Holy Bible / बाईबिल और ईसाईयत ☞ एक कूटरचित तथ्य जो क्रूरतम सत्य है


ईसाईयत और बाईबिल वेटिकन का वो चेहरा है जिसे बस यूँ कहा जा सकता है कि “एक कूटरचित तथ्य जो मानवता हेतु सिर्फ क्रूरतम सत्य है।”

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सत्ताईस विभिन्न पुस्तकों से संग्रहित, अनेक लेखकों द्वारा लिखी गई, हजारों विरोधाभासों से पूर्ण और मात्र 5 वोट की अधिकता से चुनी गई, ऑर्थिक कौंसिल में 397 ईस्वी में स्वीकृत- “बाईबिल न्यू टेस्टामेंट” अर्थात बाईबिल नव विधान, भला किस तरह प्रेरणादायक व सत्य ज्ञान से ओत-प्रोत और उत्तम हो सकती है?

‘बाईबिल न्यू टेस्टामेंट’ के वर्तमान स्वरूप को तो 1546 ईस्वी में वेटिकन ने वैधता प्रदान की है।

(एल.गार्डनर, ‘ब्लड ऑफ दी होली ग्रेल’ , पृष्ठ 50)

यहाँ ये जान लेना जरूरी रहेगा कि बाईबिल का न्यू टेस्टामेंट यानि नव विधान नामक हिस्सा ईसा मसीह के बाद का ‘लिखित’ है, जिसे ईसा के तथाकथित शिष्यों ने लिखा था, इसमें ईसा (यीशु) की जीवनी, उपदेश और शिष्यों के भी कार्य लिखे गये हैं।

इसकी मूलभाष ‘अरामी’ { Aramaic language एक सेमिटिक भाषा है जो मध्यपूर्व और उसके उत्तरी-केन्द्रीय भाग में पिछले 3000 सालों से बोली जा रही है। यह कई प्राचीन यहूदी तथा इसाई ग्रंथों की भाषा है और माना जाता है कि ईसा मसीह की मातृभाषा आरामाईक ही थी }  भाषा है और अधिकतर बोलचाल की प्राचीन ग्रीक थी, इसमें ख़ास तौर पर चार शुभसंदेश (सुसमाचार) हैं जो ईसा की जीवनी का उनके चार शिष्यों द्वारा वर्णन है : मैथ्यू, लूक, यूहन्ना और मार्कोस .!!

अभी तक ज्ञात ग्रीक / यूनानी बाईबिल की प्राचीनतम हस्तलिपियों का विवरण इस प्रकार है –

(1) वाटिकानुस (चौथी सदी से रोम मे सुरक्षित)

(2) सिनाइटिकुस (चौथी सदी की ब्रिटिश म्यूजियम में)

(3) ‘एलेक्सैंड्रिकुस’ (पाँचवीं सदी की, ब्रिटिश म्यूजियम)

(4) ‘एफ्राएम’ (पाँचवीं सदी की पेरिस का लूग्र म्यूजियम) 

(यहाँ यह भी स्पष्ट कर दूं कि “एफ्राएम” वो गुमा हुआ यहूदी कबीला है जिसे अब जेनेटिक्स और एंथ्रोपोलॉजी के अकाट्य सबूतों द्वारा “पठानों – पश्तूनों” का आफरीदी या अफरीदी कबीला माना जाता है!)

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इनके अतिरिक्त 15 संपूर्ण तथा 4000 से अधिक आंशिक न्यू टेस्टामेंट की यूनानी हस्तलिपियाँ उपलब्ध हैं जिनका लिपिकाल सन् 200 ई. तथा 700 ई. के बीच है।

नव विधान / न्यू टेस्टामेंट की प्राचीनतम हस्तलिपि सन 214 ई. की “पैपीरस चेस्टर बीरी” है और बाईबिल के अंग्रेजी भाषा के निम्नलिखित अनुवाद सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं –

*  ऑयॉराइज़द वर्शन अथवा किंग जेम्स बाइबिल (1811ई.)

*  हुए वर्शन (1609 ई.)

*  काफ्राटर्निटी वर्शन (1941 ई.)

*  आर.ए. नीक्स बाइब्रिल (1944 ई.)

*  न्यू इंग्लिश बाइबिल (1961 ई.)

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उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में प्रोटेस्टैंट मिशनरी कैरे ने बाइबिल का हिंदी अनुवाद तैयार किया था; “धर्मशास्त्र” के नाम से इसके बहुत से संस्करण छप चुके हैं और उसमें संशोधन भी होता रहा है।

मुख्यतया वेटिकनी ईसाई भी कसाई की तरह लफ्फाज़ी और मान्यताओं का खेल रच कर बाईबिल को स्थापित किये थे , वो भी यही कहते हैं कि “बाइबिल ईश्वर प्रेरित (इंस्पायर्ड) है किंतु उसे मानवीय रचना मात्र नहीं कहा जा सकता, ‘ईश्वर/योहोवा’ ने बाइबिल के विभिन्न लेखकों को इस प्रकार प्रेरित किया है कि वे ईश्वर कृत होते हुए भी उनकी अपनी रचनाएँ भी कही जा सकती हैं, योहोवा/ईश्वर ने बोलकर लेखकों से बाइबिल नहीं लिखवाई,हाँ वे लेखक अवश्य ही योहोवा/ईश्वर की प्रेरणा से लिखने में प्रवृत्त हुए किंतु उन्होंने अपनी संस्कृति, शैली तथा विचारधारा की विशेषताओं के अनुसार ही उसे लिखा है अत: बाइबिल ईश्वरीय प्रेरणा तथा मानवीय परिश्रम दोनों का सम्मिलित मानवीय परिणाम है, मानव मात्र के लिये”

यही बातें इस्लाम वाले कसाई भी कहते हैं कि कुरान और इस्लाम मानव मात्र के ही लिये है।

इस पहले भाग में बाईबिल रचना को संक्षिप्त में बतलाने के बाद दूसरे भाग में ईसाई – ईसाईयत और वेटिकन समेत चर्चों के अमानवीय – नरसंहारी कारनामों पर चर्चा होगी !

Dr. Sudhir Vyas Posted from WordPress for Android

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