पाकिस्तानी राजदूत / राजनयिक ↠ मित्रता या अनुचित दबाव?


‪#‎राजनयिक_दूत‬ (Diplomatic Envoys) संप्रभु राज्य या देश द्वारा नियुक्त प्रतिनिधि होते हैं, जो अन्य राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन अथवा अंतरराष्ट्रीय संस्था में अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हैं।

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★ अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुसार भी कोई भी राज्य या देश अन्य देशों या पडोसी देशों से मित्र संबंध / राजनयिक संबंध स्थापित करने के लिए बाध्य नहीं है, परंतु अंतरराष्ट्रीय जगत में उत्तरोत्तर बढ़ते हुए पारस्परिक संबंध एवं सापेक्ष्य के कारण प्रत्येक राष्ट्र के लिए अन्य राष्ट्रों से मित्रता वाले पारस्परिक राजनयिक संबंध स्थापित करना उपयोगी सिद्ध होता है।

वरिष्ठता के क्रम से राजदूतों के चार वर्ग होते हैं-

(1) राजदूत (Ambassadors),

(2) पूर्ण शक्ति युक्त महादूत तथा असाधारण दूत (Ministers Plenipotentiory & Envoys extraordinary),

(3) निवासी मंत्री (Ministers Resdent),

(4) कार्य भार वाहक (Charges de’ affaires)।

औपचारिकता एवं शिष्टचार के अतिरिक्त इस वर्गीकरण का कोई विशेष महत्व ही नहीं है, राष्ट्रमंडल (Commonwealth) के सदस्य राष्ट्रों के बीच परस्पर भेजे जानेवाले दूत ‘उच्चायुक्त’ जरूर कहे जाते हैं और राजदूतावास Embassy की जगह High Commission कहे जाते हैं।

एक राष्ट्र में स्थित विदेशों के राजनयिक दूतों के समूह को ‘राजनयिक निकाय’ (Diplomatic corps) कहते हैं, इसमें वरिष्ठतम दूत को ‘दूतशिरोमणि’ (Doyen) कहते हैं , वैसे भी पूरी दुनिया में कोई भी संप्रभु राष्ट्र दूसरे राष्ट्र से राजनयिक मित्र संबंध स्वीकार करने को बाध्य नहीं है ना ही उस पर दबाव डाला जा सकता है परंतु प्रश्न विशेष पर वार्ता हेतु आए दूत को स्वीकार न करना उस प्रश्न पर वार्तां न करने के निश्चय का द्योतक है, व्यक्ति विशेष को अन्य राष्ट्र के दूत रूप में ग्रहण न करना उसी दशा में उचित होगा जब अपने चरित्र के साथ दूसरे राष्ट्र के प्रति व्यक्त विचार के कारण अथवा दूसरे राष्ट्र का नागरिक होने के कारण वह व्यक्ति स्वीकार्य न हो।

अस्थायी राजनयिक दूत, समारोह अथवा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में, अपने देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए अथवा प्रश्न विशेष पर वार्ता के लिए भेजे जाते हैं,उनके कृत्य और अधिकार उसी प्रयोजन तक सीमित रहते हैं।

इसके उलट स्थायी नियुक्त राजदूतों की कार्यपरिधि बहुत विस्तृत है, राजदूत अपने राष्ट्र की नीति का आधिकारिक प्रवक्ता है और वह दोनों के बीच समस्त वार्ता संवहन एवं संपर्क का माध्यम होता है, अपने राष्ट्र की कीर्ति बढ़ाना एवं विदेशी राष्ट्र में स्वदेश के प्रति सद्भावना बढ़ाना उसका कर्तव्य है।

राजदूत का अन्य महत्वपूर्ण कार्य है दूसरे देश की राजनीतिक स्थिति एवं गतिविधियों का पर्यवेक्षण करना और उसकी सूचना अपनेदेश को भेजना, राजदूत अपने देश के प्रवासी नागरिकों की तथा उनकी सपंत्ति की रक्षा करता है और उनके जन्म, मरण, विवाहादि का पंजीकरण भी करता है।

राजदूत और उसका निवास स्थान, वाहन आदि भी विदेशी राष्ट्र के न्यायिक व संवैधानिक क्षेत्राधिकार से परे हैं, राजदूत पर उसकी स्वेच्छा के बिना विदेशी राष्ट्र के न्यायालयों में मुकदमा नहीं चल सकता और न अन्य न्यायिक कार्यवाही ही की जा सकती, कोई भी स्थानीय अधिकारी दूत की अनुमति के बिना उसके निवास स्थान अथवा कार्यालय में प्रवेश नहीं कर सकता, साथ ही प्रत्येक राजदूत को किसी भी समय, किन्ही परिस्थितयों में भी बिना रोकटोक अपने मूल देश से संपर्क करने या संवाद करने की पूर्ण स्वतंत्रता है।

राजनयिक संबंधों की समाप्ति दोनों में से किसी राष्ट्र के शासन में क्रांतिकारी परिर्वतन, राष्ट्रों की अध्यक्षता में वैधानिक परिवर्तन होने पर, दोनों में से किसी राष्ट्र के अनुरोध पर अथवा दोनों देशों में युद्ध छिड़ जाने पर हो जाती है, दोनों देशों में गंभीर वैमनस्य होने पर विरोध प्रकट करने के लिए भी स्थायी अथवा अस्थायी रूप से राजनयिक संबंध का विच्छेद कर दिया जाता है।

किसी भी स्थायी राजनयिक के मूलभूत कार्य निम्नलिखित हैं-
★ अपने देश का मेजबान देश में प्रतिनिधित्व करना
★ मेजबान देश में अपने देश तथा उसके नागरिकों के हित की रक्षा करना
★ मेजबान देश की सरकार के साथ संधिवार्ता (negotiation) करना
★ मेजबान देश के वाणिज्यिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक जीवन पर पैनी निगाह रखना और उसकी रपट देना
★ अपने देश तथा मेजबान देश के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों को बढ़ावा देना
★ स्वदेश तथा मेजबान देश के बीच वाणिज्यिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक सम्बन्धों का विकास करना
★ पारपत्र (पासपोर्ट), वीजा तथा अन्य यात्रा-सम्बन्धी प्रपत्र जारी करना।

‪#‎जिल्लेइल़ाही_उवाच्‬
अब जरा उपरोक्त अकाट्य नियमों व मान्यताओं के परिप्रेक्ष्य में आप सुधि पाठक व मित्रगण यह जरूर बतायें कि बात बेबात लगभग हर हफ्ते किसी ना किसी रूप से भारतीय आंतरिक सुरक्षा नीति, भारतीय सरकार की नीति व राजनीति तक को अनुचित रूप से प्रभावित करते पाकिस्तानी उच्चायोग / High Commission of Pakistan की जरूरतें लगती हैं भारत में …??

जिस तरह से पाकिस्तानी उच्चायुक्त भारतीय नीतियों को प्रभावित करता है और बेइज्जत नेताओं समेत ‪#‎Presstitutes‬ एवं खैरात पसंद लोग पाकिस्तानी उच्चायोग के जरखरीद गुलामों की तरह रह कर भारतीय नीतियों व राजनीति की दशा व दिशा पाकिस्तान के अनुसार निर्धारित व निर्देशित करने में सारा जोर लगाते हैं , मेरे व्यक्तिगत विचार के अनुसार तथा परिलक्षित तथ्य व सत्य के सानिध्य में पाकिस्तानी उच्चायोग को भारतीय विदेश मंत्रालय तथा गृह मंत्रालय की एक एक ब्रान्च भी अलॉट कर ही देनी चाहिए।

वैसे लंबे समय से, दशकों से यह वास्तविकता में लगने लगा है कि पाकिस्तानी उच्चायोग व उच्चायुक्त ही भारतीय संप्रभुता एवं नीतियों को निर्देशित व निर्धारित करता है, “सरकारें बस सहयोग या विरोध का , लाचारगी वाली मंजूरी का ठप्पा लगाती है” भाईचारगी की बेचारगी के तहत।

मानो या ना मानो, सच बदलेगा थोडे ही …

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Dr. Sudhir Vyas Posted from WordPress for Android

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