ब्राह्मण समुदाय का सबसे बलवान अंग – भूमिहार ब्राह्मण


ब्राह्मण समुदाय के एक प्रमुख अंग “भूमिहार” के बारे में रोचक व ज्ञानप्रद संक्षिप्त जानकारी :-

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हमारे देश आर्यावर्त में 7200 विक्रम सम्वत् पूर्व देश, धर्म व संस्कृति की रक्षा हेतु एक विराट युद्ध राजा सहस्रबाहु सहित समस्त आर्यावर्त के 21 राज्यों के क्षत्रिय राजाओ के विरूद्ध हुआ, जिसका नेतृत्व ऋषि जमदग्नि के पुत्र ब्रह्मऋषि भगवान परशुराम ने किया, इस युद्ध में आर्यावर्त के अधिकतर ब्राह्मणों ने भाग लिया और इस युद्ध में भगवान परशुराम की विजय हुई तथा इस युद्ध के उपरान्त अधिकतर ब्राह्मण अपना धर्मशास्त्र एवं ज्योतिषादि का कार्य त्यागकर समय-समय पर कृषि क्षेत्र में संलग्न होते गये, जिन्हे अयाचक ब्राह्मण व खांडवायन या भूमिहार कहा जाने लगा,,,

जोकि कालान्तर में त्यागी, भूमिहार, महियाल, पुष्करणा, गालव, चितपावन, नम्बूदरीपाद, नियोगी, अनाविल, कार्वे, राव, हेगडे, अयंगर एवं अय्यर आदि कई अन्य उपनामों से पहचाने जाने लगे।

त्यागी अर्थात भूमिहार आदि ब्रह्मऋषि वंशज यानि अयाचक ब्राह्मणों को सम्पूर्ण भारतवर्ष में विभिन्न उपनामों जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, दिल्ली, हरियाणा व राजस्थान के कुछ भागों में त्यागी, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार व बंगाल में भूमिहार, जम्मू कश्मीर, पंजाब व हरियाणा के कुछ भागों में महियाल, मध्य प्रदेश व राजस्थान में गालव, गुजरात में अनाविल, महाराष्ट्र में चितपावन एवं कार्वे, कर्नाटक में अयंगर एवं हेगडे, केरल में नम्बूदरीपाद, तमिलनाडु में अयंगर एवं अय्यर, आंध्र प्रदेश में नियोगी एवं राव तथा उड़ीसा में दास एवं मिश्र आदि उपनामों से जाना जाता है। अयाचक ब्राह्मण अपने विभिन्न नामों के साथ भिन्न भिन्न क्षेत्रों में अभी तक तो अधिकतर कृषि कार्य करते थे, लेकिन पिछले कुछ समय से विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।

भूमिहार या ब्राह्मण (अयाचक ब्राह्मण) एक ऐसी सवर्ण जाति है जो अपने शौर्य, पराक्रम एवं बुद्धिमत्ता के लिये जानी जाती है। बिहार, पश्चिचमी उत्तर प्रदेश एवं झारखण्ड में निवास करने वाले भूमिहार जाति अर्थात अयाचक ब्राह्मणों को त्यागी नाम की उप-जाति से जाना व पहचाना जाता हैं। मगध के महान पुष्य मित्र शुंग और कण्व वंश दोनों ही ब्राह्मण राजवंश भूमिहार ब्राह्मण (बाभन) के थे भूमिहार ब्राह्मण भगवन परशुराम को प्राचीन समय से अपना मूल पुरुष और कुल गुरु मानते है

भूमिहार ब्राह्मण समाज में कुल 10 उपाधिय है- 
1-पाण्डेय 
2-तिवारी/त्रिपाठी 
3- मिश्र 
4-शुक्ल 
5-यजी 
6-करजी 
7-उपाध्याय 
8-शर्मा 
9-ओझा 
10-दुबे\द्विवेदी 

इसके अलावा राजपाट और ज़मींदारी के कारण एक बड़ा भाग भूमिहार ब्राह्मण का राय ,शाही ,सिंह, उत्तर प्रदेश में और शाही , सिंह (सिन्हा) , चौधरी , ठाकुर आदि बिहार में लिखने लगा बहुत से भूमिहार या बाभन/बामन भी लिखते है..!!

भूमिहार ब्राह्मण जाति ब्राह्मणों के विभिन्न भेदों और शाखाओं के अयाचक लोगो का एक संगठन ही है. प्रारंभ में कान्यकुब्ज शाखा से निकले लोगो को भूमिहार ब्राह्मण कहा गया,उसके बाद सारस्वत , पुष्करणा, महियल , सरयूपारीण , मैथिल(झा) , चितपावन , कन्नड़ आदि शाखाओं के अयाचक ब्राह्मण लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में इन लोगो से सम्बन्ध स्थापित कर भूमिहार ब्राह्मणों में मिलते गए, मगध के ब्राह्मण और मिथिलांचल के पश्चिम तथा प्रयाग के जमींदार ब्राह्मण भी अयाचक होने से भूमिहार गाँव में ही सम्मिलित होते गए…!

भूमिहार ब्राह्मण के कुछ मूलों ( कूरी ) के लोगो का भूमिहार ब्राह्मण रूप में संगठित होने की एक सूची यहाँ दी जा रही है :

1. कान्यकुब्ज शाखा से :- दोनवार ,सकरवार,किन्वार, ततिहा , ननहुलिया, वंशवार के तिवारी, कुढ़ानिया, दसिकर, आदि.

2. सरयूपारी शाखा से : – गौतम, कोल्हा (कश्यप), नैनीजोर के तिवारी , पूसारोड (दरभंगा) खीरी से आये पराशर गोत्री पांडे, मुजफ्फरपुर में मथुरापुर के गर्ग गोत्री शुक्ल, गाजीपुर के भारद्वाजी, मचियाओं और खोर के पांडे, म्लाओं के सांकृत गोत्री पांडे, इलाहबाद के वत्स गोत्री गाना मिश्र ,राजस्थान आदि पश्चिमोत्तर क्षेत्र के पुष्करणा – पुष्टिकरणा – पुष्टिकर ब्राह्मण आदि.. !!

3. मैथिल शाखा से : – मैथिल शाखा से बिहार में बसने वाले कई मूल के भूमिहार ब्राह्मण आये हैं.इनमे सवर्ण गोत्री बेमुवार और शांडिल्य गोत्री दिघवय – दिघ्वैत और दिघ्वय संदलपुर प्रमुख है.

4. महियालो से : – महियालो की बाली शाखा के पराशर गोत्री ब्राह्मण पंडित जगनाथ दीक्षित छपरा (बिहार) में एकसार स्थान पर बस गए. एकसार में प्रथम वास करने से वैशाली, मुजफ्फरपुर, चैनपुर, समस्तीपुर, छपरा, परसगढ़, सुरसंड, गौरैया कोठी, गमिरार, बहलालपुर , आदि गाँव में बसे हुए पराशर गोत्री एक्सरिया मूल के भूमिहार ब्राह्मण हो गए.

5. चित्पावन से : – न्याय भट्ट नामक चितपावन ब्राह्मण सपरिवार श्राध हेतु गया कभी पूर्व काल में आये थे.अयाचक ब्राह्मण होने से इन्होने अपनी पोती का विवाह मगध के इक्किल परगने में वत्स गोत्री दोनवार के पुत्र उदय भान पांडे से कर दिया और भूमिहार ब्राह्मण हो गए.पटना डाल्टनगंज रोड पर धरहरा,भरतपुर आदि कई गाँव में तथा दुमका , भोजपुर , रोहतास के कई गाँव में ये चितपावन मूल के कौन्डिल्य गोत्री अथर्व भूमिहार ब्राह्मण रहते हैं.!

6. पुष्करणा / पुष्टिकर से : सिंध, बलोचिस्तान, अविभाजित पंजाब, राजस्थान और गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र में बसने वाले अयाचक ब्राह्मण समूह पुष्करणा ब्राह्मण भी भूमिहार ब्राह्मण यानि अयाचक ब्राह्मण समुदाय ही हैं।
भारतीय इतिहास में सिंध – थार के साम्राज्य पर मोहम्मद बिन कासिम के अरब मुस्लिम आक्रमण से पहले का आखिरी ब्राह्मण सम्राट “राजा दाहिरसेन” पुष्करणा ब्राह्मण ही था, पुष्करणा ब्राह्मण शुरूआत से ही कृषि – व्यापार – अध्यापन – ज्योतिष विज्ञान – धर्म शास्त्र व ग्रंथ टीका रचनाओं – सैन्य कार्य – प्रशासन – जमींदारी – दीवानी आदि से जुडे कार्य करते हुऐ भूमिहार रहे हैं। पुष्करणा ब्राह्मण पुरोहिती – कर्मकांड / याचक द्वारा जीवन यापन नहीं करते रहे हैं।
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भूमिपति ब्राह्मणों के लिए पहले जमींदार ब्राह्मण शब्द का प्रयोग होता था..याचक ब्राह्मणों के एक दल ने ने विचार किया की जमींदार तो सभी जातियों को कह सकते हैं,फिर हममे और जमीन वाली जातियों में क्या फर्क रह जाएगा.काफी विचार विमर्श के बाद ” भूमिहार ब्राह्मण ” शब्द अस्तित्व में आया.”

मैं डॉ.सुधीर व्यास, पुष्करणा / पुष्टिकरणा / पुष्टिकर ब्राह्मण हूँ,अर्थात मैं ‘डॉ. सुधीर व्यास’, पुष्करणा भूमिहार ब्राह्मण, भारद्वाज गोत्री , यजुर्वेदी, टंकाशाली व्यास, और व्यासों में भी लाखा जी के वँशज होने से लखावत व्यास हूँ!

मेरा पुष्करणा ब्राह्मण समाज भी प्राचीनतम भारतीय हिंदू ब्राह्मण समुदाय है और पुष्करणा / पुष्टिकरणा ब्राह्मण समाज भी भूमिहार ब्राह्मण यानि अयाचक ब्राह्मण समाज है।

#भूमिहार_ब्राह्मणों के पूर्वांचली प्रमुख सरनाम – भूमिहारों के प्रमुख उपनाम- राय, शर्मा , सिंह , चौधरी, सिन्हा , पाण्डेय, मिश्र, तिवारी, दीक्षित, शुक्ला, शाही, प्रधान

1.) बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में- भूमिहार
2.) पंजाब एवं हरियाणा में – मोहयाल

3.) जम्मू कश्मीर में – पंडित, सप्रू, कौल, दार / डार , काटजू आदि

4.) मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश में आगरा के निकटस्थ – गालव
5.) उत्तर प्रदेश में – त्यागी एवं भूमिहार।
6.) गुजरात में – अनाविल ;देसाई जोशी, मेहताद्ध – मेहता
7.) महाराष्ट्र में – चितपावन
8.) कर्नाटक में – चितपावन
9.) पश्चिमी बंगाल – भादुड़ी, चक्रवर्ती, गांगुली, मैत्रा, सान्याल आदि।

10.) उड़ीसा में – दास, मिश्र
11.) तमिलनाडू में – अयर, आयंगर
12.) केरल में – नंबूदरीपाद

13.) राजस्थान में – बांगर, पुष्कर्णा/पुष्टिकरणा /पुष्कर्ण, पुरोहित, रंग/ रंगा एवं रूद्र, बागड़ा.”

14.) आन्ध्रप्रदेश में – राव और नियोगी।

कुछ विद्वानों को सुझाव है कि भूमिहार उन ब्राह्मणों में एक है जिनकी गंगा के मैदान में इतिहास के विभिन्न अवधियों के माध्यम से भूमि और राजनीतिक सत्ता पर पकड़ थी, उसी तरह सरस्वती नदी सहित अन्य नदियां जो पश्चिमी सीमांत पंजाब सिंध गुजरात में बहती थी के क्षेत्र में सारस्वत एवं पुष्टिकर पुष्करणा जातियों के लोग रहते थे। सिंधु नदी के भेद से सैंधु मणेचा भेद की भी स्थिति रही थी। द्रव (पानी) द्रविड़ पुष्करिणी (नदी) तथा पुष्टिकर परंपरा के साथ जुड़े समूह नाम हैं। सारस्वत की यात्रा केरल तक हुई थी जबकि पुष्टिकर समुदाय महाराष्ट्र की आरंभिक सीमा से आगे नहीं निकला था। क्षेत्र दृष्टि से पंच द्रविड़ परंपरा के गुण अधिक हैं। विगत 1200 वर्ष के कालखंड में जब विदेशी आक्रमणकारियों का प्रभाव रहा है तो सिंध प्रांत के पुष्टिकर मुस्लिम भी बने तथा बगदाद में गणित ज्योतिष विज्ञान भी लेकर गए और राजस्थान की ओर भी पलायन हुआ। काशी की पुष्टि तथा वहां पीठ की बात भी परंपरा में है जो सरस्वती के लुप्त पोखर रूप में होने पर बनी तथा प्रयाग की तीसरी नदी की परंपरा भी वहीं से बनी है। विद्यानुरागी व संतोषी वृत्ति की पहचान भी उचित है। उष्ट्रवाहिनी थार से बलूच या आगे तक की/से यात्रा व पलायन को दर्शाती है। तदुपरांत वैष्णव परंपरा को अपनाते हुए समुदाय की पहचान जय श्री कृष्ण से भी दर्शाती है।

बिहार एवं उत्तरप्रदेश सहित लगते क्षेत्र में कुछ प्रमुख भूमिहार उपनाम यथासंभव निम्नलिखित हैं जिनमें सुधार व बढत की पूरी गुंजाइश है।

* ठाकुर: मुजफ्फरपुर निवासी उपनाम के रूप में ठाकुर

* धरी: चौधरी – मुजफ्फरपुर, कटिहार, पूर्णिया में . कुछ बंगाली ब्राह्मण और मैथिल ब्राह्मणों को भी MP में चौधरी कहते हैं.. निखिल चौधरी और उद्योगपति श्री दुर्गा चौधरी पूर्णिया से हैं.

* शर्मा: भूमिहार ब्राह्मणों के बड़े वर्ग के रूप में शर्मा उपनाम है.
प्रसिद्ध राष्ट्रवादियों में शुमार और किसान नेता पंडित कर्यानंद शर्मा और पंडित जदुनंदन शर्मा, वामपंथी इतिहासकार आर.एस. शर्मा जैसे नेता शामिल हैं.

* तिवारी – ओझा: छपरा में कुछ गांवों और
मुजफ्फरपुर ओझा सरनाम भी भूमिहार है.
श्री डी पी ओझा, पूर्व डीजीपी,बिहार.

* मिश्र – मधुबनी और छपरा में मिश्र उपनाम के रूप में है.
मुजफ्फरपुर आधारित SKMCH मेडिकल कॉलेज के पहले प्रिंसिपल डॉ. बी.पी. मिश्र छपरा से है.

* सिंह: इन भूमिहारों या जमींदार ब्राह्मणों का एक उपनाम और सिंह बड़े भूमिहार ब्राह्मण जमींदार है.

* सिन्हा – कई लोग सिंह या सिंहा के स्थान पर सिन्हा को लिखते हैं, मनोज सिन्हा, पूर्व सांसद, गाजीपुर और सांसद अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा आदि!

* पांडे / पाण्डेय : सहबद और छपरा क्षेत्रों में.
अमर शहीद मंगल पांडे व रघुनाथ पाण्डेय आदि

* शाही: वे मुजफ्फरपुर में पाए जाते हैं और देवरिया और गोपालगंज (सरन) के कुछ हिस्सों में भी. हथवा नरेश उपनाम, एल.पी.शाही (कांग्रेस नेता).

* शुक्ल: वे भी वैशाली में पाए जाते हैं

* पंजाब में “दत्त” – महिवाल या मोह्यल- मोहयाली से लिया, सर गणेश दत्त सिंह, फिल्म अभिनेता सुनील दत्त, संजय दत्त आदि

* प्रसाद : ये भूमिहार बख्तियारपुर से हैं.

*करजी : मुजफ्फरपुर

* द्विवेदी : सीतामढ़ी और पश्चिम चंपारण भूमि से

* यहोवा – योजा सरीखे भूमिहार उपनाम के रूप में.

* द्विवेदी – उपाध्याय: रोहतास / कैमूर उपाध्याय
उपनाम

* राय नाम के लगभग सभी भूमिहार पूर्वी उत्तर प्रदेश से भूमिहार उपनाम के रूप में है और इन्ही इलाकों में खावं खान / खावं या सिर्फ ‘खान’ भी भूमिहार का एक उपनाम पाया जाता है।

भूमिहार ब्राह्मणों के इतिहास को पढने से पता चलता है की अधिकांश समाजशास्त्रियों ने भूमिहार ब्राह्मणों को कान्यकुब्ज की शाखा माना है.भूमिहार ब्राह्मण का मूलस्थान मदारपुर है जो कानपुर – फरूखाबाद की सीमा पर बिल्हौर स्टेशन के पास है….1528 में बाबर ने मदारपुर पर अचानक आक्रमण कर दिया.इस भीषण युद्ध में वहाँ के ब्राह्मणों सहित सब लोग मार डाले गए इस हत्याकांड से किसी प्रकार अनंतराम ब्राह्मण की पत्नी बच निकली थी जो बाद में एक बालक को जन्म दे कर इस लोक से चली गई , इस बालक का नाम गर्भू तिवारी रखा गया..!!

गर्भू तिवारी के खानदान के लोग कान्यकुब्ज प्रदेश के अनेक गाँव में बसते है.कालांतर में इनके वंशज उत्तर प्रदेश तथा बिहार के विभिन्न गाँव में बस गए,गर्भू तिवारी के वंशज भूमिहार ब्राह्मण कहलाये इनसे वैवाहिक संपर्क रखने वाले समस्त ब्राह्मण भी कालांतर में भूमिहार ब्राह्मण कहलाये ,,,!

अंग्रेजो ने यहाँ के सामाजिक स्तर का गहन अध्ययन कर अपने गजेटियरों एवं अन्य पुस्तकों में भूमिहारो के उपवर्गों का उल्लेख किया है, गढ़वाल काल के बाद मुसलमानों से त्रस्त भूमिहार ब्राह्मणों ने जब कान्यकुब्ज क्षेत्र से पूर्व की ओर पलायन प्रारंभ किया और अपनी सुविधानुसार यत्र तत्र बस गए तो अनेक उपवर्गों के नाम से संबोधित होने लगे,यथा – ड्रोनवार , गौतम , कान्यकुब्ज , जेथारिया आदि अनेक कारणों,अनेक रीतियों से उपवर्गों का नामकरण किया गया.कुछ लोगो ने अपने आदि पुरुष से अपना नामकरण किया और कुछ लोगो ने गोत्र से.कुछ का नामकरण उनके स्थान से हुवा जैसे – सोनभद्र नदी के किनारे रहने वालो का नाम सोन भरिया, सरस्वती नदी के किनारे वाले सर्वारिया,,सरयू नदी के पार वाले सरयूपारी , आद् मूलडीह के नाम पर भी कुछ लोगो का नामकरण हुआ जैसे जेथारिया , हीरापुर पण्डे ,वेलौचे ,मचैया पाण्डे , कुसुमि तेवरी , ब्रह्मपुरिये , दीक्षित , जुझौतिया आदि.

★ भूमिहार ब्राह्मण और सरयुपारिन ब्राह्मण –

पिपरा के मिसिर ,सोहगौरा के तिवारी ,हिरापुरी पांडे, घोर्नर के तिवारी ,माम्खोर के शुक्ल,भरसी मिश्र,हस्त्गामे के पांडे,नैनीजोर के तिवारी ,गाना के मिश्र ,मचैया के पांडे,दुमतिकार तिवारी ,आदि.भूमिहार ब्राह्मन और सर्वरिया (सरयूपारिण ) दोनों में हैं.वरन भूमिहार ब्राह्मण में कुछ लोग अपने को “सर्वरिया” ही कहते है.सर एच.एलिअत का कथन है – ” वे ही ब्राह्मण भूमि का मालिक होने से भूमिहार कहलाने लगे और भूमिहारों को अपने में लेते हुए सर्वारिया लोग पूर्व में कनौजिया से मिल जाते हैं

★ भूमिहार ब्राह्मण पुरोहित –

भूमिहार ब्राह्मण कुछ जगह प्राचीन समय से पुरोहिती करते चले आ रहे है अनुसंधान करने पर पता लगा कि प्रयाग की त्रिवेणी के सभी पंडे भूमिहार ही तो हैं, हजारीबाग के इटखोरी और चतरा थाने के 8-10 कोस में बहुत से भूमिहार ब्राह्मण, राजपूत,बंदौत , कायस्थ और माहुरी आदि की पुरोहिती सैकड़ों वर्ष से करते चले आ रहे हैं और गजरौला, ताँसीपुर के त्यागी राजपूतों की यही इनका पेशा है। गया के देव के सूर्यमंदिर के पुजारी भूमिहार ब्राह्मण ही मिले। इसी प्रकार और जगह भी कुछ न कुछ यह बात किसी न किसी रूप में पाई गई। हलाकि गया देव के सूर्यमंदिर का बड़ा हिस्सा शाकद्विपियो को बेचा जा चूका है!

ब्राह्मण की उत्पत्ति

इस परिप्रेक्ष्य में अब हम ब्राह्मण की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विचार करें, हमारा शास्त्र कहता है :-

(1) ब्राह्मणो स्य मुखमासीद्बाहू राजन्य: कृत:।
ऊरू तदस्य यद्वैश्य: पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥
(अध्याय 31(11) पुरुष सूक्त, यजुर्वेद)

(2) चतुर्वर्णम् मयाश्रिष्ठ्यम् गुणकर्माविभागशः
(गीता)

यजुर्वेद 31 वें अध्याय के पुरुष सूक्त श्लोक संख्या 11 की पुष्टि ऋग्वेद, और अथर्ववेद के साथ श्रीमद्भागवतपुराण ने भी की है,,इसका सटीक अर्थ समझने के लिए हमें पहले यजुर्वेद के श्लोक सं. 10 का अर्थ समझना होगा, दसवें श्लोक में पूछा गया है कि “उस विराट पुरुष का मुख कौन है, बाजू कौन है, जंघा कौन है तथा पैर कौन है?

इसके उत्तर में श्लोक सं. 11 आता है जिसमे कहा गया है कि –
“ ब्राह्मण ही उसका मुख है, क्षत्रिय बाजू है, वैश्य जंघा है और शूद्र पैर है”

यह कहीं नहीं लिखा है कि प्रजापति (ब्रह्मा) के मुख से ब्राह्मण, बाजूओं से क्षत्रिय, जांघों से वैश्य और पैरों से शुद्र पैदा हुए, ऐसा आजकल प्रचलित अर्थ मात्र कुअर्थ है, दुष्प्रचार हेतु भ्रान्ति मात्र है,,, हम तो उस दिन की कल्पना भर कर सकते हैं जब अणुओं के टकराव और विष्फोट से उत्पन्न हिग्स बोसोन या (God Particle) श्रृष्टि की रचना का पूरा सिद्धांत 40-50 वर्षों में बदल देगा, तब ब्राह्मण न तो मुख से पैदा हुआ माना जायेगा और नहीं शुद्र पैरों से.. !!

ब्राह्मणों के कार्य –
अध्यापनमध्यायनं च याजनं यजनं तथा।
दानं प्रतिग्रहश्चैव षट् कर्माण्यग्र जन्मन:॥ 10।75

मनुस्मृति के इस श्लोक के अनुसार ब्राह्मणों के छह कर्म हैं, साधारण सी भाषा में कहें तो अध्ययन-अध्यापन(पढ़ना-पढाना), यज्ञ करना-कराना, और दान देना-लेना!

इन कार्यों को दो भागों में बांटा गया है, धार्मिक कार्य और जीविका के कार्य,,,,अध्ययन,यज्ञ करना और दान देना धार्मिक कार्य हैं तथा अध्यापन, यज्ञ कराना (पौरोहित्य) एवं दान लेना ये तीन जीविका के कार्य हैं
ब्राह्मणों के कार्य के साथ ही इनके दो विभाग बन गए
एक ने ब्राह्मणों के शुद्ध धार्मिक कर्म (अध्ययन, यज्ञ और दान देना) अपनाये और दूसरे ने जीविका सम्बन्धी (अध्यापन, पौरोहित्य तथा दान लेना) कार्य
जिस तरह यज्ञ के साथ दान देना अंतर्निहित है वैसे ही पौरोहित्य अर्थात यज्ञ करवाने के साथ दान लेना
इस तरह वास्तव में ब्राह्मणों के चार ही कार्य हुए – अध्ययन और यज्ञ तथा अध्यापन और पौरोहित्य !!

★ याचकत्व और अयाचकत्व –

ब्राह्मणों के कर्म विभाजन से मुख्यतः दो शाखाएं स्तित्व में आयीं – पौरोहित्यकर्मी या कर्मकांडी याचक एवं अध्येता और यजमान अयाचक
यह भी सिमटकर दो रूपों में विभक्त होकर रह गया – दान लेने वाला याचक और दान देने वाल अयाचक
सत्ययुग से ही अयाचक्त्व की प्रधानता रही!

विभिन्न पुराणों, बाल्मीकिरामायण और महाभारत आदि में आये सन्दर्भों से पता चलता है कि याचकता पर सदा अयाचकता की श्रेष्टता रही है, प्रतिग्रह आदि तो ब्राह्मणोचित कर्म नहीं हैं जैसा कि मनु जी ने कहा है कि :-

प्रतिग्रह समर्थोपि प्रसंगं तत्रा वर्जयेत्।
प्रतिग्रहेण ह्यस्याशु ब्राह्मं तेज: प्रशाम्यति॥
(म.स्मृ. 4/186)

‘यदि ब्राह्मण प्रतिग्रह करने में सामर्थ्य भी रखता हो (अर्थात् उससे होनेवाले पाप को हटाने के लिए जप और तपस्यादि भी कर सकता हो) तो भी प्रतिग्रह का नाम भी न ले, क्योंकि उससे शीघ्र ही ब्रह्मतेज (ब्राह्मणत्व) का नाश हो जाता है’।

जैसा रामायण में स्पष्ट लिखा हैं और ब्रह्मर्षि वशिष्ट ने भी कहा है कि –
‘उपरोहिती कर्म अतिमन्दा।
वेद पुराण स्मृति कर निन्दा।’

★ भू-धन का प्रबंधन –

दंडीस्वामी श्री सहजानंद सरस्वती जी के अनुसार अयाचकता और याचकता किसी विप्र समाज या जाति का धर्म न होकर व्यक्ति का धर्म हैं। जो आज अयाचक हैं कल वह चाहे तो याचक हो सकता हैं और याचक अयाचक। इसी सिद्धांत और परम्परा के अनुसार जब याचक ब्राह्मणों को दान स्वरूप भू-संपत्ति और ग्राम दान मिलने लगे तो याचकों को भू-धन प्रबंधन की जटिलताएं सताने लगीं
पौरोहित्य जन्य कर्मों में संलग्न याचक वर्ग दान में मिली भू-सम्पत्तियों के प्रबंधन के लिए समय नहीं निकाल पा रहा था!
इसलिए आंतरिक श्रम विभाजन के सिद्धांत पर आपसी सहयोग और सम्मति से परिवार के कुछ सदस्य अपनी रूचि अनुसार भू-प्रबंधन में संलग्न हो गए!
ब्राह्मणों के पेशागत परिवर्तन के उदाहरण वैदिक काल में परशुराम, द्रोण, कृप, अश्‍वत्थामा, वृत्र, रावण एवं ऐतिहासिक काल में शुंग, शातवाहन, कण्व, अंग्रेजी काल में काशी की रियासत, दरभंगा, बेतिया, हथुआ, टिकारी, तमकुही, सांबे, मंझवे, आदि के जमींदार हैं।

★★ भूदान-धन प्रबन्धक की विशेषताएं एवं इतिहास एवं ब्राह्मण की विशेष शाखा का उद्भव –

आज भी किसी परिवार में प्राकृतिक श्रम विभाजन के सिद्धांत पर हर सदस्य अपनी रूचि अनुसार अलग-अलग काम स्वतः ले लेता है, कोई सरकारी दफ़्तर और कोर्ट कचहरी का काम संभालता है तो कोई पशुधन प्रबंधन में लग जाता है तो कोई ग्राम संस्कृति में संलग्न हो ढोलक बजाने लगता है तो कोई साधारण से लेकर ऊँची-ऊँची नौकरियां करने लगता है तो कोई पूजा-पाठ यज्ञादि में संलग्न हो जाता है
ठीक यही हाल याचकता और अयाचकता के विभाजन के समय हुआ,, हालांकि उस समय किसी के उत्कृष्ट और किसी के निकृष्ट होने की कल्पना भी नहीं थी,,, भू-संपत्ति प्रबंधन में संलग्न परिवार शुद्ध अयाचकता की श्रेणी में अपने को ढालता गया
याचकों की आर्थिक विपन्नता और अयाचकों की भू-सम्पदाजन्य सम्पन्नता काल-क्रम से उत्तरोत्तर बढ़ती गई तथापि याचकों के सामाजिक प्रभाव और आत्मसम्मान में कोई कमी नहीं थी, ऐसा भी नही था कि याचक ब्राह्मण कृषि कार्य नही करता था लेकिन उसके पास विशेषज्ञता की कमी थी और आत्मसम्मान की अधिकता.. !!

वाल्मीकी रामायण के के अयोध्या कांड बत्तीसवें सर्ग के 29-43 वें श्लोक में गर्ग गोत्रीय त्रिजट नामक ब्राह्मण की कथा से अयाचक से याचक बनने का सटीक उदाहरण मिलता है:-

“तत्रासीत् पिंगलो गार्ग्यः त्रिजटो नाम वै द्विज
क्षतवृत्तिर्वने नित्यं फालकुद्दाललांगली। ॥ 29॥”

इस आख्यान से यह भी स्पष्ट हैं कि दान लेना आदि स्थितिजन्य गति हैं, और काल पाकर याचक ब्राह्मण अयाचक और अयाचक ब्राह्मण याचक हो सकते हैं और इसी प्रकार अयाचक और याचक ब्राह्मणों के पृथक्-पृथक् दल बनते और घटते-बढ़ते जाते हैं

इसी तरह के संदर्भ का द्वापरकालीन महाभारत में युधिष्ठिर को राजसूय यज्ञ में ब्राह्मणों द्वारा गोधन आदि भू-संपदा के उपहार और दान का वर्णन दुर्योधन द्वारा शकुनि के समक्ष किया गया है!

★ त्रेता-द्वापर संधिकाल में क्षत्रियत्व का ह्रास एवं अयाचक भू-धन प्रबन्धक द्वारा क्षात्रजन्य कार्यों का संचालन –

मनुजी स्पष्ट लिखते हैं कि :

सेनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च।
सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्र विदर्हति॥ 100॥

अर्थात ”सैन्य और राज्य-संचालन, न्याय, नेतृत्व, सब लोगों पर आधिपत्य, वेद एवं शास्त्रादि का समुचित ज्ञान ब्राह्मण के पास ही हो सकता है, न कि क्षत्रियादि जाति विशेष को।”

स्कन्दपुराण के नागर खण्ड 68 और 69वें अध्याय में लिखा हैं कि जब कर्ण ने द्रोणाचार्य से ब्रह्मास्त्र का ज्ञान माँगा हैं तो उन्होंने उत्तर दिया हैं कि :

ब्रह्मास्त्रां ब्राह्मणो विद्याद्यथा वच्चरितः व्रत:।
क्षत्रियो वा तपस्वी यो नान्यो विद्यात् कथंचन॥ 13॥

अर्थात् ”ब्रह्मास्त्र केवल शास्त्रोक्ताचार वाला ब्राह्मण ही जान सकता हैं, अथवा क्षत्रिय जो तपस्वी हो, दूसरा नहीं। यह सुन वह परशुरामजी के पास, “मैं भृगु गोत्री ब्राह्मण हूँ,” ऐसा बनकर ब्रह्मास्त्र सीखने गया हैं।” इस तरह ब्रह्मास्त्र की विद्या अगर ब्राह्मण ही जान सकता है तो युद्ध-कार्य भी ब्राह्मणों का ही कार्य हुआ ,, उन विभिन्न युगों में भी ब्राह्मणों के अयाचक दल ने ही पृथ्वी का दायित्व संभाला, इससे बिना शंका के यह सिद्ध होता है कि भू-धन प्रबन्धक अयाचक ब्राह्मण सत्ययुग से लेकर कलियुग तक थे और अपनी स्वतंत्र पहचान बनाये रखी हालांकि वे अयाचक ब्राह्मण की संज्ञा से ही विभूषित रहे ,, साहस, निर्णय क्षमता, बहादुरी, नेतृत्व क्षमता और प्रतिस्पर्धा की भावना इनमे कूट-कूटकर भरी थी तथा ये अपनी जान-माल ही नहीं बल्कि राज्य की सुरक्षा के लिए भी शक्तिसंपन्न थे!

★ क्षत्रियत्व का ह्रास –

प्राणी रक्षा के दायित्व से जब क्षत्रिय च्युत हो निरंकुश व्यभिचारी और अधार्मिक कार्यों एवं भोग विलास में आकंठ डूब गए तो ब्रह्मर्षि परशुराम जी ने उनका विभिन्न युगों में २१ बार संहार किया और पृथ्वी का दान और राज ब्राह्मणों को दे दिया

अब भी यह प्रश्न उठता है कि अगर परशुराम जी ने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रिय-विहीन कर दिया तो बाद में क्षत्रिय कहाँ से आ गए? उत्तर यह है कि हालाँकि पौराणिक इतिहास में कहीं भी ऐसा संदर्भ नहीं है की उन्होंने क्षत्रियों के साथ क्षत्राणियों का भी संहार किया यानि नारी सदा अवध्य ही रही!

उन्हीं अवध्य जीवित क्षत्राणियों से ब्राह्मणों ने जो संतानें पैदा कीं वे क्षत्रिय कहलाये इसलिए क्षत्रिय भी ब्राह्मणों की ही संतानें हुईं , शास्त्र भी कहता है की ब्राह्मण वीर्य और क्षत्रिय रज से उत्पन्न संतान क्षत्रिय ही होती हैं ब्राह्मण नहीं,,

महाभारत में अर्जुन ने युधिष्ठिर से शान्तिपर्व में कहा है कि:

ब्राह्मणस्यापि चेद्राजन् क्षत्राधार्मेणर् वत्तात:।
प्रशस्तं जीवितं लोके क्षत्रांहि ब्रह्मसम्भवम्॥
।। अ.।। 22॥

”हे राजन्! जब कि ब्राह्मण का भी इस संसार में क्षत्रिय धर्म अर्थात् राज्य और युद्धपूर्वक जीवन बहुत ही श्रेष्ठ हैं, क्योंकि क्षत्रिय ब्राह्मणों से ही उत्पन्न हुए हैं, तो आप क्षत्रिय धर्म का पालन करके क्यों शोक करते हैं?’

★★ कलियुग में अयाचक भू-धन प्रबंधक की स्वतंत्र पहचान व ब्राह्मणों में सर्वोच्च अधिकार –

कलियुग में इस भू-प्रबन्धक की लिखित और अमिट छाप ईशापूर्व से स्पष्ट परिलक्षित होती है
सिकंदर ने जब 331 ईशापूर्व आर्यावर्त पर आक्रमण किया था तो उसके साथ उसका धर्मगुरु अरस्तू भी साथ आया था , अरस्तू ने क्षत्रियों की अराजकता और अकर्मण्यता के संदर्भ में उस समय के भारत की जो दुर्दशा देखी उसका बहुत ही रोचक चित्रण अपने स्मरण ग्रन्थ में इस तरह किया है:-

“Now the ideas about castes and profession, which have been prevalent in Hindustan for a very long time, are gradually dying out, and the Brahmans, neglecting their education,….live by cultivating the land and acquiring the territorial possessions, which is the duty of Kshatriyas. If things go on in this way, then instead of being (विद्यापति) i.e. Master of learning, they will become (भूमिपति) i.e. Master of land”.

“जो विचारधारा, कर्म और जाति प्रधान भारतवर्ष में प्राचीन काल से प्रचलित थी, वह अब धीरे-धीरे ढीली होती जा रही हैं और ब्राह्मण लोग विद्या विमुख हो ब्राह्मणोंचित कर्म छोड़कर भू-संपत्ति के मालिक बनकर कृषि और राज्य प्रशासन द्वारा अपना जीवन बिता रहे हैं जो क्षत्रियों के कर्म समझे जाते हैं। यदि यही दशा रही तो ये लोग विद्यापति होने के बदले भूमिपति हो जायेगे।” आज हम कह सकते हैं कि अरस्तू की भविष्यवाणी कितनी सटीक और सच्ची साबित हुई!

In the year 399 A.D. a Chinese traveler, Fahian said “owing to the families of the Kshatriyas being almost extinct, great disorder has crept in. The Brahmans having given up asceticism….are ruling here and there in the place of Kshatriyas, and are called ‘Sang he Kang”, which has been translated by professor Hoffman as ‘Land seizer’.

अर्थात “क्षत्रिय जाति करीब करीब विलुप्त सी हो गई है तथा बड़ी अव्यवस्था फ़ैल चुकी है ,, ब्राह्मण धार्मिक कार्य छोड़ क्षत्रियों के स्थान पर राज्य शासन कर रहे हैं”!!

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★★ ब्राह्मणों (भूमिहारों) द्वारा राज्य संचालन

यद्यपि अयाचक ब्राह्मणों द्वारा राज्याधिकार और राज्य संचालन का कार्य हरेक युग में होता रहा है लेकिन ईशापूर्व चौथी-पांचवीं सदी से तो यह कार्य बहुत ही ज्यादा प्रचलित हो गया और इसने करीब-करीब एक परम्परा का रूप ले लिया इसमें सर्व प्रमुख नाम 330 ई.पू. सिकंदर से लोहा लेने वाले सारस्वत गोत्रीय महियाल ब्राह्मण राजा पोरस, 500 इस्वी सुधाजोझा, 700 ईस्वी राजा छाच, और 1001 ईस्वी में अफगानिस्तान में जयपाल, आनंदपाल और सुखपाल आदि महियाल ब्राह्मण राजा का नाम आता है जैसा कि स्वामी सहजानंद सरस्वती ने ‘ब्रह्मर्षि वंशविस्तर’ में लिखा है!

★ भू-धन प्रबंधक ब्राह्मणों में “भूमिहार” शब्द का प्रथम ज्ञात प्रचलन –

हालांकि भूमिहार शब्द का पहला जिक्र बृहतकान्यकुब्जवंशावली 1526 ई. में आया है लेकिन सरकारी अभिलेखों में प्रथम प्रयोग 1865 की जनगणना रिपोर्ट में हुआ है इसके पहले गैर सरकारी रूप में इतिहासकार बुकानन ने 1807 में पूर्णिया जिले की सर्वे रिपोर्ट में किया है इनमे लिखा है :-

“भूमिहार अर्थात अयाचक ब्राह्मण एक ऐसी सवर्ण जाति जो अपने शौर्य, पराक्रम एवं बुद्धिमत्ता के लिये जानी जाती है। इसका गढ़ बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश है ,, पश्चिमी उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा में निवास करने वाले भूमिहार जाति अर्थात अयाचक ब्राह्मणों को त्यागी नाम की उप-जाति से जाना व पहचाना जाता हैं।“

एम.ए. शेरिंग ने 1872 में अपनी पुस्तक ‘Hindu Tribes & Caste’ में कहा “भूमिहार जाति के लोग हथियार उठाने वाले ब्राह्मण हैं (सैनिक ब्राह्मण)।

पं. परमेश्वर शर्मा ने ‘सैनिक ब्राह्मण’ नामक पुस्तक भी लिखी है

अंग्रेज विद्वान मि. बीन्स ने लिखा है –
“भूमिहार एक अच्छी किस्म की बहादुर प्रजाति है, जिसमे आर्य जाति की सभी विशिष्टताएं विद्यमान है। ये स्वाभाव से निर्भीक व हावी होने वालें होते हैं।“

‘विक्रमीय संवत् 1584 (सन् 1527) मदारपुर के अधिपति भूमिहार ब्राह्मणों और बाबर से युद्ध हुआ और युद्धोपरांत भूमिहार मदारपुर से पलायन कर यू.पी. एवं बिहार के बिभिन्न क्षेत्रों में फ़ैल गए , गौड़, कान्यकुब्ज, सर्यूपारीण , मैथिल, सारस्वत,पुष्करणा, दूबे और तिवारी आदि नाम प्राय: ब्राह्मणों में प्रचलित हुए, वैसे ही भूमिहार या भुइंहार नाम भी सबसे प्रथम कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के एक अयाचक दल विशेष में प्रचलित हुआ और सिंध का अंतिम हिंदू, ब्राह्मण ‘राजा दाहिरसेन’ भी भूमिहार पुष्करणा ब्राह्मण था जो अरब के मुसलमान लुटेरे आक्रांता मोहम्मद बिन कासिम के साथ सैन्य युद्ध में मारा गया!

भूमिहार शब्द सबसे प्रथम ‘बृहत्कान्यकुब्जकुलदर्पण’ (1526) के 117वें पृष्ठ पर मिलता है , इसमें लिखा हैं कि कान्यकुब्ज ब्राह्मण के निम्नलिखित पांच प्रभेद हैं:-

(1) प्रधान कान्यकुब्ज

(2) सनाढ्य

(3) सरवरिया

(4) जिझौतिया

(5) भूमिहार

सन् 1926 की कान्यकुब्ज महासभा का जो 19वाँ वार्षिक अधिवेशन प्रयाग में जौनपुर के राजा श्रीकृष्णदत्तजी दूबे, की अध्यक्षता में हुई थी
स्वागताध्यक्ष जस्टिस गोकरणनाथ मिश्र ने भी भूमिहार ब्राह्मणों को अपना अंग माना है

★ जमींदार/भूमिहार –

यद्यपि इनकी संज्ञा प्रथम जमींदार या जमींदार ब्राह्मण थी लेकिन एक तो, उसका इतना प्रचार न था, दूसरे यह कि जब पृथक्-पृथक् दल बन गये तो उनके नाम भी पृथक-पृथक होने चाहिए परन्तु जमींदार शब्द तो जो भी जाति भूमिवाली हो उसे कह सकते हैं इसलिए विचार हुआ कि जमींदार नाम ठीक नहीं हैं क्योंकि पीछे से इस नामवाले इन अयाचक ब्राह्मणों के पहचानने में गड़बड़ होने लगेगी इसी कारण से इन लोगों ने अपने को भूमिहार या भुइंहार कहना प्रारम्भ कर दिया।

हालांकि जमींदार और भूमिहार शब्द समानार्थक ही हैं, तथापि जमींदार शब्द से ब्राह्मण से अन्य क्षत्रिय आदि जातियाँ भी समझी जाती हैं, परन्तु भूमिहार शब्द से साधारणत: प्राय: केवल अयाचक ब्राह्मण विशेष ही क्योंकि उसी समाज के लिए उसका संकेत किया गया हैं।

आईन-ए-अकबरी, उसके अनुवादकों और उसके आधार पर इतिहास लेखकों के भी मत से भूमिहार ब्राह्मण लोग ब्राह्मण सिद्ध होते हैं। कृषि करने वाले या जागीर प्राप्त करने बाले भूमिहारों के लिए ‘जुन्नारदार’ शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका मतलब होता है “जनेऊ पहनने वाला ब्राह्मण”
फिर वहाँ भूमिहार लोग ब्राह्मण हैं या नहीं इस संशय की जगह ही कहाँ हैं??

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★★ जाति के रूप में भूमिहारो का संगठन –

भूमिहार ब्राह्मण जाति ब्राह्मणों के विभिन्न भेदों और शाखाओं के अयाचक लोगो का एक संगठन है
प्रारंभ में कान्यकुब्ज शाखा से निकले लोगों को भूमिहार ब्राह्मण कहा गया, उसके बाद सारस्वत, महियल, सरयूपारीण , मैथिल, पुष्करणा / पुष्टिकरणा , चितपावन, कन्नड़ आदि शाखाओं के अयाचक ब्राह्मण लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में इन लोगो से सम्बन्ध स्थापित कर भूमिहार ब्राह्मणों में मिलते गए, मगध के बाभनो और मिथिलांचल के पश्चिमा तथा प्रयाग के जमींदार ब्राह्मण भी अयाचक होने से भूमिहार ब्राह्मणों में ही सम्मिलित होते गए !!

भूमिहार ब्राह्मण महासभा –

सन् 1885 में द्विजराज काशी नरेश महाराज श्री ईश्वरी प्रसाद सिंह जी ने वाराणसी में प्रथम अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासभा की स्थापना की
बिहार और उत्तर प्रदेश के जमींदार ब्राह्मणों की एक सभा बुलाकर प्रस्ताव रखा कि हमारी एक जातीय सभा होनी चाहिए, सभा के प्रश्न पर सभी सहमत थे
परन्तु सभा का नाम क्या हो इस पर बहुत ही विवाद उत्पन्न हो गया, मगध के बाभनो ने जिनके नेता स्व.कालीचरण सिंह जी थे, सभा का नाम ‘बाभन सभा’ करने का प्रस्ताव रखा, स्वयं काशी महाराज ‘भूमिहार ब्राह्मण सभा’ के पक्ष में थे, सो बैठक में आम राय नहीं बन पाई, अतः नाम पर विचार करने हेतु एक उप-समिति गठित की गई, सात वर्षो के बाद समिति की सिफारिश पर “भूमिहार ब्राह्मण” शब्द को स्वीकृत किया गया

सन् 1947 में 33 वां अखिल भारतीय सम्मलेन टिकारी में पं. वशिष्ठ नारायण राय जी की अध्यक्षता में हुआ, अनेकों संस्कृत विद्यालयों/महाविद्यालयों के संस्थापक/व्यवस्थापक स्वामी वासुदेवाचार्य जी इसके स्वागताध्यक्ष थे,, टिकारी सम्मलेन के बाद 47 वर्षों तक कोई अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण सम्मलेन नहीं हुआ क्योंकि राजा रजवाड़े रहे नहीं जो सम्मेलन आयोजित कराते थे हालांकि क्षेत्रीय सम्मलेन विभिन्न नामों से होते रहे

1994 जून में 34 वां अधिवेशन टिकारी अधिवेशन के 47 वर्षों बाद अखिल भारतीय भूमिहार बाह्मण सम्मलेन सिमरी, जिला बक्सर, बिहार में हुआ विद्वानों और समाजसेवियों के सानिध्य में आचार्य पं. रामख्याली शर्मा की अध्यक्षता में हुआ, इसी सिमरी ग्राम में स्वामी सहजानंद सरस्वती जी ने अपने महान ग्रंथ कर्मकलाप, ब्रह्मर्षि वंश विस्तर, और भूमिहार ब्राह्मण परिचय लिखे हालांकि सीताराम आश्रम, बिहटा, पटना जिला उनका अंतिम निवास था!

इस तरह भूमिहार ब्राह्मण महासभा का 114 वर्षों के इतिहास में मुख्यतः 34 अधिवेशन हुए हालांकि सभाएं तो पचास से ज्यादा हुई, इसके बाद भी सभाएं तो बहुत हुईं लेकिन उसका क्रमानुसार नामकरण नहीं किया गया!

अन्य प्रान्तों में भूमिहार ब्राह्मणों के नाम/उपाधि तथा भूमिहारों का ब्राह्मणत्व से विचलन व बढ़ती दूरियां

बनारस(काशी), टिकारी, अमावां, हथुआ, बेतिया और तमकुही आदि अनेक ब्राह्मणों (भूमिहार) के राज्यारोहण के बाद सम्पूर्ण भूमिहार समाज शिक्षा, शक्ति, और रोआब के उच्च शिखर पर पहुँच गया था
चारो ओर हमारे दबदबे की दहशत सी फैली हई थी
लोग भूमिहारों का नाम भय मिश्रित अदब से लिया करते थे सर्वाधिकार प्राप्ति और वर्चस्व के लिए भूमिहार शब्द ही काफी था किंतु धीरे धीरे हमने विवेक शून्यता का प्रदर्शन करना शुरू किया फिर भूमिहार शब्द के साथ तमाम नकारात्मक विशेषण जुड़ने लगे, हमने भूमिहार शब्द के चाबुक का प्रयोग हर उचित-अनुचित जगह करना प्रारम्भ किया और भूमिहार शब्द के चढे नशे ने हमारे दिलो-दिमाग को इतना विषाक्त कर दिया कि हमारे पैर जमीन पर नही टिकते थे ,हरेक भूमिहार चाहे वह साधारण कर्जदार खेतिहर रैयत ही क्यों न हो, वह इन रियासतों के मालिक से अपने आप को कमतर नहीं आंकने लगा
खेत में भले ही वह मगध नरेश रूपी रैयत अपने मजदूर के साथ कंधा से कंधा मिलाकर धान-गेहूं की कटाई करे पर क्या मजाल कि गली से गुजरते वक्त वह मजदूर गली में खटिया निकालकर सामने बैठे रहने की जुर्रत कर ले , हाल यह हुआ कि हम अब ब्राह्मणों से अलग अपनी एक जाति समझने लगे
हमारे उम्र के लोगों को याद होगा कि जब बचपन में शादी के लिए अगुआ आता था तो हमें घर के लोग बताते थे कि अगुआ पूछेगा कि “बबुआ आप कौन जात के है?” तो बताना कि “हम भूमिहार ब्राह्मण हैं”
लेकिन आज हम अपने को ब्राह्मण या भूमिहार ब्राह्मण कहने में अपनी तौहीन और सिर्फ भूमिहार कहने में अपनी शान समझते हैं, अब तो हाल यह है कि “न खुदा ही मिला न विसाले सनम, न इधर के रहे न उधर के रहे” !!

भूमिहार ब्राह्मणों की वर्तमान स्थिति –

अब तो हम खालिस भूमिहार जाति के हो गए और ब्राह्मणों ने हमसे दूरी बना ली , अब जब हमारे युवा स्वयं अपनी जड़ और अपना इतिहास पूरी तरह भूल गए हैं तो अन्य जातियां उनपर फब्तियां कसती हैं और पूछती हैं कि “भूमिहार कौन सी जात है?”
तुम न ब्राह्मण, न राजपूत, न वैश्य और न शुद्र!!!
तुम तो ‘Mixed Breed’ (मिश्रित जाति) के हो
तुम्हारा अपना कोई इतिहास नहीं है…. आदि, इत्यादि!
वास्तविकता में जब हम अपना इतिहास ही नहीं जानते तो उन्हें जवाब क्या देंगे? इसिलिये हम बगलें झाँकने लगते हैं और फेसबुक पर पूछते हैं कि हमारा इतिहास क्या है?

“वो परिंदा जिसे परवाज से फुर्सत ही न थी
आज तनहा है तो दीवार पर आ बैठा है”

यह किसकी गलती है?
किसने हमे दम्भ में चूर होकर अपने को ब्राह्मण से अलग होने के लिए कहा?

हमारे पूर्वज ब्राह्मणों ने तो हमे मदारपुर सम्मेलन से ही अपना माना था, कान्यकुब्ज हों या सरयूपारीण, श्रीमाली या पुष्करणा सब ने ही सदा हमें अपना कहा
लेकिन हमें तो सिंध,टिकारी, बेतिया और काशी नरेश बनना था, अयाचक्त्व के नशे में हमने अपने आप को अपने आधार से नीचे गिराकर अंतहीन अंधकूप में डाल दिया,, शिक्षा और उन्नति की हर विधा को तिलांजलि देकर हमने मगध नरेश बनने का सपना देखा!

‘Firsr deserve then desire’ अर्थात ‘पहले काबलियत हासिल करो तब ख्वाब देखो’ के मूल मंत्र को भूमिहार के रोब में कोई स्थान नहीं दिया गया और नतीजा है कि आज हम अपने पैर पर खुद कुल्हाड़ी मार बैठे हैं हम क्या थे और क्या हो गए..??

आज हमें दूसरों से नहीं अपनों से ही डर सता रहा है

“मेरा अज्म इतना बुलंद है, कि पराये शोलों का डर नहीं,
मुझे खौफ आतिशे-गुल से है, कहीं ये चमन को जला न दे”

आज हम कठिन परिश्रम से जी चुराते हैं और सब कुछ बिना प्रयास के अपनी थाली में पाना चाहते हैं
“We want everything on a Platter” हाँ, यह बात ठीक है कि आज के ‘Welfare State System’ अर्थात कल्याणकारी राज्य व्यवस्था में आरक्षण आदि बहुत से प्रावधान हमारे समाज की उन्नति में बाधक हैं लेकिन सरकारी प्रतियोगिताजन्य नौकरियों के अलावे अभी भी Private Sector में अपार संभावनाएं हैं जहां योग्यता की पूछ, इज्जत और जरुरत है और अपनी क़ाबलियत दिखाने के असंख्य अवसर सामने खुले पड़े हैं।

कौन रोकता है हमें..??
भाईयों “सितारों के आगे जहां और भी है”…..

मित्रों इस लेख के कई अंतिम अंश जिस मूल लेख से लिये गये हैं उस अत्यंत ज्ञानवर्धक वृहद लेख का लिंक निम्नलिखित है –

http://guljanaavillageingayabihar.blogspot.in/2014/02/blog-post.html?m=1

लेख अभी संकलन, संपादन की प्रक्रिया में है,  सो आगे समयानुसार संपादन, संकलन जारी रहेगा !

क्रमश:   

Dr. Sudhir Vyas Posted from WordPress for Android

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5 Comments Add yours

  1. Sunny says:

    ye post to fb par khub share huyee hai, specially bhumihar groups me, aaj pataa huaa aapne likha hai. shukriya sir 🙂 Ek bhumihar ko gaurvanvit karaane ke liye 🙂 🙂 _/|_

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    1. हार्दिक आभार,
      यह मेरी पुरानी फेसबुक पोस्ट थी जिसमे विस्तृत रूप दे कर यहां लिखा है।

      Liked by 1 person

      1. नमस्कार सुधीर जी,
        आज कुछ ब्रह्मर्षि युवाओं की पहल से विश्व ब्रह्मर्षि महासभा का गठन होने जा रहा है जिसका स्वरुप अखिल भारतीय होगा।
        नोट: विशेष सूचना हेतु
        रणजीत महाप्रभु
        राष्ट्रीय अध्यक्ष
        विश्व ब्रह्मर्षि महासभा
        भारत
        contact: 9507266551

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  2. There should be some thinking on the problem of society including nation’s.

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  3. Reblogged this on Site Title.

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