915 में अलहिलाल प्रेस जब्त कर लिया गया।

जिल्लेइल़ाही उवाच् —

उपरोक्त अंश का लेखक “सय्यद” मुज़म्मिलुद्दीन (जो खुद तथाकथित रूप से मुहम्मद के वंशज एक पूजनीय सय्यद वंशीय मुसलमान है  ) इसे 4 अप्रेल 2006 को लिखते हुऐ बहुत सफाई से हिंदू मुस्लिम भाईचारगी का बुरका पहना कर मूल बात छुपा जाता है कि मौलाना अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन अहमद ‘आजाद’ तो खुद 1919 से 1925 तक खिलाफत आंदोलन के प्रमुख समर्थक और प्रचारक थे, ताजिंदगी मुख्य रूप से मुस्लिम हित और भारत में मुस्लिम, मुगल अफगान तुर्क श्रेष्ठतता की ही सोच व बातें रखते रहे।

अब अंततः मौलाना अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन उर्फ मौलाना अबुल कलाम ‘आजाद’ को आजाद कहने वालों से बस इतना ही पूछना चाहूंगा कि वो गुलाम से आजाद कब हुऐ..??

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मौलाना आजाद ने अपने जीवन का ध्येय यह बनाया कि वे इस्लाम का स्वच्छ रूप जनता को समझाएंगे और इसके लिए उन्होंने पत्रकारिता को अपना माध्यम बनाया। मौलाना आजाद की लेखनी में ऐसा जादू था जो सर चढ़कर बोलता था। उससे भी भारत की आजादी के लिए मौलाना ने बहुत बड़ा आंदोलन चलाया। लिखने – पढ़ने का चाव आजाद को पागलपन की हद तक था। 1912 में उन्होंने ‘ अल – हिलाल ‘ अखबार प्रकाशित किया जिसका ध्येय अंग्रेजों के खिलाफ भारतवासियों में राष्ट्रीय भावना जगाना था जिसमें वे पूरी तरह सफ ल रहे। मगर, हिन्दू – मुस्लिम संप्रदाय की आपसी सद्भावना को पनपते देख अंग्रेज सरकार ने इसे जब्त कर लिया। 1916 में पुन : ‘ अल – बलाग ‘ के नाम से इसे मौलाना ने प्रकाशित किया और उस समय इसकी प्रसार संख्या 29000 पहुंच गई। फिर अंग्रेजों ने एक बार और उसे बंद कर दिया।

एक जानकारी और देना जरूरी समझूँगा कि पीके (PK) और सत्यमेव जयते स्टार आमिर खान भी इन्ही मौलाना अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन अहमद “आज़ाद” का वंशज यानि Great Grandson है। 

मुस्लिम और सेक्यूलर विचारक / चिंतक ही कहते हैं कि उनके तत्कालीन लेखों से ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे वर्षों पूर्व उन्हें इस बात का आभास हो गया था यदि भारत का विभाजन हुआ तो उससे न तो पाकिस्तान में मुसलमान और न ही भारत में हिंदू खुश रहेगा।

विभाजन के समय पाकिस्तान जाते मुसलोईड्स को रोक कर ये आधा अफगानी और आधा अरबी खून पूछ रहा है कि अपने बुजुर्गों की तामील की हूकूमत और शाहजंहानी विरासतें किस के के भरोसे छोडे जा रहे हो …??? 
हद है और आजादी के बाद हिंदू मुस्लिम एकता का बुरका पहना कर ,इसे शिक्षामंत्री बना कर हमारा सारा इतिहास मुगलों, अफगानों, तुर्कों , मुसलमानों की ही प्रशंसा में भर कर इसे भारत रतन भी दे दिया..??

ये साढे पांच मिनट समय वाला मौलाना अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन का विभाजन के समय पर रिकॉर्डेड़ आखिरी भाषण के अंश सुनें कृपया ..और बतायें कि ताजिंदगी मौलाना लिखते ‘अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन अहमद’ किस तरह इस्लामिक उच्च मानसिकता और हिंदू तो दोयम “धिम्मा” वाली सोच के गुलाम होने से सेक्यूलर और आजाद हुऐ ..और कब..??

https://m.youtube.com/watch?v=REPYdMw5r4Q

पूरा 31 मिनट का भाषण आप निम्नलिखित लिंक को क्लिक करके सुन सकते हैं और लफ्जों की सुनियोजित लफ्फाज़ी वाली हिंदू मुस्लिम एकता और हमारी भाईचारगी की बेचारगी भरी लाचारगी की बुनियाद पर अब सिर नहीं पीटें बल्कि सच को मानना समझना शुरू करें।

भारत माता की जय

https://m.youtube.com/watch?v=XKMLtiK6o_s

हिंदी हिंदू हिंदुस्तान
यही लक्ष्य हो बाकी सब कुर्बान
वन्दे मातरम्

Dr. Sudhir Vyas Posted from WordPress for Android

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