ईसा मसीह / Jesus / यीशु की कब्र यानि श्रीनगर का रोजाबल श्राईन ☞ जीसस का देवत्व ⇄ वेटिकन रचित Son of God या ..??


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श्रीनगर के एक छोटे से मोहल्ले “खानयार मौहल्ला” में स्थित रोजाबल ही हिन्दू धर्म में परिवर्तित ईसा मसीह की समाधि है, जम्मू कश्मीर की पिछली सरकारों ने कट्टरपंथी मुसलमानों की मांग के आगे झुककर उस समाधि को एक मुस्लिम फकीर / सूफी की कब्र घोषित कर दिया है तथा वहाँ पर गैर मुस्लिमों के प्रवेश करने एवं फोटोग्राफी करने पर प्रतिबंध लगा दिया है, अब वहाँ इस्लामिक जियारत होती है, अब रोजाबल श्राईन अचानक पिछले 15 – 17 सालों में हजरत यूज़ा औसफ की जियारतगाह बना दिया गया है।

कश्मीर के इस खानयार मोहल्ले में आज भी वही एक पुरानी सी इमारत है जिसे लोग रोजाबल श्राईन के नाम से जानते थे और आज भी जानते हैं, वो गली के किनारे स्थित साधारण सी दिखने वाली पारंपरिक बहुस्तरीय छतों वाली कश्मीरी इमारत न सिर्फ मुस्लिमों बल्कि दुनियाभर के ईसाईयों और धार्मिक इतिहासकारों की आस्था और आकर्षण का केंद्र बनते जा रही है ,कई विद्वानों ने अपने शोध के जरिए ये साबित करने की कोशिश की है कि यहां स्थित मकबरा किसी और की नहीं बल्कि ईसा मसीह या जीसस की है. पर सवाल यह उठता है कि अगर जीसस की मौत सूली पर चढ़ाए जाने की वजह से जेरूसलम में हुई तो उनका मकबरा वहां से लगभग 2500 किमी दूर कश्मीर में कैसे हो सकता है ?

दरअसल कई शोधकर्ताओं का मानना है कि जीसस की मृत्यु सूली पर चढ़ाने की वजह से हुई ही नहीं थी, रोमनों द्वारा सूली पर चढ़ाए जाने के बावजूद वे बच गए थे और फिर वे मध्यपूर्व होते हुए भारत आ गए, इस घटना के कई वर्षों बाद तक जीसस जीवित रहे पर उनकी बाकी का जीवन भारत में ही बीता!

जर्मन लेखक होलगर्र कर्सटन ने अपनी किताब ‘जीसस लीव्ड इन इंडिया’ में इस विषय पर विस्तार से लिखा है पहली बार सन 1887 में रुसी विद्वान, निकोलाई अलेक्सांद्रोविच नोटोविच ने यह अाशंका जाहिर की थी कि संभवत: जीसस भारत आए थे, नोटोविच कई दफे कश्मीर आए थे जोजी ला पास के नजदीक स्थित एक बौद्ध मठ में नोटोविच मेहमान थे जहां एक भिक्षु ने उन्हें एक बोधिसत्व संत के बारे में बताया जिसका नाम ईसा था. नोटोविच ने पाया कि ईसा औऱ जीसस क्राईस्ट के जीवन में कमाल की समानता है !

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Nikolai Aleksandrovich Notovich (Николай Александрович Нотович), पश्चिम के देशों में, यूरोप में निकोलस नोटोविच  Nicolas Notovitch (1858-1916) के रूप में जाना गया है जो कि एक रूसी यहूदी राजदूत – राजनीतिज्ञ तथा पत्रकार था !
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स्थापित मान्यताओं के अनुसार यीशु/जीसस की जिंदगी से जुड़ा एक विवाद यह भी है कि बाईबिल का नया नियम / New Testament इस बात पर पूरी तरह खामोश है कि जीसस 13 साल की उम्र से लेकर 30 साल की उम्र तक कहां रहे, इस समय को जीसस की जिंदगी के गुमशुदा साल कहे जाते है कुछ विद्वानों का मानना है कि जीसस पूर्व की ओर चलते हुए रेशम मार्ग से होते हुए आज के भारत, तिब्बत और चीन पहुंचे और यहां पहुंचकर उन्होंने हिन्दू और बौद्ध धर्म की शिक्षा प्राप्त की और उनकी मृत्यु भी हिमालय के गोद में बसे भारत के कश्मीर प्रांत में हुई जहां उनकी कब्र आज भी मौजूद है!

गोवा से छपने वाले एक अंग्रेजी अखबार नवहिंद टाइम्स के अनुसार, अपने लंबे भारत प्रवास के दौरान जीसस ने पूरी, बनारस और तिब्बत की बुद्ध मठों की यात्रा की जहां उनके प्रेम और अहिंसा के दर्शन और अधिक मजबूत हुए, 30 साल की उम्र में जीसस अपने इस दर्शन के प्रचार-प्रसार के लिए अपने जन्मस्थान पहुंचे पर सूली की घटना के बाद (जिसमें वे बच गए थे) उन्हें वापस भारत आना पड़ा वे अपनी मां मेरी और अपने कुछ शिष्यों के साथ एक लंबी यात्रा करके भारत पहुंचे जहां वे कश्मीर प्रांत में 80 वर्ष की उम्र तक रहे.. !!

https://m.youtube.com/watch?v=hup6fe_JFJE&feature=youtu.be

यदि 52 मिनट को तसल्ली से खर्च करके देखा डाये तो यह बहुत ही ज्ञानवर्धक ऐतिहासिक भारतीय डॉक्यूमेंटरी है,, जो प्रमाणिक रूप से भारत में ईसा मसीह का संबंध 2000 साल पुराने शिव मंदिर के अभिलेखों, संस्कृत पांडुलिपि, सम्राट कनिष्क के अनदेखे सिक्कों और चीनी, तिब्बति ऐतिहासिक पांडुलिपियों द्वारा सटीक तरीके से दिखाती है साथ ही साफ तौर पर बताती है कि इस्राईल के कुल 12 यहूदी कबीलों में से गुम हुऐ 10 यहूदी कबीलों में से कुछ के वंशज अफगान और कश्मीर में ही बसे हुऐं हैं, कश्मीर में बसे हुऐ इस्राईल मूल के यहूदी लोग जिन्हे पाकिस्तानी कब्जे वाले तथा आज के कश्मीर में भी “बनी इस्रायल” कहा जाता है अब मुस्लिम बन चुके हैं पर डॉक्यूमेंटरी में वे हिंदी में साफ साफ कह रहे हैं कि हमारा खानपान, रीति रिवाज कश्मीरियों से अलग हैं और हम कश्मीरीयों से रोटी – बेटी के संबंध नहीं रखते।

डॉक्यूमेंटरी में ईसा मसीह की मां “मदर मेरी” की कब्र भी दिखाई है, जो.पाकिस्तान के मुर्री इलाके में है…!

डॉक्यूमेंटरी में सबसे खास पौराणिक व ऐतिहासिक सत्य यही है कि यहूदी कब्रों व रस्मों के अनुसार मुर्री में मेरी / मरियम की कब्र और कश्मीर के खानयार की ईसा मसीह / योजा आसफ की कब्र नॉर्थ – ईस्ट / उत्तर पूर्व दिशा के अनुसार है और मुसलमानो की कब्रें साऊथ – वेस्ट यानि दक्षिण पश्चिमी होती हैं। कब्र रूपी मकबरे के पुराने फोटो में ईसा मसीह की कब्र पर यहूदी भाषा लिखा लाल कपडा डला है पर अब अरबी उर्दू लिखे हरे कपडे / चादर डलती हैं।
बहुत ही प्रमाणिकता व सबूतों के सानिध्य में यह डॉक्यूमेंटरी बनी है जिसमें सन् 25 ई. से सन् 80 ई. के दौरान भी भारत व कश्मीर में ईसा मसीह की उपस्थिति दिखाई गई है, साथ ही आज के नये उदाहरणों के साथ साथ सन 1000 ई. तथा 1500 ई. एवं 1700 ई. के लिखित उदाहरणों, पांडुलिपियों और अभिलेखों, शिलालेखों की भरमार है।

पता नहीं क्यों भारत व कश्मीर की मुस्लिम तुष्टिकरण वाली सरकारें देश के इतिहास तथा देश की थातियों के साथ मजाक बना कर उन्हे गुमनामी के तले फेंक देने को ही कार्य समझते हैं, 
कश्मीर में पहाड की गुफा में स्थित हिंदू प्राचीन ऋषि के समाधी स्थल और राजा जयसिंह के समाधी स्थलों को मुस्लिम दरगाहों में बदल कर गुफा में ही दुकानदारियां चलाई जा रही हैं जबकि वो ऐतिहासिक रूप से गैर मुसलमान थे।
पहलगाम का क्षेत्र डीएनऐ संरचना अनुसार मुसलमान बने यहूदी नस्लों से ही भरा हुआ है …!!

यह डॉक्यूमेंटरी इस विषय में आधिकारिक और मील का पत्थर है व भारत सरकार द्वारा ही प्रायोजित व पुरस्कृत है, जरूर देखें।

The Roza Bal or Rauza Bal or Rozabal ( रोज़ाबल or रौज़ाबल ) is the name of a shrine located in the Khanyaar quarter in Downtown area of Srinagar in Kashmir. The word rauza means tomb, the word bal means place, often a landing place by a lake, hence “place of the tomb.” Locals believe a sage buried there is Yuzasaf (one word), more recently Yuz Asaf (two words; or “Youza Asouph”). and the other man is Mir Sayyid Naseeruddin.

The shrine is currently under Muslim control and visitors are either not allowed or discouraged from visiting by having rocks thrown at them. They[who?] claim it is an insult to their faith that some believe it to be the tomb of Jesus,[citation needed] although the shrine existed before Muslim rule in the 14th century. Originally a center of Buddhism, Hinduism and Shaivism for thousands of years before Islam, the shrine was relatively unknown until the founder of the Ahmadiyya Muslim Community, Mirza Ghulam Ahmad, claimed in 1899 that it is actually the tomb of Jesus.This belief is shared by many Ahmadis today, though the local Sunni caretakers of the shrine believe that “the theory that Jesus is buried anywhere on the face of the earth is blasphemous to Islam.

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रोजाबल में जिस व्यक्त्ति का मकबरा है उसका नाम यूजा असफ कहा जाता है, शोधकर्ताओं का मानना है कि यूजा असफ कोई और नहीं बल्कि ईसा मसीह या जीसस हैं आज के ईरान और तब के फारस में यात्रा के दौरान जीसस को यूजा असफ के नाम से ही जाना जाता था इस बात की पुष्टी कई कश्मीरी ऐतिहासिक दस्तावेज करते हैं कि कुरान में उल्लेखित ईसा को यूजा असफ के नाम से भी जाना जाता था!

तथाकथित हिंदू ग्रंथ भविष्यपुराण में भी इस बात का तथाकथित उल्लेख है कि ईसा मसीह भारत आए थे और उन्होंने कुषाण राजा शालीवाहन से मुलाकात की थी , मुस्लिमों का अहमदिया समुदाय भी इसी बात पर यकीन करता है कि रोजाबल में मौजूद मकबरा ईसा या जीसस का ही है , अहमदिया समुदाय के संस्थापक हजरत मिर्जा गुलाम अहमद ने 1899 में लिखी अपनी किताब ‘मसीहा हिन्दुस्तान में’ इस बात को सिद्ध किया है कि रोजाबेल में स्थित मकबरा जीसस का ही है जिनकी शादी कश्मीर प्रवास के दौरान मरजान / Marjan से हुई और बच्चे हुऐ जिनमें से एक बच्चे एल कीन/ Eil Kin की संबंधता के शिलालेख भी 2000 साल से कश्मीर के प्रसिद्व शिव मंदिर पर लगे हुऐं हैँ,, बाईबल भी ईसा के सूली पर चढाये जाने के बाद उनके 12 बार अलग अलग समय पर लोगों के समक्ष आ कर अपने मानव रूप में जीवित होने का प्रमाण देना स्वीकार करती है जिसमें अंतिम बार बाईबल अनुसार ही घोषित रूप से दमास्कस/दमिश्क (आज के सीरीया देश की वर्तमान राजधानी Damascus या दमिश्क) में प्रकट होना है, वो भी क्रूसीफिकेशन के छ: साल बाद…!!

हालांकि ईसाई धर्मगुरू इस बात से साफ इंकार करते हैं कि जीसस कभी भारत आए थे पर यह बात अगर सिद्ध हो जाती है तो यह ईसाई धर्म के आधारभूत विश्वास पर बेहद करारा कुठाराघात होगा.!!

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ईसा मसीह ने 13 साल से 30 साल की उम्र के मध्य में क्या किया, यह रहस्य की बात है। बाइबल में उनके इन वर्षों के बारे में कुछ भी उल्लेख नहीं मिलता है। 30 वर्ष की उम्र में उन्होंने येरुशलम में यूहन्ना (जॉन) से दीक्षा ली। दीक्षा के बाद वे लोगों को शिक्षा देने लगे। ज्यादातर विद्वानों के अनुसार सन् 29 ई. को प्रभु ईसा गधे पर चढ़कर येरुशलम पहुंचे। वहीं उनको दंडित करने का षड्यंत्र रचा गया। अंतत: उन्हें विरोधियों ने पकड़कर क्रूस पर लटका दिया। उस वक्त उनकी उम्र थी लगभग 33 वर्ष।

रविवार को यीशु ने येरुशलम में प्रवेश किया था। इस दिन को ‘पाम संडे’ कहते हैं। शुक्रवार को उन्हें सूली दी गई थी इसलिए इसे ‘गुड फ्रायडे’ कहते हैं और रविवार के दिन सिर्फ एक स्त्री (मेरी मेग्दलेन) ने उन्हें उनकी कब्र के पास जीवित देखा। जीवित देखे जाने की इस घटना को ‘ईस्टर’ के रूप में मनाया जाता है। उसके बाद यीशु कभी भी यहूदी राज्य में नजर नहीं आए। कुछ लोग कह सकते हैं कि उन्हें और भी लोगों ने देखा था, तो कोई बात नहीं देखा होगा।

जब ईसा मसीह थे तब संपूर्ण विश्‍व में बौद्ध धर्म अपने चरम पर था। उत्तरी ईरान, उत्तरी अफगानिस्तान, उत्तरी पाकिस्तान, भारत (कश्मीर, बिहार, मध्यप्रदेश, पूर्वोत्तर के राज्य), तिब्बत, चीन, श्रीलंका, बर्मा, ल्हासा आदि सभी जगह बौद्धों के बड़े-बड़े धर्म स्थल, मठ, स्तूप और रहस्यमयी गुफाएं थी। उस काल में प्रत्येक विद्वान, ‍बुद्धिवादी, संत आदि सभी बुद्ध की प्रज्ञा और उनके प्रभाव से बच नहीं पाए थे। उनके वैचारिक और आध्यात्मिक विस्फोट के चलते दुनिया में नए-नए धर्मों की उत्पत्ति का मार्ग खुल गया था। ईसाई धर्म पर बौद्ध और हिन्दू धर्म की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।

बाइबिल के बाद ईसा मसीह का जिक्र भविष्य पुराण में मिलता है। भविष्य पुराण कब लिखा गया इस पर विवाद हो सकता है, पर यह तो तय है कि इसे ईसा मसीह के बाद लिखा गया था। यह संभवत: मध्यकाल में लिखा गया होगा। इसमें हिमालय क्षेत्र में ईसा मसीह की मुलाकात उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के पौत्र से होने का छोटा-सा वर्णन मिलता है। इससे यह भी तय हो गया कि विक्रमादित्य के पौत्र के बाद या उसके काल में लिखा गया होगा, हिन्दू लोग भले ही कहते रहे हैं कि इसे वेद व्यास ने लिखा था, लेकिन सच तो सच ही होता है !!

ईसा मसीह उर्फ जीसस उर्फ यूज़ा युसुफ की तथाकथित पत्नि मैरी मैग्डैलिन को वेश्या तो पोप के आदेश से सन 1080 के आस पास पहले क्रूसेड के समय में बताया गया किंतु दस्तावेजी आधार पर वो फिलीस्तीनी यहूदी कबीले की राजवंशी और धनाड्य कुलीन महिला थी, जो ईसा के गुफा से बाहर आने पर मिस्र की ओर चली गई थी तथा ईसा ने दमास्कस/ दमिश्क, सीरीया का रूख करते हुऐ सिल्क रूट पकडा और ईरान पाकिस्तान होकर पुन: भारत पहुंचे जिसमें यात्रा के बीच उनकी मां चल बसी और जिसकी कब्र मैरी/ मुर्री के नाम से पाकिस्तान के मुर्री जगह पर ही है।

N.B. The following article by Dr. Ali Jan does not involve The Marian Library’s responsibility as to historical accuracy. It is published to show the prominence of Our Lady in a predominantly Muslim country.

Among various fascinating legends connected with the popular tourist resort of Murree, self-styled as ‘Queen of the Hills’ in Pakistan, there is the one about the tomb of the Virgin Mary.
Believe it or not, some claim that located on a peaceful Murree hilltop, is the very site thought to be the final abode or resting place of the Mother of Isa (AS) or Jesus Christ–better known to Muslims as Hazrat Marium (AS).

http://campus.udayton.edu/mary/resources/marianshrineinpakistan.htm

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मैरी मैग्डैलिन और ईसा के वंशजों में से पुत्री साराह की शादी तत्कालीन फ्रांसीसी राजघराने में हुऐ जाने के भी सबूत दस्तावेजी हैं…. बस ईसाईयत के सबसे जलील संप्रदाय कैथोलिक ने (पोप , वेटिकन ने) सचाई जाहिर होने पर प्रोपोगंड़ा फैला रखा है अपनी दुकानदारी बचाने को, opus dei , Priory of Sion जैसे काम भी वेटिकनी हैं जबकि Priory of Sion तो ईसा और मैग्डेलिन की सीक्रेट ब्लड लाईन यानि बच्चों की रक्षा व बचाव हेतु 10 वीं सदी में बना फ्रांस में ही…!

The Priory of Sion (from the French Prieure de Sion) is alleged to be a secret society founded in the 11th century its said purpose to preserve and protect the original precepts of Christianity and act as guardian to Jesus and Mary Magdalene’s sacred bloodline.
The mainstream public were initially introduced to the Priory through a number of controversial BBC Two documentaries and books by writers Henry Lincoln, Michael Baigent and Richard Leigh. 

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The Holy Blood and the Holy Grail (marketed as Holy Blood, Holy Grail in the U.S.) especially raised eyebrows. In this provocative book the authors stated “There was a secret order behind the Knights Templar, which created the Templars as its military and administrative arm. This order, which has functioned under a variety of names, is most frequently known as the Prieure de Sion (Priory of Sion). The Prieure de Sion has been directed by a sequence of Grand Masters whose names are amongst the most illustrious in Western history and culture. Although the Knights Templar were destroyed and dissolved between 1307 and 1314 the Prieure de Sion remained unscathed.”

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Other assertions include: The Priory of Sion was founded in 1099 CE and is sworn to return the Merovingian dynasty whom they believe to be the descendants of Jesus and Mary Magdalene to power; its leaders or Grand Masters have included the likes of Isaac Newton, Robert Fludd, Victor Hugo and Leonardo da Vinci; the Priory is dedicated to a united Europe and new world order; and the Catholic Church has been engaged, historically, in a war to destroy the dynasty and its protectors the Cathars [1] and Knights Templar in order to retain authority afforded it through a patriarchal line of Popes beginning with Peter instead of the legitimate hereditary succession that began with Mary Magdalene.

The unfortunate problem with all this is that although the Knights Templar and the Cathars are an historical fact, all evidence pertaining to the Priory of Sion and offered as truth by the aforementioned authors was unintentionallybased on false information from fraudulent sources. The Priory, at least in the form of an 11th century secret society, appears to be a deception established a mere half century ago by con man and would be pretender to the French throne Pierre Plantard. 

In 1956 Pierre Plantard founded an association in the French town of Annemasse the original purpose of which seems to have been a relatively benign involvement in the affairs of the local community, but Plantard for whatever his reasons (suggestions are he hoped to re-establish the French monarchy with himself on the throne) soon embarked on a course of action that would result in a hoax of monumental proportions.

Co-conspirators were enlisted, the first was Plantard’s friend Philippe de Cherisey, together they deposited a series of fake documents called the Dossiers Secrets d’Henri Lobineau (“Secret Dossiers of Henri Lobineau”) at the Bibliotheque national de France, in Paris, in order to give credence to Plantard’s royal pedigree. Later a series of “medieval parchments” were forged containing encrypted messages pertaining to the Priory of Sion, the story being that a Father Berenger Sauniere had found them in 1891 while renovating his church, thus giving credence to claims that the Priory is a thousand year old secret society. A second conspirator Gerard de Sede then wrote L’Or de Rennes (“The Gold of Rennes”) and Le Tresor Maudit de Rennes-le-Chateau (“The Accursed Treasure of Rennes Castle”) a further embellishment based on the forged material. It was this fictitious data that Lincoln, Baigent and Leigh used and expanded on in their books and documentaries.

To those that missed the documentaries and books of Lincoln, Baigent and Leigh their first exposure to both the Priory of Sion and the Knights Templar was probably either Dan Brown’s best selling novel The Da Vinci Code or the blockbuster movie that followed it. 

http://www.factfictionandconjecture.ca/files/priory_of_sion.html

The Poor Fellow-Soldiers of Christ and of the Temple of Solomon (Latin: Pauperes commilitones Christi Templique Salomonici), commonly known as the Knights Templar, the Order of Solomon’s Temple (French: Ordre du Temple or Templiers) or simply as Templars, were among the most wealthy and powerful of the Western Christian military orders[4] and were among the most prominent actors of the Christian finance. The organisation existed for nearly two centuries during the Middle Ages.

Officially endorsed by the Roman Catholic Church around 1129, the Order became a favoured charity throughout Christendom and grew rapidly in membership and power. Templar knights, in their distinctive white mantles with a red cross, were among the most skilled fighting units of the Crusades.[5] Non-combatant members of the Order managed a large economic infrastructure throughout Christendom,[6] innovating financial techniques that were an early form of banking,[7][8] and building fortifications across Europe and the Holy Land.

https://en.m.wikipedia.org/wiki/Knights_Templar

ऐतिहासिक व दस्तावेजी तथ्यों के अनुसार सन् 313 ई. में ईसाईयत में परिवर्तित होने से पहले रोमन सम्राट कॉन्सटेंटाईन के बारे में यही कहा जाता है कि शांति बनाये रखने हेतु उसने ईसाईयत स्वीकार की और रोमन साम्राज्य का राजकीय धर्म ईसाई घोषित कर दिया यानि ईसा के तीन सदी बाद जब Holy Bible को गोस्पेल्स मार्क, मैथ्यू व लूक द्वारा रचा गया, इतिहास उस वास्तविक कारण पर मौन रहता है जिस वजह से रोमन सम्राट कॉन्सटेन्टाईन ईसाई बन गया पर, विभिन्न गोस्पेल्स के दस्तावेजी कथन कहते हैं कि –

“यह कोई नहीं कह रहा कि यीशु पाखंडी थे, या उनका पृथ्वी पर आगमन हुआ और उन्होंने लाखों लोगों को बेहतर जीवन जीने के लिए प्रेरित किया था। हम केवल इतना कह रहे हैं कि कॉन्सटेंटाइन ने ईसा के गहरे प्रभाव और महत्व का फायदा उठाया था और ऐसा करते हुए उसने ईसाई धर्म को ऐसा रूप दिया जिसे आज हम जानते हैं।”

उदाहरणार्थ –

रहस्यमय डा विंची कोड का आरंभ फ़्रांसीसी संग्रहालय के निरीक्षक जैक्स सॉनियर नामक व्यक्ति की हत्या से होता है उसकी मृत्यु से पहले उसके द्वारा छोड़े गए संदेश को समझने के लिए हार्वर्ड के विद्वान प्राध्यापक और एक खूबसूरत फ़्रेंच कूट-विशेषज्ञ को अधिकृत किया जाता है, संदेश ने मानवीय इतिहास की सबसे गंभीर साजिश को प्रकट किया – यूनानी कैथोलिक गिरजों की ओपस डे नामक गुप्त शाखा द्वारा ईसा मसीह का वास्तविक संदेश।

मृत्यु के पहले निरीक्षक के पास ऐसा प्रमाण था जो ईसा के देवत्व को असत्य सिद्ध कर सकता था। हालांकि (कथानक के अनुसार) गिरिजाघर ने सदियों तक प्रमाणों को दबाने का प्रयास किया, महान विचारकों और कलाकारों ने हर जगह सुरागों को छिपाया, डा विंची के चित्रों में जैसे कि मोना लिसा और लास्ट सपर में, प्रधान गिरजा घर की वास्तुकला में, यहां तक की डिज़नी के कार्टून में भी। पुस्तक के मुख्य दावे निम्न हैं –

• रोमन सम्राट कॉन्सटेंटाइन ने ईसा मसीह को देवता साबित करने के लिए साजिश की।

• कॉन्सटेंटाइन ने निजी रूप से नवविधान की पुस्तकों का चयन किया।

• महिलाओं के दमन हेतु, पुरुषों द्वारा गूढ़ज्ञानवादी ईसा चरित प्रतिबंधित किए गए।

• यीशु और मैरी मग्दलिनी ने गुप्त रूप से विवाह किया और उनका एक बच्चा हुआ।

• हज़ारों गुप्त दस्तावेज़ ईसाई धर्म की मुख्य बातों को असत्य सिद्ध करते हैं।

ब्राउन अपनी साजिश को पुस्तक की काल्पनिकता के विशेषज्ञ, ब्रिटेन के राजकीय इतिहासकार सर ले टीबिंग के माध्यम से उजागर करते हैं। ज्ञानी वृद्ध विद्वान के रूप में प्रस्तुत किए गए टीबिंग, कूट विशेषज्ञ, सोफी नेवू को बताते हैं कि 325 ई. में नायसिया के परिषद में यीशु के देवत्व समेत “ईसाई धर्म के कई पहलुओं पर बहस हुई और उस पर मत बताए गए।”

वे कहते हैं “इतिहास में उस पल तक यीशु को उनके अनुयायी एक नश्वर पैगंबर … एक महान और शक्तिशाली व्यक्ति के रूप में देखते थे लेकिन फिर भी एक व्यक्ति ही के रूप में।”

नेवू हैरान है। “ईश्वर का पुत्र नहीं?” वह पूछती है।

टीबिंग स्पष्ट करते हैं: “यीशु को ‘ईश्वर के पुत्र के रूप में आधिकारिक तौर पर नायसिया के परिषद में प्रस्तावित किया गया और उस पर मत दिया गया।”

“रुको। आप कह रहे हैं यीशु का देवत्व एक मत का परिणाम था?”

“वह भी अपेक्षाकृत नज़दीकी मत,” टीबिंग ने स्तब्ध कूट विशेषज्ञ से कहा।

इसलिए, टीबिंग के अनुसार यीशु को 325 ईसवी में नायसिया के परिषद तक ईश्वर नहीं माना जाता था, जब यीशु के वास्तविक रिकॉर्ड को कथित रूप से प्रतिबंधित और नष्ट कर दिया गया। इसलिए, सिद्धांत के अनुसार ईसाई धर्म की संपूर्ण बुनियाद एक झूठ पर टिकी है।

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ईसा मसीह का देवत्व वेटिकन द्वारा अपनी सत्ता कायम करने हेतु सुनियोजित और संगठित रूप से, क्रूरता पूर्वक गढा गया था, इसी थ्यौरी पर बहुत शोध के साथ लिखा हुआ उपन्यास है “डा विंची कोड”  इस ने अपनी इस थ्यौरी आधारित कहानी को अच्छे से बेचा, पाठकों की टिप्पणियां आकर्षित की, जैसे “अगर यह सत्य नहीं होता तो यह प्रकाशित नहीं हो सकता था!” किसी अन्य ने कहा कि वह “दोबारा कभी गिरजा में कदम नहीं रखेगा।” पुस्तक के एक समीक्षक ने इसकी सराहना इसके “त्रुटिहीन अनुसंधान” के लिए किया है।

रोमन साम्राज्य पर कॉन्सटेंटाइन के शासनकाल से पूर्व शताब्दियों में ईसाईयों को निर्दयतापूर्वक सताया जाता था। लेकिन फिर, युद्ध में फंसे रहने के दौरान, कॉन्सटेंटाइन ने आकाश में एक चमकदार क्रूस देखा जिस पर “इसके द्वारा जीतो” खुदा हुआ था। उसने युद्ध में क्रूस के निशान के अधीन रहते हुए कूच किया और साम्राज्य पर नियंत्रण पा लिया।

कॉन्सटेंटाइन का ईसाई धर्म में प्रत्यक्ष धर्म-परिवर्तन गिरजा के इतिहास में एक ऐतिहासिक घटना थी। रोम एक ईसाई साम्राज्य बन गया। लगभग 300 वर्षों के इतिहास में पहली बार ईसाई होना अपेक्षाकृत सुरक्षित, और यहां तक कि शान की बात थी।

अब ईसाइयों को उनके धर्म के कारण नहीं सताया जाता था। कॉन्सटेंटाइन ने तब अपने पूर्वी और पश्चिमी साम्राज्य को एकजुट करने पर ध्यान दिया जो ज़्यादातर ईसा की पहचान के आधार पर पूरी तरह से फूट, संप्रदायों और पंथ में विभाजित था।

ये डा विंची कोड में सत्य के कुछ सार हैं और किसी भी सफल साजिश वाली परिकल्पना की पहली आवश्यकता सत्य के सार होते हैं। लेकिन पुस्तक का कथानक कॉन्सटेंटाइन को षड्यंत्रकारी में बदल देता है।

तो आइए ब्राउन की परिकल्पना द्वारा उठाए गए मुख्य प्रश्न का पता लगाऐं कि क्या कॉन्सटेंटाइन ने यीशु के देवत्व का ईसाई सिद्धांत प्रतिपादित किया ?

ईसाई लोग यीशु को ईश्वर के रूप में पहली सदी से पूजते आ रहे थे। परंतु चौथी शताब्दी में पूर्व की गिरजा के एक नेता, एरियस ने ईश्वर की एकात्मकता के समर्थन में प्रचार करना आरंभ किया। उसने बताया कि यीशु विशेष रूप से पैदा किए गए थे, वे देवदूतों से ऊपर थे, परंतु ईश्वर नहीं थे। दूसरी ओर एथानेसियस और गिरजा के अधिकतर नेता इस बात से सहमत थे कि यीशु ईश्वर का अवतार थे।

कॉन्सटेंटाइन इस आशा में इस विवाद का समाधान करना चाहते थे कि इससे उनके साम्राज्य में शांति आएगी तथा पूर्वी और पश्चिमी वर्ग एकजुट हो पाएंगे। इसलिए 325 ईसवी में उसने पूरी ईसाई दुनिया से 300 से ज़्यादा बड़े पादरी को नायसिया (अब तुर्की का हिस्सा है) बुलाया था। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि प्रारंभिक गिरजाघर अथवा वेटिकन क्या सोचते थे, यीशु सृजनकर्ता हैं या मात्र एक सृजन हैं—ईश्वर के पुत्र या बढ़ई के बेटे?

तो ईसाई प्रचारकों ने यीशु के बारे में क्या सिखाया?

उनके सबसे पहले दर्ज किए गए कथनों में ही उन्होंने यीशु को ईश्वर माना। यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान के लगभग 30 वर्षों बाद, पौलुस ने फिलिप्पियों को लिखा था कि यीशु मानवीय रूप में ईश्वर हैं (फिलिप्पियों 2:6-7, NLT)। और एक निकट प्रत्यक्षदर्शी यूहन्ना ने यीशु के देवत्व की निम्नलिखित वाक्यों में पुष्टि की है:

आरंभ में यह शब्द पहले से ही मौजूद था। वह ईश्वर के साथ थे, और वह ईश्वर थे। उसने हर एक चीज बनाई। ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे उन्होंने नहीं बनाया। जीवन स्वयं उनके भीतर था। इसलिए शब्द मानव बन गया और पृथ्वी पर हमारे बीच रहने लगा (यूहन्ना 1: 1-4, 14, NLT)।

यूहन्ना 1 के ये वाक्य एक प्राचीन हस्तलिपि में पाए गए हैं और इसकी कार्बन-तिथि 175-225 ईसवी है। इस प्रकार कॉन्सटेंटाइन द्वारा नायसिया परिषद आयोजित करने के सौ वर्ष पूर्व ही यीशु को निश्चित रूप से ईश्वर बोला जाने लगा था। हम अब देखते हैं कि हस्तलिपि का न्यायिक प्रमाण द डा विंची कोड के इस दावे का खंडन करता है कि यीशु का देवत्व चौथी शताब्दी की कल्पना थी। परंतु इतिहास हमें नायसिया के परिषद के बारे में क्या बताता है? ब्राउन अपनी पुस्तक में टीबिंग के माध्यम से कहते हैं कि नायसिया में बड़े पादरियों ने बहुमत से एरियस के इस विश्वास को नामंज़ूर कर दिया कि यीशु एक “नश्वर पैगंबर” थे और यीशु के देवत्व के सिद्धांत को “अपेक्षाकृत बहुमत” से अपनाया। सही या गलत?

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ग्रंथ-संग्रह पर हमला

द डा विंची कोड यह भी उल्लेख करता है कि कॉन्सटेंटाइन ने हमारे वर्तमान नवविधान ग्रंथ-संग्रह (धर्मप्रचारकों के प्रमाणिक प्रत्यक्षदर्शी वृत्तांत के रूप में गिरजा द्वारा मान्यताप्राप्त) में प्राप्त दस्तावेज़ों के अलावा यीशु से संबंधित सभी दस्तावेज़ों को दबा दिया था। यह आगे उल्लेख करता है कि कॉन्सटेंटाइन और बड़े पादरियों ने यीशु को ईश्वर के रूप में ईजाद करने के लिए नवविधान (new testament) वृत्तांत में फेर बदल किया। द विंची कोड साजिश का अन्य महत्वपूर्ण तत्व यह है कि चार नवविधान ईसा चरित कुल “80 से अधिक ईसा चरित” से लिए गए थे जिसमें से अधिकतर कॉन्सटेंटाइन द्वारा कथित रूप से दबा दिए गए थे।

यहां पर दो केंद्रीय मुद्दे हैं और हमें दोनों पर चर्चा करने की आवश्यकता है। पहला यह है कि क्या कॉन्सटेंटाइन ने नवविधानमें फेरबदल किया या उसके चयन में पक्षपात किया। दूसरा कि क्या उसने उन दस्तावेजों को निकाल दिया जिन्हें बाइबिल में शामिल होना चाहिए था।

पहले मुद्दे के संदर्भ में दूसरी सदी के गिरजा नेताओं और विधर्मियों द्वारा लिखे गए पत्र और दस्तावेज़ समान रूप से नवविधान की पुस्तकों के व्यापक उपयोग की पुष्टि करते हैं। कॉन्सटेंटाइन द्वारा नायसिया परिषद आयोजित करने के लगभग 200 वर्ष पहले, विधर्मी मारसियन ने नवविधान की 27 में से 11 पुस्तकों को धर्मप्रचारकों के प्रमाणिक लेख के रूप में सूचीबद्ध किया।

और लगभग उसी समय एक अन्य विधर्मी, वैलेन्टियस नवविधान के प्रसंगों और वाक्यों की व्यापक विविधता का ज़िक्र करता है। चूंकि ये दोनों विधर्मी प्रारंभिक गिरजा अगुआओं के विरोधी थे तो वे वह नहीं लिख रहे थे जो बड़े पादरी चाहते थे। फिर भी प्रारंभिक गिरजा की तरह वे भी उसी नवविधान की पुस्तकों को उल्लिखित करते थे जिन्हें हम आज पढ़ते हैं।

तो अगर कॉन्सटेंटाइन और नायसिया परिषद के 200 वर्ष पहले ही नवविधान व्यापक रूप से उपयोग में था तो सम्राट कैसे उसका ईजाद या उसमें फेरबदल कर सकता था? उस समय तक गिरजा दूर-दूर तक फैल गया था और लाखों नहीं तो सैकड़ों हज़ारों समर्थकों को शामिल कर चुका था जिनमें से सभी नवविधानके वृत्तांतों से परिचित थे।

यह हमें हमारे दूसरे मुद्दे पर लाता है; क्यों ये इन रहस्यमय गूढ़ज्ञानवादी ईसा चरित्रों को नष्ट किया गया और नवविधान से निकाला गया?
पुस्तक में टीबिंग निश्चित करते हैं कि परिषद में कॉन्सटेंटाइन द्वारा नियुक्त 50 अधिकृत बाइबिल से गूढ़ज्ञानवादी लेखों को हटा दिया गया। वह रोमांचित होकर नेवू से कहता है:

“क्योंकि कॉन्सटेंटाइन ने यीशु की प्रतिष्ठा को उनकी मृत्यु के लगभग चार शताब्दी बाद बढ़ाया, हज़ारों ऐसे दस्तावेज़ पहले से ही मौजूद थे जिसमें यीशु के जीवन को नश्वर व्यक्ति के रूप में लिपिबद्ध किया गया था। कॉन्सटेंटाइन जानता था कि इतिहास की पुस्तकों को पुनः लिखने के लिए उसे एक बड़े प्रहार की ज़रूरत है। यहां से ईसाईयों के इतिहास का सबसे गंभीर पल प्रकट हुआ। …कॉन्सटेंटाइन ने नए बाइबिल के निर्माण को अधिकृत किया और वित्तीय सहायता दी जिससे ईसा की मानवीय विशेषताओं को बताने वाले ईसा चरितों को निकाल दिया और उन वृत्तांतों को अलंकृत किया गया जिन्होंने उन्हें ईश्वरस्वरूप बनाया। पहले के ईसा चरितों को गैरकानूनी करार देकर एकत्रित किया गया और जला दिया गया।”

52 लेखों में से वास्तव में केवल पाँच ईसा चरित के रूप में सूचीबद्ध हैं। जैसा कि हम देखेंगे ये तथाकथित ईसा चरित स्पष्ट रूप से नवविधान ईसा चरित मैथ्यू ( Mathews), मार्कोस (Marcos) उर्फ मार्क (Mark) तथा लूक (Luke) और यूहन्ना (Yuhanna) से भिन्न हैं।

जैसे-जैसे ईसाई धर्म का विस्तार हुआ गूढ़ज्ञानवादियों ने ईसाई धर्म के कुछ सिद्धांतों और तत्वों को अपने विचारों में सम्मिलित किया और गूढ़ज्ञानवाद को नकली ईसाई धर्म रूप में बदल दिया। शायद उन्होंने अपनी भर्ती संख्या को बढ़ाए रखने के लिए और यीशु को अपने अभियान के लिए चेहरा बनाने के लिए ऐसा किया। हालांकि, अपनी विचार प्रणाली को ईसाई धर्म के योग्य बनाने के लिए यीशु को फिर से ईजाद करने की, उनकी मानवीयता और पूर्ण देवत्व दोनों को स्पष्ट करने की आवश्यकता थी।

द ऑक्सफ़ोर्ड हिस्ट्री ऑफ़ क्रिस्चनियटी में जॉन मैकमैनर्स ने ईसाई और मिथकीय आस्था के गूढ़ज्ञानवादी मिश्रण के बारे में लिखा।

“गूढ़ज्ञानवाद कई सामग्रियों वाली एक ब्रह्मविद्या थी (और अभी भी है)। गुह्यविद्या और प्राच्य रहस्यवाद को ज्योतिषशास्त्र, जादू के साथ जोड़ दिया गया।

उन्होंने यीशु के कथनों को एकत्र किया, अपनी व्याख्या (जैसा कि थॉमस के वृत्तांत में है) के अनुकूल बनाया, और उनके अनुयायियों को ईसाई धर्म के वैकल्पिक या प्रतिद्वंद्वी के रूप में उसे पेश किया !!

सुनामी के महाप्रलय ने जो संहार किया उससे भी बड़ा भूचाल डैन ब्राउन के दा विंची कोड ने पैदा किया है। क्योंकि सुनामी ने तो पार्थिव शरीरों को नष्ट किया, लेकिन द विंची कोड ने ईसाइयत के आध्यात्मिक आधार को हिला दिया है।

अगर डैन ब्राउन ने जो लिखा वह निरी बकवास है तो उससे स्थापित धर्म और उसे मानने वालों की रूह क्यों थरथरा उठी?

जरूर डैन ब्राउन की कल्पना के बादलों से सत्य का प्रखर सूरज झाँक रहा है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

डैन ब्राउन ने बरसों असली दस्तावेजों का अध्ययन करने के बाद यह उपन्यास लिखा है- वे दस्तावेज जिन्हें आज तकस्थापित धर्म ने दफना दिया था और गुह्य समूहों ने जीवित रखा था।

विख्यात चित्रकार लिओनार्दो द विंची ऐसे ही गुह्य समूह का एक सदस्य था इसलिए उसने अपनी पेंटिंग्स में कुछ सूत्र, कुछ इशारे छुपाए हैं जिन्हें अनकोड किया जा सकता है।

प्रसिद्ध चित्र मोनालिसा आज तक उसकी गूढ़ मुस्कराहट के बारे में जानी जाती थी, लेकिन किसे पता था कि वह अपने सीने में ईसाई धर्म का राज छुपाए बैठी है। और राज भी ऐसा खतरनाकजो चर्च के पैरों तले जमीन खिसका ले।

अपने उपन्यास में डैन ब्राउन एक के बाद एक धमाके करता जाता है, पहला यह कि जीसस का विवाह मैरी मेग्दलीन से हुआ था, और उन्हें एक बच्चा भी था।

यहीं पर स्थापित पूरे ईसाई धर्म की हवा निकल गई उनका मसीहा जो कि ईश्वर का एकमात्र पुत्र था, इतना मानवीय कैसे हो सकता है?

वेटिकन का पूरा साम्राज्य जीसस की दिव्यता पर खड़ा है अतः ऐसी कहानियाँ गढ़ी गईं कि न तो उनका अपना जन्म नैसर्गिक या मानवोचित तरीके से हुआ और न ही उनका अत: हर घटना अतिमानवीय या यूं कहें पारलौकिक पुट लिए हुए है।

डैन ब्राउन जब स्पेन के एक विश्वविद्यालय में कला का इतिहास सीख रहे थे, तो वहां पहली बार उन्हें द विंची के चित्रों में छुपे हुए रहस्यों का पता चला फिर बरसों बाद वेटिकन के गुप्त आर्काइव्स का अध्ययन करते समय उनके सामने फिर एक बार द विंची के चित्रों का रहस्य उभर आया फिर वे पैरिस के लूव्र संग्रहालय में गए और एक विशेषज्ञ की मदद से उन्होंने लिओनार्दो द विंची के चित्रों का रहस्य उघाड़ने की कोशिश की।उन चित्रों के विलक्षण पहलुओं को जानने के बाद डैन ब्राउन की सर्जनशील प्रतिभा को इस विषय ने पकड़ लिया, और उन्होंने ईसाइयत से संबंधित उन सभी दस्तावेजों को छान मारा जो अब तक हाशिए में थे लेकिन जो जीसस के वास्तविक रूप को प्रकट करते थे। और जो तथ्य सामने आए वे वाकई आश्चर्यजनक थे।

सबसे बड़ा धक्का यह था कि बाइबल में जो अंकित है वह जीसस की असली कहानी और वचन नहीं है जीसस की मृत्यु के 325 साल बाद रोम में तत्कालीन सम्राट कॉन्स्टेंटाइन ने एक धर्म परिषद बुलवाकर जीसस को दिव्यता प्रदान की और उसके लिए सदस्यों ने वोट डाले थे अपने राज्य में अमन और चैन लाने के लिए उसे यह करना जरूरी था क्योंकिउन दिनों ईसाइयों की संख्या बहुत कम थी और रोमन और ईसाई लोगों के बीच लगातार कलह होता था।

डैन ब्राउन के लेखन की ताकत यह है कि उसने काल्पनिक पात्र रचे और उनके मुँह से सत्य घटनाओं का विश्लेषण करवाया। यह ताना-बाना उन्होंने इस खूबी से बुना है कि उनका उपन्यास सत्य और कल्पना के बीच लगातार धूप-छाँव खेलता है।
अब जैसे 1945 में इजिप्त की की खुदाई में नॉस्टिक ग्रंथों का मिलना सत्य घटना है, सन 325 में रोम में हुई नाइसीआ की धर्म परिषद सत्य घटना है, लिओनार्दो द विन्सी एक गुप्त समूह ‘प्रायरी ऑफ सायन’ का सदस्य था यह सच है। इन घटनाओं की बुनियाद पर ब्राउन ने एक सस्पेन्स थ्रिलर, एक रहस्य कथा की भव्य इमारत खड़ी की है। और पढ़ने वाला इस कदर चकरा जाता है कि क्या सत्य, क्या आभास, इसकी सीमाएँ धुँधली हो जाती हैं।
यह रहस्य कथा पढ़ने के बाद जीसस को मानने वालों के विश्वास पर गहरी चोट पड़ी है, अन्यथा विश्व भर में इतनी आग्नेय प्रतिक्रिया क्यों होती? विश्वास पर चोट तभी पड़ती है जब विश्वास के नीचे कहीं संदेह सिर छुपाए बैठा हो। या फिर विश्वास एकभावना हो, संदेह की आग से गुजरकर तपी हुई श्रद्धा नहीं।
अब हम देखें जिन नॉस्टिक ग्रंथों को डैन ब्राउन प्रमाण मानते हैं ये नॉस्टिक ग्रंथ क्या हैं?
उत्तर इजिप्ट के एक शहर नाग हम्मदि के पास, सन 1945 में एक बर्तन में सुरक्षित रखी हुई 12 किताबें मिलीं। ये किताबें एकऐसा असाधारण दस्तावेज है जो तकरीबन 1500 साल पहले निकटवर्ती ईसाई मठ के पुजारी / पादरियों ने पुरातनपंथी चर्च के विध्वंसक चंगुल से बचाने की खातिर भूमि के नीचे दफना रखा था। उस समय जो भी विद्रोही मत रखते थे उन सबको कैथोलिक – वेटिकनी चर्च नष्ट कर रहा था, कैथोलिक चर्च का क्रोध जायज भी है क्योंकि जीसस के ये मूल सूत्र प्रकाशित होते तो चर्च का काम तमाम हो जाता।
बाद में विद्वानों को इस खजाने की खबर लगी और उन्होंने इसका अनुवाद कर इसे छपवाया। इनमें संत थॉमस के सूत्र हैं, ल्यूक के और मेरी मग्दालिन के भी सूत्र हैं ये सूत्र ईसाइयत के लिए सर्वाधिक खतरनाक हैं क्योंकि ये मनुष्य की अन्तःप्रज्ञा को मानते हैं, चर्च या ईश्वर को नहीं।
थॉमस के ये सूत्र आध्यात्मिक खोज को आदमी को भीतर मोड़ते हैं, इसलिए ये बाइबल का हिस्सा नहीं हैं। ये जीसस के कुँवारे शब्द हैं जो 2000 साल तक मानवीय हाथों से अछूते रहे। इनमें से कुछ वचन तो ऐसे हैं कि पहली बार मनुष्य की निगाह उन पर पड़ी।
इस किताब में जीसस का मूल हिब्रू नाम जोशुआ ही लिखा हुआ है। जीसस का उनके शिष्यों के साथ हुआ वार्तालाप है यह। यह बहुत छोटी सी पॉकेट बुकनुमा किताब है जिसमें आधे पन्नों में खूबसूरत चित्र हैं और आधे पन्नों में जीसस के सूत्र जो थॉमस ने दर्ज किए हैं। ये सारे चित्र प्राचीन मिस्र के हैं, और उनमें से कुछ रहस्यपूर्ण प्रतीक हैं जैसे यिन-यांग की आकृति या और कुछ यंत्र।

सूत्रों के प्रारंभ में थॉमस ने लिखा है- ये गुप्त शब्द हैं जिन्हें जीवित जोशुआ ने कहा और और डिडीमस जुदास थॉमस ने लिखा।

ये सूत्र कई तरह के हैं- इनमें प्रज्ञापूर्ण वचन हैं, भविष्यवाणियां हैं, मुहावरे हैं, कथाएँ हैं और संघ के लिए कुछ नियम हैं। न्यू टेस्टामेंट में जो सूत्र हैं उनके मुकाबले थॉमस के सूत्र अधिक प्रामाणिक और जीसस के वचनों के करीब मालूम होते हैं।
इस किताब में मेरी मग्दालिन जीसस के शिष्यों में से एक है। वह वेश्या नहीं थी। हां, लेकिन जीसस के पुरुष शिष्यों की मानसिकता इसमें अवश्य झलकती है।
पढ़कर आश्चर्य होता है कि आज से 2000 साल पहले भी पुरुष स्त्रियों को वैसे ही निकृष्ट मानते थे जैसे कि आज मानते हैं। जैसे आखिरी सूत्र-114 में साइमन पीटर बाकी शिष्यों से कहता है, ‘मैरी मग्दालिन हममें से चली जाए क्योंकि औरतें जीवन के काबिल नहीं हैं।’
जोशुआ कहता है, ‘देखो, मैं उसका मार्गदर्शन करूँगा और उसे पुरुष बनाऊँगा ताकि वह भी जीवंत आत्मा बन जाए जैसे कि तुम पुरुष हो। क्योंकि हर औरत जो अपने को पुरुष बनाती है वह आकाश के राज्य में प्रवेश करेगी।’
शिष्यों ने जीसस से पूछा, ‘हमें बताओ, स्वर्ग का राज्य कैसा है?’
उसने कहा, ‘वह राई के दाने जैसा है, जो सभी बीजों से छोटा है। लेकिन जब वह कसी हुई जमीन पर गिरता है तब वह बहुत बड़ा पौधा बन जाता है और आकाश के पक्षियों के लिए सहारा बन जाता है।
इन सूत्रों में जीसस साफ कहते हैं कि मेरे पिता का राज्य तुम्हारे भीतर है। वह सर्वत्र फैला हुआ है लेकिन तुम्हें दिखाई नहीं देता क्योंकि तुम्हारी आँखें खुली नहीं हैं। नन्हे शिशु जैसे हो जाओ, दुई को एक बना लो, वही उसमें प्रवेश है। जहाँ पुरुष पुरुष न रहे और स्त्री स्त्री न रहे वहां उसका प्रवेश द्वार है।’
मैरी मग्दालिन को वेश्या बनाना कॉन्स्टन्टाइन के कट्टर पुरुषवादी पुरोहितों की चाल थी। हकीकत में मैरी मग्दालिन जीसस के संघ की प्रमुख शिष्या थी। वे चाहते थे कि उनके बाद मैरी उनके संघ की प्रधान बने और उसे आगे चलाए, लेकिन उसे भेज दिया गया। और ब्राउन कहते हैं कि जीसस सर्वप्रथम ‘फेमिनिस्ट’ नारी मुक्तिवादी थे।

एक अद्भुत संयोग है कि थॉमस की यह किताब ‘ए गॉस्पेल ऑफ थॉमस’ ओशो को भी निःसंदेह प्रामाणिक लगी और जीसस के वचनों पर जब उन्होंने बोलना शुरू किया तो इसी किताब को प्रमाण मानकर इनकी व्याख्या की बाद में ओशो के व्याख्यान ‘दि मस्टर्ड सीड’ नाम से प्रकाशित हुए। ओशो ने मैरी मग्दालिन को बहुत ऊँचा स्थान दिया है उसका निष्कलुष प्रेम, जीसस पर उसकी अनन्य श्रद्धा का ओशो ने कई बार बखान किया है, जीसस को तीन दिन बाद सूली से उतारने वाली भी मैरी ही थी और जीसस – ईसा का एक भी पुरुष शिष्य उस समय वहां मौजूद नही था।

दा विंची कोड लिखने का ख्याल डैन ब्राउन को कैसे आया? टीवी के एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि यह कहानी उनके द्वार पर दस्तक देती रही। आखिर उन्हें द्वार खोलना ही पड़ा। संयोगवश उन्हें कागजात भी ऐसे मिलते गए जो स्थापित धर्म पर प्रश्न उठाने के लिए मजबूर करें।
ब्राउन मानते हैं कि ईसाई धर्मगुरुओं द्वारा उनके वक्तव्यों का विरोध होना एक स्वस्थ घटना है। क्योंकि विवाद और संवाद के बीच से ही सृजन का रास्ता गुजरता है। इस बहाने चर्च और उसके अनुयायी हड़बड़ाकर जाग उठे, सारी दुनिया में फिर एक बार जीसस का जीवन और ईसाई धर्म के सिद्धांतों की चर्चाएँ और जांच परीक्षण हो रहा है। यह किसी भी तत्व के पुन:रुज्जीवन के लिए परम आवश्यक है। धर्म की सबसे दुश्मन अगर कुछ है तो लोगों की उपेक्षा।

उपन्यास लिखने के लिए ब्राउन ने जिन ऐतिहासिक कागजातों का सहारा लिया है वे कहाँ तक सच हैं? जहाँ तक ऐतिहासिक तथ्यों का सवाल है, ब्राउन स्पष्ट रूप से कहते हैं कि इतिहास एक भ्रांति है क्योंकि इतिहास विजयी लोगों द्वारा लिखा जाता है और हमेशा घटनाओं के बाद में लिखा जाता है। वर्तमान स्थिति का समर्थन करने की खातिर या और किसी राजनीतिक उद्देश्य से इतिहास लिखवाया जाता है। यहां पर ब्राउन ने एक और खतरनाक प्रश्न उठाया है- पहले तो हमें देखना चाहिए किहमारा इतिहास कितना ऐतिहासिक है?
इस पूरी घटना ने कुछ मूलभूत सवाल उठाए हैं- क्या धर्म का आधार विश्वास हो सकता है? विश्वास एक मानसिक मान्यता है, और मन जो खुद ही संशय से भरा और संदिग्ध है उस पर क्या आध्यात्म का भवन बनाना उचित है? यह तो बहते हुए पानी पर महल बनाने जैसा है।

दूसरा मुद्दा यह है कि कला को अपनी अभिव्यक्ति का अधिकार है कि नहीं? किसी के विश्वासों के विपरीत कुछ कहा नहीं कि लोग उसकी आवाज बंद करना चाहते हैं। आज इस वैज्ञानिक युग में धर्म इतना असहिष्णु क्यों हो गया है? किसी नये विचार का विरोध करने से पहले उसे देखना परखना वैज्ञानिक बुद्धि का कर्तव्य है। लेकिन जो वैज्ञानिक बुद्धि पदार्थ के जगत में कुशलता से काम करती है वह आंतरिक जगत में एकदम अपाहिज और अंधी हो जाती है।
वैज्ञानिक रुख तो यह होगा कि डैन ब्राउन को जो गुप्त कागजात मिले हैं उनकी जाँच-पड़ताल खुद धार्मिक लोग करें और उसमें कुछ सचाई हो तो उनको स्वीकार करें। इससे जीसस की गरिमा और बढ़ेगी, घटेगी नहीं।

आज 2000 साल बाद क्या फर्क पड़ता है कि उनके मसीहा ने विवाह किया था या नहीं? मान लें कि जीसस मानवीय थे, अधिक से अधिक असाधारण मानव; लेकिन जो शख्स समय को जीतकर 2000 साल की लंबी अवधि तक दो तिहाई मानवता के विश्वास का पात्र बना है वह अगर मानवीय सिद्ध हुआ तो इससे बड़ा मनुष्य का सम्मान और क्या हो सकता है।

 रौज़ाबल श्राईन की आधिकारिक डॉक्यूमेंटरी जिसका लिंक मैनें उपर शुरूआत में ही उल्लेख सहित दिया है उसमें वर्णन अनुसार यहूदियों के पैगंबर मौजेज/ Moses यानि मुसलमानों के नबी – पैगंबर हजरत मूसा का अंत में यही उल्लेख मात्र इसलिये भी जरूरी है क्योंकि डॉक्यूमेंटरी में बताई गई छडी ईसा मसीह की नहीं बल्कि हजरत मूसा की है वास्तविकता में.!!

वहीं अप्रैल 2015 के प्रथम सप्ताह में इस्राईल के येरूशल से एक वैज्ञानिक द्वारा खुलासा हुआ कि येरूशलम / जेरूसलेम में ईसा मसीह उर्फ यीशु उर्फ जीसस उनके बच्चे, भाई और परिवार की कब्रें मिली है, और यह खबर पूरी दुनिया के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों, टीवी न्यूज चैनलों समेत शोध पत्रों तक में प्रकाशित हुई!
इजरायल के एक भूगर्भशास्त्री ने येरुशलम में जीसस और उनके बेटे को लेकर एक बेहद ही चौंकाने वाला दावा किया है।’डेली मेल’ के मुताबिक, भूगर्भशास्त्री डॉक्टर ए शिमरॉन का दावा है कि उन्होंने येरुशलम में जीसस और उनके बेटे की कब्र की प्रमाणिकता और उसके अस्तित्व को पुख्ता किया है।

करीब 150 कैमिकल टेस्ट के बाद शिमरॉन ने दावा किया है कि उन्होंने जेम्स ओजुएरी (पहली शताब्दी के चॉक बॉक्स जिनके बारे में मान्यता है कि उनमें जीसस के भाई की हड्डियां हैं) का ‘जीसस फैमिली टॉम्ब’ का कनेक्शन भी खोज लिया है। ये टॉम्ब येरुशलम के पूर्व में स्थित बताई गई हैं।

शिमरॉन ने दावा किया है कि जीसस शादीशुदा थे और उनका एक बेटा भी था। डॉक्टर शिमरॉन के मुताबिक, ‘गॉड के बेटे’ को नौ अन्य लोगों के साथ दफनाया गया था जीसस के बेटे जुदा और पत्नी मैरी शामिल हैं। चॉक बॉक्स पर मिले अभिलेखों में ‘जेम्स, जोसेफ का बेटा, जीसस का भाई’ आदि का उल्लेख भी मिला है। इन्हीं संबंधों और जांच के आधारों पर शिमरॉन का दावा है कि जीसस एक बच्चे के पिता भी थे और शादीशुदा थे। चॉक बॉक्स में लिखित नाम भी एक परिवार से ही संबंधित हैं। 

A new piece of evidence is reigniting controversy over the potential bones of Jesus of Nazareth.

A bone box inscribed with the phrase “James, son of Joseph, brother of Jesus” is potentially linked to a tomb in Talpiot, Israel, where the bones of people with the names of Jesus’ family members are buried, according to a new chemical analysis. Aryeh Shimron, the geologist who conducted the study, claims that because it is so unlikely that this group of biblical names would be found together by chance, the new results suggest the tomb once held the bones of Jesus. Historians place Jesus’ birth at some time before 4 B.C. in Nazareth, a small village in Galilee.

“If this is correct, that strengthens the case for the Talpiot or Jesus Family Tomb being indeed the tomb of “Jesus of Nazareth” said Shimron, a retired geologist who has studied several archaeological sites in Israel.

If true, the idea that Jesus was buried on Earth would undermine one of the central tenets of Christianity — that Jesus was physically resurrected and rose bodily to heaven after his crucifixion.

But many historians are skeptical. They say the names on the bone boxes (inside the Talpiot tomb) don’t all match with those of Jesus’ family. In addition, the current research has not been published in a peer-reviewed journal, the experts say. 

In the time of Jesus, people buried the dead initially in a shroud, but once the flesh had rotted away, they often took the remaining bones and collected them in a small limestone box, called an ossuary , said Mark Goodacre, a New Testament and Christian origins scholar at Duke University in North Carolina who was not involved in the current study.

One of these bone boxes, The James Ossuary, made headlines in 2002, when it was first revealed. The first-century box is inscribed with Aramaic text that translates to “James, son of Joseph, brother of Jesus.” If it’s authentic, the ancient artifact could potentially be the only known relic from the family of Jesus of Nazareth.

But in 2003, the Israel Antiquities Authority argued that the “brother of Jesus” text was forged, and the collector, Oded Golan, was later tried for fraud. After seven years, an Israeli judge concluded that Golan was not guilty of forgery in part because Golan produced a photograph of the box sitting on his shelf in 1976, and would therefore have not had an incentive to forge the inscription many years before he went public with the discovery.

In 1980, another group of researchers unearthed a first-century tomb in Talpiot, a suburb of Jerusalem. The tomb was flooded with a reddish soil called rendzina, and buried in this soil were 10 boxes, six of which were inscribed with names such as Jesus, Mary, Judah, Joseph and Yose.

The tomb came into the public spotlight with the 2007 documentary “The Lost Tomb of Jesus,” written by Israeli journalist and filmmaker Simcha Jacobovici, and produced by “Titanic” producer James Cameron. In recent years, Jacobovici has put forward the theory that the James Ossuary came from the Talpiot tomb — and that the tomb was the final resting place of Jesus of Nazareth and his family. But most archaeologists were skeptical of that claim, Goodacre said.

In the new study, Shimron took scrapings from several places on the James Ossuary and the Talpiot tomb ossuaries. He then compared the traces of chemicals — such as aluminum, magnesium, iron and potassium — from those boxes with about 30 to 40 randomly chosen ossuaries collected by the Israel Antiquities Authority. (Some bones were analyzed for DNA but could not be studied thoroughly because they were quickly reburied after excavation, as Jewish law forbids disturbing Jewish burials, Shimron said.)

Shimron found that the chemical signatures from the James Ossuary matched those from the Talpiot bone boxes.

“The flooding of [the] tomb was caused by this earthquake which hit Jerusalem in [A.D.] 363,” Shimron told Live Science. “That soil and mud that flooded the tomb also buried the ossuaries.”

Because both of the boxes contain chemical signatures associated with this soil, the findings suggest the James Ossuary originally came from the Talpiot tomb, Shimron said.
If true, the new findings could strengthen the case for the Talpiot tomb containing the bones of Jesus of Nazareth. In this interpretation,  after Joseph of Arimathea initially buried Jesus in an empty tomb, his body may have later been laid to rest in this family plot, said James Tabor, a historian at the University of North Carolina at Charlotte, who has worked in the past with Jacobovici, who financed the current research.

The trouble is proving that the tomb belongs to Jesus of Nazareth and his family, rather than a completely different Jesus. The argument for the former theory rests on statistics — namely, that it would be incredibly unlikely that names associated with Jesus of Nazareth’s family would occur by chance for another unrelated Jesus, according to Jacobovici. Adding in another ossuary with names associated with Jesus — namely, the James Ossuary — would potentially buttress that statistical case.

But many experts say that statistical case doesn’t hold up. For one, almost all the names in the tomb were common at the time. In addition, some of the inscriptions, such as the name for Jesus, are hard to read, said Robert Cargill, a classics and religious studies professor at the University of Iowa in Ames, who was not involved in the study.

What’s more, some of the names found on ossuaries from the tomb have no historical precedent — such as “Judah, son of Jesus.”

“There’s no evidence at all that Jesus had a son at all, let alone a son called Judah,” Goodacre said.

One of the boxes is inscribed with what may be “Mariamne” or, alternatively, “Mary and Mara,” Goodacre added. While Jacobovici argues that the name corresponds to one of Jesus’ followers, Mary Magdalene, early Christians didn’t call Mary Magdalene “Mariamne” — rather, she was just called Mariam or Marya, Goodacre said.

When those inconsistencies are also considered, the statistical case for the names matching those of Jesus’ family falls apart, Cargill said.

Jacobovici disagrees with their interpretation of the statistics.

“The fact is that this tomb has more evidence going for it now than probably any other archaeological artifact on the planet. The names are not common and some of the versions of the names are unique e.g., ‘Yose’ (which corresponds to one of the brothers of Jesus),” Jacobovici said in an email to Live Science.

Another inconsistency comes in the timing of the discoveries. The James Ossuary was in a collector’s hands by 1976, but the tomb wasn’t discovered until 1980, Cargill said.

The A.D. 363 earthquake opened up the tomb centuries ago, so it’s possible that the box was closer to the entrance of the tomb and was partly visible from the surface, whereas the other boxes were still submerged and hidden. Someone could have seen it and quickly absconded with it, without having discovered the other tombs, Tabor said.
In addition, Tabor argues that, as a Jewish man of his day, Jesus of Nazareth was more likely to be married with kids, rather than celibate. So the mention of Jesus’ son Judah is not problematic for their theory, even if Judah were never mentioned in historical documents, Tabor added.

The new findings are incredibly controversial because they deal with one of the most polarizing figures in history — Jesus of Nazareth. Traditional Christians believe that Jesus rose bodily of the dead and ascended to heaven after he was crucified and returned to walk on Earth, Tabor said.

“If you find the bones of Jesus, the resurrection is off,” Tabor told Live Science. Conservative Christians “see it as an attack on Christianity and also a refutation of the faith of Christianity.”

But Goodacre and Cargill said theological questions don’t factor into their skepticism. Rather, the real issue is that the scientific standards have not been met, Cargill said.

http://m.livescience.com/50434-jesus-family-tomb-geology.html

The lost tomb of Jesus? Scientist claims he has ‘virtually unequivocal evidence’ that could help explain the whereabouts of Christ’s remains

A geologist in Jerusalem claims to have found “virtually unequivocal evidence” that could reopen the controversy over the final resting place of Jesus Christ.

Dr Aryeh Shimron says he has carried out new tests that suggest it is more likely the Talpiot Tomb, a burial site found in East Jerusalem in 1980, was a family grave for Jesus of Nazareth, his wife Mary Magdalene and his son Judah.

Dubbed “The Lost Tomb of Jesus” in a 2007 documentary movie directed by James Cameron, the chamber contained nine burial boxes or “ossuaries” inscribed with the names “Jesus son of Joseph”, “Mary” and other names associated with the New Testament.
The inscriptions and the approximate dates of burial have led some to suggest the Talpiot Tomb means Jesus married, that he fathered a child, and that the existence of bodily remains means the Resurrection could never have happened.

The controversial claims were refuted on a variety of grounds at the time of the film’s broadcast – not least on the basis that the names were all relatively common at the time.

Yet speaking to the New York Times , Dr Shimron has said that geochemical tests on a 10th ossuary make it highly likely the box was recently removed from among the others in the Talpiot Tomb.

That’s significant because the Aramaic inscription on the 10th ossuary reads “James son of Joseph brother of Jesus” – adding weight to the suggestions that the names are those of Jesus Christ and his family.

“The evidence is beyond what I expected,” Dr Shimron said. “I think I’ve got really powerful, virtually unequivocal evidence that the James ossuary spent most of its lifetime, or death time, in the Talpiot Tomb.”

The geochemical tests, carried out under Dr Shimron’s supervision largely by the Israel Antiquities Authority, worked on the basis that the ossuaries in the Talpiot Tomb were all once covered by the same clay with a very distinctive mineral make-up.

http://www.independent.co.uk/news/world/world-history/the-lost-tomb-of-jesus-scientist-claims-he-has-virtually-unequivocal-evidence-that-could-help-explain-the-whereabouts-of-christs-remains-10158514.html

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मित्रों,  सुधि पाठकों इस पल पल बदलती फ़ानी दुनिया में सबकुछ जानना जरूरी भले ही नहीं पर बहुत कुछ जानना या जानते रहना बहुत जरूरी है…. because this world is obeying the ‘survival of fittest’

★ वन्दे मातरम् ★

  

Dr. Sudhir Vyas Posted from WordPress for Android

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