हिंदू धार्मिकता के तहत जातिगत आरक्षण ☞ मुसलमान किस प्रकार हिंदू जाति व्यवस्था के तहत ओबीसी बन कर अधिकारी हैं ? {भाग 3}


इस्लाम खतरे में है  UN – ISIS – सऊदी अरब – ईरान समेत AIMPLM , ओवैसी, आजम काँग्रेस, बीजेपी वगैरह वगैरह देखो भारत में बुनियादी इस्लाम अपनी शिक्षाओं और नियमों के साथ भारतीय मुसलमानों के कारण पूरी तरह खतरे में है!

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इस्लाम के शरियत में यानि कुरान – हदीस में , किसी शरई नियम कानून में जाति व्यवस्था / जातिप्रथा का उल्लेख है ही नहीं, फिर भारत के मुसलमानों में हिंदू – हिंदुत्व की नकल करके हिंदू जाति व्यवस्था किस तरह से कायम है..??

क्या भारत के मुसलमान, वेद – उपनिषद् – मनु संहिता के अनुसार चलते हैं, इस्लाम – शरिया की मूल व्यवस्था से नहीं..??

मित्रों,  प्रमुख धार्मिक समुदाय इस्लाम – ईसाई , पारसी , यहूदी जो भारत से शुरू या भारत पर ही आधारित नहीं हैं ना ही उनके मुख्य आस्था – पूजनीय स्थल ही भारत में स्थित हैं, वे अभी भी अपने निजी कानूनों का ही पालन कर रहे हैं।

जहां मुसलमानों, ईसाइयों, पारसियों और यहूदियों के उनके स्वयं के भारतीय संवैधानिक मान्यता प्राप्त निजी कानून हैं (उदाहरणार्थ शरिया – शरियत) , तो वहीं हिंदू, जैन, बौद्ध और सिख लोग ‘हिंदू पर्सनल लॉ’ नामक “संसद रचित संवैधानिक कानूनों द्वारा शासित” होते हैं, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 (2) (बी) में कहा गया है कि हिंदुओं में “सिक्ख, जैन तथा बौद्ध धर्मं का पालन करने वाले व्यक्तियों” को भी शामिल किया जायेगा।

★  इसके अलावा हिंदू विवाह अधिनियम 1955, जैनियों, बौद्ध, तथा सिक्खों की क़ानूनी स्थिति को इस प्रकार परिभाषित करता है – क़ानूनी रूप से हिंदू परन्तु “धर्म के आधार पर हिंदू नहीं” !!

भारत के धर्मनिरपेक्ष (“नागरिक”) कानून के तहत आने वाला एकमात्र भारतीय धर्म ब्रह्मोइज्म / ‘बहाई’ धर्म है, जो 1872 के अधिनियम 3 से प्रारंभ होता है।

★  भारत में मुसलमान “मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अनुप्रयोग अधिनियम, 1937 द्वारा शासित हैं, जिसमें भी जातिव्यवस्था का कोई उल्लेख नहीं है” यह मुसलमानों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ को निर्देशित करता है जिसमें शादी, महर (दहेज), तलाक, रखरखाव, उपहार, वक्फ, चाह और विरासत शामिल है।

आम तौर पर अदालत सुन्नियों, के लिए हनाफ़ी सुन्नी कानून को लागू करती है, शिया मुसलमान के कुछ निजी कानून सुन्नी कानून से अलग है,अत: वर्ष 2005 में, भारतीय शिया ने सबसे महत्वपूर्ण मुस्लिम संगठन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ से नाता तोड़ दिया और उन्होंने ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के रूप में स्वतंत्र लॉ बोर्ड का गठन किया।

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कई प्रमाणित सूत्रों से संकेत मिलता है कि “भारत के मुसलमानों के बीच जाति सिर्फ ‘काफ़ा’ (Kafa’a) की अवधारणा के परिणामस्वरूप हुआ” और इसका शरियत – कुरान – इस्लाम से कोई लेना देना ही नहीं है, बल्कि ये इस्लाम की मूल शिक्षाओं के विरुद्ध है, यानि इस्लाम विरूद्ध है, और मुसलमान समुदाय / Community के किसी भी फिरके (सुन्नी – शिया इत्यादि में) इस जाति / समुदाय / Communities को शरियत – इस्लाम के अनुसार बिदअत या Bid’ah कहा जा सकता है यानि कि संक्षिप्त में इस्लाम विरूद्ध – कुफ्र / शिर्क भी!

यहाँ बिदअत और Bid’ah का मतलब बतला देना जरूरी समझता हूँ  ‘बिदअत’ का मतलब है – 

‘बिदअत से मतलब ऐसी बात या प्रथा – व्यवस्था से हैं जो पहले मौजूद न हो’ , शरीयत इस्लाम मे बिदअत के माने हर वो बात – रिवाज़ – प्रथा – काम  बिदअत कहलाता है जो नेकी समझ कर किया जाये लेकिन शरियत मे इसकी कोई बुनियाद व सबूत न हो यानि न तो नबी सल्ललाहो अलेहे वसल्लम ने खुद उस अमल को किया हो, न तो किसी और को हुक्म दिया हो और न किसी को इसकी इजाज़त दी हो!

मुसलमान समुदाय / Community में अवैध जाति प्रथा – जातियों / Communities को स्पष्टतः बिदअद / Bid’ah ही कहा जा सकता है, उस संदर्भ में मुसलमानों व संविधान कानूनों के जानकार हेतु सुन्नी मुसलमानों की शरियत का उल्लेख नीचे कर रहा हूं जो अकाट्य है।

“क़यामत के रोज़ जब नबी सल्ललाहो अलेहे व सल्लम हौज़े कौसर से अपनी उम्मत को पानी पिला रहे होगें तो कुछ लोग आयेगें जिन्हें नबी सल्ललाहो अलेहे व सल्लम अपनी उम्मत समझेगें लेकिन फ़रिश्ते बतायेगें के ये वो लोग है जिन्होने आप के बाद बिदअत शुरु कर दी तो नबी सल्ललाहो अलेहे व सल्लम फ़रमायेगें के दफ़ा और दूर हो वो लोग जिन्होने मेरे बाद दीन को बदल डाला!”
(बुखारी व मुस्लिम)

Bid’ah –  “In Islam, Bid’ah (Arabic: بدعة) refers to any innovations in religious matters. Linguistically the term means “innovation, novelty, heretical doctrine, heresy”. In contrast to the English term “innovation”, the word bid’ah in Arabic generally carries a negative connotation.”

भारत के मुसलमानों की जाति व्यवस्था / जातियों / Communities में जिन लोगों को अशराफ/सवर्ण/सामान्य वर्ग के रूप में सन्दर्भित किया जाता है, उन्हें ऊंचे स्तर का माना जाता है और उन्हें यानि अशराफ को विदेशी अरब वंश का माना जाता है, जबकि अजलाफ को हिंदू धर्म से धर्मान्तरित होने वाला मुसलमान माना जाता है और उन्हें निचली जाति का माना जाता है, भारत सहित, वास्तविक मुस्लिम सामाजिक व्यवहार, कठोर सामाजिक ढांचे के अस्तित्व की ओर इशारा करता है जिसे कई मुस्लिम विद्वानों ने काफ़ा की धारणा के साथ सम्बंधित फिक के विस्तृत नियम के माध्यम से उचित इस्लामी मंजूरी प्रदान करने की कोशिश की.

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प्रमुख मुस्लिम विद्वान मौलवी अहमद रजा खान बेरलवी और मौलवी अशरफ अली फारूकी थानवी जन्म पर आधारित श्रेष्ठ जाति की अवधारणा के ज्ञाता हैं, और इसके संदर्भ में उल्लेखनीय रूप से यह तर्क दिया जाता है कि अरब मूल (सैयद और शेख) के मुस्लिम गैर-अरब या अजामी मुस्लिम से श्रेष्ठ जाति के होते हैं और इसलिए जब कोई आदमी अरब मूल का होने का दावा करता है तो वह अजामी महिला से निकाह कर सकता है जबकि इसके विपरीत संभव नहीं है।

इसी तरह का एक प्रमुख “भारतीय इस्लामिक” तर्क है, एक पठान मुस्लिम आदमी एक जुलाहा (अंसारी) मंसूरी (धुनिया), रईन (कुंजरा) या कुरैशी (कसाई या बूचड़) महिलाओं से निकाह कर सकता है लेकिन अंसारी, रईन, मंसूरी और कुरैशी आदमी पठान महिला से निकाह नहीं कर सकता है, चूंकि ऐसा माना जाता है कि पठान के मुकाबले ये जातियां निचली हैं, इनमें से कई उलेमा यह भी मानते हैं कि अपनी जाति के भीतर ही निकाह सबसे अच्छा होता है सो इसी कारण भारतीय इस्लाम के मुसलमानों में घरेलू रिश्तों, रक्त संबंधियों में तथा हिंदुओं की ही तरह सजातीय विवाह का कठोरता से पालन किया जाता है।

दक्षिण एशिया के कुछ भागों में मुसलमान, अशराफ और अजलाफ तथा अरजाल के रूप में विभाजित हैं, अशराफ, विदेशी वंश से उत्पन्न अपनी “ऊंची जाति/नस्ल” का दावा करते हैं।

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हिंदू धर्म से धर्मान्तरित होने वाले को गैर-अशराफ/निचली जाति/ नीची नस्ल / अजलाफ माना जाता है और ‘अरजाल’ को तो लगभग अछूत सरीखे मुसलमान माना जाता है इसलिए वे भी अजलाफ की ही तरह ‘स्वदेशी आबादी’ होते हैं और वे भी वैकल्पिक रूप से कई उपजातियों / समुदायों / Communities में विभाजित हो जाते हैं।

उलेमा की धारा (इस्लामी न्यायशास्त्र के विद्वानों) काफ़ा की अवधारणा की मदद से धार्मिक जाति वैधता प्रदान करते हैं।

मुस्लिम जाति व्यवस्था के विद्वानों की घोषणा का एक शास्त्रीय उदाहरण फतवा-ऐ- जहांदारी है, जिसे तुर्की विद्वान जियाउद्दीन बरानी द्वारा चौदहवीं शताब्दी में लिखा गया था, जो कि दिल्ली सल्तनत के तुगलक वंश के मुहम्मद बिन तुगलक दरबार के एक सदस्य थे, बरानी को उसके कठोरता पूर्वक जातिवादी विचारों के लिए जाना जाता था और अजलाफ़ मुसलमानों की तुलना में से अशरफ मुसलमानों को नस्ली रूप से ऊंचा मानते थे उन्होंने मुसलमानों को ग्रेड और उप श्रेणियों में विभाजित किया उनकी योजनाकार नजर  सभी उच्च पद और विशेषाधिकार, भारतीय मुसलमानों की बजाए तुर्क/अरब मूल से जन्म लेने वाले का एकाधिकार हैं को ही परिभाषित करती है, यहां तक कि मुसलमानों की एकमात्र पवित्रतम पुस्तक ‘कुरान’ की अपनी बुनियादी बात कि “वास्तव में, आप लोगों के बीच सबसे पवित्र अल्लाह हैं” को भी महान जन्म के साथ धर्मनिष्ठता का जुड़े होने की मान्यता / प्रथा / विचार से ही जुडे होने को मानते हैं।

बरानी अपने सिफारिश पर सटीक थे अर्थात “मोहम्मद के बेटे/वंशज” {यानी अशराफ} ” को धर्मान्तरित मुसलमानों [यानी अजलाफ़ और अरजाल] की तुलना में एक बहुत ही उच्च सामाजिक स्थान दिया, फतवा में उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान “इस्लाम के लिए सम्मान के साथ” भारत में इस्लामिक धर्मान्तरण के फलस्वरूप जातियों का उनका विश्लेषण था “, उनका दावा था कि जातियों को राज्य कानून या “ज़वाबी” के माध्यम से अनिवार्य किया जाएगा और जब कभी सहूलियत होगी तब शरीयत कानून पर पूर्ववर्तिता को लाया जाएगा !!

फतवा-ऐ- जहांदारी (सलाह 21) में उन्होंने “उच्च जन्म के गुण” के बारे में “धार्मिक” और “न्यून जन्म” के रूप में “दोष के संरक्षक” लिखा था।

यानि कि हर कार्य जो “दरिद्रता से दूषित और अपयश पर आधारित नज़ाकत से [अजलाफ़ से] आता है” !!

बरानी के पास अजलाफ़ के लिए एक स्पष्ट तिरस्कार था और दृढ़ता से उन्होंने उनके शिक्षा से वंचित करने की सिफारिश की है, क्योंकि ऐसा न हो कि वे अशरफ की स्वामित्व को हड़प लें, उन्होंने प्रभाव मंजूरी के लिए धार्मिक मांग को उचित माना है,, साथ ही बरानी ने जाति के आधार पर शाही अधिकारी (“वजीर”) की पदोन्नति और पदावनति की एक विस्तृत प्रणाली को विकसित किया।

अशराफ/अजलाफ़ के रक्तानुसार जातिगत और जन्मानुसार जातिगत विभाजन के अलावा, मुसलमानों में एक अरज़ाल वर्ग भी होता है, जिसे बाबासाहेब अम्बेडकर की तरह जाति-विरोधी दलित – अछूत कार्यकर्ता के रूप में माना जाता है जो कि एक अछूत की तरह ही हैं,इनसे अजलाफ मुसलमान भी संबंध नहीं करते।

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“अरज़ाल” शब्द का संबंध “अपमान” से होता है और अरज़ाल जाति को भनर, हलालखोर, हिजरा, कस्बी, ललबेगी, मौग्टा, मेहतर ,भंगी ,कसाई, कसाब, कुरैशी आदि में बांटा गया है जिसका उल्लेख मैने भाग 1 में भी संपूर्ण श्रैणियों में किया है।

मुसलमान जातिवाद के अरज़ाल समूह को 1901 की भारत की जनगणना में दर्ज किया गया था और ‘इन्हें पता नहीं कैसे अपरिवर्तनीय शरिया वाले इस्लाम के विरूद्ध जा कर दलित मुस्लिम भी कहा जाता है’

“इन अरज़ाल जातिगत मुसलमानों के साथ और मुसलमान नहीं जुड़ते और इन्हें मस्जिद में प्रवेश करने और सार्वजनिक कब्रिस्तान का इस्तेमाल करने से अप्रत्यक्ष तौर पर वर्जित किया जाता है।”
इन अरज़ाल मुसलमानों को सफाई करना और मैला ले जाना जैसे “छोटे / घृणित व्यवसायों” के लिए दूर रख कर अपमानित ही किया जाता है और यह भी पूरी तरह इस्लाम – शरियत के विरूद्ध बिदअत / Bid’ah सरीखा कुकर्म ही है।

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{इस उपरोक्त तस्वीर को जूम करके पढें, आधिकारिक व सरकारी तौर पर यह पत्र पोल खोल रहा है कि मुसलमानों को ओबीसी में वर्ग या समुदाय / Communities की लफ्फाज़ी करते हुऐ ही नहीं अपितु खुल्लमखुल्ला “जाति / Caste” के आधार पर ही शामिल किया गया है! }

मुस्लिम समुदाय की अधिकांश जातियाँ “समुदाय /Communities” की शाब्दिक लफ्फाज़ी का सहारा ले कर  पिछड़े या निम्न जाति /Communities कहला कर ओबीसी – OBC में हिंदुओं की तरह शामिल हो गई हैं जिनमें  अंसारी , कुंजडा , लोहार , धुनिया , कुंजर ,  चूडीहार , मनिहार , धोबी और हलालखोर आदि इत्यादि शामिल हैं।

उच्च और मध्यम जाति के मुस्लिम समुदायों में सैयद, शेख, शैख्ज़दा, खानजादा, पठान, मुगल और मलिक शामिल हैं, जिनमें से भी कई जातियाँ शाब्दिक लफ्फाज़ी – अपभ्रंश तक का सहारा लेकर OBC – पिछडा वर्ग में शामिल हो गई हैं।

मुसलमानों का प्रमाणिक आनुवंशिक डेटा भी इस गैर इस्लामिक, गैर शरई और गैर संवैधानिक स्तरीकरण का समर्थन करते हुऐ मुसलमानों के जातिवाद की पोल खोलता है जिसे सरकार Muslim Community में OBC राज’नीति को कायम रखते हुआ Muslim Community में ‘समुदाय / जाति / Communities’ के शाब्दिक खिलवाड़ के साथ परिभाषित करके ओबीसी बनाती है, अब कोई पूछे कि Muslim Community / मुसलमान समुदाय में Communities / समुदायों की गुंजाईश कैसे पैदा हुई जबकि फिरका वही है??

इसे ध्यान में रखना चाहिए कि भारत में अरबी वंश के लिए अधिकांश दावे त्रुटिपूर्ण हैं और स्थानीय शरीयत में अरबी प्राथमिकताओं की ओर इशारा करते हैं।

साथ ही इस भाग 3 द्वारा प्रमाणित रूप से ,फतवा ऐ जहाँदारी आदि के उल्लेखों द्वारा यह भी साबित होता है कि हिंदू धर्म की व्यवसाय आधारित वर्ण व्यवस्था को मुसलमानों (तुर्क – अरब मुसलमानों) द्वारा अपनी विजयी श्रेष्ठता और अंहकार को बनाये रखने हेतु जबरन जन्म आधारित जाति व्यवस्था के रूप में बलात् बदला गया मुसलमानों पर लादा गया वो भी जानते हुऐ कि यह बिदअत / Bid’ah है, गलत है, इस्लाम विरूद्ध है  और यही नहीं मुसलमानों ने तुर्क – अरब आक्रमणकाल में इसे जबरन हिंदू धर्म पर भी थोप कर स्थापित किया गया!

जिल्लेइल़ाही_उवाच् –

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अब कोई मुसलोईड या हिंदू मोमिन या जय मीम जय भीम करता बुद्धिपिशाच बताओ मुसलमानों का “भारतीय इस्लाम” कौन से ब्राह्मणवाद – मनुवादिता को मानता है और इन काफिरों की बिदअत / Bid’ah से ही इस्लाम और भारत के संविधान समेत हिंदू और हिंदुत्व खतरे में क्यों नहीं है..???

क्रमश:

Dr. Sudhir Vyas Posted from WordPress for Android

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2 Comments Add yours

  1. बहुत ज्ञानवर्धक लेख ….मुस्लोइड्स के दावों के परखच्चे उड़ा दिए भाई जी

    Liked by 1 person

    1. जिल्लेइल़ाही इन बे’ईमानवालों के अल़ कायम हैं! 😁😉

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