सिद्दी / Siddi ☞ भारतीय इतिहास के अबीसीनीयाई लड़ाके ↦ आधुनिक भारत के Afro Indian अनुसूचित जनजाति (ST)


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सदियों से भारत में रहते “African by origin, Indian by nationality and Kannad, Marathi, Gujarati by speech” वाले भारतीय अफ्रीकी कबीलों  यानि Afro Indian Tribes के बारे में कौन कौन जानता है..जो भारत में आधिकारिक ST श्रेणी में भी हैं, और तीनो धर्मों में बंटें भी हैं यानि अधिसंख्य लोग मुस्लिम है, कुछ रोमन कैथोलिक ईसाई हैं और बहुत कम लोग हिंदू हैं , सबसे मजेदार बात मुगल साम्राज्य में इनका अपना झंडा और मनसबदारी थी…
हाँ ये भी बता दूँ कि अंडमान निकोबार द्वीप समूह के पाषाणकालीन समय में जमे अफ्रीकी मूल के “सेंटीनेल, जारवा, सिर्का , ग्रेट अंडमानी, जांगिल, ओंगे आदि”  कबीलों से अलग हैं ये Afro Indo Tribes ..  कुछ इतिहासकारों का मानना है कि लाखों अफ़्रीकी लोगों ने समुद्र पार कर इधर का रुख़ किया था, अफ़्रीकी-भारतीय लोग सिद्दी (शीदि) कहलाते हैं, ग़ुलाम के रूप में अफ़्रीकी लोगों के बारे में तो शायद सबको जानकारी हो लेकिन भारत में रहने वाले अफ़्रीकी लोगों के बारे में लोगों को कम ही जानकारी है सो उनका ही यथासंभव वर्णन करने की कोशिश है यह लेख! 

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मित्रों ये हैं सिद्दी / सिदी / Siddi या Sheedi लोग, सिद्दी या सिदी भारत और पाकिस्तान का एक मानव समुदाय है जिसका मूल अफ्रीका है भारत में ये मुख्यतः गुजरात में रहते हैं कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश व महाराष्ट्र में भी इनका अस्तित्व है तथा वहाँ इन्हे सिद्धि, Sheedi, हब्शी या मकरानी के रूप में जाना जाता है सिद्दी, भारत और पाकिस्तान में रहने वाले एक जातीय समूह हैं।

ये कबीलाई सदस्य हैं  जो दक्षिण पूर्व अफ्रीका से संबंधता रखती बंटू जनजाति के लोग हैं  इनमें से  कुछ के पूर्वज व्यापारी, नाविक और भाडे के – गुलाम सैनिक कारिंदे थे और बहुतों के पूर्वज दूसरों के सेवक / गिरमिटिया गुलाम थे !

आज की तारीख में पाकिस्तान के बलोचिस्तानी क्षेत्र की मकरान पर्वत श्रृंखला और कराची में तथा भारत के कर्नाटक, गुजरात, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र राज्यों  में संयुक्त रूप से (वर्तमान में ) लगभग 70,000-85,000 सिद्दी जनजाति के लोगों की कुुल जनसंख्या का अनुमान है!
यह सिद्ध साबित ऐतिहासिक तथ्य है कि तत्कालीन अरब ,तुर्क और पुर्तगाली व्यापारियों द्वारा भी सिद्दी समुदाय को गुलाम -दास और भाडे के सैनिकों / Mercenaries के रूप में भारतीय उपमहाद्वीप के लिए लाया गया था।

सिद्दी नाम के मूल पर परस्पर विरोधी परिकल्पन रही हैं जिनमें से एक प्रमुख सिद्धांत यह है कि सिदी या सिद्धी शब्द साहिबी / sahibi से निकला है जिसका कारण यह है कि आधुनिक भारत और पाकिस्तान में शब्द साहिब बोला जाता है और इस साहिब शब्द के लिए इसी तरह का उत्तरी अफ्रीका में सम्मान का एक अरबी शब्द भी है।
एक दूसरा सिद्धांत यह है कि सिद्दी शब्द अरब जहाजों के कप्तानों के Title / शीर्षक से लिया गया है क्योंकि इन अरबी जहाजों के कप्तानों को सईद/सैय्यद/Sayyid के रूप में जाना जाता था।

इसी तरह एक और सिद्धांत है कि सिदीयों  के लिये हब्शी (अल हबाशा, हबश के लोगों के लिए अरबी शब्द) एक और शब्द है, यह भी पहली बार भारतीय  उपमहाद्वीप में ही सिद्दी दास – गुलामों को दिया गया है ,वास्तविकता में हब्शी शब्द को अरबियों द्वारा Abyssinian / अबीसीनीयाई / इथियोपियाई जहाजों के कप्तानों के लिए या वहाँ के नागरिकों के संदर्भों में ही काम में लिया जाता था!

पहले पहल सिदीयों को भरूच बंदरगाह पर 628 ईस्वी में भारत में लाया गया था,फिर कई अन्य लोगों के समूहों को 712 ईस्वी में भारतीय उपमहाद्वीप के पहले अरब इस्लामी आक्रमणों के साथ लाया गया ,इसमें सैनिक समूह मुहम्मद बिन कासिम के अरब सेना के साथ भाडे के सैनिकों  के रूप में आया था ऐसा इतिहास में भी दस्तावेजी उल्लेख किया गया है इन सिदी / अबीसीनीयाई / हब्शी सैनिकों और दासों को Zanjis / जानिस यानि जानिसार अर्थात हुकुम पर जान लुटा देने वाला कहा जाता था।

भारत में मुगलों के उदय के पहले तुर्कों के गुलामवंश की दिल्ली सल्तनत काल में “जमाल-उद-दीन याकूत” नामक सिदी हब्शी सुल्तान अल्तुतमिश की शहज़ादी रजिया सुल्ताना (1205-1240 ई.) का एक करीबी विश्वासपात्र था जो कि एक प्रमुख सिद्दी गुलाम से बना अमीर पद वाला लडाकू मनसबदार रईस था, इसमें कहा जाता है कि याकूत राजकुमारी रजिया सुल्तान का प्रेमी हो सकता है कुछ सिदी समुदाय बारहवीं शताब्दी के बाद जफ्फराबाद,  मुरूंद जंजीरा द्वीप पर और वन क्षेत्रों में छोटे सिदी समाजों की स्थापना के लिए गुलामी से भाग निकले और ऐसा ही स्थापित एक पूर्व द्वीपीय राज्य मुरूद जंजीरा या हब्शन / Habshan था (यानी हब्शी/Habshis की भूमि) और य़े हब्शी शब्द मूल रूप से सेमेटिक शब्द है । इसके कई रूप है मसलन हब्शी, हबशी, हबसा आदि। अरबी में इसका एक रूप है हबासत जो सेमेटिक धातु हब्स्त का रूप है। आमतौर पर यह शब्द उत्तर पूर्वी अफ्रीकी समुदाय के लोगों के लिए इस्तेमाल होता था। ख़ासतौर पर इथियोपिया, इरिट्रिया आदि के संदर्भ में। अरबी में एक शब्द है अल-हबाशात यानी इथियोपिया के लोग, अलहबाशा ने ही यूरोपीय भाषाओं में जाकर अबीसीनिया का रूप लिया। गौरतलब है कि इथियोपिया का पुराना नाम अबीसीनिया ही था। गौरतलब है कि ग़ुलाम वंश की रजिया सुल्तान के प्रेमी का नाम याकूत था जो एक ‘अबीसीनियाई ग़ुलाम’ ही था, तेरहवीं सदी में भारत स्थानीय राजाओं के महल में भरपूर से उन अबीसीनीयाई, सिदी ‘ग़ुलामों’ का चलन था, जिन्हें ‘हब्शी’ कहा जाता था, मुस्लिम देश अरब और अफ्रीका से भारत के पुराने व्यापारिक रिश्ते थे ही सो इन्हीं देशों से भारत में ये ग़ुलाम लाये जाते थे। अफ्रीका से आने वाले ग़ुलाम को ही ‘हब्शी’ कहा जाता था, इनका क़द ऊंचा क़द और शरीर की गठन सुगढ़ होती थी इनका रंग गहरा और बाल घुंघराले होते थे हिन्दी साहित्य और इतिहास में ‘हब्शी’ शब्द का प्रयोग ही इनके संदर्भो में मिलता है।

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Flag of the Siddis from Murud-Janjira an important vassal of the Mughal Empire.

ऐसी ही एक दूसरी प्रसिद्ध शख्सियत यानि
” मलिक अंबर” , जो भारतीय इतिहास में एक प्रमुख सिदी / सिद्दी हब्शी व्यक्तित्व है,उसे “मराठों के सैन्य गुरु” के रूप में भी माना जाता है, और इतिहास ने गहराई से मराठा लोगों के साथ मलिक अंबर सिद्दी हब्शी को संबद्ध किया गया है !

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मलिक अम्बर (जन्म: 1549 – मृत्य: 13 मई 1626)

“मलिक अम्बर या अम्बर मलिक” एक हब्शी ग़ुलाम था। वह तरक़्क़ी करके वज़ीर के पद तक पहुँचा था। उसने पहली बार 1601 ई. में उस समय नाम कमाया, जब उसने मुग़ल सेना को हरा दिया था। मलिक अम्बर एक ‘अबीसीनियायी’ था और उसका जन्म ‘इथियोपिया’ में हुआ था। उसके प्रारम्भिक जीवन की विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है। ऐसा अनुमान है कि उसके निर्धन माता-पिता ने उसे बग़दाद के ग़ुलाम-बाज़ार में बेच दिया था। बाद में उसे किसी व्यापारी ने ख़रीद लिया और उसे दक्कन (दक्षिण भारत) ले आया, जहाँ की समृद्धि उस काल में बहुत लोगों को आकर्षित करती थी। 1626 ई. में मलिक अम्बर की मृत्यु हुई।

मलिक अम्बर अहमदनगर में बस गया था। चाँद सुल्तान की मृत्यु के बाद वह अपनी योग्यताओं के बल पर तरक़्क़ी करके अहमदनगर के वज़ीर के पद पर पहुँच गया वहाँ का राज्य प्रबन्ध अनेक वर्षों तक उसके हाथ में रहा वह जितना योग्य सिपहसलार था, उतना ही योग्य राजनेता भी था उसमें नेतृत्व के सहज गुण थे और मध्यकालीन भारत के सबसे बड़े राजनीतिज्ञों में उसकी गणना की जाती थी, मलिक अम्बर ने अहमदनगर राज्य की उत्तम शासन व्यवस्था की थी इसके अलावा उसने राज्य में मालगुज़ारी की व्यवस्था भी बड़े सुन्दर ढंग से की, सारी कृषि योग्य भूमि को उर्वरता के आधार पर चार श्रेणियों में विभाजित कर दिया और लगान स्थायी रूप से निश्चित कर दिया गया, जो नक़द लिया जाता था। लगान की वसूली राज्य के अधिकारी गाँव के पटेल से करते थे।

मलिक अम्बर ने मुर्तज़ा निज़ामशाही के प्रभावशाली सरदार चंगेज़ ख़ाँ के यहाँ काफ़ी तरक़्क़ी की थी। जब मुग़लों ने अहमदनगर पर आक्रमण किया, तो मलिक अम्बर अपना भाग्य आजमाने के लिए बीजापुर चला गया लेकिन जल्दी ही वह वापस आ गया और चाँदबीबी के विरोधी हब्शी, अबीसीनियायी दल में सम्मिलित हो गया, अहमदनगर के पतन के बाद अम्बर ने एक निज़ामशाही वंश के शाहज़ादे को ढूँढ निकाला और बीजापुर के शासक की मदद से उसे मुरतजा निज़ामशाह द्वितीय के नाम से गद्दी पर बैठा दिया वह स्वयं उसका पेरुबा (संरक्षक) बन गया, पेशवा का पद अहमदनगर की रियासत में पहले से प्रचलित था अहमदनगर के पतन और मुग़लों द्वारा बहादुर निज़ाम शाह की गिरफ्तारी के बाद इस बात की पूरी सम्भावना थी कि अहमदनगर रियासत के टुकड़े हो जाते और पड़ोसी रियासतें उन पर अधिकार कर लेतीं, किन्तु मलिक अम्बर के रूप में एक योग्य व्यक्ति के उदय की वजह से ऐसा नहीं हो सका और मलिक अम्बर ने काफ़ी बड़ी मराठा सेना (बारगी) इकट्ठी कर ली मराठे तेज़ गति वाले थे और दुश्मन की रसद काटने में काफ़ी होशियार थे सो मलिक अम्बर ने मराठों को गुरिल्ला युद्ध में भी निपुणता प्रदान कर दी थी यह गुरिल्ला युद्ध प्रणाली दक्कन के मराठों के लिए परम्परागत थी और वे इसमें और भी निपुण हो गए, लेकिन मुग़ल इससे अपरिचित थे, मराठों की सहायता से मलिक अम्बर ने मुग़लों को बरार, अहमदनगर, और बालाघाट में अपनी स्थिति सुदृढ़ करना कठिन कर दिया था!

मुग़ल सेना दौलताबाद पर अधिकार करना चाहती थी, जो कि अहमदनगर सल्तनत की राजधानी थी। 1601 ई. में राजधानी यहीं स्थानान्तरित कर दी गई थी। उसी के उद्योग से अहमदनगर पर क़ब्ज़ा करने के जहाँगीर के सारे प्रयत्न विफल हो गए। उसने अहमदनगर को बादशाह जहाँगीर के पंजे से बचाने की जी तोड़ कोशिश की, लेकिन 1616 ई. में जब बहुत बड़ी मुग़ल सेना ने अहमदनगर पर चढ़ाई की तो मलिक अम्बर को आत्म समर्पण करना पड़ा। उस समय शाहज़ादा ख़ुर्रम (शाहजहाँ) मुग़ल सेना का नेतृत्व कर रहा था।

” मलिक अम्बर ने बड़े सम्मान के साथ जीवन बिताया और 1626 ई. में बहुत वृद्ध हो जाने पर उसकी मृत्यु हुई उसकी मृत्यु के बाद ही अहमदनगर सल्तनत को मुग़ल साम्राज्य में सम्मिलित किया जा सका। ”

“फ़तेह ख़ाँ” जो मलिक अम्बर का पुत्र था,वह अहमदनगर के निज़ामशाही वंश का वर्षों तक वज़ीर रहा, फ़तेह ख़ाँ के अन्दर अपने पिता के समान वफ़ादारी नहीं थी। वह अहमदनगर के उपान्तिम शासक मुरतज़ा निज़ामशाह द्वितीय का वज़ीर था।फ़तेह ख़ाँ ने 1630 ई. में निज़ामशाह की हत्या कर उसके युवा पुत्र हुसेन को अहमदनगर का शासक घोषित कर दिया।1631 ई. में उसने बड़ी बहादुरी के साथ मुग़ल सम्राट शाहजहाँ की फ़ौज से दौलताबाद दुर्ग की रक्षा की।

मलिक अम्बर ने दौलताबाद की बड़ी ही मज़बूत क़िलेबंदी की थी , मुग़ल सम्राट शाहजहाँ ने 1633 ई. में फ़तेह ख़ाँ को लालच दिया।लालच में आकर फ़तेह ख़ाँ ने दौलताबाद का दुर्ग मुग़ल सम्राट के हवाले कर दिया।शाहजहाँ ने अहमदनगर के अन्तिम निज़ामशाह हुसेन को ग्वालियर के क़िले में आजीवन क़ैद रखा , फ़तेह ख़ाँ मृत्यु पर्यन्त मुग़ल बादशाह की सेवा में ही रहा।

भारत में प्रमुख सिद्दी इलाके –

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(1) आंध्रप्रदेश और हैदराबाद के सिदी/सिद्दी –

18 वीं सदी में,सिद्दी समुदाय अक्सर आसिफ जाही निजाम की अनियमित सेना के रूप में घुड़सवार सेना गार्ड की सेवा करते थे , जो अरब सिद्दी प्रवासी द्वारा हैदराबाद राज्य में स्थापित किया गया था।
आसिफ जाही निजाम रियासत में उन्होने पुरस्कार के साथ संरक्षण और पारंपरिक मरफ़ा संगीत की जबरदस्त लोकप्रियता हासिल की और सरकारी समारोहों और समारोह के दौरान प्रदर्शन किया, हैदराबाद की सिद्दीयों को पारंपरिक रूप से सिद्दी रिसाला के नाम से जाना जाता है आज भी वो एसी गार्ड (अफ्रीकी कैवेलरी गार्डस) मस्जिद रमानिया / मस्जिद रहमानी के निकट क्षेत्र में रहते है।

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(2)  कर्नाटक के सिद्दी –

कर्नाटक के सिद्दी भी भारत में एक अनुसूचित जनजातीय समूह हैं, इसके सदस्यों को पुर्तगाली व्यापारियों ने दास के रूप में शताब्दियों पहले भारतीय उपमहाद्वीप में लाया गया है ये दक्षिण पूर्व अफ्रीका के बंटू जनजातीय लोग रहे हैं जिसमें से अधिकतक कर्नाटक में सिर्फ 50,000 ही हैं जो कतई मजबूत सिद्धि आबादी नहीं है।
कर्नाटक में ये सिद्दी येलापुर, हलियाल, अंकोला, जोईडा,मुंडगोड और उत्तर कन्नड़ सिरसी तालुका के आसपास वनों में खेती करते और वन उपज उपजाते हुऐ रहते है और बेलगाम और धारवाड़ जिले के कालघाटगी के खानपुर में शहरी केंद्रित स्थलों पर रह रहे हैं, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कई सिद्धी परिवार पाकिस्तान के लिए चले गए और वे वहाँ सिंध, कराची के क्षेत्रों में बस गये जिनका मुख्य काम रंगरेजी और मछली पकडने का है, कर्नाटक के सिद्दी मुख्यतया रोमन कैथोलिक ईसाई हैं और उनके ही बीच कुछ सिद्दी हिंदू भी हैं।

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कर्नाटक के सिद्दीयों पर बनी ये कीनीयाई -.नाईजीरियाई सहयोग की डॉक्यूमेंटरी देखें जो वहां की मूल बंटू जनजाति के अफ्रीकियों द्वारा ही निर्मित है, लिंक नीचे प्रदर्शित है।

https://m.youtube.com/watch?v=UD7sp-L9lUk

पाकिस्तान के सिद्दी लोगों पर बनी डॉक्यूमेंटरी का 9 मिनट का प्रमुख हिस्सा देखें जिसका लिंक नीचे दिया गया है।

https://m.youtube.com/watch?v=Lxaz6hBxf3I

हाल ही में, कर्नाटक के येलापुर इलाके के सिद्दी गांव के लोग संगीतकार स्नेहा खानवलकर के साउंडट्रैक ‘Yere’ से सुर्खियों में आ गए हैं और यह एमटीवी पर हिट है, बहुत मजेदार संगीतमय गाना है और येलापुर के सिद्दी गांव में ही उनके बीच फिल्माया गया है आप भी देखें, लिंक नीचे है

https://m.youtube.com/watch?v=kXhdcynqWN4

(3) गुजरात के सिद्दी  –

हमारे भारतदेश के गुजरात राज्य का जम्बुर पिछड़ा हुआ गाँव है। यहाँ के लोग पड़ोस के किसानों के लिए मज़दूरी का काम करते हैं, केंद्र और राज्य सरकार भी ग़रीब लोगों की सहायता के लिए लागू कार्यक्रमों के तहत इनकी सहायता करती है तथा सरकारी अनुसूची के तहत इन्हे आदिवासी जनजाति यानि आरक्षित ST श्रैणी में मानती है।

जम्बुर गाँव की स्थापना सिदी सैनिकों के परिवारों ने की थी, जो इस इलाक़े के पूर्व नवाब के लिए काम करते थे ,भारत के कई राजा-महाराजाओं ने अफ़्रीकी लोगों को अपने निजी अंगरक्षकों, नौकरों और संगीतकारों के रूप में तैनात किया था और देश के कई हिस्सों में तो सिदियों ने काफ़ी प्रगति की और सैनिक जनरल और कई बार तो राजा भी बने, ज़्यादातर सिदियों की तरह जम्बुर के लोग सूफ़ी मुसलमान हैं, जो मानते हैं कि भगवान की पूजा संगीत और नृत्य के ज़रिए होती है, जम्बुर के ड्रम बजाने वाले प्रमुख व्यक्ति युसूफ़ बताते हैं कि डमाल अफ़्रीका से आया। युसूफ़ अंधे हैं। वे बताते हैं कि ड्रम बजाने की कला पिता से पुत्र के पास आती है। वे कहते हैं कि यह भगवान की ओर से मिला उपहार है।

भारत के पश्चिमी तट पर जम्बुर (गुजरात का एक गांव) जैसे गाँव में ये लोग अभी भी रह रहे हैं। इनके पूर्वज अफ़्रीकी थे जिन्हें ग़ुलाम के रूप में इस उपमहाद्वीप में लाया गया था। बाक़ी के लोग लड़ाके, व्यापारी और नाविक के रूप में यहाँ आए थे। पूर्वी व दक्षिणी अफ़्रीका और भारत में गुजरात के साथ समुद्री व्यापार दो हज़ार साल पहले स्थापित हुआ था , इसी जम्बुर गाँव के एक प्रमुख सिदि हसन भाई का कहना है कि उनके पिता मोज़ाम्बिक से आए थे उन्हें पुर्तगाली सेना में काम करने के लिए लाया गया था, जो पास के एक बंदरगाह का नियंत्रण करती थी , हालांकि ज़्यादातर सिदियों को अपने पूर्वजों के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं पता,इस पर हसन कहते हैं कि बच्चे अफ़्रीका के बारे में कुछ नहीं जानते और जो अफ़्रीका के बारे में जानते थे। वे अब दुनिया में नहीं रहे, जम्बुर के सिदीयों के कुछ चित्र नीचे प्रदर्शित हैं।

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मानवविज्ञानियों का मानना है कि नर्तकों की कला पारंपरिक अफ़्रीकी पूजा और भारतीय सूफ़ी परंपरा का मिश्रण है, इस समुदाय के पास अपनी जड़ों से जुड़े रहने का एक महत्वपूर्ण साधन है- डमाल या ड्रम. अन्यथा सिदी समुदाय ग्रामीण भारत के अन्य ग़रीब तबके से अलग नहीं है, इस इलाक़े में आने वाले लोग गाँव के संगीतकारों को पैसा देते हैं। लोगों से मिले पैसे को मुँह में दबाकर ये लोगों को शुक्रिया अदा करते हैं, सिदी और भारतीय मुसलमान सैकड़ों किलोमीटर दूर से जम्बुर की दरगाह पर आते हैं। कुछ लोग यहाँ आकर चमत्कार की उम्मीद करते हैं। जिन महिलाओं के बच्चे नहीं होते हैं, वे भी यहाँ इस उम्मीद में आती हैं कि उनका बाँझपन दूर हो जाएगा, मानसिक रूप से बीमार बच्चे भी ठीक होने की आस में यहाँ लाए जाते हैं !

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उपरोक्त चित्र में जम्बुर में नागारची बाबा की दरगाह है जिन्हें ड्रम मास्टर भी कहा जाता है। सिदियों का मानना है कि वे एक अरब थे, जिन्होंने 900 वर्ष पहले अफ़्रीका की यात्रा की थी और फिर भारत में रहने लगे ,यहीं एक अन्य सूफ़ी संत बावा गोर की दरगाह भी है। जो नाइजीरिया के मोती के व्यापारी थे।

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सिदी सईद मस्जिद,अहमदाबाद सिदी सईद मस्जिद को गुजरात राज्य के अहमदाबाद शहर में 1573 में बनवाया गया था और यह अहमदाबाद में मुगल काल के दौरान बनी आखिरी मस्जिद है।

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मस्जिद के पश्चिमी ओर की खिड़की पर पत्‍थर पर बनी जाली का काम पाया जाता है जो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है बाहर परिसर में पत्‍थर से ही नक्‍काशी और खुदाई करके एक पेड़ का चित्रांकन किया गया है जो उस काल की शिल्‍प कौशल की विशिष्‍टता को दर्शाता है , यह सिदी सईद मस्जिद अहमदाबाद शहर के व्‍यस्‍ततम इलाके में स्थित है।

भुज क्षेत्र,  गुजरात के सिद्दीयों पर एक महत्वपूर्ण वीडीयो लिंक नीचे है

https://m.youtube.com/watch?v=aFzK9dOt-KQ

गुजरात के दूसरे प्रमुख क्षेत्र के सिद्दीयों और उनके गांव पर आधारित 2 – 3 मिनट के वीडीयो लिंक नीचे हैं। 
People of Siddhi Village, Gujarat

https://m.youtube.com/watch?v=CORizSrk9Ks

Dancers of Siddi Village, Gujarat

https://m.youtube.com/watch?v=ceP5t5Bn_1A

Performance by Basheer Ahmed Siddi – हिंदी
https://m.youtube.com/watch?v=Z8OMrpeZh-E

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(4) महाराष्ट्र के मुरूद जंजीरा / मुरूंड द्वीप के सिद्दी और सिद्दी शासक –

मुरुद-जंजीरा भारत के महाराष्ट्र राज्य के रायगड जिले के तटीय गाँव मुरुड में स्थित एक किला हैं, यह भारत के पश्चिमी तट का एक मात्र किला हैं जो की कभी भी जीता नहीं गया यह किला 350 वर्ष पुराना है, स्थानीय लोग इसे अजिनक्या कहते हैं, जिसका शाब्दिक अर्थ अजेय होता है माना जाता है कि यह किला पंच पीर पंजातन शाह बाबा के संरक्षण में है , शाह बाबा का मजार मकबरा भी इसी किले में है।

यह किला समुद्र तल से 90 फीट ऊंचा है इसकी नींव 20 फीट गहरी है यह किला सिद्दी शासक सिदी जौहर द्वारा बनवाया गया था इस किले का निर्माण 22 वर्षों में हुआ था और यह किला 22 एकड़ में फैला हुआ है तथा इसमें 22 सुरक्षा चौकियां है।

ब्रिटिश, पुर्तगाली, शिवाजी, कान्होजी आंग्रे, चिम्माजी अप्पा तथा शंभाजी ने इस किले को जीतने का काफी प्रयास किया था, लेकिन कोई सफल नहीं हो सका, इस किले में सिद्दी शासकों की कई तोपें अभी भी रखी हुई हैं, जंजीरा का किला जाने के लिए ऑटोरिक्शा से मुरुड से राजपुरी जाना होता है, यहां से नाव द्वारा जंजीरा का किला जाया जा सकता है। एक व्यक्ति का नाव का किराया 12 रु. है और दर्शन समय समय: सुबह 7 बजे से शाम 6 से 7 के बीच यह किला शुक्रवार/ जुम्मे को अल़ दोपहर 12 से 2 बजे तक बंद रहता है।

Tourist Guide about Undefeated Siddis of Murud Janjira Fort in the Arabian Sea- Incredible India

https://m.youtube.com/watch?v=3hXbQ1Qf9Fg

A captivating devotional performance by Sidi Goma

https://m.youtube.com/watch?v=jYdR0ezNZ2o

Murud Janjira fort Info Part 1

https://m.youtube.com/watch?v=5pw8J2SOlxg

★★ अंत में यही कहूँगा कि प्रिय मित्रों हमें अपने देश को भली भांति जानने समझने की भी कोशिशें की जानी चाहिए, चंद महत्वपूर्ण जानकारियां अपने देश के बारे में ही ना रख कर और उसके उलट काल यात्राओं समेत अमेरिका यूरोप आदि पर बहस करने से हम ज्ञानी नहीं निपट मूर्ख ही कहलायेंगे क्योंकि वो लोग खुद का देश पूरी तरह जानते मानते हैं , बाकी सब जय है ..!!

वन्दे मातरम्

Dr. Sudhir Vyas Posted from WordPress for Android

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