थेरवादी वहाबियत (भाग 3) नवयान की थेरवादी वहाबियत का पहला जिहादी ☞ डा. बी. आर. अम्बेडकर पुत्र श्री रामजी मालोजी सकपाल और उन की प्रसिद्ध 22 प्रतिज्ञाऐं


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डा.भीमराव आंबेडकर का जन्म ब्रिटिशों द्वारा शासित केन्द्रीय प्रांत ( मध्यप्रदेश ) में स्थापित नगर व सैन्य छावनी मऊ में हुआ था, भीमराव अपने पिता रामजी मालोजी सकपाल और माता भीमाबाई की 14 वीं व अंतिम संतान थे, उनका परिवार मराठी था और वो अंबावडे नगर जो आज के महाराष्ट्र राज्य के रत्नागिरी जिले मे है, से संबंधता रखता था, भीमराव और उनका परिवार ‘हिंदुओं की महार जाति’ से संबंधित थे , अम्बेडकर के पूर्वज और पिता (परिवारजन) लंबे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्यरत थे और उनके पिता, भारतीय सेना की मऊ छावनी में सेवा में थे और यहां काम करते हुये वो सूबेदार के पद तक पहुँचे थे! 

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कबीर पंथ से संबंधित और अनुयायी भीमराव के परिवार में, पिता रामजी सकपाल अपने बच्चों को हिंदू ग्रंथों को पढ़ने के लिए, विशेष रूप से महाभारत और रामायण पढने को प्रोत्साहित किया करते थे, उन्होने सेना मे अपनी हैसियत का उपयोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल से शिक्षा दिलाने मे किया क्योंकि अपनी जाति के कारण उन्हें इसके लिये सामाजिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा था, स्कूली पढ़ाई में सक्षम होने के बावजूद अंबेडकर और अन्य अस्पृश्य बच्चों को विद्यालय मे अलग बिठाया जाता था और अध्यापकों द्वारा न तो ध्यान ही दिया जाता था, न ही कोई सहायता दी जाती थी, उनको कक्षा के अन्दर बैठने की अनुमति नहीं थी, साथ ही प्यास लगने प‍र कोई ऊँची जाति का व्यक्ति ऊँचाई से पानी उनके हाथों पर पानी डालता था, क्योंकि उनको न तो पानी, न ही पानी के पात्र को स्पर्श करने की अनुमति थी,तब लोगों के मुताबिक ऐसा करने से पात्र और पानी दोनों अपवित्र हो जाते थे आमतौर पर यह काम स्कूल के चपरासी द्वारा किया जाता था जिसकी अनुपस्थिति में बालक भीमराव को बिना पानी के ही रहना पड़ता था!

सन् 1894 ई. मे भीमराव के पिता रामजी सकपाल के ब्रिटिश सैन्य सेना से सेवानिवृत्त हो जाने के बाद सपरिवार सतारा चले गए और इसके दो साल बाद, भीमराव की मां भीमाबाई की मृत्यु हो गई। बच्चों की देखभाल उनकी चाची ने कठिन परिस्थितियों में रहते हुये की।

रामजी सकपाल के केवल तीन बेटे, बलराम, आनंदराव और भीमराव और दो बेटियाँ मंजुला और तुलासा ही इन कठिन हालातों मे जीवित बच पाये। अपने भाइयों और बहनों मे केवल भीमराव ही स्कूल की परीक्षा में सफल हुए और इसके बाद बड़े स्कूल मे जाने में सफल हुये वहाँ  अपने एक देशस्त ब्राह्मण शिक्षक महादेव अम्बेडकर जो उनसे विशेष स्नेह रखते थे के कहने पर भीमराव सकपाल पुत्र रामजी मालोजी सकपाल ने अपने नाम से सकपाल हटाकर ब्राह्मण जाति सूचक उपनाम ‘अम्बेडकर / अंबेडकर’ जोड़ लिया जो उनके गांव के नाम “अंबावडे” पर आधारित था।

भीमराव के पिता रामजी सकपाल ने 1898 ई. मे पुनर्विवाह कर लिया और परिवार के साथ मुंबई (तब बंबई )चले आये। यहाँ भीमराव एल्फिन्सटन रोड पर स्थित गवर्न्मेंट हाई स्कूल के पहले अछूत छात्र बने, पढा़ई में अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन के बावजूद लगातार अपने विरुद्ध हो रहे इस अलगाव और, भेदभाव से भीमराव व्यथित रहे।
1907 में मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद भीमराव ने बंबई विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और इस तरह वो भारत में कॉलेज में प्रवेश लेने वाले पहले अस्पृश्य बन गये उनकी इस सफलता से उनके पूरे महार समाज मे एक खुशी की लहर दौड़ गयी और बाद में एक सार्वजनिक समारोह उनका सम्मान किया गया इसी समारोह में उनके एक शिक्षक कृषणजी अर्जुन केलूसकर ने उन्हें भगवान् बुद्ध की जीवनी भेंट की, श्री केलूसकर, एक मराठा जाति के विद्वान थे!

भीमराव की सगाई एक साल पहले यानि 1906 ई. में हिंदू रीति के अनुसार दापोली नामक स्थान की निवासी एक नौ वर्षीय लड़की, रमाबाई से तय की गयी थी फिर 1908 ई. में, उन्होंने एलिफिंस्टन कॉलेज में प्रवेश लिया और बड़ौदा के गायकवाड़ शासक सहयाजी राव तृतीय से संयुक्त राज्य अमेरिका मे उच्च अध्धयन के लिये पच्चीस रुपये प्रति माह का वजीफा़ प्राप्त किया।

 1912 में उन्होंने राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में अपनी डिग्री प्राप्त की और बड़ौदा राज्य सरकार की नौकरी को तैयार हो गये, भीमराव की 15 वर्षीय पत्नी रमाबाई ने अपने पहले बेटे यशवंत को इसी वर्ष यानि 1912 में जन्म दिया,फिर भीमराव अपने परिवार के साथ बड़ौदा चले आये पर जल्द ही उन्हें अपने पिता की बीमारी के चलते बंबई वापस लौटना पडा़, जिनकी मृत्यु 02-02-1913 को हो गयी।

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तत्पश्चात् गायकवाड शासक ने अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय मे जाकर अध्ययन के लिये अम्बेडकर का चयन किया गया साथ ही इसके लिये एक 11.5 डॉलर प्रति मास की छात्रवृत्ति भी प्रदान की, वहाँ 1916 में, उन्हे उनके एक शोध के लिए पी. एच.डी. से सम्मानित किया गया, इस शोध को अंततः उन्होंने पुस्तक “इवोल्युशन ओफ प्रोविन्शिअल फिनान्स इन ब्रिटिश इंडिया” के रूप में प्रकाशित किया और भीमराव अंबेडकर पुत्री रामजी सकपाल अब डा.भीम राव अंबेडकर बन गये थे। अपनी डाक्टरेट की डिग्री लेकर अम्बेडकर लंदन चले गये जहाँ उन्होने ग्रे’स इन और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में कानून का अध्ययन और अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट शोध की तैयारी के लिये अपना नाम लिखवा लिया। अगले वर्ष छात्रवृत्ति की समाप्ति के चलते मजबूरन उन्हें अपना अध्ययन अस्थायी तौर बीच मे ही छोड़ कर भारत वापस लौटना पडा़ ये विश्व युद्ध प्रथम का काल था। बड़ौदा राज्य के सेना सचिव के रूप में काम करते हुये अपने जीवन मे अचानक फिर से आये भेदभाव से अम्बेडकर उदास हो गये और अपनी नौकरी छोड़ एक निजी ट्यूटर और लेखाकार के रूप में काम करने लगे। यहाँ तक कि अपनी परामर्श व्यवसाय भी आरंभ किया जो उनकी सामाजिक स्थिति के कारण विफल रहा। अपने एक अंग्रेज जानकार बंबई के पूर्व राज्यपाल लॉर्ड सिडनेम, के कारण उन्हें बंबई के सिडनेम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनोमिक्स मे राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रोफेसर के रूप में नौकरी मिल गयी, तब 1920 में कोल्हापुर के महाराजा अपने पारसी मित्र के सहयोग और अपनी बचत के कारण वो एक बार फिर से इंग्लैंड वापस जाने में सक्षम हो गये,, 1923 में उन्होंने अपना शोध प्रोब्लेम्स ऑफ द रुपी (रुपये की समस्यायें) पूरा कर लिया,इस पर उन्हें लंदन विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टर ऑफ साईंस की उपाधि प्रदान की गयी और उनकी कानून का अध्ययन पूरा होने के, साथ ही साथ उन्हें ब्रिटिश बार मे बैरिस्टर के रूप में प्रवेश मिल गया। भारत वापस लौटते हुये अम्बेडकर तीन महीने जर्मनी में रुके, जहाँ उन्होने अपना अर्थशास्त्र का अध्ययन, बॉन विश्वविद्यालय में जारी रखा। उन्हे औपचारिक रूप से 8 जून 1927 को कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा पी एच.डी. प्रदान की गयी।

भारत सरकार अधिनियम , तैयार कर रही साउथ बोरोह समिति के समक्ष, भारत के एक प्रमुख विद्वान के तौर पर भीम राव अम्बेडकर को गवाही देने के लिये आमंत्रित किया गया, इस सुनवाई के दौरान, पहली बार अम्बेडकर ने दलितों और अन्य धार्मिक समुदायों के लिये पृथक निर्वाचन  (separate electorates) और आरक्षण देने की वकालत की और भविष्य के पूना पैक्ट सहित अंग्रेजों द्वारा निर्देशित जातिगत अलगाववाद की नींव रखी!। उनके दलित वर्ग के एक सम्मेलन के दौरान दिये गये भाषण ने कोल्हापुर राज्य के स्थानीय शासक शाहू चतुर्थ को बहुत प्रभावित किया, जिनका अम्बेडकर के साथ भोजन करना रूढ़िवादी समाज मे हलचल मचा गया, अम्बेडकर ने अपनी वकालत अच्छी तरह जमा ली और बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना भी की जिसका उद्देश्य दलित वर्गों में शिक्षा का प्रसार और उनके सामाजिक आर्थिक उत्थान के लिये काम करना था।  १९२७ में, उन्होंने अपना दूसरी पत्रिका बहिष्कृत भारत शुरू की और उसके बाद रीक्रिश्टेन्ड जनता की। 1928 में भीमराव अंबेडकर पुत्र रामजी सकपाल को बॉम्बे प्रेसीडेंसी समिति मे सभी यूरोपीय सदस्यों वाले साइमन कमीशन में काम करने के लिए नियुक्त किया गया। इस आयोग के विरोध मे भारत भर में विरोध प्रदर्शन हुये और जबकि इसकी रिपोर्ट को ज्यादातर भारतीयों द्वारा नजरअंदाज कर दिया गया, डा. भीमराव अम्बेडकर ने ब्रिटिश शासन के अंतर्गत रहते हुऐ ही भारतीयों के भविष्य के संवैधानिक सुधारों के लिये सिफारिशों लिखीं थी यानि डा भीमराव अंबेडकर पुत्र रामजी सकपाल भारत की स्वंतत्रता के अनुगामी तो कई नहीं थे, ना ही समर्थक ही।

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1930 में डॉ भीमराव ने अपना पहला विख्यात वक्तव्य दिया – ” हमें अपना रास्ता स्वयँ बनाना होगा और स्वयँ … राजनीतिक शक्ति शोषितो की समस्याओं का निवारण नहीं हो सकती, उनका उद्धार समाज मे उनका उचित स्थान पाने मे निहित है। उनको अपना रहने का बुरा तरीका बदलना होगा…. उनको शिक्षित होना चाहिए …. एक बड़ी आवश्यकता उनकी हीनता की भावना को झकझोरने और उनके अंदर उस दैवीय असंतोष की स्थापना करने की है जो सभी उँचाइयों का स्रोत है!

1932 मे जब ब्रिटिशों ने अम्बेडकर के साथ सहमति व्यक्त करते हुये अछूतों को पृथक निर्वाचिका या पृथक निर्वाचन अधिकार देने की घोषणा की तब गांधी ने इसके विरोध मे पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में आमरण अनशन शुरु कर दिया था, गांधी ने रूढ़िवादी हिंदू समाज से सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता को खत्म करने तथा, हिंदुओं की राजनीतिक और सामाजिक एकता की बात की और गांधी के अनशन को देश भर की जनता के हर वर्ग से घोर समर्थन मिला और रूढ़िवादी हिंदू नेताओं, कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं जैसे पवलंकर बालू और पं. मदन मोहन मालवीय ने अम्बेडकर और उनके समर्थकों के साथ यरवदा मे संयुक्त बैठकें की, तब कहा जाता है कि अनशन के कारण गांधी की मृत्यु होने की स्थिति मे, होने वाले सामाजिक प्रतिशोध के कारण होने वाली अछूतों की हत्याओं के डर से और गाँधी जी के समर्थकों के भारी दवाब के चलते अंबेडकर ने अपनी पृथक निर्वाचिका की माँग वापस ले ली। इसके एवज मे अछूतों को सीटों के आरक्षण, मंदिरों में प्रवेश/पूजा के अधिकार एवं छूआ-छूत ख़तम करने की बात स्वीकार कर ली गयी,गांधी ने इस उम्मीद पर की बाकि सभी सवर्ण भी पूना संधि का आदर कर, सभी शर्ते मान लेंगे अपना अनशन समाप्त कर दिया।

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डा. भीमराव की आरक्षण प्रणाली में पहले दलित अपने लिए संभावित उमीदवारों में से चुनाव द्वारा (केवल दलित) चार संभावित उमीदवार चुनते, इन चार उम्मीदवारों में से फिर संयुक्त निर्वाचन चुनाव (सभी धर्म \ जाति) द्वारा एक नेता चुना जाता,फिर  इस आधार पर सिर्फ एक बार सन 1937 में चुनाव हुए, अंबेडकर 20-25 साल के लिये आरक्षण चाहते थे लेकिन गाँधी के अड़े रहने के कारण यह आरक्षण मात्र 5 साल के लिए ही लागू हुआ।

डा भीमराव के प्रस्तावित पृथक निर्वाचिका में दलित दो वोट देता एक सामान्य वर्ग के उम्मीदवार को ओर दूसरा दलित (पृथक) उम्मीदवार को, ऐसी स्थिति में दलितों द्वारा चुना गया दलित उम्मीदवार दलितों की समस्या को अच्छी तरह से तो रख सकता था किन्तु गैर उम्मीदवार के लिए यह जरूरी नहीं था कि उनकी समस्याओं के समाधान का प्रयास भी करता बाद मे अम्बेडकर ने गाँधी जी की आलोचना करते हुये उनके इस अनशन को अछूतों को उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित करने और उन्हें उनकी माँग से पीछे हटने के लिये दवाब डालने के लिये गांधी द्वारा खेला गया एक नाटक करार दिया, उनके अनुसार असली महात्मा तो ज्योति राव फुले थे।

13 अक्तूबर 1935 में अम्बेडकर को सरकारी लॉ कॉलेज का प्रधानचार्य नियुक्त किया गया और इस पद पर उन्होने दो वर्ष तक कार्य किया इसके चलते अंबेडकर बंबई में बस गये, उन्होने यहाँ एक बडे़ घर का निर्माण कराया, जिसमे उनके निजी पुस्तकालय मे 50000 से अधिक पुस्तकें थीं। इसी वर्ष उनकी पत्नी रमाबाई की एक लंबी बीमारी के बाद मृत्यु हो गई, उनकी पत्नि रमाबाई अपनी मृत्यु से पहले तीर्थयात्रा के लिये पंढरपुर जाना चाहती थीं पर अंबेडकर ने उन्हे इसकी इजाज़त नहीं दी। अम्बेडकर ने कहा की उस हिन्दु तीर्थ मे जहाँ उनको अछूत माना जाता है, जाने का कोई औचित्य नहीं है इसके बजाय उन्होने उनके लिये एक नया पंढरपुर बनाने की बात कही।

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इसके बाद के समय में नासिक के निकट येओला मे एक सम्मेलन में बोलते हुए अम्बेडकर ने धर्म परिवर्तन करने की अपनी इच्छा प्रकट की। उन्होने अपने अनुयायियों से भी हिंदू धर्म छोड़ कोई और धर्म अपनाने का आह्वान किया, उन्होने अपनी इस बात को भारत भर मे कई सार्वजनिक सभाओं मे दोहराया भी।

1937 में डा. भीमराव अंबेडकर पुत्र रामजी मालोजी सकपाल ने अपनी पुस्तक जाति के विनाश भी इसी वर्ष प्रकाशित की जो उनके न्यूयार्क में लिखे एक शोधपत्र पर आधारित थी इस सफल और लोकप्रिय पुस्तक मे अम्बेडकर ने हिंदू धार्मिक नेताओं और जाति व्यवस्था की जोरदार आलोचना की। उन्होंने अस्पृश्य समुदाय के लोगों को गाँधी द्वारा रचित शब्द हरिजन पुकारने के कांग्रेस के फैसले की कडी़ निंदा की,तब अम्बेडकर अंग्रेज शासन के अंग भी थे और रक्षा सलाहकार समिति और वाइसराय की कार्यकारी परिषद के लिए श्रम मंत्री के रूप में सेवारत भी रहे,यहाँ तक की जीवन यात्रा और सार्वजनिक जीवन में दिये उनके किसी संभाषण या विचार में भारत की स्वतंत्रता का या ब्रिटिश राज से भारत के छुटकारा पाने के समर्थन तक का उल्लेख नहीं मिलता।

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अपनी पुस्तक वॉट काँग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स  (काँग्रेस और गान्धी ने अछूतों के लिये क्या किया) के साथ, अम्बेडकर ने गांधी और कांग्रेस दोनो पर अपने हमलों को तीखा कर दिया उन्होने उन पर ढोंग करने का आरोप लगाया, उन्होने अपनी पुस्तक‘हू वर द शुद्राज़?’( शुद्र कौन थे?) के द्वारा हिंदू जाति व्यवस्था के पदानुक्रम में सबसे नीची जाति यानी शुद्रों के अस्तित्व मे आने की व्याख्या की उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि किस तरह से अछूत, शुद्रों से अलग हैं, हाँ यह अलग और विचित्र बात है कि डा. भीमराव अंबेडकर पुत्र रामजी सकपाल ये सब अपनी मूल जाति उपनाम सकपाल को लगभग छिपाते हुऐ तथा ब्राह्मण उपनाम अंबेडकर लगा कर ही कर रहे थे, फिर अम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक पार्टी को अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन मे बदलते देखा, हालांकि 1946 में आयोजित भारत के संविधान सभा के लिए हुये चुनाव में इसने खराब प्रदर्शन किया, 1948 में हू वर द शुद्राज़? की उत्तरकथा द अनटचेबलस: ए थीसिस ऑन द ओरिजन ऑफ अनटचेबिलिटी (अस्पृश्य: अस्पृश्यता के मूल पर एक शोध) मे अम्बेडकर ने हिंदू धर्म को लताड़ा, इस हेतु उन के विचारों पर नजर डालें –

” हिंदू सभ्यता …. जो मानवता को दास बनाने और उसका दमन करने की एक क्रूर युक्ति है और इसका उचित नाम बदनामी होगा। एक सभ्यता के बारे मे और क्या कहा जा सकता है जिसने लोगों के एक बहुत बड़े वर्ग को विकसित किया जिसे… एक मानव से हीन समझा गया और जिसका स्पर्श मात्र प्रदूषण फैलाने का पर्याप्त कारण है? “

अम्बेडकर इस्लाम और दक्षिण एशिया में उसकी रीतियों के भी आलोचक थे। उन्होने भारत विभाजन का तो पक्ष लिया पर मुस्लिम समाज मे व्याप्त बाल विवाह की प्रथा और महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की घोर निंदा की। उन्होंने कहा –
“बहुविवाह और रखैल रखने के दुष्परिणाम शब्दों में व्यक्त नहीं किये जा सकते जो विशेष रूप से एक मुस्लिम महिला के दुःख के स्रोत हैं। जाति व्यवस्था को ही लें, हर कोई कहता है कि इस्लाम गुलामी और जाति से मुक्त होना चाहिए, जबकि गुलामी अस्तित्व में है और इसे इस्लाम और इस्लामी देशों से समर्थन मिला है। हालाँकि कुरान में वर्णित ग़ुलामों के साथ उचित और मानवीय व्यवहार के बारे में पैगंबर के विचार प्रशंसायोग्य हैं लेकिन, इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं है जो इस अभिशाप के उन्मूलन का समर्थन करता हो। अगर गुलामी खत्म भी हो जाये पर फिर भी मुसलमानों के बीच जाति व्यवस्था रह जायेगी।”

उन्होंने लिखा कि मुस्लिम समाज मे तो हिंदू समाज से भी अधिक सामाजिक बुराइयाँ हैं और मुसलमान उन्हें ” भाईचारे ” जैसे नरम शब्दों के प्रयोग से छुपाते हैं  , उन्होंने मुसलमानो द्वारा अरज़ाल वर्गों के खिलाफ भेदभाव जिन्हें ” निचले दर्जे का ” माना जाता था के साथ ही मुस्लिम समाज में महिलाओं के उत्पीड़न की दमनकारी पर्दा प्रथा यानि बुर्का – हिजाब प्रथा की भी आलोचना की, उन्होंने कहा हालाँकि पर्दा हिंदुओं मे भी होता है पर उसे धर्मिक मान्यता केवल मुसलमानों ने दी है।

उन्होंने इस्लाम मे कट्टरता की आलोचना की जिसके कारण इस्लाम की नातियों का अक्षरक्ष अनुपालन की बद्धता के कारण समाज बहुत कट्टर हो गया है और उसे को बदलना बहुत मुश्किल हो गया है। उन्होंने आगे लिखा कि भारतीय मुसलमान अपने समाज का सुधार करने में विफल रहे हैं जबकि इसके विपरीत तुर्की जैसे देशों ने अपने आपको बहुत बदल लिया है।

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सन् 1950 के दशक में अम्बेडकर बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए और बौद्ध भिक्षुओं व विद्वानों के एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्रीलंका (तब सीलोन) गये। पुणे के पास एक नया बौद्ध विहार को समर्पित करते हुए, अम्बेडकर ने घोषणा की कि वे बौद्ध धर्म पर एक पुस्तक लिख रहे हैं और जैसे ही यह समाप्त होगी वो औपचारिक रूप से बौद्ध धर्म अपना लेंगे।

1954 में अम्बेडकर ने बर्मा का दो बार दौरा किया; दूसरी बार वो रंगून मे तीसरे विश्व बौद्ध फैलोशिप के सम्मेलन में भाग लेने के लिए गये, 1955 में उन्होने भारतीय बुद्ध महासभा या बौद्ध सोसाइटी ऑफ इंडिया की स्थापना की उन्होंने अपने अंतिम लेख, द बुद्ध एंड हिज़ धम्म को 1956 में पूरा किया और यह उनकी मृत्यु के पश्चात प्रकाशित हुआ।

14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में अम्बेडकर ने खुद और उनके समर्थकों के लिए एक औपचारिक सार्वजनिक समारोह का आयोजन किया। अम्बेडकर ने एक बौद्ध भिक्षु से पारंपरिक तरीके से तीन रत्न ग्रहण/त्रिपिटक और पंचशील को अपनाते हुये बौद्ध धर्म ग्रहण किया इसके बाद उन्होने एक अनुमान के अनुसार अपने लगभग पांच लाख समर्थको को बौद्ध धर्म मे धर्म परिवर्तित किया।

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अंबेडकर रचित बौद्ध मत की काल्पनिक और बौद्धों में ही अस्वीकृत शाखा ‘नवयान’ जो कि पूरी तरह थेरवादी बौद्धमत की वहाबी सरीखी विचारधारा है को प्रतिपादित और स्थापित कर डा.भीमराव अम्बेडकर पुत्र रामजी सकपाल एक नबी – पैगंबर – अवतार की तरह खुद भी स्थापित हो गये! 

डा. अंबेडकर और उनके समर्थकों ने हिंदू धर्म और हिंदू दर्शन की स्पष्ट निंदा की और उसे त्याग दिया।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने दीक्षा भूमि, नागपुर, भारत में बौद्ध धर्मं में परिवर्तन के ऐतिहासिक अवसर पर,15 अक्टूबर 1956 को अपने अनुयायियों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ निर्धारित की थी, अंबेडकर के साथ 800000 लोगों का “हिंदू धर्म छोडकर बौद्ध धर्म में रूपांतरण” ऐतिहासिक था क्योंकि यह विश्व का सबसे बड़ा सार्वजनिक धर्म रूपांतरण था, अंबेडकर ने इन निम्नलिखित शपथों को निर्धारित किया ताकि उस समय एवम् आगामी धर्म रूपांतरित होने वाला ‘हर व्यक्ति हिंदू धर्म के बंधनों से पूरी तरह पृथक किया जा सके’  ये 22 प्रतिज्ञाएँ हमारे हिंदू धर्म,  हिंदू मान्यताओं और पद्धतियों की जड़ों पर गहरा आघात करती हैं..!!

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वो हिंदू व हिंदुत्व विरोधी 22 प्रतिज्ञाएँ निम्न हैं, जो नवबौद्धों द्वारा जिहादियों की तरह देवी देवता अपमान और हिंदुत्व के तिरस्कार – अपमान का मूल है और मुझे आश्चर्य है कि हिंदुत्व एवं हिंदुओं के प्रति पूर्वाग्रही दुराग्रहों से परिपूर्ण व्यक्ति को काँग्रेस ने क्या सोच कर संविधान की ड्राफ्टिंग का काम दिया..?
खैर ,, वो 22 प्रतिज्ञाऐं पढें जो निम्न हैं –

1.) मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा

2.) मैं राम और कृष्ण, जो भगवान के अवतार माने जाते हैं, में कोई आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा

3.) मैं गौरी, गणपति और हिन्दुओं के अन्य देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा.

4.) मैं भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करता हूँ

5.) मैं यह नहीं मानता और न कभी मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे. मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार-प्रसार मानता हूँ

6.) मैं श्रद्धा (श्राद्ध) में भाग नहीं लूँगा और न ही पिंड-दान दूँगा.

7.) मैं बुद्ध के सिद्धांतों और उपदेशों का उल्लंघन करने वाले तरीके से कार्य नहीं करूँगा

8.) मैं ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह को स्वीकार नहीं करूँगा

9.) मैं मनुष्य की समानता में विश्वास करता हूँ

10.) मैं समानता स्थापित करने का प्रयास करूँगा

11.) मैं बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग का अनुशरण करूँगा

12.) मैं बुद्ध द्वारा निर्धारित परमितों का पालन करूँगा.

13.) मैं सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया और प्यार भरी दयालुता रखूँगा तथा उनकी रक्षा करूँगा.

14.) मैं चोरी नहीं करूँगा.

15.) मैं झूठ नहीं बोलूँगा

16.) मैं कामुक पापों को नहीं करूँगा.

17.) मैं शराब, ड्रग्स जैसे मादक पदार्थों का सेवन नहीं करूँगा.

18.) मैं महान आष्टांगिक मार्ग के पालन का प्रयास करूँगा एवं सहानुभूति और प्यार भरी दयालुता का दैनिक जीवन में अभ्यास करूँगा.

19.) मैं हिंदू धर्म का त्याग करता हूँ जो मानवता के लिए हानिकारक है और उन्नति और मानवता के विकास में बाधक है क्योंकि यह असमानता पर आधारित है, और स्व-धर्मं के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाता हूँ

20.) मैं दृढ़ता के साथ यह विश्वास करता हूँ की बुद्ध का धम्म ही सच्चा धर्म है.

21.) मुझे विश्वास है कि मैं फिर से जन्म ले रहा हूँ (इस धर्म परिवर्तन के द्वारा).

22.) मैं गंभीरता एवं दृढ़ता के साथ घोषित करता हूँ कि मैं इसके (धर्म परिवर्तन के) बाद अपने जीवन का बुद्ध के सिद्धांतों व शिक्षाओं एवं उनके धम्म के अनुसार मार्गदर्शन करूँगा.

वही 22 प्रतिज्ञाऐं यानि 22 Vows अंग्रेजी के मूल रूप में भी निम्नलिखित हैं –

★I shall have no faith in Brahma, Vishnu and Mahesh nor shall I worship them.

★I shall have no faith in Rama and Krishna who are believed to be incarnation of God nor shall I worship them.

★I shall have no faith in ‘Gauri’, Ganapati and other gods and goddesses of Hindus nor shall I worship them.

★I do not believe in the incarnation of God.

★I do not and shall not believe that Lord Buddha was the incarnation of Vishnu.

★I believe this to be sheer madness and false propaganda.

★I shall not perform ‘Shraddha’ nor shall I give ‘pind-dan’.

★I shall not act in a manner violating the principles and teachings of the Buddha.

★I shall not allow any ceremonies to be performed by Brahmins.

★I shall believe in the equality of man.I shall endeavour to establish equality.

★I shall follow the ‘noble eightfold path’ of the Buddha.

★I shall follow the ‘paramitas’ prescribed by the Buddha.

★I shall have compassion and loving kindness for all living beings and protect them.

★I shall not steal.

★I shall not tell lies.

★I shall not commit carnal sins.

★I shall not take intoxicants like liquor, drugs etc.

★I shall endeavour to follow the noble eightfold path and practise compassion and loving kindness in every day life.

★I renounce Hinduism which is harmful for humanity and impedes the advancement and development of humanity because it is based on inequality, and adopt Buddhism as my religion.

★I firmly believe the Dhamma of the Buddha is the only true religion.

★I believe that I am having a re-birth.

★I solemnly declare and affirm that I shall hereafter lead my life according to the principles and teachings of the Buddha and his Dhamma.

#जिल्लेइल़ाही_उवाच्

अब इन धर्म परिवर्तित नवबौद्धों यानि थेरवादी वहाबियत के जिहादियों ने भी आम हिंदुओं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है जैसे 2006, महाराष्ट्र में नवबौद्ध महारों व अन्य नवबौद्धों का हिंदू पूजा व आस्थाओं का विरोध और फिर उन्होने हिंदू मंदिरों मे गन्दगी फैला दी,तत्पश्चात देवताओं के स्थान पर अम्बेडकर के चित्र लगा दिये।

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मैं व्यक्तिगत रूप से बौद्ध और नवबौद्ध को हिंदूधर्म के अंतर्गत मानने को तैयार नहीं हूँ और ना ही मानता हूँ साथ ही थेरवादी वहाबियत के इन जिहादियों को चेतावनी भी देता हूँ कि हिंदू नाम और हिंदू जात ढोते हुऐ वहाबियत के थेरवादी जिहादियों अब तैयार रहो क्योंकि मैं भी बचाव की मान्यता को नकारते हुऐ बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार माना जाना, कहा जाना नकारता हूँ!

हिंदी हिंदू हिंदुस्तान,  यही है हमारी मूल पहचान
वन्दे मातरम्

Dr. Sudhir Vyas Posted from WordPress for Android

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