मुसलमान संहारक मंगोल साम्राज्य ☞ ईरान के इलखानी साम्राज्य का पहला राजा हलाकु ख़ान ( भाग 2 )


हलाकु ख़ान या हुलेगु ख़ान या हलागु ख़ान

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ईरान, अफगानिस्तान से लेकर पूरे मुख्य अरब में मुसलमानों के संहारक के रूप में प्रसिद्ध हलाकु ख़ान एक मंगोल कबीलाई शासक था जिसने ईरान समेत दक्षिण-पश्चिमी एशिया, अरब के अन्य बड़े हिस्सों पर विजय करके वहाँ इलख़ानी राजवंश और साम्राज्य स्थापित किया यह साम्राज्य मंगोल वृहद राज्य का ही एक भाग था, हलाकु ख़ान के नेतृत्व में मंगोलों ने इस्लाम के सबसे शक्तिशाली केंद्र बगदाद को पूरी तरह तबाह कर दिया, ईरान पर अरबी कब्जे और इस्लाम के उभरने के लगभग फ़ौरन बाद ईरान भी अरब हो चुका था और तब से वहाँ के सभी विद्वान अरबी में ही लिखा पढ़ा करते थे,,बग़दाद की ताक़त नष्ट होने से ईरान में मूल फारसी भाषा फिर पनपने लगी और उस काल के बाद ईरानी विद्वान और इतिहासकार फ़ारसी में ही लिखा करते थे।

हलाकु के आक्रमणों का भारत पर एक बड़ा असर यह हुआ कि बहुत से ईरानी, अफ़गानी और तुर्क विद्वान, शिल्पकार और अन्य आम लोग भागकर, आकर बस गए और अपने साथ अरबी,  ईरानी , तुर्क विद्या, वस्तुकला और अन्य सामरिक ज्ञान भी यथासंभव लाए।

हलाकु ख़ान मंगोल साम्राज्य के संस्थापक चंगेज का सगा पोता और उसके छोटे पुत्र तोलुई ख़ान का बेटा था, हलाकु की माता सोरगोगतानी बेक़ी (तोलुइ ख़ान की पत्नी) ने उसे और उसके भाइयों को बहुत निपुणता से पाला और पारिवारिक परिस्थितियों पर ऐसा नियंत्रण रखा कि हलाकु आगे चलकर एक बड़ा साम्राज्य स्थापित कर सका,, हलाकु ख़ान की पत्नी दोक़ुज़ ख़ातून एक नेस्टोरियाई / कॉप्टिक / सीरीयाई ईसाई थी और हलाकु के इलख़ानी राज में सिर्फ बौद्ध धर्म और ईसाई धर्म को ही बढ़ावा दिया जाता था, दोक़ुज़ ख़ातून ने बहुत कोशिश की के हलाकु भी ईसाई बन जाए लेकिन वह मरते दम तक बौद्ध धर्म का अनुयायी ही रहा।

इलख़ानी साम्राज्य  एक मंगोलियाई ख़ानत थी जो 13 वीं सदी में ईरान और निकटस्थ अज़रबैजान देश में शुरू हुई थी और जिसे इतिहासकार मंगोल वृहद साम्राज्य का ही एक हिस्सा मानते हैं इसकी स्थापना चंगेज खान के पोते हलाकु ख़ान ने की थी और इसके चरम पर इसमें ईरान , ईराक , सीरीया,  फिलीस्तीन, अफगानिस्तान ,  तुर्कमेनिस्तान, आर्मेनिया , अज़रबैजान , तुर्की , जॉर्जिया,  मॉल्दोवा सरीखे रूसी कॉकेशियाई व पूर्वी यूरोपीय देश शामिल थे और साथ ही आज के पश्चिमी पाकिस्तान का बड़ा इलाका ( बलूचिस्तान, वजीरीस्तान) शामिल था।

इलख़ानी बहुत से धर्मों के प्रति सहानुभूति रखते थे लेकिन इनमें बौद्ध और ईसाई धर्म को ही विशेष स्वीकृति हासिल थी।

★ विशेष ध्यान देने वाली बात यह है कि इसी इलख़ानी साम्राज्य में पहले पहल महमूद ग़जनवी ने 1295 में इस्लाम अपनाया और उसके बाद के शासकों ने शिया इस्लाम को ही बढ़ावा दिया , इलख़ानी साम्राज्य सन् 1256 से 1336 तक चला।

मंगोल भाषा में ‘इल-ख़ान’ का मतलब था ‘सर्वोच्च खान के अधीन वाला ख़ान’ और इस साम्राज्य के शुरू में इसे महान मंगोल साम्राज्य के अधीन एक हिस्सा माना जाता था ,, ‘इलख़ान’ में ‘ख़’ पर ध्यान दें क्योंकि यह बिना बिन्दु वाले ‘ख’ से ज़रा भिन्न है, इसका उच्चारण ‘ख़राब’ और ‘ख़रीद’ के ‘ख़’ से ही मिलता है।

अब पुन: मूल विषय हलाकु की विजय यात्राओं सहित मुसलमानों के संहार की ओर चलते हैं जिसके कारण इस्लामिक इतिहास और अरब इतिहास मंगोलों से भयभीत रहता है और हलाकु को मुसलमानो का Nightmare / बुरा स्वप्न माना जाता है! 

नवम्बर  1257 ई. में हलाकु की फ़ौज ने ईराक की ओर इस्लाम के प्रमुख केंद्र बगदाद की तरफ़ कूच किया जहाँ से तत्कालीन सुन्नी इस्लाम का ख़लीफा अपना इस्लामी राज चलता था, वहाँ पहुँचकर उसने अपनी सेना को पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों में बांटा जो शहर से गुज़रने वाली दजला / टाइग्रिस नदी के दोनों किनारों पर आक्रमण कर सकें।

उसने दूत भेजकर ख़लीफ़ा से आत्म-समर्पण करने को कहा लेकिन ख़लीफ़ा ने मना कर दिया,,  ख़लीफ़ा की सेना ने कुछ आक्रामकों को खदेड़ दिया लेकिन अगली मुठभेड़ में हार गई, मंगोलों ने ख़लीफ़ा की सेना के पीछे के बाँध तोड़ दिये जिस से बहुत से ख़लीफ़ाई सैनिक डूब गए और बाक़ियों को मंगोलों ने आसानी से मार डाला।

29 जनवरी 1258 में मंगोलों ने बग़दाद को घेरा डाला और 5 फ़रवरी तक वह शहर की रक्षक दीवार के एक हिस्से पर क़ब्ज़ा जमा चुके थे, अब ख़लीफ़ा ने हथियार डालने की सोची लेकिन मंगोलों ने बात करने से इनकार कर दिया और 13 फ़रवरी को बग़दाद शहर में घुस आये उसके बाद एक हफ़्ते तक उन्होंने वहाँ क़त्ल, बलात्कार और लूट की, जिन नागरिकों ने भागने की कोशिश की उन्हें भी रोककर मारा गया या उनका बलात्कार किया गया, उस समय बग़दाद में एक बहुत बडा सांस्कृतिक और इस्लामिक पुस्तकालय था जिसमें धर्म से लेकर चिकित्साशास्त्र तक हर विषय पर अनगिनत दस्तावेज़ और किताबें थीं, लेकिन मंगोलों ने उन सभी पुस्तकों, पांडुलिपियों को उठाकर नदी में फेंक दिया, अरबी व इस्लामिक इतिहास में कहते हैं कि जो शरणार्थी बचकर वहाँ से निकले उन्होंने कहा कि किताबों से बहती हुई स्याही से दजला का पानी काला हो गया था।

महल, मस्जिदें और अन्य महान इमारतें जला दी गई थी, यहाँ मरने वालों की संख्या कम-से-कम 15 लाख कही जाती है, अलमूत नगर, जो क़ज़वीन के उत्तर में एक पर्वतीय क्षेत्र है, इसी नाम के एक दुर्ग के कारण आज भी विख्यात है जो काफ़ी समय तक इस्माईली समुदाय के प्रमुख हसन सब्बाग़ और उनके उत्तराधिकारियों की सत्ता का मुख्यालय रहा है।
यह दुर्ग जो आशियाना ऐ उक़ाब या बाज़ के घोंसले के नाम से भी जाना जाता है, एक पहाड़ पर दो हज़ार एक सौ मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।
चारों ओर से दुर्ग खाइयों से घिरा हुआ है और इसमें प्रवेश का एकमात्र मार्ग उत्तर पूर्वी छोर पर है। इतिहास के विश्वस्त किताबों के अनुसार अलमूत दुर्ग का निर्माण वर्ष 246 हिजरी क़मरी में किया गया। पैग़म्बरे इस्लाम के वंशज हसन बिन ज़ैद अलवी के आदेश पर इस दुर्ग का निर्माण किया गया और वर्ष 483 हिजरी क़मरी में इस पर हसन सबाह का नियंत्रण हो गया और वर्ष 654 हिजरी क़मरी तक यह इस्माईली समुदाय के शासकों के नियंत्रण में रहा। इसी साल हलाकू ख़ान के आदेश पर इसे ध्वस्त कर दिया गया। मंगोलों ने इस्माईलियों (शियाओं) द्वारा वर्षों तक अलमूत दुर्ग में एकत्रित की गई अत्यंत मूल्यवान पुस्तकों को भी प्राप्त कर लिया। हलाकू ख़ान ने उस पुस्तकालय को जलाने का आदेश दिया किंतु ईरान के प्रख्यात इतिहासकार अता मलिक जुवैनी ने उस पुस्तकाल से अति मूल्यवान किताबों को अलग करने की अनुमति प्राप्त कर ली।

इस प्रकार उन्होंने क़ुरान की प्रतियों, प्राचीन किताबों और खगोल शास्त्र संबंधी यंत्रों को अलग कर लिया किंतु बाक़ी किताबें और पुस्तकालय के अन्य साधन आग में जल गए।

इसके बाद अलमूत दुर्ग को निर्वासन क्षेत्र और कारावास के रूप में प्रयोग किया जाने लगा, शाह तहमास्ब सफ़वी के शासन के आरंभिक काल तक दुर्ग का ढांचा सही सलामत था। बाद में इस पर गीलान व माज़न्दरान के शासकों का नियंत्रण हुआ और उन्होंने इसकी मरम्मत कराई।

हलाकू के हमले के बाद इस्लामिक ख़लीफ़ा पर क्या बीती, इसपर दो अलग वर्णन मिलते हैं –

★ इटली यूरोप से बाद में आने वाले यात्री मार्को पोलो के अनुसार उसे भूखा मारा गया।

★ लेकिन उस से अधिक विश्वसनीय मंगोल और मुस्लिम स्रोतों के अनुसार उसे एक क़ालीन में लपेट दिया गया और उसके ऊपर से तब तक घोड़े दौड़ाए गए जब तक उसने दम नहीं तोड़ दिया, वही तरीका जो हमारे यहाँ और पूरी दुनिया में मुस्लिम आक्रमणकारियों का प्रिय शगल रहा है।

चंगेज़ ख़ान के पोते हलाकू ख़ान ने बग़दाद पर नियंत्रण के बाद ईरान के पश्चिमोत्तरी क्षेत्र अज़रबैजान का रुख़ किया और अपने निवास के लिए मराग़ा को चुना और तबरीज़ को अपनी राजधानी में परिवर्तित कर दिया। उसके बाद के चरण में मंगोलों ने सीरिया के आसपास के क्षेत्रों पर आक्रमण आरंभ किया किन्तु मिस्र पर मंगोलों के आक्रमण के दौरान मिस्री जनता ने उनका डटकर मुक़ाबला किया और उनके बढ़ते हुए क़दमों को रोक दिया और अंततः फ़िलिस्तीन में मंगोल सेना को करारी हार का सामना करना पड़ा। इस प्रकार से मंगोलों के अजेय रहने का वह जादू टूट गया जो संसार में चंगेज़ ने फैलाया था।

मंगोलों की सत्ता और उनके क़ब्ज़े का काल, इस्लामी देशों के ऐतिहासिक काल में बहुत ही बुरा व भयावह काल समझा जाता था जिसके दौरान इस्लामी संस्कृति व सभ्यता के पतन की विभिन्न घटनाएं घटी। पूरब के इस्लामी क्षेत्रों पर मंगोलों के आक्रमण में इस्लामी सभ्यता के महत्त्वपूर्ण ज्ञान विज्ञान के केन्द्रों पर हमले हुए और इसी प्रकार पुस्तकालयों को खंडहर बना दिया गया। बहुत से विद्वान और धर्मगुरू मारे गये या उन्हें बंदी बना लिया गया। इसी प्रकार मस्जिदें, मदरसे, धार्मिक शिक्षा केन्द्र जैसे पवित्र धार्मिक स्थलों और पुरातन वस्तुओं और धरोहरों को नष्ट कर दिया गया। 

नोगाई ख़ान भी एक मंगोल सिपहसालार और यूरोपीय, साईबेरियाई स्तेपी मंगोल राज का असली शासक भी था, नोगाई का दादा बाउल ख़ान (उर्फ़ तेवल ख़ान) था जो जोची ख़ान का 7 वाँ बेटा था इस लिहाज़ से नोगाई, चंगेज ख़ान का पड़-पड़-पोता था।

नोगाई’ का अर्थ मंगोल भाषा में ‘कुत्ता’ होता था, लेकिन उस संस्कृति में आदमियों के लिए यह एक अपशब्द के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाता था।

मंगोल बहुत से कुत्ते रखते थे और यह शिकार में और सुरक्षा में, ख़तरों में चेतावनी देने के लिए बहुत उपयोगी थे। 
चंगेज ख़ान अक्सर अपने सबसे लायक़ सिपहसालारों को ‘लड़ाकू आदमी’ या ‘लड़ाकू कुत्ते’ बुलाया करता था अन्य मंगोल भी अपने आदमियों के गिरोहों को ‘नोख़दूउद’ (यानि ‘तुम कुत्ते’) बुलाया करते थे।

नोगाई के पिता का नाम ‘तातार’ या ‘तुतार’ था यह ‘तेवल’ या ‘तेरवल’ का बेटा था जो खुद जोची ख़ान का बेटा था। नोगाई सुनहरा उर्द नामक ख़ानत (जो पूर्वी यूरोप और रूस के बहुत से हिस्से पर राज करती थी) के संस्थापक बातु ख़ान और बातु के बाद सुनहरा उर्द पर राज करने वाले बरकेई ख़ान का भतीजा था (बरकेई , बातु का छोटा भाई था) सुनहरे उर्द से दक्षिण में ईरान और उसके पड़ोसी इलाक़ों पर विस्तृत इलख़ानी राज स्थित था और यह भी एक मंगोल ख़ानत थी, जिसकी स्थापना चंगेज़ ख़ान के एक अन्य पोते हलाकु ख़ान ने की थी, शुरू में सभी मंगोलों ने एक दूसरे की मदद करी और नोगाई के पिता तातार स्वयं हलाकु ख़ान की सेवा में युद्ध में मारे गए लेकिन आगे चलकर, जैसे चंगेज़ी परिवार बढ़ा, उनमें आपसी फूट पड़ गई।

सुनहरा उर्द और इलख़ानी साम्राज्य में लड़ाईयां शुरू हो गई 1259-1260 में नोगाई ने प्रसिद्ध मंगोल सिपहसालार बुरूनदाई के नीचे पोलैंड पर दूसरे धावे में भाग लिया और क्रैको जैसे शहरों को लूटा, माना जाता है कि 1250 के ही दशक में नोगाई ने अपने ताऊ बरके ख़ान की तरह तुर्क संबंधता से इस्लाम अपनाया था!

1262 में हलाकु ख़ान की फ़ौजें उत्तरी कॉकेशियाई क्षेत्र में तेरेक नदी पार करके सुनहरे उर्द पर हमला करने आई तो नोगाई की फ़ौजों ने उन्हें हैरान कर दिया और उनमें से कई हज़ारों की नदी में डूबकर मौत हो गई।
हलाकु की फ़ौजें मैदान छोड़कर अजरबैज़ान लौट गई इस से सुनहरे उर्दू के शासक (और उसके ताऊ) बरके ख़ान की नज़रों में नोगाई की इज़्ज़त बढ़ी। 1265 ई. में नोगाई ने पश्चिम में सेना लेकर दैन्यूब नदी पार करते हुऐ तुर्की की बाईजैन्टाईनी फ़ौजों को खदेड़कर त्राकिया (आधुनिक बुल्गारिया) के शहरों को ध्वस्त कर दिया, 1266 में बाईज़न्टाईनी सम्राट मिख़ाईल अष्टम पालायोलोगोस ने हमलावरों से संधि करने के लिए अपनी पुत्री यूफ़्रोसाईनी पालायोलोगीना की शादी नोगाई से करवा दी।उसी साल इलख़ानी साम्राज्य के दूसरे इलख़ान (और हलाकु ख़ान के पुत्र) अबाका ख़ान के साथ तिबलिसी (जॉर्जिया) में मुठभेड़ से नोगाई की एक आँख चली गई।

1277 ई. में मंगोलों के खिलाफ़ बुल्गारिया में एक जन-विद्रोह हुआ जिसका नेतृत्व इवाईलो नामक स्लाव जनजाति ( रूसियों की मूलभूत जाति / नस्ल) के नेता ने किया और मंगोलों को पहले तो हराया लेकिन 1278-78 में नोगाई द्वारा हरा दिया गया , बचने के लिए इवाईलो ने मित्रता का हाथ बढ़ाया लेकिन नोगाई ने उसे मरवाकर गेयोर्गी तेयोर्तेर प्रथम  को अपने अधीन बुल्गारिया का नया ज़ार / राजा बना दिया।

नोगाई ने रूस के कुछ हिस्से,असेतिया, लोन्गों और रूमानिया के कुछ हिस्से पर शासन किया। उसने 1275 ई. में बॉल्टिक सागर के क्षेत्र लिथुआनिया पर और 1285 ई. में तुलबुगाई ख़ान के साथ मिलकर यूरोप के हंगरी पर हमला किया, हंगरी में उनकी हार हुई।

1287 – 1288 ई. में उन्होंने पोलैंड पर तीसरा धावा किया जिसका नतीजा इतिहासकारों को ठीक से ज्ञात नहीं हालांकि कुछ स्रोतों के अनुसार वे 20 हजार बंदी गुलामों के साथ लौटे , वहीं 1282 में उसके ससुर मिख़ाईल के खिलाफ़ जब कुस्तुंनतुनिया यानि इस्तांबूल में विद्रोह हुआ तो उसने उसे कुचलने के लिए चार हजार मंगोल योद्धा भेजे लेकिन मिख़ाईल के मरने पर उन्हें सर्बिया के विरुद्ध इस्तेमाल किया गया।

1286 ई. तक सर्बिया का राजा स्तेफ़ान उरोश द्वितीय मिलुतीन भी नोगाई को अपना सरताज मानने पर मजबूर हो गया , हालांकि नोगाई चंगेज़ ख़ान का वंशज था लेकिन उस ज़माने की तुर्क – मंगोल व्यवस्था में केवल पत्नियों से जन्में पुत्रों को ही अपने अलग ‘उलुस’ (राज्यों) का ख़ान बनाने का अवसर दिया जाता था शायद इसीलिए अधिकतर समकालीन स्रोतों में उसे ‘तूमेन बेग़’ (यानि ‘दस हज़ार सैनिकों का नेता’) या ‘सिपहसालार’ का ही ख़िताब दिया जाता है , युद्ध में निपुण होने और अपनी शक्ति के बावजूद नोगाई ने कभी भी सुनहरे उर्द की सत्ता छीनने की कोशिश नहीं की, बल्कि दूसरे उस गद्दी पर बैठने के लिए नोगाई का समर्थन माँगा करते थे अगर कोई ख़ान उसे पसंद नहीं आता था तो वह उसे मरवा देता या गद्दी छोड़ने पर मजबूर कर देता , 1291 में किशोर उम्र का तोख़्ता मंगोल,  नोगाई ख़ान की मदद से सुनहरे उर्द का ख़ान बना, नोगाई ने समझा की वह उसे भी पहले के ख़ानों की तरह नियंत्रित रखेगा लेकिन तोख़्ता एक दृढ़-संकल्प शासक निकला जो जल्दी ही नोगाई से टकराया। इन दोनों की पहली जंग में नोगाई की जीत हुई लेकिन उसी समय नोगाई के पोते का [क्राइमिया] में इतालवी लोगों ने ख़ून कर दिया और नोगाई की फ़ौज वहाँ इतालवी बंदरगाहों को ध्वस्त करने में लग गई।

1299 ई. में तोख़्ता के वफ़ादार मंगोलों से दैन्यूब नदी के पास लड़ाई में नोगाई मारा गया उसे एक साधारण रूसी सैनिक ने मारा और जब नोगाई का सिर तोख़्ता के पास लाया गया तो उसने उस रूसी सैनिक को मरवा दिया क्योंकि उसके हिसाब से ‘एक साधारण आदमी एक राजकुंवर को मारने के लायक़ नहीं था।’

नोगाई की चीनी नामक एक पत्नी नोगाई के एक पुत्र (‘तूरी’ नामक) इलख़ानी साम्राज्य के शासक ग़ाज़ान / गज़नवी के पास शरण मांगने भाग गई, ग़ाज़ान / गज़नवी ने उन्हें आदर के साथ शरण दी। नोगाई की मुख्य पत्नि ‘अलग़’ का पुत्र चाका कुछ महीनो के लिए बुल्गारिया का ज़ार (शासक) बना लेकिन फिर हटा दिया गया। 

उराल पर्वतों से पूर्व राज करने वाले मंगोल अपने आपको ‘नोगाई उर्द’  यानि ‘नोगाई झुण्ड’ कहने लगे !!

अब पुन: चंगेज और हलाकु के अरब व मुसलमान विजय की ओर चलते हैं –

मुसलमानों पर ये अल्लाह की तरफ से मंगोल / तातारियों की शक्ल में प्रकोप सन् 1218 मे आया , क्योंकि उस समय मुस्लिम शासक या खलीफ़ा भ्रष्टाचार, आपसी दुश्मनी, ऐयाशी और कत्लेआम में ही लिप्त थे, उस समय तक चंगेज ख़ान एक शक्ति के तौर पर उभर चुका था, वो मुस्लिम शासकों से दोस्ती रखना चाहता था, इस लिये उस ने ख्वारिज़्म के शाह से दोस्ती की तरफ हाथ बढाने के उद्देश्य से एक राजनयिक दल भेजा, मगर इसे ख्वारिज़्म के शाह की मूर्खता कहेंगें कि उस ने सभी 400 लोगों को जो कि बर्बरता के पर्याय चंगेज़ खान के भेजे हुए थे, उस ने सब को जासूसी के इल्जाम मे मरवा दिया, हत्या करा दी, इधर बग़दाद मे बैठा अब्बासी खलीफ़ा भी यही चाहता था के ख्वारिज़्म के शाह की हुकूमत का खात्मा हो जाये,, चंगेज़ ख़ान ने जब सुना के उस के राजनयिक दल की हत्या कर दी गयी है तो उस ने शपथ ले कर कहा कि अब एक भी मुस्लिम मुल्क और मुसलमानो को नही छोड़ूंगा और इस तरह मंगोल सेना हमले के लिये निकल पड़ी,  उस के बाद पूरी दुनिया ने देखा के किस तरह मुसलमानो का क़त्ले आम हुआ.चंगेज़ ख़ान द्वारा मुसलमानों के नरसंहार की सूची नीचे दी जा रही है –

Nishapur 1,747,000 dead 

Herat 1,600,000 dead 

Samarkand 950,000 dead 

Merv 700,000 dead 

Aleppo 50,000 dead 

Balkh completely destroyed 

Khiva completely destroyed 

Harrat completely destroyed

चंगेज़ ख़ान उस समय इस्लाम के प्रमुख शहर बग़दाद पर हमला नही कर सका लेकिन उस के बाद उस के पोते हलाकू ख़ान ने बग़दाद पर हमला किया और चंगेज की इच्छा पूरी की !

बगदाद उस समय दुनिया का सब से उन्नत शहर था जो शिक्षा, व्यापार अमीरी में सब से आगे था, हलाकू ख़ान ने उस पर हमला किया और पूरे शहर की ईंट से ईंट बजा दी पूरे बग़दाद को जला दिया गया, उस ने बग़दाद मे 15 लाख इंसानो का कत्ल किया और दुनिया के सब से बड़े पुस्तकालय को आग लगा दी. . शहर मे सिर्फ खलीफ़ा मुहतसिम बिल्ला बचा था उसे भी एक बोरी मे बाँध कर लात-घूँसो से मारा गया फिर उस पर घोडे दौडवा कर खत्म किया गया,और उसके साथ ही अरब में मूल अरबी खलीफा का राज और खिलाफत समाप्त हो गई।  

बग़दाद को लूटने के बाद वो सीरिया और अफ्रीका की तरफ बढ़ा और वहां भी क़त्ले आम और लूट-पाट की उस समय ऐसा लग रहा था कि इस आंधी को कोई रोक नही पायेगा, और इस धरती से मुसलमानों का खात्मा हो जायेगा मगर 1260  में Ain-Jalut, in Galilee / ऐन जलूत गलीली में सुल्तान बाईबर्स / बैबर के हाथो हलाकू ख़ान की फौज की शर्मनाक हार हुई , इस विजेता इस्लामिक फ़ौज को तैयार करने में शैख़ इजाजुद्दीन का बहुत बड़ा हाथ था जो कि एक इलहामी उलेमा थे, उन्होने मुसलमानों की एक फ़ौज बनाई और मंगोलों के खिलाफ आम “जिहाद” यानि जिहाद अल असगर‬ करने के लिये तैयार किया जिसमें मुसलमानों को थोड़ी कामयाबी मिली..!!

 

13 वी सदी मे जिस तरह का प्रकोप मुसलमानो पे चंगेज़ और हलाकू की शक्ल मे आया थे ऐसा इस्लाम के 1400 साल के इतिहास मे कभी नही आया  था 

क़ुरान की एक आयत है जिस का मतलब है कि –
“अगर तुम अल्लाह के बताये रास्ते से भटक जाओगे तो हम तुम्हारे उपर एक जालिम क़ौम भेज देंगे.” 
सो 13वीं सदी मे जिस तरह का मुसलमानों का संहार हुआ ,इतिहास ने इस तरह का मुसलमानों का संहार फिर से अब तक, कभी नही देखा ,तेरहवीं सदी में तबाही के एक ज्वार की लहर मुस्लिम दुनिय में बही जिसमें शहर के बाद शहर, क्षेत्र के बाद क्षेत्र, मुल्क का मुल्क खत्म हो गया, मरने वालों की संख्या अविश्वसनीय थी, और बगदाद की खिलाफत का समूल नाश हो गया,  जिसके कुछ सालों बाद ही तुर्की में उस्मानिया खिलाफत का उदय हुआ जिसे ऑट्टोमन साम्राज्य भी कहते हैं, लेकिन जिस तरह का प्रकोप मुसलमानों पर तातारी या मंगोलो की तरफ से आया था, वैसा फिर ना आये दुनिया का हर मुसलमान आज भी इस डर से दुआ मांगता है।

#Note – हलाकु उर्फ हलाकू ख़ान पर 1956 में बनी प्राण व मीना कुमारी अभिनीत हिंदी फिल्म का लिंक भी सरप्राइज के रूप में नीचे दे रहा हूं, जिसके गाने अपने समय में बहुत प्रसिद्ध हुऐ थे।
आनंद लीजिये मित्रों!

https://m.youtube.com/watch?v=BrTsldSs9mw

इतिश्री भाग – 2

क्रमश:

Dr. Sudhir Vyas Posted from WordPress for Android

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3 Comments Add yours

  1. misras111 says:

    Excellent !!!! Mohabbat zinda rehti hai…

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  2. गजब
    तुस्सी रियली GR8 हो.

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