नवबौद्ध या थेरवादी वहाबियत के जातिवादी जिहादी {भाग 2}


पहले भाग में आप मित्रों के समक्ष हिंदू धर्म, हिंदू धर्म के पूजनीय अवतारों, देवी देवताओं सहित “सिर्फ ब्राह्मणों” को लक्षित करते हुऐ नवबौद्धों के अश्लील व उन्मादी कु’लेखन तथा मानसिकता का विस्तृत वर्णन किया था!
उसी प्रथम भाग में उपरोक्त वर्णनों के साथ मैनें थेरवाद (हीनयान बौद्धमत) एवं वहाबियत की मूल धारणाओं को स्पष्टतया समझाने का भी संक्षिप्त प्रयास किया था, अब इस दूसरे भाग में आप सुधि पाठकों व मित्रों को “थेरवादी वहाबियत के जातिवादी जिहादियों ” का पूरा पोलखोल वर्णन स्थापित सिद्धांतो, अकाट्य तथ्यों व साक्ष्यों के तहत करके समझाने का क्षुद्र प्रयास करना चाह रहा हूँ, जिसमें पहले भाग से कुछ अंश ले कर यह भाग शुरू कर शनै: शनै: संपूर्ण करूँगा ताकि विषयगत तारतम्यता बनी रहे और मित्रों को समझ आ सके कि मैं कहना ही क्या चाह रहा हूँ, आप सब को समझाना क्या चाह रहा हूँ ..?

बौद्ध धर्म की दो प्रधान शाखाएँ हैं—हीनयान (या उत्तरीय) और महायान (या दक्षिणी)। इनमें से हीनयान शाखा के सब ग्रंथ पाली भाषा में हैं और बौद्ध धर्म के मूल रूप का प्रतिपादन करते हैं। महायान शाखा कुछ पीछे की है और उसके सब ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए हैं। महायान शाखा में ही अनेक आचार्यों द्वारा बौद्ध सिद्धांतों का निरूपण गूढ़ तर्कप्रणाली द्वारा दार्शनिक दृष्टि से हुआ है। प्राचीन काल में वैदिक आचार्यों का जिन बौद्ध आचार्यों से शास्त्रार्थ होता था वे प्रायः महायान शाखा के थे।
महायान वर्तमान काल में बौद्ध धर्म की दो प्रमुख शाखाओं में से एक है। दूसरी शाखा का नाम थेरवाद है। महायान बुद्ध धर्म भारत से आरम्भ होकर उत्तर की ओर बहुत से अन्य एशियाई देशों में फैल गया, जैसे कि चीन, जापान, कजजोरिया, ताइवान, तिब्बत, भूटान, मंगोलिया और सिंगापुर। महायान सम्प्रदाय कि आगे और उपशाखाएँ हैं, मसलन ज़ेन/चान, पवित्र भूमि, तियानताई, निचिरेन, शिन्गोन, तेन्दाई और तिब्बती बौद्ध धर्म….

भगवान बुद्ध के निर्वाण के मात्र 100 वर्ष बाद ही बौद्धों में मतभेद उभरकर सामने आने लगे थे। वैशाली में सम्पन्न द्वितीय बौद्ध संगीति में थेर भिक्षुओं ने मतभेद रखने वाले भिक्षुओं को संघ से बाहर निकाल दिया। अलग हुए इन भिक्षुओं ने उसी समय अपना अलग संघ बनाकर स्वयं को ‘महासांघिक’ और जिन्होंने निकाला था उन्हें ‘हीनसांघिक’ नाम दिया जिसने कालांतर में महायान और हीनयान का रूप धारण कर किया।

सम्राट अशोक ने 249 ई.पू. में पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन कराया जिसमें भगवान बुद्ध के वचनों को संकलित किया ‍गया। इस बौद्ध संगीति में पालि तिपिटक (त्रिपिटक) का संकलन हुआ। श्रीलंका में प्रथम शती ई.पू. में पालि तिपिटक को सर्वप्रथम लिपिबद्ध किया गया था। यही पालि तिपिटक अब सर्वाधिक प्राचीन तिपिटक के रूप में उपलब्ध है।

महायान के भिक्षु मानते थे हीनयान के दोषों और अंतर्विरोधों को दूर करने के लिए बुद्ध द्वारा उपदेशित अद्वैतवाद की पुन: स्थापना की जानी चाहिए। अद्वैतवाद का संबंध वेद और उपनिषदों से है। महायान के सर्वाधिक प्रचीन उपलब्ध ग्रंथ ‘महायान वैपुल्य सूत्र’ है जिसमें प्रज्ञापारमिताएँ और सद्धर्मपुण्डरीक आदि अत्यंत प्राचीन हैं। इसमें ‘शून्यवाद’ का विस्तृत प्रतिपादन है।

हीनयान को थेरवाद, स्थिरवाद भी कहते हैं। तृतीय संगीति के बाद से ही भारत में इस सम्प्रदाय का लोप होने लगा था। थेरवाद की जगह सर्वास्तित्ववाद या वैभाषिक सम्प्रदाय ने जोर पकड़ा जिसके ग्रंथ मूल संस्कृत में थे लेकिन वे अब लुप्त हो चुके हैं फिर भी चीनी भाषा में उक्त दर्शन के ग्रंथ सुरक्षित हैं। वैभाषिकों में कुछ मतभेद चले तो एक नई शाखा फूट पड़ी जिसे सौत्रान्तिक मत कहा जाने लगा।

हीनयान का आधार मार्ग आष्टांगिक है। वे जीवन को कष्टमय और क्षणभंगूर मानते हैं। इन कष्टों से छुटकारा पाने के लिए व्यक्ति को स्वयं ही प्रयास करना होगा क्योंकि आपकी सहायता करने के लिए न कोई ईश्वर है, न देवी और न ही कोई देवता। बुद्ध की उपासना करना भी हीनयान विरुद्ध कर्म है।

हीनयान कई मतों में विभाजित था। माना जाता है कि इसके कुल अट्ठारह मत थे जिनमें से प्रमुख तीन हैं- थेरवाद (‍स्थिरवाद), सर्वास्तित्ववाद (वैभाषिक) और सौतांत्रिक।

‘थेरवाद’ शब्द का अर्थ है “बड़े-बुज़ुर्गों का कहना” और इस्लामिक वहाबियों के मूल संस्थापक मुहम्मद इब्न अब्दुल वहाब की विचारधारा को कई नामों से जाना जाता है, उसके नाम के मुताबिक उसकी कट्टर विचारधारा को वहाबियत यानी वहाबी विचारधारा कहा जाता है और खुद इब्न अब्दुल वहाब ने अपनी विचारधारा को “सलफिया/सहाबी” यानी ‘बुजुर्गों के आधार पर’ कहा था,, जो थेरवाद या हीनयान भी कहता है..!!

इसीलिये थेरवाद में भी धार्मिक कट्टरता से बौद्ध धर्म की इस शाखा में पालि भाषा में लिखे हुए प्राचीन त्रिपिटक धार्मिक ग्रंथों का पालन करने पर ज़ोर दिया जाता है, बिलकुल वहाबी सुन्नी विचारधारा की तरह जो सिर्फ कुरान की आयतों पर ही चलने और इस्लाम को “मूल स्वरूप में कुरान के अनुसार” ही मानने पर जोर देती है,  उसी अनुसरण में थेरवाद अनुयायियों का कहना है कि इस से वे बौद्ध धर्म को उसके मूल रूप में मानते हैं इनके लिए महात्मा बुद्ध एक महापुरुष / पैगंबर के रूप में ज़रूर हैं लेकिन कोई देवता नहीं वे उन्हें पूजते नहीं और न ही उनके धार्मिक समारोहों में बुद्ध-पूजा होती है, बिलकुल असहिष्णु कट्टरपंथी सलाफियों – वहाबियों की ही विचारधारा की तरह।

आप सभी मित्रगण व सुधि पाठक इस नवयान – थेरवाद (संभवत: हीनयान) को बहुत आसानी से बौद्ध धर्म का सलाफी / सहाबी / वहाबी वाद या सहाबी / वहाबी शाखा कह सकते हैं और नवबौद्धों का वहाबीवाद सरीखा धम्म भी यहीं से निकला है जिसमें संस्कृत की जगह पालि भाषा मूलनिवासी भाषा मानी जा रही है साथ ही थेरवाद या हीनयान यह भी कहता है कि खुद मरे बगैर स्वर्ग नहीं मिलेगा इसीलिए जंगल में तपस्या करो, जीवन के हर मोर्चे पर पराक्रम करो, पूजा, पाठ, ज्योतिष और प्रार्थना सब व्यर्थ है, यह सिर्फ सुख का भ्रम पैदा करते हैं और दिमाग को दुविधा में डालते हैं, शाश्वत सुख की प्राप्ति के लिए स्वयं को ही प्रयास करना होगा ,, आश्चर्यजनक रूप से बिलकुल सलाफी – वहाबी मुसलमानों की मूल जिहादी विचारधारा के ही अनुरूप ..!
यह अक्षरक्ष: बिलकुल इस्लामिक जिहाद की अवधारणा से ही मिलता है और देवी देवताओं सहित अवतारों को अपमानित करना दुष्प्रचार करते हुऐ अपशब्दों का ही उपयोग करना यही नवबौद्धों की थेरवादी हीनयानी नवबौद्ध + सहाबी/सलफी/वहाबी जिहाद का मूलमंत्र और प्रमुखतम हथियार है, जिसकी जड़ में वही प्रमुख हथियार है जो तथाकथित “हिंदू” वंचित – दलित वर्ग के चिंतकों ने ईसाई मिशनरी सानिध्य में अपनाया था लेकिन उसको असल धार इस्लाम ने नेतृत्व प्रदान कर दे दी है, यहाँ स्पष्टतया इस्लाम और सुन्नी – वहाबी के साथ नवयान – हीनयान – थेरवाद का उल्लेख करना इसलिये आवश्यक है क्योंकि मुसलमानों में आश्चर्यजनक रुप से दलित – पिछडा वर्गीकरण ‘हिंदू जातिप्रथा’ के अनुसार किया जाने लगा है और इस वर्गीकरण को आधार देते इस्लामिक आंदोलन का नाम है “पसमान्दा आँदोलन” !

पसमान्दा आँदोलन की खास बात है कि इसमें भी सवर्ण, पिछडे और दलित वर्ग की तरह 3 वर्ग बनाये गये हैं जिसके अंतर्गत भारत की मुसलमान आबादी मुख्यतः तीन श्रेणियों में बांटी जाने लगी है:
अशराफ़, अजलाफ और अरज़ाल, ये मूलतः फारसी शब्द हैं, अरबी या तुर्क नहीं, और शिया मुसलमान समुदाय द्वारा प्रचलन में लाये गये थे,इसीलिये मुस्लिम राजाओं – नवाबों – सुल्तानों के शासन काल से ले कर आज तक भारत में सरकारी भाषा में फारसी का ही अधिपत्य रहा ना कि इस्लाम की मूल भाषा अरबी का.. यह भी एक अकाट्य सत्य व तथ्य है।

1.) अशराफ़ श्रेणी में मुसलमानों कि उच्च बिरादरियां—जैसे कि सय्यद, शेख़, मुग़ल, पठान और मल्लिक/मलिक आदि वर्गीकृत की गई हैं!

2.) अजलाफ़ श्रेणी में मुसलमानों ने अपनी तथाकथित ‘शूद्र / शुद्दर’ तबके की या वैश्यकर्म प्रधान जातियां वर्गीकृत की हैं जैसे – तेली, जुलाहे, राईन, धुनिये , रंगरेज इत्यादि शामिल की जा सकती हैं!

3.) अरज़ाल श्रेणी में तथाकथित रूप से “मुसलमानों के दलित” या “अतिशूद्र मुस्लिम जातियां” हैं जैसे कि मेहतर, भंगी, हलालखोर, बक्खो, कसाई, इत्यादि!

लेकिन सबसे आश्चर्यजनक बात है कि मुसलमानों में ये तथाकथित पसमांदे यानि दलित – पिछडे अपने अशराफ वर्ग के लोगों पर ‘उनकी मान्यताओं पर’, अशराफ वर्ग के लोगों – पैगम्बरों पर कीचड़ नहीं उछालते, ना ही अश्लील टिप्पणियाँ करते हैं , ना ही “खौला बिन्त  हकीम अल सलमिया“[मोहम्मद की सगी मौसी] , आयशा [मोहम्मद की बीबी], “उम्मे  हानी  बिन्त अबू तालिब” उर्फ “फकीत” उर्फ “हिन्दा[मोहम्मद की चचेरी बहन] या फिर खुद मोहम्मद ‘साहब’ पर , ‘जैनब बिन्त जहश‘  (मोहम्मद की पुत्रवधू)  सहित फातिमा , लूत , अली आदि को संबोधित करते हुऐ ,उन के साथ कुरान व हदीसों में वर्णित अकाट्य अश्लीलता, अवैधता पर बातें कतई नहीं करते हैं!
बल्कि उसके सर्वथा उलट नवबौद्धों व हिंदू धर्म के तथाकथित दलित – वंचित – पिछडे वर्ग के चिंतकों, विचारकों, प्रचारकों के साथ मिल कर सिर्फ हम हिंदुओं पर कुत्सित, बेबुनियाद व अश्लील झूठे प्रचार व प्रहार करते हैं , अफवाहे, व्याख्याओं को जन्म देने का कार्य भी यही मुसलमान इन नवबौद्धों के साथ मिल कर कर रहे हैं।

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पैगंबर मोहम्मद के घरेलू व्याभिचार के दो अकाट्य उदाहरण यहाँ दे रहा हूँ –

1.  मोहम्मद साहब की हवस की शिकार होने वाली पहली घरेलू औरत का नाम खौला बिन्त हकीम अल सलमिया था और उसके पति का नाम उसमान बिन मजऊम था, खौला’ मोहम्मद साहब की माँ की बहन यानि उनकी सगी मौसी ही थी इसको मोहम्मद ने अपना सहाबी यानि मजहबी बुजुर्ग बना दिया था, मदीना की हिजरत में मोहम्मद आयशा के साथ खौला को भी ले गए थे, यह  घटना उसी समय की है इस औरत ने अय्याशी और यौन व्याभिचार के लिए खुद को  अपने ही भांजे मोहम्मद के हवाले कर दिया था , यह बात  मुसनद अहमद में निम्नलिखित प्रकार से वर्णित की गयी है –

“खौला बिन्त हकीम ने रसूल से पूछा कि जिस औरत को सपने में ही स्खलन होने की बीमारी हो तो वह औरत क्या करे ही ? तब रसूल ने कहा उसे मेरे साथ ही लेटना चाहिए “

“Khaula Bint Hakim al-Salmiya,asked the prophet about the woman having a wet dream, he said she should lay with    me “

 محمد بن جعفر قال حدثنا شعبة وحجاج قال حدثني شعبة قال سمعت عطاء الخراساني يحدث عن‫حدثنا “””‬ ‫سعيد بن المسيب أن خولة بنت حكيم السلمية وهي إحدى خال ت النبي صلى ال عليه وسلم سألت النبي صلى ال‬ ‫عليه وسلم عن المرأة تحتلم فقال رسول ال صلى ال عليه وسلم لتغتسل‬Translation:26768 – 

Musnad Ahmad -‫Hadith 26768 
तब खौला मोहम्मद साहब के पास लेट गयी और मोहम्मद साहब ने उसके साथ सम्भोग किया !

आयशा  ने खौला  को  धिक्कारा –
जब मोहम्मद की बीबी आयशा को पता चला कि रसूल चुपचाप अपनी सगी मौसी खौला के साथ ही सम्भोग कर रहे हैं तो उसने बाद में खौला को धिक्कारा और उसकी बेशर्मी के लिए फटकारा यह अकाट्य सत्य इस हदीस में दिया गया है –
“हिशाम के पिता ने कहा कि खौला एक ऐसी औरत थी जिसने सम्भोग के लिए खुद को रसूल के सामने पेश कर दिया था इसलिए आयशा ने उस से पूछा ‘क्या तुझे एक पराये मर्द के सामने खुद को पेश करने में जरा भी शर्म नहीं आयी?’  

तब रसूल ने कुरान की “सूरा अहजाब 33:50”  की यह आयत सुना दी जिसमे कहा था –
 “हे नबी , तुम सम्भोग के लिए अपनी पत्नियों की बारी (Turn) को भुला सकते हो ,इस पर आयशा बोली – ‘लगता है तुम्हारा अल्लाह तुम्हें और अधिक मजे करने की इजाजत दे रहा है’ “
( I see, but, that your Lord hurries in pleasing you)
“حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ سَلاَمٍ، حَدَّثَنَا ابْنُ فُضَيْلٍ، حَدَّثَنَا هِشَامٌ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ كَانَتْ خَوْلَةُ بِنْتُ حَكِيمٍ مِنَ اللاَّئِي وَهَبْنَ أَنْفُسَهُنَّ لِلنَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَتْ عَائِشَةُ أَمَا تَسْتَحِي الْمَرْأَةُ أَنْ تَهَبَ نَفْسَهَا لِلرَّجُلِ فَلَمَّا نَزَلَتْ ‏{‏تُرْجِئُ مَنْ تَشَاءُ مِنْهُنَّ‏}‏ قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ مَا أَرَى رَبَّكَ إِلاَّ يُسَارِعُ فِي هَوَاكَ‏.‏ رَوَاهُ أَبُو سَعِيدٍ الْمُؤَدِّبُ وَمُحَمَّدُ بْنُ بِشْرٍ وَعَبْدَةُ عَنْ هِشَامٍ عَنْ أَبِيهِ عَنْ عَائِشَةَ يَزِيدُ بَعْضُهُمْ عَلَى بَعْضٍ‏.‏
बुखारी , जिल्द 7 किताब  62 ,  हदीस 48

2.  मोहम्मद साहब के चाचा अबू तालिब की बड़ी लड़की का नाम “उम्मे हानी बिन्त अबू तालिब” था जिसे लोग “फकीत” और “हिन्दा” भी कहते थे यह सन 630 ईस्वी यानि 8 हिजरी की बात है जब मोहम्मद तायफ़ की लड़ाई में हार कर साथियों के साथ जान बचाने के लिए काबा में छुपे थे लेकिन मोहम्मद चुपचाप सबकी नजरें चुरा कर उम्मे हानी के घर में घुस गए लोगों ने उनको काबा में बहुत खोजा और आखिर वह उम्मे हानी के घर में पाऐ गए इस बात को छुपाने के लिए मोहम्मद ने एक कहानी गढ़ दी और लोगों से कहा कि मैं यरुशलेम और जन्नत की सैर करने गया था ,मुझे अल्लाह ने बुलाया था उस समय उनकी पहली पत्नी खदीजा की मौत हो चुकी थी , मोहम्मद साहब, उम्मे हानी के साथ व्यभिचार करने गए थे उन्होंने कुरान की “सूरा अहजाब की आयत 33:50”  सुना कर सहवास के लिए राजी कर लिया था ,यह बात हदीस की किताब तिरमिजी में मौजूद है जिसे प्रमाणिक माना जाता है पूरी हदीस इस प्रकार है –
“उम्मे हानी ने बताया उस रात रसूल ने मुझे अपने साथ शादी करने का प्रस्ताव रखा लेकिन मैं इसके लिये उन से इंकार कर माफी मांगी तब उन्होंने कहा कि “अभी अभी अल्लाह की तरफ से मुझे एक आदेश मिला है” जिसमें कहा गया –
“हे नबी,  हमने तुम्हारे लिए वह पत्नियां वैध कर दी हैं जिनके मेहर तुमने दे दिये और लौंडियाँ / दासियाँ जो युद्ध में प्राप्त हुई हो और चाचा की बेटियां,  फ़ूफ़ियों की बेटियां ,मामाओं की बेटियां, खालाओं की बेटियां और जिस औरत ने तुम्हारे साथ हिजरत की है और वह ईमान वाली औरतें जो खुद को तुम्हारे लिए समर्पित कर दे”
उम्मे हानी ने आगे कहा कि “यह सुन कर मैं राजी हो गयी और मोहम्मद के साथ संभोग कर के मुसलमान बन गयी “

” عَنْ أُمِّ هَانِئٍ بِنْتِ أَبِي طَالِبٍ، قَالَتْ خَطَبَنِي رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَاعْتَذَرْتُ إِلَيْهِ فَعَذَرَنِي ثُمَّ أَنْزَلَ اللَّهُ تَعَالَى ‏:‏ ‏(‏إنَّا أَحْلَلْنَا لَكَ أَزْوَاجَكَ اللاَّتِي آتَيْتَ أُجُورَهُنَّ وَمَا مَلَكَتْ يَمِينُكَ مِمَّا أَفَاءَ اللَّهُ عَلَيْكَ وَبَنَاتِ عَمِّكَ وَبَنَاتِ عَمَّاتِكَ وَبَنَاتِ خَالِكَ وَبَنَاتِ خَالاَتِكَ اللاَّتِي هَاجَرْنَ مَعَكَ وَامْرَأَةً مُؤْمِنَةً إِنْ وَهَبَتْ نَفْسَهَا لِلنَّبِيِّ ‏)‏ الآيَةَ قَالَتْ فَلَمْ أَكُنْ أَحِلُّ لَهُ لأَنِّي لَمْ أُهَاجِرْ كُنْتُ مِنَ الطُّلَقَاءِ ‏.‏ قَالَ أَبُو عِيسَى لاَ نَعْرِفُهُ إِلاَّ مِنْ هَذَا الْوَجْهِ مِنْ حَدِيثِ السُّدِّيِّ ‏.‏  “-هَذَا حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ –
तिरमिजी -जिल्द 1 , किताब  44  हदीस 3214  पे.522

अपने निकट सम्बन्ध की स्त्रियों के साथ शारीरिक संबंध बनाने को इनसेस्ट (incest ) कहा जाता है विश्व के सभी धर्मों और हर देश के कानूनों में इसे पाप और घृणित अपराध माना गया है लेकिन मोहम्मद साहब अपनी काम वासना की पूर्ति के लिए शायद? तुरंत कुरान की आयत सुना दिया करते थे और इस निंदनीय काम को जायज की शक्ल दे कर, शरीयत – इस्लामिक रूप से वैध बना देते थे , कुरान व इस्लाम की इसी बुनियादी खोट की तालीम के कारण हर जगह व्यभिचार और बलात्कार हो रहे हैं क्योंकि मुसलमान इन नीच कर्मों को गुनाह नहीं मानते बल्कि रसूल की सुन्नत मानते हैं !

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पसमान्दा मुसलमान और नवबौद्धों समेत तथाकथित दलित – पिछडे वर्ग के तथाकथित प्रचारक / चिंतक / विचारक रूपी बुद्धिपिशाच इन दस्तावेजी अकाट्य उदाहरणों का जिक्र नहीं करते बल्कि सीता माता, प्रभु श्रीराम, पूजनीय हनुमान जी व रावण आदि पर अकल्पनीय कपोल कल्पित लांछन लगाते रहते हैं हर माध्यम पर, लेकिन निम्नलिखित चित्र पर कभी “ज्ञान पेलते हुऐ” नजर ही नहीं आते।

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देवबन्द ,तबलीगी जमात सहित हर इस्लामिक फिरके – वर्ग – मसलक़ द्वारा समर्थित किये जा रहे इस तथाकथित “पसमांदा आँदोलन” के कर्ता धर्ता व प्रमुख संरक्षक अली अनवर अंसारी के दिमागी जहर को पढकर बहुजनवादियों – दलित चिंतकों के मूल विचारों के साथ विश्लेषणात्मक तुलना जरूर कीजियेगाकीजिये और मुख्यतया इस बात पर ध्यान दीजियेगा कि श्लील व अश्लील नवबौद्धों और पसमांदों के विचारों, शब्दों और ‘मुद्दों’ के फैलाव,  प्रतिपादन में समानता है या नहीं..??
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अब वक्त आ गया है जब पसमांदा मुसलमानों को अपनी अलग पहचान बनानी होगी. अब तक पसमांदा मुसलमानों की पहचान अकलियत के नाम पर गुम थी. अब हम अल्पसंख्यक शब्द से घबराते हैं और यह हमें छलिया लगता है. अकलियत के नाम पर या तो कोई हमें डराता है या कोई हमारे हक-हुकूक छीनता है. असल में हम इस देश के बहुजन हैं…पसमांदा-दलित मुसलमानों और दूसरे धर्मों के दलित-पसमांदा तबकों के बीच एक दर्द का रिश्ता है. दर्द का रिश्ता सबसे बड़ा रिश्ता होता है. हम एक ही तरह की परेशानियां झेलते हैं. इस लिए हम को दूसरे धर्मों के दलित-पसमांदा से हाथ मिलाना होगा! 

‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उस की उतनी ज़िम्मेदारी’ 

ज़ात-बिरादरी सिर्फ हिन्दुओं की बीमारी नहीं बल्कि पूरे हिन्दुस्तानी समाज की एक ठोस सच्चाई है।
इस वजह से यह यहां के सारे मज़हबी अकलियत समाजों में भी नज़र आती है जहाँ मुसलमानों में अशराफ़, अजलाफ़ और अरजाल तबके पाये जाते हैं,  वहीं सिख समाज जाट/खत्री और मज़हबी तथा ईसाई समाज सिरीयन/सारस्वत और दलित ईसाइयों में बंटा हुआ है। अगर गौर से देखा जाए तो मज़हबी पहचान की सियासत, चाहे वह बहुसंख्यकों की हो या अल्पसंख्यकों की,ऊँची जात वालों की सियासत है, सारे धार्मिंक गुरु-नेता और प्रतिष्ठानों-इदारों में आप ऊँची जात वालों का ही दबदबा पाएंगे, हिन्दू धार्मिंक राजनीति पर सवर्णों का तो मुसलमानों में अशराफ तबके का गलबा है, सत्ता की गलियों में भी आमतौर पर सारे धर्मों की अगड़ी जातियां ही पहुंच पाती हैं।”
 [अली अनवर अंसारी ]

 आओ मित्रों अब हम भारतीय मुसलमानों की दलित/पिछड़ी बिरादरियों, जिनको राजनीति की ज़बान में  आजकल ‘पसमांदा मुसलमान’ कहा जाता है, उन सांप्रदायिक कट्टरपंथी मुसलमानों के सत्ता हासिल करने, गज़वा ऐ हिंद को चरितार्थ करने के हथियार दलित – पिछडे वर्ग के नकली दर्द को  नवबौद्धों से मिला कर जानने की कोशिश करते हैं!

इस नव अलगाववादी चिंतन की मूल जड़ और गजवा ऐ हिंद की इस प्रमुख शाखा पसमांदा राजनीति को बहुत खूबसूरती से राम मनोहर लोहिया जी के समाजवादी ताने बाने के सानिध्य में बुना गया है –
भारत के राजनीतिकों ने अब तक देश के सचमुच पीड़ित अल्पसंख्यक, यानि हिंदू तथा मुस्लिमों की अनगिनत पिछड़ी जातियों, के हितों की रक्षा करने की चिंता नहीं की. उन्होंने शक्तिशालियों का अल्पसंख्यक के नाम पर हितसाधन किया है,जैसे पारसी, क्रिश्चियन , मुसलमान और हिंदुओं में उच्च जाति वालों का. ”   (डॉ. राममनोहर लोहिया)
Guilty Men of India’s Partition, p.47, B. R. Publishing Corporation, 2000

इन सारे प्रचारों और विचारों का मूल डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों से प्रेरित बताने का यह बुरकाधारी प्रयास ही अपनी पोल खुद खोलता है जिसमें तथाकथित रूप से ब्राह्मणों व सवर्णों को बहुसंख्यक तथा हिंदू पिछडे – दलितों सहित मुसलमानों और किंचित रूप से सिक्खों व ईसाईयों को मिला कर अधिसंख्य जनता को सम्मिलित रूप से या यूँ कहें कि संमिश्रण कर , बहुत चालाकी से “अल्पसंख्यक” जनता का नाम दे दिया गया है और यही विचार अब नवबौद्धों सहित मुसलमानों का जादुई नारा बन गया है जिसे हम “जय मीम जय भीम” के नये प्रचलित होते नारे और कर्ताधर्ता MIM पार्टी और उसके औवेसी ब्रदर्स के रूप में जानते हैं!
दलितों और पिछडों के नाम पर हो रही इस सटीक अलगाववादी विभाजन की,, भारत में पुन: इस्लामिक राजनैतिक सत्ता कायम करने वाली गजवा ऐ हिंद अभियान की राजनीति को सरकारी संरक्षण वाले AIMPLB यानि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड समेत सभी तरह के इस्लामिक फिरकों – मसलकों / वर्गों का पूरी तरह समर्थन है,विशेषकर “हनफ़ी, वहाबी, मालीकि, शाफई हम्बली, बरेलवी, देवबन्दी, तबलीगी, सुन्नी और शिया” इत्यादि का कतई फर्क किये बिना ही…!!
मेरे कथन की पुष्टि में मैं हालिया “अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस” के विरोध में AIMPLB यानि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के देश की प्रमुख मस्जिदों, मौलानाओं, इमामों को लिखे पत्र का जिक्र जरूर करना चाहूँगा, जो मित्र AIMPLB यानि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बारे में नहीं जानते उनकी जानकारी हेतु बता देना उचित समझता हूँ कि भारत में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ,मुसलमानों की वह सरकार, संविधान समर्थित संस्‍था है जो मुस्लिम कानून और शरीयत से संबंधित मामले व इस्लामिक हित के मामले ही देखता है,इस सेक्यूलर समाजवादी India that is भारत नामक देश में…. !!
जून 23, 2015 को प्रकाशित ‘दैनिक भास्कर’ अखबार के समाचारानुसार –

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने ब्राह्मण धर्म और वैदिक संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के खुले विरोध का फैसला किया है। उसका कहना है कि इन तत्वों का बढ़ता प्रभाव इस्लाम को नुकसान पहुंचा रहा है। बोर्ड के महासचिव ने एक चिट्ठी में लिखा है, “योग और सूर्य नमस्कार ब्राह्मण धर्म और वैदिक कल्चर को प्रमोट करने की कोशिश हैं। शुक्रवार को जुमे की नमाज के दौरान इमामों को बाकी लोगों के साथ इस बारे में विचार कर आंदोलन के लिए तैयार करना चाहिए।” यह पहली बार है जब एआईएमपीएलबी सीधे मुस्लिम ऑर्गनाइजेशंस, इमामों और मस्जिदों को लेटर लिखकर उन्हें हिंदू ताकतों के प्रति सावधान कर रहा है। 
‘इंटरनेशनल योगा डे एक साजिश’
एआईएमपीएलबी मुसलमानों की वह संस्‍था है जो मुस्लिम कानून और शरीयत से संबंधित मामले देखता है। मौलाना वली रहमानी इसके महासचिव हैं। उन्‍होंने अपने लेटर में आरोप लगाया है कि 21 जून को मनाया गया इंटरनेशनल योगा डे आरएसएस की एक साजिश थी, क्योंकि इसी दिन संघ के पहले सरसंघचालक हेडगेवार की वर्षगांठ होती है।
रहमानी ने संगठनों और पदाधिकारियों को लिखे लेटर में कहा है कि उन्हें इस्लाम की शिक्षाओं के बारे में अपने समुदाय के लोगों को जागरूक करते रहना चाहिए। बोर्ड ने योग, सूर्य नमस्कार और वंदे मातरम को प्रमोट करने के लिए केंद्र सरकार की आलोचना करते हुए कहा है कि यह मुस्लिम विचारधारा के खिलाफ है।”
पूरे समाचार हेतु संबंधित लिंक नीचे दे रहा हूँ।

http://m.bhaskar.com/news-rec/referer/521/UP-LUCK-call-goes-out-to-mosques-from-muslim-law-board-5030488-NOR.html?referrer_url=

रहमानी के लिए इस लेटर में एक बात पर गौर करना जरूरी है, दरअसल, अपने इस लेटर में रहमानी ने ‘हिंदू धर्म’ की जगह ‘ब्राह्मण धर्म’ शब्द का इस्तेमाल किया है। माना जा रहा है कि इसका मकसद दलित पिछडे हिंदुओं तक पहुंच बनाना है।

Unite against ‘Brahmin dharma’: AIMPLB warns Muslims against rising tide of Hindutva

http://m.firstpost.com/india/unite-brahmin-dharma-aimplb-issues-call-arms-rising-tide-hindutva-2307862.html

मुसलमानों,  उनके संरक्षक बोर्डों व दलों की ये बाते अक्षरक्ष: बिलकुल वही हैं जो अब तक इन जलीलों की शह पा कर तथाकथित अंबेडकरवादी – नवयान बौद्ध और थेरवादी / हीनयान वादी बौद्ध ही फैला रहे थे, बोल रहे थे लेकिन अब हर मुसलमान बोलने लगा है, और सबका निशाना “ब्राह्मण” है, हाँ यह अलग बात है कि नवबौद्ध, थेरवादी बौद्ध और तथाकथित दलित – पिछडे चिंतक / विचारक इन मुसलमानों के 900 साल तक किये हत्यारे – अमानवीय अत्याचारों पर कतई मुंह नहीं खोलते, बस ले दे कर वही 17-20 ‘मुद्दे’ या यूं कहे बातें – विषय दोहराते हैं जो मैनें पहले भाग में लिखी हैं।

सबसे मजेदार बात जिसपर सभी लोगों का ध्यान कम ही जाता है – कि आजकल ये मुसलमान भी सवर्णों और ब्राह्मणों को “मूलनिवासियों पर अत्याचार करने वाले विदेशी”  नामक संबोधन – विशेषणों से उपकृत कर रहे हैं, मैं निरंतरता से फेसबुक आदि सोशल मीडियाई प्रसार माध्यमों पर बना रहता हूँ जहाँ विभिन्न पेजों और ग्रुपों में तथाकथित दलित – पिछडे ‘विचारकों / चिंतकों’ , नवबौद्ध वहाबियत के जेहादियों समेत मुसलमानों और हिंदू नामधारी “इस्लामिक जिहादियों” के विचार – शब्द और संप्रेषण शब्द दर शब्द एक समान है और लक्ष्य भी समान, ये ‘संवैधानिक रूप से अतिसंरक्षित सुधिजन’ मिलजुल सिर्फ हिंदू धर्म, मनु संहिता,वेदों, अवतारों का भरपूर अश्लीलता से मजाक उड़ाते हैं, मनमाफिक व्याख्या करते हैं, उदाहरणार्थ मनघडंत किस्से लिखते हैं, लेकिन कतई इस्लाम पर, इस्लामिक पैगंबरी व्याभिचार पर बात नहीं करते, मुसलमानों की भारत में की गई क्रूरता, अत्याचारों पर बात नहीं करते ,बस संस्कृत सुनने पर, श्लोक सुनने पर कान में पिघला सीसा डालने, जबान काटने आदि इत्यादि की बातें करते हैं , इन सब के मनपसंद विषय हैं शबंकू वध,  दुर्गा – महिषासुर युद्ध,  महिषासुर वध, शिवलिंग पूजन, सीता हरण, हनुमान जी, गणेश जी इत्यादि।

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सो मित्रों,  उपरोक्त अकाट्य तथ्यों व सत्य के सानिध्य में दस्तावेजी उदाहरण देते हुऐ मैं यही कहना व बताना चाह रहा हूँ कि बहुजनवादी, समाजवादी, दलित – पिछडा संयुक्त आंदोलन  – पसमांदा आंदोलन और कुछ नहीं मूलतः इस्लामिक गजवा ऐ हिन्द का ही मॉडिफाईड़ रूप है, सुधरा हुआ रूप है जिसे देवबन्द, तबलीगी, AIMPLB, समाजवादी ,MIM पार्टी समेत तथाकथित दलित पिछडे विचारक और नवबौद्ध मिलजुलकर हवा दे रहे हैं, हिंदू व बौद्ध कालिदासों को नहीं मालूम कि सच्चर कमेटी आदि की लफ्फाज़ी में वो दिस डाल पर बैठे हैं उसे ही पेड समेत काटने पर उतारू है क्योंकि डाल वो हिंदू व बौद्ध मिल कर काट रहे हैम और जड ये वहाबी – मुसलमान मिल कर बिना शिया सुन्नी विभेद किये मिल जुल कर काटने में लगे हैं, किंतु सारी बहुसंख्यक राजनीति और पत्रकारिता तो भांग पी कर टुल्ल पडी है कबाब खाते खाते ।

सोशल मीडियाई माध्यमों सहित दलित – पिछडे विचारकों और नवबौद्धों द्वारा सवर्णों और खासकर “ब्राह्मणों” के विरूद्ध कु’प्रचारित एवं प्रसारित की जा रही मांगों – बातों में जिन बातों का मोटे रूप से उल्लेख है वो सुन्नियों – वहाबी मुसलमानों के इस्लामिक संधिपत्र “उमर के संधिपत्र / Covenant of Umar / अहद अल उमरिया / Pact of Umar” भी कहा जाता है!

इस संधि का काल लगभग सन 637 बताया जाता है उमर ने यह संधिपत्र “अबूबक्र मुहम्मद इब्न अल वलीद तरतूश” से बनवाया था ,
जिसने इस संधिपत्र  का उल्लेख अपनी प्रसिद्ध किताब ” सिराज अल मुल्क” के पेज संख्या 229 और 230 पर दिया है ,इस संधिपत्र का पूरा प्रारूप ” एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी University of Edinburgh  ” ने सन 1979 में पकाशित किया है !
इस संधिपत्र की शर्तों को पढ़ने के बाद पता चलेगा कि मित्रता के बहाने मुसलमान कैसा धोखा देते हैं और अल्पसंख्यकों को अधिकार देने के बहाने उनके अधिकार छीन लेते है यद्यपि उमर ने इस्लाम को शांति का धर्म बता कर लोगों गुमराह करने के लिए इस संधिपत्र बड़ा ही लुभावना शीर्षक दिया था!

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सभी मुस्लिम देश इसे अपना आदर्श मानते है . और हरेक मुस्लिम देश के कानून में उमर के संधिपत्र की कुछ न कुछ धाराएँ जरुर मौजूद है ,उमर के संधिपत्र का हिंदी अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है –

1. हम अपने शहर में और उसके आसपास कोई नया चर्च ,मठ , उपासना स्थल या सन्यासियों के रहने के लिए कमरे नहीं बनवायेंगे और उनकी मरम्मत भी नहीं करवाएंगे ,चाहे दिन हो या रात.
(हिंदू मंदिरों की पूंजी उपयोग सहित अवैध व अतिक्रमण कह कर मंदिर विध्वंसों और इस्लामिक स्थल संरक्षण को याद करें)

2. हम अपने घर मुस्लिम यात्रियों के लिए हमेशा खुले रखेंगे , और उनके लिए खाने पीने का इंतजाम करेंगे.
(सीनाजोरी वाली तुष्टिकारक योजनाओं आदि को याद करें।)

3. यदि कोई हमारा व्यक्ति मुसलमानों से बचने के लिए चर्च में शरण मांगेगा तो हम उसे शरण नहीं देंगें.
(नमाज पढाते मंदिर और इफ्तार समर्थन करने वालों सहित लव जिहाद के सच का भी विरोध करने वालों को वर्गानुसार याद करें)

4. हम अपने बच्चों को बाईबिल नहीं पढ़ाएंगे .
(स्कूलों में बहुसंख्यकों को ही गीता, श्लोक, सूक्ति, प्रार्थनाओं के पढने, पाठ्यक्रम में होने व बोले जाने के सबसे बडे विरोधी स्वर किन किन के होते हैं जरा जाति अनुसार, विचारधारा क्रमानुसार याद करें?)

5. हम सार्वजनिक रूप से अपने धर्म का प्रचार नहीं करेंगे और न किसी का धर्म परिवर्तन करेंगे.
(घर वापसी, गीता, योग, हिंदुत्व के खुल्लमखुल्ला विरोधी कौन कौन हैं जरा वर्गानुसार जरा याद करें..)

6. हम हरेक मुसलमान के प्रति आदर प्रकट करेंगें और उसे देखते ही आसन से उठ कर खड़े हो जायेंगे और जब तक वह अनुमति नहीं देता आसन पर नहीं बैठेंगे.
(चहुंओर यही हो रहा है तुष्टिकरण के साये में, अल्पसंख्यक संरक्षण में और सहयोगियों में तथाकथित दलित – पिछडे ही शामिल हैं।)

7. हम मुसलमानों से मिलते जुलते कपडे ,पगड़ी और जूते नहीं पहिनेंगे.

8. हम किसी मुसलमान के बोलने और लहजे की नक़ल नहीं करेंगे और न मुसलमानों जैसे उपनाम (Surname ) रखेंगे.

9. हम घोड़ों पर जीन लगाकर नहीं बैठेंगे किसी प्रकार का हथियार नहीं रखेंगे और न तलवार पर धार लगायेंगे.
(शस्त्र कानूनों के तहत सवर्णों और ब्राह्मणों की विशेषकर अनदेखी, तथा बेबुनियाद कलह उत्पन्न कर मीडियाई हाईप द्वारा घुडचढी याद आ रही है मित्रों..?)

10. हम अपनी मुहरों और सीलों (Stamp) पर अरबी के अलावा की भाषा का प्रयोग नहीं करेंगे.
(संस्कृत और हिंदी विरोध याद आ रहा है, कभी उर्दू का विरोध सुना है इन नवबौद्धों या पसमान्दों से मित्रों..?)

11. हम अपने घरों में सिरका (vinegar) नहीं बनायेंगे 

12. हम अपने सिरों के आगे के बाल कटवाते रहेंगे.
(शिखा रखने पर नवबौद्धों और मुसलमानों द्वारा उडाई जा रही अपमानजनक खिल्ली और व्याख्याओं को याद करें मित्रों)

13. हम अपने रिवाज के मुताबिक कपडे पहिनेंगे ,लेकिन कमर पर “जुन्नार” (एक प्रकार का मोटा धागा) नहीं बांधेंगे.
(ब्राह्मणों और जनेऊ का नवबौद्धों, मुसलमानों तथा तथाकथित दलित-पिछडे चिंतकों द्वारा विरोध करना, अपमानजनक खिल्ली उडाने से याद आ रहा है मित्रों? )

14. हम मुस्लिम मुहल्लों से होकर अपने जुलूस नहीं निकालेंगे और न अपनी किताबें और धार्मिक चिन्ह प्रदर्शित करेंगे और अपनी पूजा प्रार्थनाएं भी धीमी आवाज में पढेंगे.
(मंदिरों से लाऊडस्पीकरों का उतरवाना याद है मित्रों?)

15. यदि कोई हमारा सम्बन्धी मर जाये तो हम जोर जोर से नहीं रोयेंगे और उसके जनाजे को ऐसी गलियों से नहीं निकालेंगे जहाँ मुसलमान रहते हों और न मुस्लिम मुहल्लों के पास अपने मुर्दे दफनायेंगे.

16. यदि कोई मुसलमान हमारे किसी पुरुष या स्त्री को गुलाम बनाना चाहे तो हम उसका विरोध नहीं करेंगे.

17. हम अपने घर मुसलमानों से बड़े और ऊँचे नहीं बनायेंगे.

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” जुबैरिया बिन कदमा अत तमीमी ने कहा जब यह मसौदा तैयार हो गया तो उमर से पूछा गया , हे ईमान वालों के सरदार, क्या इस मसौदे से आप को संतोष हुआ तो उमर बोले, इसमें यह बातें भी जोड़ दो ,हम मुसलमानों द्वारा पकडे गए कैदियों की बनायीं गयी चीजें नहीं बेचेंगे और हमारे ऊपर रसूल के द्वारा बनाया गया जजिया का नियम लागू होगा ”
बुखारी -जिल्द 4 किताब 53 हदीस 38

मेरे लिखे पर आपत्ति करने वालों के लिये उमर के संधिपत्र की फोटो भी लगाई हैं और विस्तृत जानकारी हेतु कई प्रमाणित लिंक भी नीचे दे रहा हूँ।

1)   http://legacy.fordham.edu/halsall/source/pact-umar.asp

2.)    http://fanar.gov.qa/understand/covenant.html

3.)   https://en.m.wikipedia.org/wiki/Pact_of_Umar

अब उमर के संधिपत्र के आधार पर, चहुंओर चहुंमुखी हिंदू व हिंदुत्व सहित मुख्यतया “गोमूत्र व शिवलिंग” की निंदा करते हुऐ सवर्णों और खासकर सीधे ब्राह्मणों को ही लक्ष्य बनाते हुऐ किये जा रहे सुनियोजित, संगठित प्रचार की मूल जड़ आप मित्रों को मिलने लगी होगी, ऐसी आशा करता हूं..!!
यह अति सुनियोजित संगठित इस्लामिक खेल है जिसमें बहुतायत से तथाकथित अंबेडकरवादी दलित – पिछडे चिंतक/विचारक लोगों की फौज़ और थेरवादी जिहादी शामिल हैं जिन्हे मैं सम्मिलित रूप से “नवबौद्ध वहाबियत के जेहादी” कहता हूँ।

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पहले भाग को पढने हेतु लिंक नीचे प्रदर्शित है।

https://sudhirvyas.wordpress.com/2015/06/04/%e0%a4%97%e0%a5%8c%e0%a4%a4%e0%a4%ae-%e0%a4%ac%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7-%e0%a4%ac%e0%a5%8c%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%ac%e0%a5%8c%e0%a4%a6/?preview=true

और अधिक तथ्यों के साथ और सत्य व्याख्या के साथ वर्तमानचीन हालातों को सामने रखते हुऐ तीसरे व अंतिम भाग में समापन करने का प्रयास कर रहा हूं,  जल्दी ही धमाकेदार सनसनीखेज़ खुलासे वाले तीसरे व अंतिम आलेख सहित उपस्थिति दर्ज कराऊंगा, तब तक जयतु हिंदूराष्ट्रम!
वन्दे मातरम्

Dr. Sudhir Vyas Posted from WordPress for Android

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One Comment Add yours

  1. Sunny says:

    Sir, abhi aapki post padhi nahi hai aur comment kar rahaa hu aur kaaran do hai, aap is post se pahle wale post ka link isi post ke upar me daal de taki readers ko sahuliyat ho…dusri baat ye hai ki agar aap chhoti post karenge to post bojhil nahi hoga, chuki digital means me lambi posts ko log jyada nahi padhte….
    baaki aap to khud jille ilaahi ho….
    padh ke vichar rakhta hu 🙂

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