मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड या भारत विरोधी इस्लामिक जेहादियों का गिरोह


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इंडिया दैट इज भारत की आजादी के बाद पूर्णतया अवांछित – अवैध और पाकिस्तानछाप मुसलोईड्स की अलगाववादी आतंकवादी हिम्मतें, वो भी भारत के सरकारी, संवैधानिक संरक्षण में …??? हद है !

योग और सूर्य नमस्कार के साथ-साथ ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने ‘ब्राह्मण धर्म’ और ‘वैदिक संस्कृति’ के खिलाफ खुला विरोध किया है। बोर्ड का कहना है कि ‘बाह्मण धर्म’ और ‘वैदिक संस्कृति’ के बढ़ते प्रभाव के कारण इस्लाम को नुकसान पहुंच रहा है। उन्होंने मुस्लिमों को आंदोलन के लिए तैयार करने की भी बात कही है। ऐसा पहली बार हुआ है जब खुद को भारत में मुस्लिमों के विचारों का प्रवक्ता बताने वाले मुस्लिम ल़ॉ बोर्ड ने खुलेआम मुस्लिम संगठनों, संस्थानों और इमामों को चिट्ठी लिखकर हिंदू ताकतों के खिलाफ सावधान किया है।

‪#‎जिल्लेइल़ाही_उवाच्‬

“ब्राह्मण धर्म”…???
अब असहिष्णुता एवं सांप्रदायिकता की असल कौम मुसलमानों समेत मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपनी अलगाववादी इस्लामिक फितरत में इतना पागल हो चुका है कि उसे देश बाँटने के बाद हिंदुओं को बांटना ही पल्ले पड रहा है, एकत्रित संगठित होती हिंदू शक्ति तथा इस्लामिक असहिष्णुता – सांप्रदायिकता के विरूद्ध हिंदुओं की एकजुटता से मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और उसके मदरसाछाप मुसलमान घबरा कर पागल हो चुके हैं जिस कारण वो ब्राह्मण धर्म सरीखी नई व्याख्या ला कर अपनी कुत्सित अलगाववादी मानसिकता का परिचय दे रहा है।

ऐ बे’ईमान वालों, ऐ जलालत के गलीज पुर्जों तुम मुसलमानों को भारत में जो कुछ मिला है वह हिंदू और गैर मुसलमान समुदाय की मेहरबानी है और 1947 के द्विराष्ट्रवाद सिद्धांत के तहत धार्मिक आधार पर हुऐ देश विभाजन के बाद इस देश में अवांछनीय, अनाधिकृत रूप से पडे खैरात पसंद दंगाई और असहिष्णु मुसलमानों को हम हिंदुओं की ओर से जो कुछ भी मिला है, उसका उन्हें अधिकार ही नहीं था इसलिए उन्हें ज़्यादा उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि , किसका कितना हिस्सा?

1947 के विभाजन की दलील ही ये थी कि पाकिस्तान मुस्लिम का और भारत हिंदुओं और गैर मुसलमानो का तो फिर इस देश में मुसलमानों को और क्या चाहिए..?
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान मुसलमानों ने जो बलिदान , योगदान दिए उनके बदले उन्हें पाकिस्तान के रूप में एक अलग देश मिल गया और इस तरह उन्होंने अपनी क़ुर्बानियों को भुना लिया, भारत के विभाजन की तो दलील और नींव ही ये थी कि भारत हिंदू और गैर मुसलमानो का और पाकिस्तान मुसलमानों का, तो फिर अब भारत में उनका अधिकार कैसा, इसके उल्टे हिंदू व गैर मुसलमान समुदायों ने बड़ी बात की है कि आज़ाद भारत में भी मुसलमानों को बराबरी का दर्जा दे दिया!!

इस तर्क के अलावा वर्तमान में देखें तो वैसे भी यह एक शाश्वत सत्य व सार्वभौमिक नियम है कि अधिकारों के लिए पहले कर्तव्य पालन करना अनिवार्य होता है ,इसलिए लगभग सारे ही मुस्लिम नेताओं और उनके सेक्यूलर रहनुमाओं ने अब यह अनोखी बात कहना भी शुरू कर दिया कि भारतदेश की आजादी के लिये हजारों मुसलमानों ने अपनी जानें क़ुरबान की हैं तो मेरा संवैधानिक व ऐतिहासिक सत्य को मानते हुए यही कहना है कि “द्विराष्ट्रवाद सिद्धांत के आधार पर अविभाजित भारत का विभाजन करके मुसलमानों नें उसके एवज में पाकिस्तान और बंगलादेश बना कर कीमत 1947 में ही समस्त अधिकारों समेत वसूल ली थी” साथ ही अब मुस्लिम नेता और उनके राजनैतिक रहनुमा यह अत्यंत विचित्र बात भी कहने लगे हैं कि हरेक मुसलमान स्वभाव से सेक्यूलर और हिन्दू तो सांप्रदायिक यानि फिरका परस्त होते हैं जिनके कारण ही मुसलमान पिछड़े , गरीब,अशिक्षित और बेरोजगार हैं जबकि इन मुसलमान रूपी ‘सेक्यूलर वोट’ की कट्टर धर्मांधता की बर्बर जेहादी व आतंकवादी सचाई वैश्विक रूप से जगजाहिर हो चुकी है विश्व के 63 देशों में इनकी वीभत्स व घिनौनी धर्मांधता व जेहादीवाद के रूप में..जिसमें गैरमुसलिम सिर्फ मार ही दिये जाते हैं !!

शायद कांग्रेस समाजवादी, वामपंथी और तो और काँग्रेस की सगी बहन बन चुकी भाजपा और तथाकथित सेकुलर सत्ता के नशे में आकर इस गलतफहमी में पड़े हुए हैं कि इन अवांछित खैरात पसंद मुसलमानों को जितनी अधिक मुफतखोर सुविधायें दी जायेगी वह उतने ही देशभक्त बनेंगे जैसे कि Legionaries Patriotism जैसा वर्णसंकर देशभक्त पैसों के बल पर पैदा करने की असफल द्रोही कोशिश लेकिन हो तो इसका उलटा ही असर रहा है , मुसलमानों में अलगाववादिता की भावना जानबूझकर और उग्र हो रही है क्योंकि ये खैराती मुसलमान अपना मूल कट्टरपंथी सांप्रदायिक और अलगाववादी स्वभाव नहीं बदल सकते ,वैसे भी इनकी इस गद्दार अलगाववादिता यानि भारत व हिंदू विरोध का बिस्मिल्लाह खैरूम्माकिरीन तो कश्मीर समेत उत्तरप्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र से हो ही चुका है जो अब कुछ समय के भीतर सम्पूर्ण भारत में फ़ैल जायेगा इसका सबूत मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की हालिया हरकत से खुल्लमखुल्ला सामने है।

भारत का विभाजन दस्तावेजी रूप से हिंदू-मुस्लिम दोनों धर्मों के सिद्धांत एक दूसरे के विपरीत होने के कारण सिर्फ धार्मिक आधार पर ही हुआ था और जब मुस्लिम लोग आजादी के बाद हिंदुओं के साथ रहने के लिए कतई तैयार नहीं थे, इसलिए उन्होंने अपनी आबादी के हिसाब से देश को दो हिस्सों में बंटवा लिया और अपना पाकिस्तान देश अलग बना लिया,पर यह भी कड़वी सच्चाई है कि जिन अधिकांश मुस्लिमों ने देश के बंटवारे के लिए हिंदुओं से खूनी होली खेली, बंटवारे के बाद उनमें से ही अधिकांश पाकिस्तान गए ही नहीं और भारत में ही रह गए।

‪#‎Important_Note‬

यह सब “जय मीम, जय भीम” के नारे समेत “हिंदू धर्म” (जीवनपद्धति नहीं सेक्यूलर कमीनों) , पूजा पद्धति, देवी देवताओं के लक्षित अपमान समेत विशेषकर ब्राह्मणों के अपमानजनक विरोध से लंबे समय से सामने आ रहा है और तथाकथित दलित वंचित वर्ग के विचारकों / चिंतको रूपी बुद्धिपिशाचों , इन बुद्धिपिशाचों के अनुयायियों की सोशल मीडिया व सार्वजनिक रूप से काम में ली जाती भाषा तथा इन मुसलोईड्स सहित इनके नेताओं की भाषा व मानसिकता तक में कोई फर्क नहीं है जो यह दर्शाने को काफी है कि इस सब दुष्प्रचार की मूल जड़ कहाँ है..??
सबसे महत्वपूर्ण बात कि “जिल्लेइल़ाही यूंही इसे “थेरवादी वहाबियत का जेहाद” नहीं कहते हैं।” बहुत ठोस अध्ययन के साथ जिल्लेइल़ाही ने यह असल परिभाषा वाला जहीन शब्द इजाद किया है।

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अब ये मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड तो विशुद्धतम रूप से अंग्रेजों की अलगाववादी विरासत है, कोई इस्लामी सिद्धांत नहीं, दरअसल कानूनी रूप से एक समुदाय को अलग दर्जा देकर अंग्रेज शासकों ने और फिर अंग्रेजभगत कांग्रेस ने और बाद में अन्य सभी ने शुरू से अपना राजनीतिक हित साधा था लेकिन आज के आतंकवाद और कट्टर जेहादवाद, फतवावाद से ग्रसित आजाद भारत में इस मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, वक्फ बोर्ड सहित हज कमेटी बोर्ड नीति को जारी रखने की कोई जरूरत नहीं है…!!

नाम के लिये ही भारत धर्मनिरपेक्ष देश है जहां कानून का राज है,, संसद जो कानून बनाती है वे मुसलमानों सहित तमाम समुदायों पर एक तरह से लागू होते हैं,फिर अलग शरिया कानून हो, मुसलमानों को ऐसी मांग करने की कोई जरूरत नहीं है, इबादत से जुड़े मामलों में वे शरिया के हिसाब से चलने के लिए आजाद हैं जो कि बेहद निजी मसला है. लेकिन सामाजिक मसलों में उन्हें उन्हीं कानूनों के हिसाब से चलना होगा जो बाकी सभी समुदायों पर लागू होते हैं…सो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्डों को कायम रखने का औचित्य सिवाय सांप्रदायिक अलगाववादिता के और कुछ दूसरा औचित्य तो बिलकुल समझ नहीं आता है ..!

मुसलमानों के लिए एक अलग कानूनी दर्जे की अवधारणा अंग्रेजों की देन है, ऐसा उन्होंने 1937 में मुस्लिम पर्सनल लॉ बनाकर किया और कांग्रेस नें राजीव गांधी के शासनकाल में इसे अधिक स्वायत्त, निरंकुश और संवैधानिक कट्टर प्रारूप प्रदान करके देश को दो हिस्सों में फिर से बांटने की नींव रख ही दी जो फिर से मुस्लिम और गैर मुस्लिम बँटवारे का ही अब प्रत्यक्षदर्शी जेहादी सूत्रधार सिद्ध हो चुका है .. भारत में मुसलमान “मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अनुप्रयोग अधिनियम, 1937 द्वारा शासित हैं.” यह मुसलमानों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ को निर्देशित करता है जिसमें शादी, मेहर (दहेज), तलाक, रखरखाव, उपहार, वक्फ, चाह और विरासत शामिल है,,आम तौर पर अदालत सुन्नियों, के लिए हनाफी सुन्नी कानून को लागू करती है, शिया मुसलमान उन स्थानों में सुन्नी कानून से अलग है जहां बाद में सुन्नी कानून से शिया कानून अलग हैं. हालांकि, वर्ष 2005 में, भारतीय शिया ने सबसे महत्वपूर्ण मुस्लिम संगठन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ से नाता तोड़ दिया और उन्होंने ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के रूप में स्वतंत्र लॉ बोर्ड का गठन किया…जो कि स्पष्टत: इस्लामिक अलगाववादिता की भारतीय नागरिकों में धार्मिक मान्यताओं और धर्मानुसार भेद करने का घृणित उदाहरण है और भारत के संविधान की मूल भावना समेत समानता के अधिकार तक का अपमान है तथा 1947 में धार्मिक आधार पर विभाजित स्वयं भारत व हर बहुसंख्यक का अपमान है…!!

सबकुछ आज भी अस्पषटता और विरोधाभास से भरा ही हुआ है, हिंदू होना गुनाह बन चुका है भारत में…??

मठाधीशों और तरह तरह के पेशेवर व्यापारिक बाबाओं और संतों ने जितनी हानि हिंदुत्व के नाम पर हिंदुओं को पहुंचाई है उसको बस कुल्हाड़ी में लगे लकडी के हत्थे के उदाहरण और कटते हुऐ हरे भरे पेड से समझा जा सकता है !

आजाद भारत में हिंदू, हिंदुत्व और हिंदुस्तान को सबसे ज्यादा चोट तो ब्राह्मण और सवर्ण नेताओं ने भी भरपूर पहुंचाई है, सेक्यूलरिज्म नामक ईजाद ही ब्राह्मणों की है और बात बेबात आज भी वो ही ये झंडा ढो रहे हैं।

‪#‎विशेष‬ : 
अत: अब या तो भारत में अब नयी संवैधानिक धाराओं का हिंदू हित में निर्माण हो ताकि संविधान की मूल भावनाओं का पालन होकर सभी भारतीय समान हो सके और हिंदू नागरिक दोयम दर्जे के नागरिक ना बने रहें, जिस प्रकार तथाकथित अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक किताबों के अनुसार ही उनके भारतीय संविधान तक में विशिष्टता के अधिकार के पर्सनल कानून हैं उसी प्रकार हिंदू हित के कानून भी हिंदू संहिता के आधार पर हों और ईशनिंदा कानून हिंदू व गैरहिंदुओं के लिये समान रूप से गरूड़ पुराण के आधार पर ही तय किये जावें।

अथवा अविलंब बिना अल्पसंख्यकवाद और विशेषकर मुस्लिम तुष्टिकरण किये बगैर “समान नागरिक संहिता / Common Civil Code/ Uniform Civil Code ” बनाकर संविधान के अनुच्छेद 44 का सम्मान करते हुऐ लागू कर दिया जाये।

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अब बहुत हुआ हिंदुओं को दोयम दर्जे का बनाये रखना तथा मंदिरों पर , मंदिरो की डोली की जमीनों पर सरकारी कब्जा और वक्फ बोर्ड आदि का अवैध ,अनैतिक कब्जा बनाये रख कर हिंदू हित भकोस कर हिंदुओं को उनके ही मूल देश में दूसरे दर्जे का तथा अनैतिक पक्षपाती कानूनों का बंधक, गुलाम बनाये रखना.. !!

हिंदुओं के लिये संरक्षण कानून बने, गैर हिंदू को धोखाधड़ी व आरक्षण से लाभ हेतु ही हिंदू Surname व Name को रखने की इजाजतें ना हों, ईशनिंदा कानून हिंदू हित में भी हिंदू हेतु बनाया ही जाये ,हिंदू कोड़ बिल समाप्त हो अथवा
अविलंब बिना अल्पसंख्यकवाद और विशेषकर मुस्लिम तुष्टिकरण किये बगैर “समान नागरिक संहिता / Common Civil Code / Uniform Civil Code” ही बनाकर संविधान के अनुच्छेद 44 का सम्मान करते हुऐ लागू कर दिया जाये , साथ ही सारे मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड्स अब भंग किये जा कर यूनीफॉर्म सिविल कोड यानि समान नागरिक संहिता लागू की जानी चाहिए जैसा कि अमेरिका, यूरोप के हर देश में है ना कि सेक्यूलर समाजवादी इंडिया दैट इज भारत में कायम शरियत कानूनों, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, वक्फ मदरसा बोर्ड ढोते हुऐ Mentally Retarded की तरह सेक्यूलरिज्म का नाटक पेला जाये!

वरना अब समय की मांग के अनुसार हिंदुत्व और राष्ट्रवादिता का आपसी संबंध बहुत गहरा, भावनात्मक तथा कट्टरता का परिचायक बन ही जाना चाहिए यह शांति कायम रहने की और अखंड राष्ट्र के रूप में ससम्मान, जिंदा रहने तक की एकमात्र प्राथमिकता है !

याचक की तरह हिंदूओं को भाईचारे की डफली और चुटकियां बजाना बंद करके सगर्व हां ‘मैं हिंदू हूँ ‘ कहने मात्र के साथ साथ हर हिंदू के साथ सिर्फ हिंदू भारतीय होने के कारण संगठित होना शुरू कर देना पडेगा तब ही संगठित विराट हिंदू शक्ति और समाज के साथ जेहादी और सेक्यूलर हाथ बढा कर भाईचारे की ताली बजाने आ सकेंगे !!

सनद रहे मित्रों, हम हिंदू भाईचारे के याचक नहीं क्योंकि हम तो ‘कानूनन बहुसंख्यक’ है और जो यह बात ना माने, मनवा सकने लायक सिर्फ संगठित रह कर, शक्तिशाली रह कर ही सच को मानने पर मजबूर किया जाता है…हम बाजार हैं, हमारी ही क्रय शक्ति है हम ही इन सांप्रदायिक कट्टर जेहादियों के, सेक्यूलर मंगतों के भाग्यविधाता हैं सो सच को स्वीकार करो मित्रों …हम याचक नहीं हैं, हम भाईचारे का उपहार नहीं देंगें अब अपितु भाईचारे को उपहार में लेंगे वो अपनी पसंद से, ठोकबजा कर निश्चित हो कर …अन्यथा 1947 के बाद और खासकर 1971 में बंगलादेश निर्माण की कांग्रेसी गलती के बाद तथा कश्मीर से हिंदू नरसंहारी विस्थापन के बाद तो हर मुसलमान और सेक्यूलर वोट विदेशी है, भारतीय कतई नहीं…भारत में हर मुसलमान विदेशी है जिसका कोई जड़ मूल या संबंध ना भारत से है ना ही भारतीय जल, जंगल ,जमीन से…यह भी सनद ही रहे ।

हिंदू, हिंदुत्व, हिंदुस्तान
यही हो हमारी पहचान 
वन्दे मातरम्

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Dr. Sudhir Vyas Posted from WordPress for Android

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2 Comments Add yours

  1. क्या लिखा है मेरे हिन्दू भाई. बहुत अच्छा. अब हिन्दुओ को ये करना चाहिए की केवल हिन्दू है इसलिए एक दुसरे से एकता बनाना आरम्भ कर देना चाहिए.

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    1. यही सबसे आवश्यक कार्य है, वर्तमानचीन व्यवस्था व समय में छुआछूत तथा जाति भेदभाव कतई जरूरी नहीं बल्कि हिंदू हो कर संगठित रहना और कंधे से कंधा मिला कर एक थाली में खाते हुऐ संघर्षशील होना जरूरी है।
      वन्दे मातरम्

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