हिंदू धार्मिकता के तहत जातिगत आरक्षण ☞ ईसाई किस प्रकार हिंदू व्यवस्था के तहत अधिकारी हैं ? {भाग 2}


मुसलोईड_तथा_ईसलोईड  – हिंदुत्व के चोर

मित्रों आइये अब बात करते हैं ईसाईयों में फैले घोर जातिवाद और भेदभाव की, जब 52 ईस्वी में ईसाई मिशनरी सेंट थॉमस भारत आया तो उसने मालाबार के लोगों को धर्मांतरित करना शुरू किया।

सेंट थॉमस द्वारा धर्मान्तरित किए गए लोग खुद को नम्बूदरी ब्राह्मण बताते हैं और इसीलिए ये भारत के ईसाईयों में सबसे उच्च होते हैं। इनके ईसाईयत वर्ग को Syrian Christian कहा जाता है, ये अन्य जातियों के ईसाईयों के स्पर्श होने पर Holy Bath लेते हैं, ये शादियां भी सिर्फ खुद की जाति में ही करते हैं।

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इसी तरह से केरल में Latin Christian भी खुद को ऊँची जाति का मानते हैं। इसी तरह गोवा में पुर्तगालियों ने जब जबरन धर्मान्तरण किया तो वाहन के ब्राह्मण धर्मान्तरित होकर Bamonns बन गए, वहां के Vaishya Vanis धर्मान्तरित होकर Chardos बन गए। उनसे निचा दर्जा Gauddos को दिया गया। शुद्र को धर्मान्तरित करने के बाद Sudir नाम दिया गया और शेष बचे हुए धर्मान्तरण के बाद भी चमार और महार ही कहलाए। Pastor के पद पर Gaonkar ईसाई लोगों का ही दबदबा है। तमिलनाडु का तो हाल इससे भी बुरा है वहां के नाडर समुदाय के लोग संख्याबल में तो तमिलनाडु के ईसाईयों का केवल 3 प्रतिशत हैं लेकिन चर्च पर पूरा नियंत्रण उनका ही रहता है। भारत के ईसाईयों में 80% दलित हैं लेकिन 156 कैथोलिक Bishop में केवल 6 बिशप ही दलित हैं। अंतरजातीय विवाह तो दूर की बात है इनमें तो दलितोँ को उच्च जातीय ईसाईयों के कब्रिस्तान में शव भी नहीं दफ़नाने देते। रोमन कैथोलिक चर्च में तो बैठने की सीट से लेकर Chalice(प्याला)भी अलग होता है, बल्कि कुछ जगह तो चर्च ही अलग होते हैं। दलित ईसाईयों के हजारों लोग तो वापिस हिन्दू धर्म में आ रहे हैं उनका कहना है कि “इतना भेदभाव तो हिंदुओं में ही नहीं होता और कम से कम वहां आरक्षण तो मिलता है।”  😁😁

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ईसाईयत में जातिवाद

मेहरबान जेम्स द्वारा लिखा गया एक जबरदस्त सच्चा लेख नीचे शेयर कर रहा हूँ गौर कीजिए –

चर्च में दलित ईसाईयों से गैर-बराबरी का यह आलम है कि दलितों के लिए बैठने का अलग स्थान, पीने के लिए पानी का अलग गिलास दफन करने के लिए कब्रिस्तान भी अलग होता है.

भारत में ईसाई धर्म की शुरूआत ही गैर-बराबरी की नींव पर हुई थी. यहां उसे साफ तौर पर दो वर्गों में बंटा हुआ देखा जा सकता है. एक तरफ संपन्न वर्ग हो जो उच्च जाति से आया है जिसने अधिकांश उच्च पदों और संसाधनों पर कब्जा कर रखा है. तो दूसरी ओर दलित वर्ग से धर्मांतरण कर ईसाई बने लोगों का तबका है जो इस उम्मीद में ईसाई बने थे कि ऐसा करके उन्हें हिन्दू जाति व्यवस्था के दुर्गुणों से मु्क्ति मिल जाएगी. उन्हें उम्मीद थी कि ईसाई बनने के बाद वे सम्मानजनक जीवन जी सकेंगे. लेकिन ईसाई बनने के बाद भी वे गैर बराबरी के शिकार बने रहे. जाति ने यहां भी उनका पीछा नहीं छोड़ा.

असल में दक्षिण में ईसाईयत में भी जाति व्यवस्था अपने उसी क्रूरतम रूप में है जैसा कि हिन्दू समाज में. चेन्नई से 60 किलोमीटर दूर चेंगलपट्टू  जिले के केकेपुड्डुर गांव में ढाई हजार ईसाई रहते हैं. इसमें दलित ईसाईयों की तादात 1500 है. इस पूरी कैथोलिक आबादी पर नायडू व रेड्डी जाति से धर्म परिवर्तन करके आये लोगों का कब्जा है. वह चर्च से लेकर कब्रिस्तान तक भेदभाव को बनाये रखते हैं और हर ईसाई त्यौहार पर इन दलितों का दोयम दर्जा कायम रहता है. इस गैरबराबरी को तोड़ने के लिए सेंट जोजफ के जन्मदिन पर दलित ईसाईयों ने स्वयं कार्यक्रम आयोजित करने का फैसला किया. बस इतनी सी बात पर ऊंची जाति के ईसाईयों ने उनके ऊपर हमला बोल दिया. इस झगड़े में 84 लोगों को जेल जाना पड़ा और वे लोग छह महीने जेल में बंद रहे. 

कर्नाटक में दलित क्रिश्चियन फेडरनेशन के संयोजक मेरी सामा कहते हैं कि हमें गांवों के कुछ क्षेत्रों में प्रवेश नहीं करने दिया जाता. सन 2000 में आंध्र प्रदेश में जब पहला आर्क विशप वेटिकन ने मनोनीत किया तो वहां काफी हंगा हुआ और हटाये हुए आर्कविशप ने सार्वजनिक बयान दिया कि भारत की जमीनी सच्चाई के बारे में वेटिकन अनभिज्ञ है. 

ईसाई धर्म के तीन स्तंभ हैं. प्रीचिंग, टीचिंग और हीलिंग. इसका मतलब है कि खुदा की इबादत करो, लोगों को शिक्षित करो और रोगियों की सेवा करो. इन तीन कामों के लिए इसाईयों ने विश्वभर में अपनी संस्थाएं खोल रखी हैं. सालाना इन संस्थाओं के माध्यम से 145 अरब डालर खर्च किये जाते हैं. चर्च संगठनों के अधीन 50 लाख से अधिक पूर्णकालिक कार्यकर्ता हैं जो कि दुनियाभर में शिक्षा के जरिए ईसाईयत के प्रसार का काम कर रहे हैं. भारत में भी लगभग सभी मिशनरियां इसी काम में लगी हुई हैं. देश के अधिकांश प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान ईसाईयों के ही हैं. तीसरा काम हीलिंग का आता है तो ईसाई मिशनरियों के अस्पताल शहरों से लेकर आदिवासी इलाकों तक फैले हुए हैं.

ईसा मसीह ने कहा था कि “सूई की नोक से ऊंट का निकलना संभव है लेकिन किसी धनवान का स्वर्ग में प्रवेश नामुमकिन है. लेकिन आज उन्ही ईसा मसीह के नाम पर काम करने वाली संस्थाओं में ही गरीबों का प्रवेश वर्जित है. चर्च, शिक्षण संस्थाओं और स्वास्थ्य सेवा प्रदान करनेवाली संस्थाओं के उच्च पदों पर उन्हीं लोगों का कब्जा है. गरीब ईसाई न तो अपने बच्चों को उन स्कूलों में शिक्षा दिलवा सकते हैं जो ईसाईयत के नाम पर बने हैं न ही बीमार होने पर इन अस्पतालों में इलाज करवा सकते हैं. आज प्रीचिंग, टीचिंग व हीलिंग के सभी केन्द्र व्यापारिक संस्थानों में बदल दिये गये हैं. एक तरह से ईसा के मुख्य मिशन को ही इन मिशनरियों ने समाप्त कर दिया है. 
चर्च में दलित ईसाईयों से गैर-बराबरी का यह आलम है कि दलितों के लिए बैठने का अलग स्थान, पीने के लिए पानी का अलग गिलास दफन करने के लिए अलग कब्रिस्तान होता है. दलित बच्चों को इन चर्चों में अल्टर ब्वाय या लेक्टर बनने की इजाजत नहीं होती है. यहां दलितजाति से आयी ननों के साथ शोषण की घटनाओं का किस्सा तो अलग ही है. ऐसा नहीं है कि भारत में ईसाईयों के बीच इस भेदभाव से वेटिकन अवगत नहीं है लेकिन उसका कोई भी प्रयास इस दिशा में अब तक सामने नहीं आया है. चर्च आज भी उसी पुराने रूप में कायम है जिस तरह से पहले संपन्न लोगों के पापमोचन के लिए वह स्वर्ग के दरवाजे खोलने का काम करता था. वेटिकन भारत के दलित ईसाईयों के बारे में कोई बात नहीं करता. उल्टे वेटिकन साम्राज्यवादी अमेरिका के साथ खड़ा रहता है. इसी का नतीजा है कि लैटिन अमेरिका के ईसाईयों ने लिब्रेशन थियोलाजी के नाम से पोप के खिलाफ आंदोलन चला रखा है.

सवाल यह है कि भारत में जिस जाति उत्पीड़ने से त्रस्त होकर शोषण मुक्ति की चाह में हमने ईसाई धर्म अपनाया था उसका फायदा क्या हुआ? न तो हमारा कोई आर्थिक उत्थान हुआ और न ही हमें जातिवाद के कलंक से छुटकारा मिला. अब समय आ गया है कि अपने हितों की रक्षा के लिए हम स्वदेशी चर्च स्थापित करें वेटिकन के साम्राज्यवाद से अपने आप को पूरी तरह मुक्त कर लें.

(मेहरबान जेम्स दलित क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेन्ट के उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष हैं.)

मूल लेख हेतु निम्नलिखित लिंक पर क्लिक करें।
http://www.visfot.com/old12/index.php?news=240

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अब यहाँ उपरोक्त लेख का उदाहरण देते हुऐ मैं सिर्फ यही कहना चाह रहा हूँ कि जाति और वर्ग विहीन ईसा की ईसाईयत तथा गडेरिये की समान भेडों में उंची जाति, नीची जाति, महार, चमार, ब्राह्मण, आदिवासी आदि सरीखा जातिवाद वेटिकन से आया या बाईबिल से अथवा ईसाई भी मनुवादी है और भारतीय ईसाईयत में मनु महाराज व मनुसंहिता ही मान्य है बनिस्पत बाईबिल ..??

भाग 4 से ईसाईयत के कुत्सित जातिवाद पर और बाकी सब ,तब तक सब जय जय है।
वन्दे मातरम्

जरूरी लगे तो ही शेयर करना मित्रों, क्योंकि अब
#भारत_That_Was_India बनाना है।  😃😊

Dr. Sudhir Vyas Posted from WordPress for Android

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