सरकारी लेखकों तथा खुद सरकारों द्वारा इतिहास का, बलिदानों का दुष्प्रचार – कारण मुस्लिम तुष्टिकरण बस..??


जौहर ज्वालाओं और धर्म – संस्कृति रक्षण हेतु प्रसिद्ध रहे राजस्थान में सरकार जौहर को निम्नलिखित रूप से “कुप्रथा” के नाम से पढा रही है, वो भी सरकारी साईट पर,, लेकिन लेखक और सरकार कहीं यह स्पष्ट रूप से नहीं कहते कि मुस्लिम आक्रमण और इस्लामिक शरिया नीति के अनुसार की जाती हिंदू औरतों की बेइज्जती,  शीलहरण और यौनापराधों के  इस्लामिक शरियत वाले चलन के कारण ही मान – सम्मान – शील को बचाये रखने हेतु जौहर रचा जाता था, और जौहर ज्वालाओं में राजपूत ही नहीं बल्कि लगभग सभी वर्ग की महिलाएं होती थी, इतिहास गवाह है और जौहर प्रथा कभी नहीं रहा, जयपुर, जोधपुर घरानों में सिंधिया घराने तक में जौहर के कोई प्रमाण नहीं हैं।

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भारत में जौहर के प्रमाण इस्लामिक लुटेरों के आक्रमणों से पहले और भारत में इस्लाम से पहले कभी नहीं मिलते हैं।राजस्थान के ही सुप्रसिद्ध इतिहास तथा बलिदानों को मुस्लिम तुष्टिकरण के बुरके में बेइज्जत तरीकों से दुष्प्रचारित करते हुऐ पढाना बंद करो,,,

तनिक तो शर्म करो राजस्थान की रजवाड़ा सरकार !

http://www.ignca.nic.in/coilnet/rj159.htm

“जौहर प्रथा – सती प्रथा के समान ही एक और कुप्रथा राजस्थान में प्रचलित थी, जिसका नाम जौहर प्रथा था। जब शत्रु का आक्रमण होता था और स्रियों को अपने पति के लौटने की पुन: आशा नहीं रहती थी, और दुर्ग पर शत्रु के अधिकार की शत-प्रतिशत सम्भावना बन जाती थी, तब स्रियाँ सामूहिक रुप से अपने को अग्न में जलाकर भ कर देती थी। इसे जौहर प्रथा कहते थे। ऐसे अवसरों पर स्रियाँ, बच्चे व बूढ़े अपने आपको तथा दुर्ग की सम्पूर्ण सम्पत्ति को अग्नि में डालकर भस्म हो जाते थे। धर्म तथा आत्म सम्मान की रक्षा के लिए इस प्रकार का कदम उठाया जाता था, ताकि शत्रु द्वारा बन्दी बनाए जाने पर उन्हें अनैतिक तथा अधार्मिक करने के लिए विवश न होना पड़े। ऐसे कार्य से वे देश एवं स्वजनों के प्रति भक्ति अनुप्राणित करते थे और युद्ध में लड़ने वाले योद्धा अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए शौर्य एवं बलिदान की भावना से प्रेरित होकर शत्रुओं पर टूट पड़ते थे।

समसामयिक रचनाओं में जौहर प्रथा का बहुत अच्छा वर्णन मिलता है। अमीर खुसरों ने अपने ग्रन्थ “तारीख-ए-अलाई’ में लिखा है कि जब अलाउद्दीन ने 1301 ई. में रणथम्भौर पर आक्रमण किया व दुर्ग को बचाने का विकल्प न रहा तो दुर्ग का राजा अपने वीर योद्धाओं के साथ किले का द्वार खोलकर शत्रुदल पर टूप पड़ा। और इसके पूर्व ही वहाँ की वीराँगनाएं सामूहिक रुप से अग्नि में कूदकर स्वाह हो गयी। पधनाभ ने जालौर के आक्रमण के समय वहाँ के जौहर का रोमांचित वर्मन करते हुए लिखा है कि रमणियों की अग्नि में दी गयी आहुतियों ने योद्धाओं को निश्चित कर दिया और वे शत्रु दल पर टूट पड़े।
1303, 1534 एवं 1568 ई. के चित्तौड़ के तीनों शासकों के अवसर पर पद्मिनी, कर्मवती एवं पत्ता तथा कल्ला की पत्नयों की जौहर कथा इतिहास जगत में प्रसिद्ध है। अकबर के समय तो जौहर ने इतना भीषण रुप धारण कर लिया था कि चित्तौड़ का प्रत्येक घर तथा हवेली जौहर स्थल बन गयी थी। परिस्थितियोंवश ये प्रथाएँ प्रारम्भ हो गयी थी, किन्तु सती प्रथा या जौहर प्रथा को मानवीय कसौटी पर प्रमाणित नहीं किया जा सकता।”

एक अन्य सेक्यूलर उदाहरणवो भी दैनिक भास्कर समाचारपत्र के लेख का निम्नलिखित है-

सिंधु नदी के तट पर ऋषि-मुनियों ने वेदों की रचना की। यहीं पर मोहनजोदडो के भग्नावशेष यह प्रमाणित करते हैं कि दुनिया में सबसे पहले सभ्यता का विकास यहीं पर हुआ था। विद्वानों के मत के अनुसार वैदिक-संस्कृति की नींव के साथ सिंधु-घाटी का गहरा संबंध है। इतिहास साक्षी है कि अखंड भारत पर जब-जब विदेशी आततायियों के आक्रमण हुए, तब-तब सिंध के वीरों ने अपने प्राणों की आहुतियां देकर देश की रक्षा की। सिंध ही वह स्थान है, जहां पर विदेशी आक्रामकों के आगे न झुकते हुए देश की वीरांगनाओं ने ‘जौहर’ करना स्वीकार किया। यहीं से जौहर प्रथा का प्रचलन सारे देश में हुआ था। विदेशी आततायियों के लगातार चलते अत्याचारों के मध्य दसवीं शताब्दि के मध्य सिंधुजनों के अराध्य भगवान श्री झुलेलाल जी का अवतरण हुआ था। ऐतिहासिक नगर ‘ठट्टा’ के क्रूर शासक के अत्याचारों से तंग आकर सिंधजनों ने अपने उपास्य जल-देवता वरुणदेव से रक्षा की प्रार्थना की। भक्तों की करुण पुकार पर जल-देवता वरुण का अवतरण सन् 951 ईस्वी विक्रम संवत् 1007 के चैत्र माह की शुक्ल द्वितीय को शुक्रवार के दिन हुआ। उन्होंने ईश्वर-अल्लाह एक होने का उपदेश दिया। तत्कालीन प्रशासक मिरखशाह ने उनकी अलौकिक शक्ति के आगे नतमस्तक होकर उनकी शरण स्वीकार की और अपनी गलतियों की क्षमा मांगी। उन्हीं की परंपरा में चलने वाले सिंधुजन आज सर्वधर्म समभाव की प्रतीक बन गए हैं। वे सनातन धर्म के आदशरें का पालन करते हुए वैदिक परंपराओं का निर्वहन करते हुए सभी तीज-त्यौहार और पर्वो को मनाते हैं। चैत्र शुक्ल द्वितीया पर देश-भर में चेट्रीचंड महोत्सव-झूलेलाल जयंती के रूप में मनाया जा रहा है।

http://googleweblight.com/?lite_url=http://m.bhaskar.com/news/referer/521/MH-johar-was-in-the-country-where-prevalence-of-the-practice-3010162.html?referrer_url%3D&ei=S874uTUY&lc=en-IN&s=1&m=672&ts=1439351073&sig=APONPFmFt-Us7NLnVy9NM1_fNoAjwvlWDQ

हम सती प्रथा या बलात् जौहर के समर्थक नही हैं, परंतु जिस वीरांगना रानी बाई ने इसे सर्वप्रथम अपनाया था, उसकी वीरता और अपने धर्म को बचाने के लिए उसके साहस की पराकाष्ठा तो देखिए कि उसने आत्मोत्सर्ग का यही ढंग ढूंढ़ लिया कि पति के वीरगति पाने का समाचार मिलते ही स्वयं को अग्नि के समर्पित कर दिया। हम इस आदर्श देशभक्ति और पति भक्ति के प्रशंसक अवश्य हैं। भारतीय नारियों को वीरांगना होने की यह प्रेरणा वेद से मिली। हमने नारी के विषय में ये पंकित्यां स्मरण कर ली हैं :-

अबला जीवन हाय, तुम्हारी यही कहानी,

आंचल में है दूध और आंखों में पानी।।

वेदों ने कहा नारी वीरांगना है

पर हमने वेद के उन संदेशों को भुला दिया जिनमें नारी को अबला, दीनहीन और मतिहीन न मानकर उसे वीरांगना माना है।

पारस्कर गृहय सूत्र (1/7/1) में आया है कि ‘आरोहेममश्मानम् अश्वेमेव त्वं स्थिरा भव।

अभितिष्ठ पृतन्यतो अबवाधस्व पृतनायत:।।

अर्थात (सुदृढ़ता प्राप्त करने के लिए) तू इस शिला पर आरोहण कर। जैसे यह शिला स्थिर तथा सुदृढ़ है, ऐसे ही तू भी स्थिर और सुदृढ़ गात्री बन। आक्रमणकारियों को परास्त कर। सेना द्वारा चढ़ाई करने वालों को बाधित कर।

यजुर्वेद (5/10) में आया है-‘‘हे नारी! तू स्वयं को पहचान। तू शेरनी है, तू शत्रु रूप मृगों का मर्दन करने वाली है, देवजनों के हितार्थ अपने भीतर, सामथ्र्य उत्पन्न कर। हे नारी! तू अविद्या आदि दोषों पर शेरनी की भांति है। तू दुष्कर्मों एवं दुव्र्यसनों को शेरनी के समान विध्वंसित करने वाली है, धार्मिक जनों के हितार्थ स्वयं को दिव्य गुणों से अलंकृत कर।’’

यजुर्वेद (5/12) में कहा गया है-‘‘हे नारी तू शेरनी है, तू आदित्य ब्रह्मचारियों की जन्मदात्री है। हम तेरी पूजा करते हैं। हे नारी! तू शेरनी है, तू ब्राह्मणों की जन्मदात्री है, तू क्षत्रियों की जन्मदात्री है, हम तेरा यशोगान करते हैं।’’

यजुर्वेद (10/16) में नारी को क्षात्रबल की भंडार कहा गया है। जबकि यजु (13/16) में उसके लिए कहा गया है कि-‘‘हे नारी! तू धु्रव है, अटल निश्चय वाली है, सुदृढ़ है, अन्यों को धारण करने वाली है। विश्वकर्मा परमेश्वर ने तुझे विद्या, वीरता आदि गुणों से आच्छादित किया है। ध्यान रख, समुद्र के समान उमडऩे वाला रिप ुदल तुझे हानि न पहुंचा सके, गरूड़ के समान आक्रांता तुझे हानि न पहुंचा सके। किसी से पीडि़त होती हुई तू राष्ट्रभूमि को समृद्घ कर।’’

यजुर्वेद (13/26) में कहा गया है-‘‘हे नारी! तू विघ्न बाधाओं से पराजित होने योग्य नही है, प्रत्युत विघ्न बाधाओं को पराजित कर सकने वाली है। तू शत्रुओं को परास्त कर, सैन्य दल को परास्त कर, तू सहस्रवीर्या है, अपनी वीरता प्रदर्शित करके तू मुझे प्रसन्नता प्रदान कर।’’

ऋग्वेद (8/18/5) में आया है कि-‘‘हे नारी! जैसे तू शत्रु से खंडित न होने वाली, सदा अदीन रहने वाली वीरांगना है, वैसे ही तेरे पुत्र भी अद्वितीय वीर हैं।’’

ऋग्वेद (10/159/2) में नारी अपने विषय में कहती है-‘‘मैं राष्ट्र की ध्वजा हूं, मैं समाज का सिर हूं। मैं उग्र हूं, मेरी वाणी में बल है। शत्रु सेनाओं को पराजय करने वाली मैं युद्घ में वीर कर्म दिखाने के पश्चात ही पति का प्रेम पाने की अधिकारिणी हूं।’’

ऋग्वेद (10/159/4) का कहना है कि-‘‘जिस आत्मोसर्ग की छवि से मेरा वीर पति कृत कृत्य यशस्वी तथा सर्वोत्तम सिद्घ हुआ है, वह छवि आज मैंने भी दे दी है। आज मैं निश्चय ही शत्रु रहित हो गयी  हूं।’’ इससे अगले मंत्र में वह कहती है कि-‘‘ मैंने शत्रुओं का वध कर दिया है, मैंने विजय पा ली है, वैरियों को पराजित कर दिया है। ’’

वैदिक नारी का राष्ट्र की राष्ट्रनीति (राजनीति) में ये स्थान था। मानो वह अपने पति के हटते ही तुरंत ध्वजा संभालने को आतुर रहती थी। राष्ट्र और समाज की शांति व्यवस्था के शत्रु आतंकियों का विनाश करने में यदि पति ने आत्मोत्सर्ग कर लिया है, वीरगति प्राप्त कर ली है, तो पत्नी भी उसी मार्ग का अनुकरण करना अपना सौभाग्य मानती थी। इसी भाव और भावना ने राजा दाहिर की पत्नी को जौहर करने का विकल्प दे दिया। राजा दाहर की रानी के जौहर से पूर्व किसी रानी के जौहर का उल्लेख नही है। कारण ये है कि उससे पूर्व भारत वर्ष में नारी के प्रति पुरूष का बड़ा प्रशंसनीय धर्म व्यवहार था। नारी चाहे कितनी ही वीरांगना हो, परंतु पुरूष समाज उससे शत्रुता नही मानता था और ना किसी की नारी के शीलभंग के लिए युद्घ किये जाते थे, नारी का को शत्रु नही (न+ अरि = नारी) होता था, इसीलिए वह नारी कही जाती थी। परंतु अब विदेशी आक्रमणकारियों का धर्म उन्हें नारी के लिए ही युद्घ करने की प्रेरणा देता था और नारी का शीलभंग करना इस युद्घ का एक प्रमुख उद्देश्य बन गया था, इसलिए रानी बाई ने जौहर को अपना लिया।

जब इस्लामी आक्रमणकारियों ने भारत में हमले किये और यहाँ शासन स्थापित किया तो हिन्दू महिलाओं के साथ भी हर प्रकार के घृणित व्यवहार किये गए! मोहम्मद की मृत्यु के पश्चात 632 से लेकर 712 ई. तक जितने भी हमले भारतवर्ष पर किये गए, इस्लामिक आक्रमणकारी हिन्दू राजाओं के हाथों या तो परास्त हो गए अथवा मारे गए इन वर्षों में महिलाओं की इस्लामी आक्रान्ताओं द्वारा की जाने वाली दुर्दशा व दुर्गति की सूचना चहुंओर से हिन्दुओं तक पहुँच चुकी थी!

मुसलामानों के विपरीत, यहाँ के क्षत्रिय युद्ध भी नियमों की मर्यादा में करते थे और महिलाओं में उच्च कोटि के संस्कार थे. परिणामतः आरम्भ हुई एक ऐसी परंपरा जो आज सती के नाम से जानी जाती है.

इस का जो अधिक उपयुक्त शब्द है, वह है जौहर जो ‘जीव हर’ की संधि से बना है और इस का अर्थ है जीवन को देना, जब 712 ई. में सिंध में मोहम्मद बिन क़ासिम ने वहाँ के शासक दाहिर का रणभूमि में वध कर दिया था तो ये सूचना पा कर उसकी बहन बाई ने रावर दुर्ग में उपस्थित सभी महिलायों को संबोधित कर के कहा था:-

“अब ये तय है कि हम इन चांडालों और गोमांस भक्षकों के चंगुल से नहीं बच सकती हमारी सुरक्षा और स्वतंत्रता की कोई आशा नहीं है इसलिए हम लकड़ी, कपास और तेल एकत्रित कर के आत्मदाह कर लें ताकि हम अपने पतियों से (स्वर्ग में) शीघ्र ही मिल जाएँ इस के लिए कोई बाध्य नहीं है. जो शत्रु से याचना करना चाहें वो इस के लिए स्वतंत्र हैं!”

वो सब एक मत थीं और उन्होंने एक घर को आग लगा कर उसमे अपने आप को भस्म कर लिया. जो महिलाएं दुर्ग से बाहर थीं, वो इतनी भाग्यशाली नहीं रहीं मोहम्मद बिन क़ासिम अपने मुसलमान सैनिकों के साथ तीन दिन तक वहाँ रुका था, जिन में उसने 6000 योद्धाओं का वध किया था और लगभग 70,000 बंधक बनाए थे, इन सब महिलाओं और बच्चों को मुसलमान बना दिया गया था, इन में 30 युवतियां राजघराने की थीं. इन्हें इराक के शासक हज्जाज के पास भेज दिया गया. जब हज्जाज को ये बंधक मिले तो उन के साथ मोहम्मद बिन क़ासिम ने राजा दाहिर का कटा हुआ सर भी भेजा था इस कटे सर को देख कर हज्जाज ने अल्लाह का शुक्रिया अदा किया और नमाज़ अदा की. इन बंधकों में से 20% को उस समय के खलीफा वालिद को भेज दिया गया, खलीफा ने इन में से कुछ को बंदियों के रूप में बेच दिया और कुछ को भेंट स्वरुप मित्रों में बाँट दिया..!!

इसी जौहर को कालांतर में अन्य हिंदू वीरांगनाओं ने भी अपनाया। अब हम आते हैं एक ऐसी ही हिंदू वीरांगना रानी पदमिनी की वीरता की कहानी पर, जिसने अपने पति की रक्षार्थ वैदिक आदर्श को अपनाया और विदेशियों को ये बता दिया कि वेदों के आदर्श केवल कोरी कल्पना ही नही हैं और ना ही ये इतने पुराने पड़ गये हैं कि अब इन्हें कोई अपनाने या मानने वाला ही नही रहा है। रानी की विवेकशीलता और बौद्घिक चातुर्य को देखकर शत्रु भी दांतों तले जीभ दबाकर रह गया। शत्रु ने भारतीय नारी से कभी ये अपेक्षा ही नही की होगी कि वह इतनी साहसी भी हो सकती है।

यहां हम तनिक विचार करें। अलाउद्दीन का मजहब कहता था कि काफिरों की पत्नियां तुम्हारा धन हैं, उन्हें लूटो और उनका उपभोग करो। इसलिए उसके मजहब के अनुसार किसी की पत्नी छीनना अन्याय या पाप नही था। जबकि राजा का धर्म कहता था कि पत्नी पति की पोष्या है और उसके सतीत्व एवं पतित्व की रक्षा करना उसका धर्म है। यदि कोई पति अपनी पत्नी के सतीत्व एवं पतित्व की रक्षा नही कर पाता है, तो उसे कायर माना जाता है, और ऐसा न करने से उसे पाप लगता है। बात स्पष्ट है कि एक का धर्म रानी को छीनने की आज्ञा दे रहा था, तो दूसरे का धर्म उसकी रक्षा करने की आज्ञा दे रहा था। अत: टकराव होना अवश्यम्भावी हो गया। राजा ने रानी को ‘न देने’ का निर्णय लिया। समस्त राज्य की प्रजा भी राजा के निर्णय के साथ रही।

जहां भी हिन्दुओं को ये निश्चित हो जाता कि पराजय हो जायेगी, महिलाएं म्लेच्छों की बांदियाँ बनाने से मर जाना उपयुक्त समझती थीं हमारा इतिहास ऐसी, वीरांगनाओं रूपी हिन्दू महिलाओं के रक्त से सनी घटनाओं से भरा पड़ा है, जिन्हें एक राष्ट्रीय षड़यंत्र के अंतर्गत या तो उजागर नहीं होने दिया जाता अथवा उन्हें तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है…

जब अकबर (जिस के हरम में 5 हजार महिलाएं थीं) ने चित्तौढ़ पर आक्रमण किया था तो वहाँ भी लगभग 300 महिलाओं ने जौहर किया था. 

अकबरनामा, खंड 2, पृष्ठ 442

आज भारत और नेपाल तेराई क्षेत्र में जो थारु  कबीले के नाम से जाने जाते हैं, उस के पीछे भी परोक्ष रूप से जौहर का हाथ है जब एक वृद्ध सिसोदिया राजपूत राजा को लगा कि मुसलामानों से युद्ध में पराजय लगभग निश्चित है तो उस ने वीरगति को प्राप्त होने का निर्णय कर लिया और युद्ध क्षेत्र न छोड़ने का निर्णय किया किन्तु अपनी सुन्दर पुत्रियों को वो मुसलमानों के हाथों से बचाना चाहता था उसने अपने कुछ विश्वसनीय क्षत्रियों और भील सैनिकों के साथ अपनी पुत्रियों को हिमालय में बसे अपने प्रियजनों के पास जाने के लिए रवाना कर दिया दुर्भाग्य वश बीहड़ जंगलों में मलेरिया तथा अन्य व्याधियों से अधिकतर योद्धयों की मृत्यु हो गयी जब अंतिम राजपूत मर गया तो इन राजकुमारियों ने अपने भील रक्षकों से कहा कि वे इन्हीं तराई के वनों में भीलों से विवाह कर के बस जायेंगी उन्होंने शर्त रखी कि उनके वंश में सदा महिलाएं ही प्रधान होंगी वे भोजन तो पकाएँगी किन्तु परोसेंगी नहीं आज भी उनमें ये परंपरा है कि महिलाएं भोजन थाल में रख कर पुरुषों की ओर पाँव से सरका देती हैं!

कभी कभी इन वीरांगनाओं का भाग्य इन का साथ नहीं देता था, सन् 1634 में जब शाहजहाँ की सेना बुंदेला विद्रोह को कुचल रही थी, तब जुझार सिंह बुंदेला के ओरछा क्षेत्र से मुसलामानों द्वारा कई महिलाओं को बंदी बना कर उनसे बड़ी बर्बरता से व्यवहार किया गया था, जुझार सिंह अपने चौरागढ़ के दुर्ग से बहुत सी महिलायों के साथ दक्षिण की ओर भाग निकला जब उनके घोड़े बिदक गए तो जुझार सिंह ने उन महिलाओं को मार दिया और बची हुई महिलाओं को लेकर गोलकुंडा पहुंचा अभी वहाँ महिलाएं जौहर पूरा नहीं कर पाई थीं जब मुसलमान पहुँच गए कुछ ने अपने को तलवार और खंजर से घायल कर लिया था मुग़ल इन घायल महिलाओं को भी उठा कर ले गए!
Cambridge history of India, Vol. 4, page 195

अमीर खुसरो, जिसे नेहरु से ले कर आज तक के सब बुद्धिजीवी, एक षड़यंत्र के अंतर्गत इस्लाम के उदार मुखौटे के रूप में प्रस्तुत करते हैं, हमें सन् 1301 में मुसलामानों द्वारा रणथम्बौर पर आक्रमण के संबंध में बताता है कि मुसलमान काफिरों के दुर्ग पर बड़े बड़े पत्थर फेंक रहे थे, जिस से कि हिन्दू भयभीत होने लगे थे एक माह तक दुर्ग को मुसलामानों ने घेरे रखा. हिन्दुओं को भोजन की इतनी कमी हो गई कि अन्न का एक दाना, सोने के दो टुकड़ों के एवेज में मिलता था!

” एक रात, राय (राजा) ने पर्वत के शिखर पर अग्नि जलाई और अपनी स्त्रियों तथा अपने प्रियजनों को उस में झोंक दिया और अपने कुछ स्वामिभक्त सेवकों के साथ मुसलामानों पर हमला कर दिया और मारा गया इस खुशकिस्मती के दिन रणथम्बौर का सशक्त दुर्ग घृणित राय के संहार से जीत लिया गया.”

Elliot and Dowson, Volume – 3, pp 72 – तारीख ऐ अल्लाई 

सुल्तान अबुल मुजाहिद मोहम्मद शाह के सैनिकों ने जब सुल्तान के भतीजे बहाउद्दीन को पकड़ने के लिए काम्पिल्य को घेर लिया (जो वहाँ के राजा की शरण में था) तो अफ्रीका से आया हुआ इब्न बतूता लिखता है:

“जब उस काफिर (हिन्दू राजा) ने अपने ऊपर आये संकट को भांप लिया उसका अनाज का भण्डार लगभग रिक्त था और उसे भय था कि मुसलमान उसे बंधक बना लेंगे उस ने बहाउद्दीन से कहा, “तुम स्थिति को देख ही रहे हो. मैंने अपने कुल के साथ मरने का निर्णय कर लिया है. तुम उस (हिन्दू राजा का नाम लेते हुए) राजा की शरण में चले जाओ, वो तुम्हारी सुरक्षा करेगा”. उस ने किसी को उसे राह दिखाने के लिए भेज दिया फिर उस ने अग्नि जलाई और अपनी पत्नी और पुत्रिओं से कहा,”मैं मरने जा रहा हूँ. तुम में से जो चाहें वो भी ऐसा कर सकते हैं”. इसके पश्चात्, सभी महिलाओं ने स्नान किया, अपने शरीर पर चन्दन का लेप लगाया, भूमि को चूमा और अग्नि में कूद गयीं वे सब मर गयीं!
राजा के मंत्री और मुखियाओं की महिलाओं ने भी यही किया इस के उपरान्त राजा ने स्नान किया, चन्दन का लेप लगाया, अपने अस्त्र शस्त्र उठाए और कवच के बिना युद्ध के लिए चल पड़ा उस के सभी सेवकों ने भी उस का अनुसरण किया वे तब तक लड़ते रहे जब तक कि मर नहीं गए. नगर के निवासियों को बंधक बना लिया गया राजा के 11 बेटे भी बंधक बना लिए गए, सुल्तान ने उन्हें मुसलमान बना दिया!”
The travels of Ibn Batuta

इन मुसलमान शासकों का घिनौना रूप छिपाने के लिए एक कुतर्क दिया जाता है कि राजपूत अपने झूठे अहंकार के चलते सती अथवा जौहर जैसे कृत्य करते थे इस का खंडन तारीख ऐ फ़िरोज़ शाही में मिल जाता है इस का लेखक अब्बास खान लिखता है कि –

“जब काफिर पूरण मल को पता लगा कि उस के पड़ाव को सुल्तान ने घेर लिया है तो वो अपनी प्रिय पत्नी रत्नावली के पास गया और उस का गला काट दिया इसके पश्चात उसने अपने साथियों से भी ऐसा ही करने को कहा उन्होंने अपनी महिलाओं का वध कर दिया. इतने में अफगानों ने हिन्दुओं को घेर लिया और चारों ओर से उन्हें मारना आरम्भ कर दिया काफिरों ने खाड़ी के सूअरों की भांति वीरता दिखाई पर शीघ्र ही मार दिए गए उनकी जो महिलाएं और प्रियजन बच गए थे, उन्हें बंदी बना लिया गया इन में से पूरण मल की एक पुत्री और उस के भाई के तीन पुत्रों के अतिरिक्त सभी को मार दिया गया बाद में पूरण मल की बेटी एक बाज़ीगर को दे दी गयी ताकि उसे बाजारों में नचाया जा सके, तीनों लड़कों को हिजड़ा बना दिया गया ताकि उस का कुल नष्ट हो जाए!”

एक और कुतर्क जिस से इस्लामी शासकों की बर्बरता को कम कर के दर्शाने का प्रयत्न होता है वो है कि शत्रु को मारना तो युद्ध नीति के अंतर्गत है, इस में सम्प्रदाय को नहीं लाना चाहिए यदि इन शासकों ने ये दुर्व्यवहार सम्प्रदाय को ध्यान में न रखते हुए किया हो तो इसे उचित माना जा सकता है किन्तु वास्तविकता ये है कि ये शासक यहाँ शासन नहीं जिहाद करने आये थे और इसे पूरे गर्व से अपनी ही लेखनी से स्वीकार भी करते थे, इस कुतर्क का उत्तर भी मुसलमान इतिहासकारों की लेखनी से ही मिल जाता है.

प्रस्तुत घटना शाह जहां के शासन काल की है जब औरंगजेब ने कल्याणी पर आक्रमण किया था. मुग़ल सेना ने एक दुर्ग को घेर लिया था, उल्लेख इस प्रकार है:

घिरे हुए सैनिकों ने कड़ा संघर्ष किया और बानों और रॉकेटों की वर्षा की, हथगोले, मिटटी तेल के गोले और जलती हुई वस्तुएं शाही सेना पर गिराई, लेकिन आक्रमणकारी वीरता से आगे बढ़ते रहे क्योंकि जीत निश्चित थी. इस अवसर पर, दिलावर हब्शी, जो इस दुर्ग की सुरक्षा आदिल खान की ओर से अपने 2500 सैनिकों के साथ कर रहा था अपनी स्थिति को भांप गया उसने क्षमा याचना के लिए एक पत्र भेज कर आत्म समर्पण का प्रस्ताव दिया क्योंकि सभी सैनिक मुसलमान थे, सभी को अपनी संपत्ति, पत्निओं और प्रियजनों सहित जाने की अनुमति मिल गयी राजकुमार औरंगज़ेब ने दुर्ग पर अधिकार कर लिया!

कुछ ऐसा ही तैमुर लंग ने किया था. उसकी आत्मकथा मल्फुज़ती तैमूरी में लोनी  नामक दुर्ग पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त वो उल्लेख करता है:

बहुत से राजपूतों ने अपनी पत्नियों और बच्चों को अपने घरों में ले जाकर उन्हें जला दिया और इसके उपरान्त वो युद्ध क्षेत्र में डट गए और मारे गए दुर्ग के अन्य सैनिकों  ने भी युद्ध किया, जिन में से कई मारे गए और कई बंधक बना लिए गए अगली प्रातः मैंने आदेश दिया कि मुसलमान सैनिकों को क्षमा कर दिया जाए और काफिरों को तलवार से नरक में भेज दिया जाए, मैंने ये आदेश भी दिया कि आस पास के घरों में से सय्यदों, शेखों और मुसलामानों के घरों को सुरक्षित रख के अन्य सभी घरों को लूट लिया जाए और दुर्ग को नष्ट कर दिया जाए, ऐसा ही किया गया और हमें बड़ी मात्र में लूट का माल मिला!

यहाँ दिए गए सभी उल्लेख मुसलमान इतिहासकारों के लिखे हुए हैं ये आठवीं शताब्दी से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक की घटनाओं को दर्शाते हैं कि किस प्रकार हिन्दुओं को इस्लामी जिहाद का सामना करना पड़ा और आज भी वामपंथी, सेक्यूलर कहाते मुस्लिम तुष्टिकारक इतिहासकारों और सरकारों के कारण करना पड़ रहा है जिस जौहर और सती प्रथा को हिन्दू धर्म की रूढ़िवादिता कह कर हिन्दू धर्म को त्रुटिपूर्ण ढंग से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत किया जा रहा है, वो वास्तव में इस्लाम की देन है आज परिस्थितियां भिन्न हैं इसलिए हमारा सौभाग्य है कि हमारी बहनों और बेटियों को ऐसे नकारात्मक उपाय करने की आवश्यकता नहीं है.. !!

http://googleweblight.com/?lite_url=http://purusharshbh.blogspot.com/2010/12/blog-post_5489.html?m%3D1&ei=S874uTUY&lc=en-IN&s=1&m=672&ts=1439351074&sig=APONPFmsXJJNJW7zGxELDOTMRB5R23dLBw

उपरोक्त इतिहास व बलिदानों के सानिध्य में देख कर तथा उन तथाकथित सरकारी लेखकों एवं इतिहासकारों द्वारा मनमाफिक इस्लामिक तुष्टिकरण हेतु वीभत्स तरीकों से की जा रही व्याख्याऐं क्या इतिहास का प्रमाणिक वर्णन कहा जा सकता है…??

या यूं कह लें कि सत्यता, वास्तविक इतिहास व बलिदानों  को भुलाकर, वीभत्स रूप से तथाकथित लेखकों एवं इतिहासकारों द्वारा जानबूझकर इस्लामिक तुष्टिकरण हेतु ही कुत्सित मानसिकता के तहत प्रगतिशील वामपंथी तरीकों से की जा रही व्याख्याऐं क्या भारतीय इतिहास का प्रमाणिक सच्चा वर्णन कही जा सकती हैं…??

जिज्ञासाऐं

मित्रों,  इस आलेख को संपूर्ण करने हेतु जहाँ जहाँ से लेकर, संदर्भ और कथन यहां डाले गये हैं पूरी ईमानदारी से मूल लिंक डालकर यह लेख यथासंभव संकलन व संपादन कर मैनें प्रस्तुत किया है।

Dr. Sudhir Vyas Posted from WordPress for Android

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2 Comments Add yours

  1. सत्यता, वास्तविक इतिहास व बलिदानों को भुलाकर, वीभत्स रूप से तथाकथित लेखकों एवं इतिहासकारों द्वारा जानबूझकर इस्लामिक तुष्टिकरण हेतु ही कुत्सित मानसिकता के तहत प्रगतिशील वामपंथी तरीकों से आज तक की जा रही व्याख्याऐं वास्‍तविक भारतीय इतिहास से भातीयों को दूर रखने का ही षंडयंत्र रहा है लेकिन अब इसे खतम करना होगा व हमारी नई पिढ़ी को वास्‍तविक इतिहास से वाकिफ करना हमार परम कर्तव्‍य व धर्म है।

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