शूद्र – कर्मानुसार अथवा जन्मना जाति ? ☞ इस्लाम एवं ब्रिटिशकाल की पैदाईश जन्मना जातिप्रथा


एक कटु सचाई यही है कि हिंदू धर्म,  वैदिक एवं सनातन धर्मकाल के अनुसार नहीं बल्कि सिर्फ पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार प्रारंभ में दो ही वर्ण थे, आर्य और दास।

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इन सब पाश्चात्य व्याख्याओं पर ही आधारित रह कर पलते दलित चिंतको, वामपंथी इतिहासकारों और मूल पाश्चात्य व्याख्याकारों के अनुसार ही “ब्राह्मण शास्त्राकारों से यह नहीं पता चलता कि शूद्र कौन थे और चौथा वर्ण कैसे बना।”

पाश्चात्य विद्वानों ने इसके बारे में कुछ अवश्य कहा है। वैसे तो उनमें भी आपस में कुछ मतभेद है परंतु निम्नलिखित बातों पर वे सहमत हैं –

वैदिक साहित्य के रचयिता आर्य थे।

आर्य भारतवर्ष के बाहर से आये और भारत को विजय किया।

उस समय भारतवर्ष के निवासी दास तथा दस्यु थे, वे आर्य जाति से भिन्न जाति के थे।

आर्य गोरे थे और दास तथा दस्यु सांवले थे।

आर्यों ने दासों तथा दस्युओं को जीत लिया जब दास दस्यु जीत लिए गये तब वे लोग दास बना लिए गये और शूद्र कहलाये।

आर्य लोग वर्ण (रंग) के पक्षपाती थे अतएव उन्होंने चातुर्वर्ण गोरी जातियों को काली जाति जैसे एक और दस्यु से भिन्न करने को बनाया।

ऋग्वेद 1-117-8 में कहा गया है कि अश्विन ने श्यव्या और रूसानी से ब्याह किया, श्यव्या काली और रूसानी गोरी थी।

ऋग्वेद 1-117-9 में अश्विन का रंग सुनहला बताया गया है। ऋग्वेद 2-3-9 में एक आर्य ने स्तुति की है कि हे भगवन्‌ मुझे गेहुंआ रंग का पुत्र न मिले। 

ऋग्वेद 10-31-11 के अनुसार कण्व ऋषि सांवले थे।

इसी तरह अथर्ववेद में आर्य दास का युग्म आर्यशूद्र में परिणत हो गया अत: शूद्र दास दस्यु के उत्तराधिकारी हैं किंतु यह मत निर्भ्रांत नहीं ,, उपर्युक्त स्थलों पर शब्द ‘आर्य नहीं किंतु अर्य (वैश्य) है’ ,  वेबर, भीमराव आम्बेडकर, ज़िमर और रामशरण शर्मा क्रमश: शूद्रों को मूलत: भारतवर्ष में प्रथमागत आर्यस्कंध, क्षत्रिय, ब्राहुई भाषी और आभीर संबद्ध मानते हैं, “शूद्र जनजाति” का उल्लेख डायोडोरस, टॉल्मी, और ह्वेनसांग भी करता है कि  “शूद्र में ‘संभवत:’ आर्य और अनार्य कर्मकरों के मिश्रित युगल तत्व थे।”

विविध युगों और परंपराओं में शूद्रों की स्थिति विभिन्न थी।

वैदिक परंपरा
यज्ञ आधान के अधिकारी न होते हुए लियाज्ञिक समारोह में सम्मिलित हो सकते थे। पुरुषमेध के प्रसंग में वे त्रैवर्णिकों के साथ वर्णित हैं, राजसूय में दानप्राप्ति और सोमपान करते थे,साथ ही हविष्कृत में आधान से आहूत होते थे और महाव्रत में उनका अपना कार्य था।

अथर्ववेद
अथर्ववेद में कल्याणी वाक (वेद) का श्रवण शूद्रों को विहित था, बृहद्देवता और पंचविंश ब्राह्मण से दासीपुत्र कक्षीवत, पंचविंश से शूद्रोत्पन्न वत्स, छांदोग्य से सत्यकाम जाबाल तथा शूद्रराजा रैक्व के वेद विद्या का अध्ययन ज्ञात होता है। दासीपुत्र कवष ऐलूष ऋग्वेद के ऋषि के रूप में विख्यात है। परंपरा है कि ऐतरेय ब्राह्मण का रचयिता महीदास इतरा (शूद्र) का पुत्र था।

बौद्ध

बौद्ध धर्म में अश्वघोष की वज्रसूची का कथन है कि “दृश्यत च शूद्रा अपि क्वचिद् वेदव्याकरण – सर्वशास्त्रविद:।”

शार्दूलकर्णावदान में चांडाल त्रिशुंक सांगोपांग वेद, उपनिषद का ज्ञाता है, उद्दालक जातक में शूद्र भी श्रुति का अध्ययन और निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं अर्थात् –

“खत्तिया ब्राह्मणा वेस्सा सुद्दा चण्डाल पुक्कसा।
सव्वे वा सोरता दांता सव्वे वा परिनिव्वुता।।”

पुराण
अनेक अमंत्रक संस्कार शूद्रों को विहित हैं, साधारण वृद्धि श्राद्ध, पंचमहायज्ञ, वृषोत्सर्ग तथा संपूर्ण पूर्त कर्म एवं पुराण, महाभारत श्रवण शूद्र कर सकते हैं, आर्ष क्रम से शूद्र कश्यपगोत्रीय और बाजसनेय शाखा के हैं, पुराणों की वैष्णव और शैव परंपरा के शूद्रों को भी क्रमश: गोपीचंदन, तुलसी और ऊध्वंपुंड्र तथा भस्मयुक्त पुंड्र एव रुद्राक्ष माला का विधान है।

महाभारत
शांतिपर्व पाकयज्ञ और पूर्ण पात्र दक्षिणा का विधान शूद्रों के लिए करता है, शूद्र पैजवन ने ऐंद्राग्न यज्ञ किया था।

“शूद्रो पैजवनो नाम सहस्राणां शतं ददौ।
ऐद्राग्नेन विधानेन दक्षिणाभिति न:श्रुतम्‌।।”

मध्ययुग
स्मार्त परंपरा के तुलसीदास शूद्र को ‘ताड़नीय’ और ‘विप्र अवमानी शूद्र’ को शोचनीय मानते हुए भक्त शूद्र को ‘भुवन भूषण’ भी मानते हैं ,वल्लभाचार्य के प्रमुख शिष्य कृष्णदास शूद्र होते हुए भी संप्रदाय में विशेष सम्मानित थे। छीतस्वामी के विट्ठल के विषय में कहा कि “अवकें स्त्रीसूद्रादिक सबकां ब्रह्म संबंध करावे।” 

निर्गुनियाँ और संत संप्रदाय में जातिभेद मान्य नहीं था।

कबीर, रैदास, सेना, पीपा इस काल के प्रसिद्ध शूद्र संत हैं। असम के शंकरदेव द्वारा प्रवर्तित मत, पंजाब का सिक्ख संप्रदाय और महाराष्ट्र के बारकरी संप्रदाय ने शूद्र महत्त्व धार्मिक क्षेत्र में प्रतिष्ठित किया, दसनामी नागा साधुओं के जूना, आवाहन, निरंजिनी, आनंद, महानिर्वाणी, अतल, जगन, अवलिया, सूखड़ और गूदड़-अखाड़ों में शूद्र प्रवेश हो सकता था, होता है।

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राजनीतिक_स्थिति
तैत्तरीय संहिता में राज्याभिषेक के अवसर पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और जन्य (शूद्र) क्रमश: पर्ण, औदुंबर, अश्वत्थ और निग्रोध के घट से राजा का अभिषेक करते हैं।


युधिष्ठिर के राज्याभिषेक में ‘मान्यशूद्र’ आमंत्रित थे।
 

विराट की ‘मंत्रिसभा’ ‘विप्र राजन्य विशसशूद्रका’ थी, भीष्म का अनुशासन है कि राजा की मंत्रिसभा में चार प्रगल्भ सात्विक ब्राह्मण, दस अथवा आठ शस्त्रपाणि क्षत्रिय, 21 संपन्न वैश्य और 3 विनीत शूद्र हों।

पश्चिमोत्तर में आभीर और निषादों के प्रतिवेश में शूद्रों का संभवत: एक गणराज्य भी था, मनु ,डायोडोरस, टॉल्मी, ह्वेनसांग शूद्र राज्य का उल्लेख करते हैं, विष्णुपुराण के अनुसार ‘सौराष्ट्र अवंति-शूद्र-अर्बुद-मरुभूमि’ पर व्रात्य द्विज, आभीर और शूद्र शासन करेंगे, मृच्छकटिक का अंत ही शूद्रराज के अभिषेक से होता है, मुद्राओं तथा अभिलेखों से अनेक शूद्र राजाओं तथा राज्याधिकारों का पता मिलता है।

बौद्ध धर्म के वर्णनों व कथनानुसार ‘भद्दसालजातक और वासवखत्तिया’ के पुत्र विडुदभ की कथाओं से ज्ञात होता है कि बौद्ध समाज में अन्नपान और विवाह के संबंध में जातिगत वैषम्य था किंतु बौद्ध संघ में यह विभेद स्वीकार नहीं था, “सुत्तनिपात के आमगंध सूत्र में बुद्ध का स्पष्ट कथन है कि किसी के द्वारा भी बनाए गए भोजन से अशौच नहीं होता, महा परिनिर्वाण के ठीक पहले बुद्ध ने कुम्भार पुत्र चुंडा के यहाँ सुवकमादव ग्रहण किया था।” जो जहरीला था, तथागत बुद्ध की मृत्यु का कारण था।

श्रावस्ती के मालाकार जेट्ठक की धीता ही मल्लिका थी जो उदयन के साथ विवाहित हुई, काष्ठहारी की पुत्री और फल विक्रेता की कन्या अग्गमहिषी बन सकती थी ललित विस्तार और वज्रसूत्री में प्रतिनिधि बौद्ध मत उल्लिखित है कि “शूद्रा से विवाह पातक का कारण नहीं।”

“उत्तर वैदिक काल में शूद्र की स्थिति दास अथवा सर्फ की थी (वैदिक इंडेक्स) अथवा नहीं इस विषय में निश्चित नहीं कहा जा सकता।”


शूद्र स्पष्टतया कर्मकर और परिचर्या करने वाला वर्ग था, यह वर्ग सर्वमेघ, अश्वमेध और एकाह के अवसर पर ‘भूमि शूद्रवर्ज्य’ दान के नियम से यह अनुमित किया जा सकता है कि “शूद्र के ऊपर स्वामित्त्व नहीं माना जाता था।” यह सनद रहे दलित चिंतको को ..!!

जिल्लेइल़ाही उवाच् –

★ राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र हो गए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया | (विष्णु पुराण 4.1.14)

दलित उत्थान में लगे जातिवाद समर्थक छद्मवेशी चिंतक यह बताओ कि अगर उत्तर रामायण की मिथ्या कथा के अनुसार शूद्रों के लिए तपस्या करना मना होता तो पृषध ये कैसे कर पाए?

★ शुद्र भले ही अशिक्षित हों तब भी उनसे कौशल और उनका विशेष ज्ञान प्राप्त किया जाना चाहिए !

★ (2.238) अपने से न्यून व्यक्ति से भी विद्या को ग्रहण करना चाहिए और शूद्रक कुल में जन्मी उत्तम स्त्री को भी पत्नी के रूप में स्वीकार करना चाहिए !

★  (2.241) आवश्यकता पड़ने पर अ-ब्राह्मण से भी विद्या प्राप्त की जा सकती है और शिष्यों को पढ़ाने के दायित्व का पालन वह गुरु जब तक निर्देश दिया गया हो तब तक करे !

★ ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की , ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है !

★ ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे, जुआरी और हीन चरित्र भी थे, परन्तु बाद में उन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके अनेक अविष्कार किये ,ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन किया | (ऐतरेय ब्राह्मण 2.19)

★  सत्यकाम जाबाल गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे ‘ब्राह्मणत्व’ को प्राप्त हुए !

★ मातंग चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने !

★ ऋषि पुलस्त्य का पौत्र रावण अपने कर्मों से राक्षस – असुर बना (कर्मानुसार)

★ राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध राक्षस – असुर हुआ (कर्मानुसार)

★ त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे (कर्मानुसार)

★  विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्र वर्ग (कर्मण्य वर्ग) अपनाया , विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे परन्तु बाद उन्होंने ‘ब्राह्मणत्व’ को प्राप्त किया कर्मानुसार,  यानि ब्राह्मण या ब्राह्मणत्व भी कोई जाति या जन्मना वर्ग ही नहीं था, ज्ञान – अध्यापन लायक ज्ञान प्राप्ति से कोई भी ब्राह्मणत्व प्राप्त हो सकता था, शूद्रत्व कोई अछूत वर्ग नहीं था, अपितु कर्मकार वर्ग था जो कि यथासंभव त्याज्य था तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य भी शूद्रों में गिने जा सकते थे, सम्मिलित किये जाते थे कर्मानुसार और शूद्र भी कर्मानुसार ब्राह्मणत्व प्राप्त करते थे, क्षत्रियों में राज्याधिकार से सुशोभित थे।

वैदिक काल से ही कर्मानुसार वर्ण या जाति व्यवस्था होती थी जन्म से वर्ण नहीं हुआ करता था! 

प्राचीन काल में जब बालक समिधा हाथ में लेकर पहली बार गुरुकुल जाता था तो कर्म से वर्ण का निर्धारण होता था यानि कि बालक के कर्म गुण स्वभाव को परख कर गुरुकुल में गुरु बालक का वर्ण निर्धारण करते थे , यदि ग्राही ज्ञानी बुद्धिमान है तो ब्राह्मण ..यदि निडर बलशाली है तो क्षत्रिय …आदि !

यानि कि एक ब्राह्मण के घर शूद्र और एक शूद्र के यहाँ ब्राह्मण का जन्म हो सकता था ..लेकिन धीरे-धीरे यह व्यवस्था लोप हो गयी और जन्म से वर्ण व्यवस्था आ गयी ..और हिन्दू धर्म का पतन प्रारम्भ हो गया यह सब प्रमुखता से सिर्फ 12 वीं शताब्दी के आते आते मुस्लिम आक्रांताओं के कारण हुआ!

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प्राचीनकाल से हिंदू धार्मिक इतिहास में ऐसे कई जाति – वर्ग – वर्ण परिवर्तन के उद्धरण है .. ..यह एक विज्ञान है ..ऋतु दर्शन के सोलहवीं अट्ठारहवीं और बीसवी रात्रि में मिलने से सजातीय संतान और अन्य दिनों में विजातीय संतान उत्पन्न होते है –

एकवर्ण मिदं पूर्व विश्वमासीद् युधिष्ठिर
कर्म क्रिया विभेदन चातुर्वर्ण्यं प्रतिष्ठितम्॥
सर्वे वै योनिजा मर्त्याः सर्वे मूत्रपुरोषजाः
एकेन्दि्रयेन्द्रियार्थवश्च तस्माच्छील गुणैद्विजः
शूद्रोऽपि शील सम्पन्नों गुणवान् ब्राह्णो भवेत्
ब्राह्णोऽपि क्रियाहीनःशूद्रात् प्रत्यवरो भवेत्॥
(महाभारत वन पर्व)

पहले एक ही वर्ण था पीछे गुण, कर्म भेद से चार बने, सभी लोग एक ही प्रकार से पैदा होते हैं, सभी की एक सी इन्द्रियाँ हैं इसीलिए जन्म से जाति मानना उचित नहीं हैं ,यदि शूद्र अच्छे कर्म करता है तो उसे ब्राह्मण ही कहना चाहिए और कर्तव्यच्युत ब्राह्मण को शूद्र से भी नीचा मानना चाहिए ।।

ब्राम्हण क्षत्रिय विन्षा शुद्राणच परतपः
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभाव प्रभवे गुणिः ॥
(गीता18-141)

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥
(गीता 4-13)

अर्थात् – ब्राह्मण, क्षत्रिय , शुद्र और वैश्य का विभाजन व्यक्ति के कर्म और गुणों के हिसाब से होता है, न की जन्म आधारित ,, गीता में भगवन श्री कृष्ण ने और अधिक स्पष्ट करते हुए लिखा है की की वर्णों की व्यवस्था जन्म के आधार पर नहीं कर्म के आधार पर होती है !

षत्रियात् जातमेवं तु विद्याद् वैश्यात् तथैव च॥ (मनुस्मृति)

आचारण बदलने से शूद्र ब्राह्मण हो सकता है और ब्राह्मण शूद्र यही बात क्षत्रिय तथा वैश्य पर भी लागू होती है !!

वेदाध्ययनमप्येत ब्राह्मण्यं प्रतिपद्यते
विप्रवद्वैश्यराजन्यौ राक्षसा रावण दया॥
शवृद चांडाल दासाशाच लुब्धकाभीर धीवराः
येन्येऽपि वृषलाः केचित्तेपि वेदान धीयते॥
शूद्रा देशान्तरं गत्त्वा ब्राह्मण्यं श्रिता
व्यापाराकार भाषद्यैविप्रतुल्यैः प्रकल्पितैः॥
(भविष्य पुराण)

ब्राह्मण की भाँति क्षत्रिय और वैश्य भी वेदों का अध्ययन करके ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर लेता है ,रावण आदि राक्षस, श्वाद, चाण्डाल, दास, लुब्धक, आभीर, धीवर आदि के समान वृषल (वर्णसंकर) जाति वाले भी वेदों का अध्ययन कर लेते हैं , शूद्र दूसरे देशों में जाकर और ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि का आश्रय प्राप्त करके ब्राह्मणों के व्यापार, आकार और भाषा आदि का अभ्यास करके ब्राह्मण ही कहलाने लगते हैं ,कर्मानुसार ब्राह्मणत्व, क्षत्रियत्व प्राप्त होते हैं!!

जातिरिति च , न चर्मणो न रक्तस्य मांसस्य न चास्थिनः ।।
न जातिरात्मनो जातिव्यवहार प्रकल्पिता॥

अर्थात जाति चमड़े की नहीं होती, रक्त, माँस की नहीं होती, हड्डियों की नहीं होती, आत्मा की नहीं होती,  वह तो मात्र लोक- व्यवस्था के लिये कल्पित कर ली गई !!

अनभ्यासेन वेदानामाचारस्य च वर्जनात् ।।
आलस्यात् अन्न दोषाच्च मृत्युर्विंप्रान् जिघांसति॥ (मनु.)

वेदों का अभ्यास न करने से, आचार छोड़ देने से, कुधान्य खाने से ब्राह्मण की मृत्यु हो जाती है ,ब्राह्मणत्व समाप्त होता है!

अनध्यापन शीलं दच सदाचार बिलंघनम्
सालस च दुरन्नाहं ब्राह्मणं बाधते यमः॥

स्वाध्याय न करने से, आलस्य से ओर कुधान्य खाने से ब्राह्मण का पतन हो जाता है , ब्राह्मणत्व का अंत होता है।

एक ही कुल (परिवार) में चारों वर्णी-ऋग्वेद (9/112/3) में वर्ण-व्यवस्था का आदर्श रूप बताया गया है इसमें कहा गया है- एक व्यक्ति कारीगर है, दूसरा सदस्य चिकित्सक है और तीसरा चक्की चलाता है। इस तरह एक ही परिवार में सभी वर्णों के कर्म करने वाले हो सकते हैं , कर्म से वर्ण-व्यवस्था को सही ठहराते हुए भागवत पुराण (7 स्कंध, 11वां अध्याय व 357 श्लोक) में कहा गया है- जिस वर्ण के जो लक्षण बताए गए हैं, यदि उनमें वे लक्षण नहीं पाए जाएं बल्कि दूसरे वर्ण के पाए जाएं हैं तो वे उसी वर्ण के कहे जाने चाहिए।

भविष्य पुराण ( 42, श्लोक 35) में कहा गया है- शूद्र ब्राह्मण से उत्तम कर्म करता है तो वह ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ है।

आज भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और दलितों में समान गोत्र मिलते हैं ; इस से पता चलता है कि यह सब एक ही पूर्वज, एक ही कुल की संतान हैं | लेकिन कालांतर में वर्ण व्यवस्था गड़बड़ा गई और यह लोग अनेक जातियों में बंट गए !!

आर्य और अनार्य – द्रविड़ एक ही थे !

भारत में आर्य और द्रविड़ अर्थात आर्य – अनार्य -.द्रविड़ नामक विवाद व्यर्थ है, उत्तर और दक्षिण भारतीय एक ही पूर्वजों की संतानें हैं. भारत और अमेरिका के वैज्ञानिकों के एक साझे आनुवंशिक अध्ययन के परिणाम इतिहास को नए सिरे लिखने का कारण बन सकते हैं.

उत्तर और दक्षिण भारतीयों के बीच बताई जाने वाली आर्य-अनार्य असमानता अब नए शोध के अनुसार कोई सच्ची आनुवंशिक असमानता नहीं है. अमेरिका में हार्वर्ड के विशेषज्ञों और भारत के विश्लेलेषकों ने भारत की प्राचीन जनसंख्या के जीनों के अध्ययन के बाद पाया कि सभी भारतीयों के बीच एक अनुवांशिक संबंध है.

इस शोध से जुड़े सीसीएमबी यानी सेंटर फॉर सेल्यूलर ऐंड मोलेक्यूलर बायॉलॉजी (कोषिका और आणविक जीवविज्ञान केंद्र) के पूर्व निदेशक और इस अध्ययन के सह-लेखक लालजी सिंह ने एक प्रेस कांफ्रेस में बताया कि शोध के नतीजे के बाद इतिहास को दोबारा लिखने की ज़रूरत पड़ सकती है. उत्तर और दक्षिण भारतीयों के बीच कोई अंतर नहीं रहा है.

सीसीएमबी के वरिष्ठ विश्लेषक कुमारसमय थंगरंजन का मानना है कि आर्य और द्रविड़ सिद्धांतों के पीछे कोई सच्चाई नहीं है. वे प्राचीन भारतीयों के उत्तर और दक्षिण में बसने के सैकड़ों या हज़ारों साल बाद भारत आए थे. इस शोध में भारत के 13 राज्यों के 25 विभिन्न जाति-समूहों से लिए गए 132 व्यक्तियों के जीनोमों में मिले 500,000 आनुवंशिक मार्करों का विश्लेषण किया गया.

इन सभी लोगों को पारंपरिक रूप से छह अलग अलग भाषा-परिवारों, ऊंची-नीची जातियों और आदिवासी समूहों से लिया गया था. उनके बीच साझे आनुवांशिक संबंधों से साबित होता है कि भारतीय समाज की संरचना में जातियां अपने पहले के कबीलों-जैसे समुदायों से बनी थीं. उस द़ौरान जातियों की उत्पत्ति जनजातियों और आदिवासी समूहों से हुई थी. जातियों और कबीलों अथवा आदिवासियों के बीच अंतर नहीं किया जा सकता क्योंकि उनके बीच के जीनों की समानता यह बताती है कि दोनों अलग नहीं थे.

इस शोध में सीसीएमबी सहित हार्वड मेडिकल स्कूल, हार्वड स्कूल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ तथा एमआईटी के विशेषज्ञों ने भाग लिया. इस अध्ययन के अनुसार वर्तमान भारतीय जनसंख्या असल में प्राचीन कालीन उत्तरी और दक्षिणी भारत का मिश्रण है. इस मिश्रण में उत्तर भारतीय पूर्वजों (एन्सेंस्ट्रल नॉर्थ इंडियन) और दक्षिण भारतीय पूर्वजों (एन्सेंस्ट्रल साउथ इंडियन) का योगदान रहा है.

पहली बस्तियां आज से 65,000 साल पहले अंडमान द्वीप और दक्षिण भारत में लगभग एक ही समय बसी थीं. बाद में 40,000 साल पहले प्राचीन उत्तर भारतीयों के आने से उनकी जनसंख्या बढ़ गई. कालान्तर में प्राचीन उत्तर और दक्षिण भारतीयों के आपस में मेल से एक मिश्रित आबादी बनी. आनुवंशिक दृष्टि से वर्तमान भारतीय इसी आबादी के वंशज हैं.

अध्ययन यह भी बताने में मदद करता है कि भारतीयों में जो आनुवांशिक बिमारियां मिलती हैं वे दुनिया के अन्य लोगों से अलग क्यों हैं.

लालजी सिंह कहते हैं कि 70 प्रतिशत भारतीयों में जो आनुवांशिक विकार हैं, इस शोध से यह जानने में मदद मिल सकती है कि ऐसे विकार जनसंख्या विशेष तक ही क्यों सीमित हैं, उदाहरण के लिए पारसी महिलाओं में स्तन कैंसर, तिरुपति और चित्तूर के निवासियों में स्नायविक दोष और मध्य भारत की जनजातियों में रक्ताल्पता की बीमारी ज्यादा क्यों होती है,  इन सबके मूल कारणों को उनके इस शोध के ज़रिए बेहतर ढ़ंग से समझा जा सकता है। 

शोधकर्त्ता अब इस बात की खोज कर रहे हैं कि यूरेशियाई यानि यूरोपीय-एशियाई निवासियों की उत्पत्ति क्या प्राचीन उत्तर भारतीयों से हुई है ? उनके अनुसार प्राचीन उत्तर भारतीय पश्चिमी यूरेशियाइयों से जुड़ें है लेकिन प्राचीन दक्षिण भारतीयों में दुनिया भर में किसी भी जनसंख्या से समानता नहीं पाई गई हालांकि शोधकत्ताओं ने यह भी कहा कि अभी तक इस बात के पक्के सबूत नहीं हैं कि भारतीय पहले यूरोप की ओर गए थे या फिर यूरोप के लोग पहले भारत आए थे !

http://www.dw.com/hi/%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A1%E0%A4%BC-%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%B9%E0%A5%80-%E0%A4%A5%E0%A5%87/a-4725274

अंततः बस यही कह कर अपनी बात समाप्त करता हूँ कि इस संपूर्ण लेख संग्रह का मैं अकेला ज्ञानी रचियता नहीं हूँ , मैनें बस यथासंभव उद्धरण और अंश यहाँ उद्धरित करते हुऐ, संग्रह करते हुऐ संपादन मात्र किया है!

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Dr. Sudhir Vyas Posted from WordPress for Android

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